Saturday, 10 October 2015

तब बच्चों की मौतें क्यों हो रही हैं। कैम्प के लोग बेहाल क्यों


लखनऊ: प्रदेश सरकार दंगा पीडि़तों को दोजून की रोटी पर तीन करोड़। टेंट, कपड़े, बर्तन व मिट्टी के तेल पर एक करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है। देश की मुख्तलिफ तंजीमें (संस्थाएं) करोड़ों की इमदाद भेज रही हैं। ऐसे में सवाल ये है कि तब बच्चों की मौतें क्यों हो रही हैं। कैम्प के लोग बेहाल क्यों हैं? सूत्रों का कहना है कि इमदाद में घोटालेबाजी हो रही है। पीडि़तों को जरूरत की खाद्य सामग्र्री नहीं मिल रही है।
27 अगस्त को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर, शामली और बागपत में सांप्रदायिक उपद्रव की शुरूआत और फिर  दंगा भड़कने के बाद बड़ी संख्या में लोगों ने गांव छोड़कर राहत शिविरों में शरण लेनी शुरू की थी। स्थानीय लोगों के अलावा सरकार ने भी पीडि़तों के लिए खाद्य सामग्र्री के इंतजाम का दावा शुरू किया। सूत्रों का कहना है कि कुछ दिनों के अन्दर ही सरकारी मदद से कई गुना अधिक इमदाद दिल्ली, यूपी के मुख्तलिफ हिस्सों, उत्तराखण्ड़, पश्चिम बंगाल और क्षेत्रीय लोगों ने कैम्पों में भेजनी शुरू कर दी थी। बावजूद इसके कैम्पों का हाल-बदहाल है।
ठंड बढऩे के साथ ही बच्चों की मौतों का सिलसिला शुरू हो गया है। गैरसरकारी आंकड़ों के मुताबिक अब तक 50 बच्चों की मौत हो चुकी है। स्थानीय लोगों और स्वास्थ्य अधिकारियों ने दबी जुबान स्वीकार किया कि कई बच्चे निमोनिया जैसी बीमारियों के शिकार हो गए थे। यानी उन्हें सर्दी से बचाने और खाने के लिए पर्याप्त भोजन नहीं मिल पा रहा है। सवाल ये है कि आखिर सरकारी और गैर सरकारी इमदाद जा कहां रही है? क्या इसमें भी घोटाला हो रहा है। सूत्रों पर भरोसा करें तो दंगा पीडि़तों के लिए जुटाई जा रही इमदाद की रकम में भी खासा घोटाला हो रहा है।
सरकार ने इमदाद का पूरा ब्योरा तैयार करने की अधिकारियों को हिदायत दी थी लेकिन कुछ खास की नाराजगी के डर  और कुछ कर्मचारियों की मिलीभगत के चलते वह ब्योरा भी तैयार नहीं हो रहा है। कैम्प चलाने वाले लोग यह तो स्वीकारते हैं कि राहत शिविरों को लिए इमदाद मिल रही है लेकिन कहां से क्या आया? इसका कोई ठोस ब्योरा किसी के पास उपलब्ध नहीं है। अलबत्ता यूपी के मुख्य सचिव जावेद उस्मानी ने शुक्रवार को शाम आनन-फानन में बुलायी गयी पत्रकार वार्ता में कहा था कि राहत शिविरों में सब कुछ ठीक है। मीडिया लोगों को गुमराह कर रहा है। हालांकि बच्चों की मौतों पर उन्होंने जुबान बंद रखी। उन्होने कहा कि मेरठ का कमिश्नर बच्चों की मौत के कारणों की जांच कर रहे हैं, रिपोर्ट आने पर ही कुछ कह पाएंगे।


दंगा शिविर
-58 हजार लोगों ने दंगा राहत शिविर में शरण लिया (मुजफ्फरनगर में 41, शामली में 17 शिविर)
सरकारी भोजन सामग्र्री: राहत शिविर में रहने वालों के लिए खाद्य सामग्र्री आटा, दाल, चावल, नमक, खाद्य तेल, आलू, चीनी, साबुन, दूध और मसाला पर तीन करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। सरकार स्वीकारती है कि जन सामान्य के सहयोग से इन वस्तुओं से बना बनाया खाना भी कैम्पों में लगातार उपलब्ध करायी जा चुकी है।
निवास व अन्य: सरकार का दावा है कि स्टील के खाने के बर्तन, ग्लास, तौलिया, महिलाओं, बच्चों के कपड़े, पाउडर दूध, माचिस, टेंट, गैस सिलेण्डर पर आदि पर एक करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। लकड़ी वन विभाग उपलब्ध करा रहा है।
यूपी, दिल्ली और उत्तराखण्ड की निजी संस्थाओं की मदद: आटा, दाल चावल, लकड़ी, कपड़े, टेन्ट, रोटियां, साबुन, तेल, कंबल, गद्दे, नकद राशि, स्टील की प्लेट, मिट्टी का तेल, बिस्किट के पैकेट, मिल्क पैकेट

तब बच्चों की मौत क्यों: इतनी बड़ी मात्रा में सरकारी और गैर सरकारी इमदाद के बावजूद आखिर कैम्पों में रह रहे बच्चों की असमय मौतें क्यों हो रही हैं। क्या दंगा पीडि़तों के लिए पहुंच रही सामग्र्री और धनराशि में भी घोटाला शुरू हो गया है।

--------------------
सरकारी आंकड़े
------------------
-मेरठ, बागपत, सहारनपुर और शामली में सांप्रदायिक ंिहंसा में 65 व्यक्तियों की जान गयी और 85 लोग जख्मी हुए।
-मारे गए परिवार के आश्रितों को 10-10 लाख रुपए की आर्थिक सहायता पर 6 करोड़ 35 लाख रुपए खर्च हुए।
- मृतकों के आश्रितों में 58 व्यक्तियों को सरकारी नौकरी दी गयी।
-प्रधानमंत्री सहायता कोष से मारे गए व्यक्तियों के परिवार को दो-दो लाख रुपए की मदद
-मारे गए पत्रकार के परिवार को 10 लाख की मदद
-गंभीर घायलों को 50-50 हजार की आर्थिक मदद
-साधारण रुप से घायल 51 व्यक्तियों को 20-20 हजार
-ंिहसक घटनाओं के 74 घायलों को रानी लक्ष्मी बाई पेंशन
-चल, अचल संपत्तियों का 50 हजार नुकसान पर 50 हजार और एक लाख के नुकसान पर एक लाख की मदद
-इससे एक लाख से ऊपर के नुकसान पर वास्तिवक आगणन के आधार पर सहायता
-------------------

No comments:

Post a Comment