Friday, 4 July 2025

लोकायुक्त की सुरक्षा पर सात करोड़ खर्च, बिग इंवेस्टीगेशन शून्य ?

 लोकायुक्त संगठन कथा-3

परवेज़ अहमद

लखनऊ। आप क्या जानते हैं कि उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त को नौ सालों से वाई श्रेणी सुरक्षा है ? जबकि  लोकायुक्त एवं उपलोकायुक्त अधिनियम। उप नियम। राज्य सरकार के बिजनेस रूल। लोकायुक्त की सेवा शर्तों में इतनी गहरी सुरक्षा दिये जाने का कहीं उल्लेख नहीं है। वास्तव में गरीब-गुर्बो, तंत्र से निराश हो रहे लोगों को न्याय दिलाने के लिए लोकायुक्त संगठन का गठन किया गया था, मगर 2016 से जनता के धन से उपमुख्यमंत्रियों जैसी सुरक्षा क्यों उपलब्ध कराई जा रही है ? लखनऊ कमिश्नरेट पुलिस, लोकायुक्त के प्रशासनिक सतर्कता विभाग के पास इसका जवाब नहीं है। दरअसल, यूपी सरकार के दो दर्जन मंत्रियों, बाहुबली विधायकों, नौकरशाहों के विरुद्ध लोकायुक्त की रिपोर्ट पर कार्रवाई के बाद 2015 में तत्कालीन लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा को मिल रही धमकियों की इंटेलीजेंस रिपोर्ट के बाद व्यक्तिगत सुरक्षाके लिए एक पीएसओ और चार सशस्त्र सिपाहियों वाली एस्कोर्ट अखिलेश यादव सरकार ने उपलब्ध करायी थी। उसके पहले उन्हें सिर्फ एक गनर मिला था। मेहरोत्रा के पद से हटने के बाद नये लोकायुक्त न्यायमूर्ति संजय मिश्र ने नौ साल के कार्यकाल में जाहिरा तौर पर ऐसी कोई जांच नहीं की है, जिसके चलते जनता की सुरक्षा में कटौती करके उन्हें सुरक्षा उपलब्ध करायी जाए।

इस समय उत्तर प्रदेश की औसतन आबादी 24 करोड़ है। राज्य में उपलब्ध पुलिस बल की संख्या से इसका भाग दिया जाए तो तकरीबन 841 ( आठ सौ इकतालिस) नागरिकों की सुरक्षा के लिए सिर्फ एक सिपाही आता है। जब कभी अपराध का ग्राफ बढ़ता है। यातायात संचालन में दिक्कत होती है, तब पुलिस अधिकारी फोर्स नहीं होने की बात को ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैं। मगर लखनऊ में ढेरों को लोगों को स्टेटस सिंबल के लिए पुलिस सुरक्षा मिली हुई है। लोकायुक्त संगठन भी इसमें से एक है। मौजूदा समय में लोकायुक्त न्यायमूर्ति संजय मिश्र को दो पीएसओ ( पर्सनल सिक्योरिटी आफीसर) मिले हुये हैं। उनकी सुरक्षा में लखनऊ कमिश्नरेट पुलिस की एक जिप्सी, चार अत्याधुनिक हथियारों से लैस सिपाही, हैन्ड मेटडल डिडिकेक्टर के साथ दो पुरुष और दो महिला सिपाही भी तैनात हैं। जिस पर प्रतिमाह लखनऊ पुलिस का तकरीबन छह से सात लाख रुपया खर्च हो रहा है। सिर्फ इतना नहीं लोकायुक्त के साथ लखनऊ से बाहर जाने पर इन सिपाहियों का डीए, टीए और यात्रा संबंधी अऩ्य खर्च भी सरकार को वहन करना पड़ता है।

2016 के बाद कौन सी रिपोर्ट गई, यह कोई नहीं जानता

न्यायमूर्ति संजय मिश्र के लोकायुक्त बनने के बाद इस संगठन ने किन व्यक्तियों, अधिकारियों, राजनेताओं के खिलाफ रिपोर्ट भेजी, इसे कोई नहीं जानता। विधानसभा सत्र के दौरान भी इस पर फिलहाल कोई चर्चा नहीं हुई है और कार्रवाई का कोई भी प्रकरण प्रकाश में नहीं आया।

 

एऩके मेहरोत्रा को क्यों मिली थी सुरक्षा

उत्तर प्रदेश की तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार ने न्यायमूर्ति एनके मेहरोत्रा को जीवन थ्रेड पर यह सुरक्षा उपलब्ध कराई थी। दरअसल, एऩके मेहरोत्रा के लोकायुक्त रहते पांच साल पांच साल के अंतराल में 119 जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध लोकायुक्त संगठन में शिकायत हुई। 259 अधिकारी भ्रष्टाचार के घेरे आये। इनमें से 88 जनप्रतिनिधि व 33 अधिकारियों के खिलाफ उन्होंने जांच की थी। बसपा सरकार में आधा दर्जन मंत्री बर्खास्त हुए थे। सपा सरकार में प्रभावशाली मंत्री रहे गायत्री प्रजापति भी लोकायुक्त की जांच रिपोर्टों के आधार पर ही आज भी ट्रायल झेल रहे हैं। इन्हीं परिस्थितियों के चलते उन्हें व्यक्तिगत सुरक्षा आवंटित की गयी थी।

 

गणतीय नजरिया

एक सिपाही का औसत वेतन सामान्य वेतन 45 हजार रुपये। हेडकांस्टेबिल का तकरीबन 55 हजार।अब 45 का छह से गुणा कीजिए दो लाख 70 हजार रुपये महीना सिर्फ छह सिपाही का वेतन हो गया। एक दीवान, ड्राइवर, जिप्सी, मेटल डिडेटक्टर वाली सिपाही का वेतन भी जोड़ लीजिए तो नौ साल में सिर्फ सुरक्षा का खर्च सात करोड़ के ऊपर चला जाता है।

 

निष्पक्ष दिव्य संदेश की घोषणा

लोकायुक्त संगठन से उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क किया गया। मगर कोई भी उत्तर देने के लिए उपलब्ध नहीं हो सका। निष्पक्ष दिव्य संदेश घोषणा करता है कि जब भी लोकायुक्त संगठन की ओर से लिखित या मौखिक पक्ष उपलब्ध करायेगा, उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

 

Thursday, 3 July 2025

लोकसेवक थर-थरा उठते थे। न वकील, न पैरोकार की जरूरत

 उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त संगठन ने एक दौर में राजनीति का रंग बदला, अफसरो, मंत्रियों, विधायकों के भ्रष्टाचार की कलई खोली। कई मंत्रियों, विधायकों को पद, नगर पालिका, जिला पंचायत अध्यक्षों को पद छोड़ना पड़ा। कई अफसरों को निलंबित और कुछ को प्रतिकूल प्रविष्टि मिली। लोकायुक्त संगठन की इस लोकप्रियता पर भाजपा 2017 के चुनावी घोषणा पत्र में लोकायुक्त संगठन को और बेहतर बनाने का वादा किया। लेकिन नौ साल बाद भी इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। जनता भी लोकायुक्त संगठन को भूलने लगी है। कितना चमकदार था लोकायुक्त संगठन का अतीत और कैसे थरथराते थे भ्रष्टाचारी और कैसे धीरे धीरे गुमनाम हो गई यह संस्था। श्रंखला की शुरूआत...।

 

परवेज़ अहमद

लखनऊ। लोकायुक्त जांच का आदेश। लोकायुक्त ने शिकायत का संज्ञान लिया। ये दो वाक्य ऐसे थे, जिसे सुनते ही माफिया, नौकरशाह, विधायक, मंत्री, जिला पंचायत अध्यक्ष, पालिका अध्यक्ष और लोकसेवक थर-थरा उठते थे। न वकील, न पैरोकार की जरूरत थी। परिवाद दाखिल कीजिए, साक्ष्य परीक्षण और फिर जांच शुरू। परिवादी को समयबद्धता के साथ पूरी जानकारी रहती थी। 31 जुलाई 2016 को न्यायमूर्ति संजय मिश्र के लोकायुक्त पद संभालने के बाद इस संस्था पर गोपनीयता का आवरण चढ़ गया। फरियादियों को वकीलों की जरूरत पढ़ने लगी। धीरे-धीरे नागरिक भी भूल गये कि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने का एक माध्यम लोकायुक्त भी है। साथ ही लोकायुक्त संस्था को मजबूत करने की घोषणा करने वाली भाजपा सरकार भी भूल गई कि उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त का कार्यकाल बीत चुका है, शासनादेश की एक तकनीकी बिन्दु-‘’नये की नियुक्ति तक पद पर बने रहने का फायदा लोकायुक्त और उपलोकायुक्त को मिल रहा है।‘’

उत्तर प्रदेश में लोकायुक्त अधिनियम-1975 में बना था। सर्तकता विभाग इसका प्रशासकीय विभाग था। जिसकी नियमावली 1977 में बनी। 1981 में लोकायुक्त की सेवा शर्तें तैयार हुईं। इसमें लोकायुक्त का कार्यकाल छह साल होता था। इसके बाद लोकायुक्तों की नियुक्ति शुरू हुई। परिवाद दाखिल भी होने लगे। कार्रवाई भी होने लगी। लोकायुक्त कार्यालय आम जनता के लिये खुला रहता था, कोई भी परिवादी परिवाद दाखिल कर सकता था, इसके लिए उसे निर्धारित शुल्क के साथ शपथ पत्र और आरोपों के समर्थन में साक्ष्य दाखिल करना होता था। लोकायुक्त एक तरह से खुली जांच करते थे, दोनों पक्षों से साक्ष्य लिये जाते थे। कभी-कभी लोकायुक्त अपने आधानी अन्वेषण अधिकारियों से जांच करा लेते थे। जांच के निष्कर्ष के आधार पर लोकायुक्त व उपलोकायुक्त अपनी संस्तुतियों से समेत जांच रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपते थे, जहां से मुख्यमंत्री को भेजी जाती थी। सामान्य तौर पर सभी पर कार्रवाई हो जाती थी।

15 मार्च 2006 को यूपी सरकार ने न्यायमूर्ति एनके मेहरोत्रा को लोकायुक्त नियुक्त किया। कार्यभार संभालते ही एनके मेहरोत्रा ने लोकायुक्त व उपलोकायुक्त के कार्यालय को आम जनता के लिए खोल दिया। कार्यशैली को पारदर्शी कर दिया। परिवाद का प्रारम्भिक अन्वेषण एक सप्ताह में पूरा कराने की समय सीमा निर्धारित कर दी। लोकायुक्त अधिनियम की धाराओं का उपयोग करते हुए उन्होंने संबंधित विभागों, अधिकारियों, लोकसेवकों को नोटिस जारी कर जवाब मांगना शुरू कर दिया। नोटिसों की प्रति बोर्ड पर टंगवाना शुरू किया। जिससे भ्रष्टाचार के खिलाफ परिवाद की बाढ़ आ गई। परिवाद का शुल्क 1500 और शपथ पत्र भी लिया जाता था, फिर भी शिकायतें बढ़ने लगीं। कार्रवाई भी होने लगी। लोकायुक्त संगठन की लोकप्रियता चरम पर पहुंच गई। नागरिकों में यह विश्वास होने लगा कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक संस्था ऐसी है जहां बिना, वकील, सिफारिश सुनवाई होती है।

इस बीच उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बन गई। सत्ता संभालते ही अखिलेश यादव सरकार ने 6 जुलाई 2016 को पहली कैबिनेट में ही लोकायुक्त और उपलोकायुक्त का कार्यकाल छह साल से बढ़ाकर आठ साल कर दिया। साथ यह प्राविधान भी कर दिया कि कार्यकाल खत्म होने के बाद नये लोकायुक्त व उपलोकायुक्त की नियुक्ति होने तक लोकायुक्त पूरी शक्तियों के साथ अपने पद पर काम करता रहेगा।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक याचिका पर सुनवाई और निर्देश के बाद लोकायुक्त पद पर न्यायमूर्ति संजय मिश्र की नियुक्ति हुई, जिन्होंने पद संभालने के बाद से ही लोकायुक्त संस्था पर गोपनीयता का पर्दा डाल दिया। 2016 तक लोकप्रियता के चरम पर पहुंच चुकी इस संस्था को लोक भूलने लगे हैं। आलम यह है कि उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त संजय मिश्र का कार्यकाल पूरा हो चुका है लेकिन उत्तर प्रदेश की सरकार का न इस ओर ध्यान है और न ही अब तक कोई प्रयास है। जनता के जेहन से भी संस्था उतर गई है लिहाजा विपक्ष भी इस ओर से बेपरवाह है।

 

 

मौजूदा समय में लोकाय़ुक्त

-न्यायमूर्ति संजय शर्मा,

हाईकोर्ट के सेवानिवृत न्यायमूर्ति 2016 से अब तक यूपी के लोकायुक्त

उपलोकायुक्त

शंभू सिंह यादव

यूपी की प्रांतीय प्रसाशनिक सेवा के अधिकारी। आईएएस में प्रोन्नत होकर अखिलेश यादव सरकार में मुख्यमंत्री के विशेष सचिव रहे। रिटायर होते ही अखिलेश यादव ने उपलोकायुक्त बना दिया। तब से अब तक कार्यरत।

 

सुरेन्द्र कुमार यादव

लखनऊ में जिला एवं सत्र न्यायाधीश रहे। दुनिया के सबसे चर्चित केस अयोध्या में बाबरी ढांचा गिराने के आरोपियों लालकृषण आडवानी, उमा भारती को बाइज्जत बरी करने का फैसला सुनाया। सेवानिवृत होने के बाद 12 अप्रैल 2021 यूपी सरकार ने उन्हें लोकायुक्त नियुक्त किया। कार्यकाल बाकी है।

 

दिनेश कुमार सिंह

न्यायिक अधिकारी थे। उत्तर प्रदेश सरकार के प्रमुख सचिव न्याय रहे। किसी भी सरकार के लिए यह पद सबसे अहम होता है। वहां से सेवानिवृत होने के बाद 6 जून 2020 को यूपी सरकार ने उन्हें उपलोकायुक्त नियुक्त किया है। तब से वह इस पद पर हैं। कार्यकाल बाकी है। 

सत्ता, न्यायालय, राजभवन के बीच कानूनी संघर्ष ने न्यायमूर्ति संजय मिश्र को बनाया लोकायुक्त

अखिलेश यादव सरकार में लोकायुक्त पद पर आसीन हुए थे न्यायमूर्ति संजय

परवेज अहमद

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के भ्रष्ट लोकसेवकों में खौफ भरने वाले लोकायुक्त पद पर न्यायमूर्ति संजय मिश्र के काबिज होने से पहले लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा को पद से हटाने की लंबी कानूनी लड़ाई हुई। जिसमें राज्यपाल, इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, नेता प्रतिपक्ष, भाजपा और दूसरे छोटे दलों के नेता भी कानून के दायरे में नया लोकायुक्त चाहते थे। आखिर भारत के सीजेआई रहे न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की पीठ के आदेश पर न्यायमूर्ति संजय मिश्र लोकायुक्त नियुक्त हुये और उनकी तैनाती होने के साथ ही लोकायुक्त की जांचों की रफ्तार धीमी होने लगी। खौफ खत्म होने लगा और अब नौवें साल में यूपी के नागरिक यह भूल गये हैं कि लोकायुक्त संगठन भी कोई जांच एजेंसी है।

लोकायुक्त संगठन अधिनियम की मंशा ही यही थी कि अदालतों की दौड़भाग, सरकारी एजेंसियों के मकड़जाल से इतर गरीब व्यक्ति भी बिना किसी पैरोकार, वकील, सिफारिश के लोकसेवक के खिलाफ परिवाद दाखिल कर सके और उसके बारे में जानकारी हासिल कर सके। पर, एनके मेहरोत्रा की विदाई के साथ ही संस्था की साख जनता की नजरों से ओझल हो गई। नियमों के मुताबिक प्रतिवर्ष लोकायुक्त का प्रतिवेदन राज्यपाल को भेजे जाने के बाद उसे वेबसाइट पर डाल दिया जाए, ताकि कोई भी व्यक्ति परिवाद और संस्तुतियों को देख सके। लेकिन लोकायुक्त संगठन की बेवसाइट गवाह है कि 2014 के बाद लोकायुक्त की संस्तुतियों का ब्यौरा आन लाइन नहीं किया गया। छठवें लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा का कार्यकाल पूरा होने के बाद सातवें लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए कानूनी संघर्ष हुआ। जिसमें सत्ता व सांविधानिक पदों के शीर्ष लोगों ने विविध तर्क से साथ पेंच खड़े किये। जिसके बाद न्यायमूर्ति संजय मिश्र लोकायुक्त नियुक्त हुए, जिनका कार्यकाल खत्म हो गया है। लेकिन नियमों नई नियुक्ति तक पद पर बने रहने की व्यवस्था के चलते वह पद कार्यरत रहेंगे।

सूत्रों का कहना है कि लोकायुक्त संगठन में अब सिर्फ वही लोग जाते हैं, जिन्हें कानून की जानकारी है। सियासी और कानूनी रूप से जागरूक हैं। मगर,  उनकी शिकायतों का परिणाम क्या हुआ, इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है। इस संबंध में लोकायुक्त कार्यालय से संपर्क का प्रयास किया गया, मगर कोई भी इस दिशा में बात करने को उपलब्ध नहीं हुआ।

 

कुछ ऐसे बने न्यायमूर्ति संजय़ मिश्र लोकायुक्त
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जून 2012: लोकायुक्त की जांच में आरोपित पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी के अधिवक्ता सईद सिद्दीकी ने लोकायुक्त अधिनियम में संशोधन को चुनौती देती याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की। दो साल के अंतराल में कई दौर की सुनवाई हुई और शपथ पत्र दाखिल करने का सिलसिला चला।
24 
अप्रैल 2014: देश की सबसे बड़ी अदालत के तीन जजों की पीठ ने लोकायुक्त अधिनियम में संशोधन पर रजामंदी जतायीमगर यह भी कहा कि लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा का कार्यकाल पूरा होने के छह माह के अंदर नए लोकायुक्त का चयन की प्रक्रिया शुरू की जाए।
15 
मार्च 2014: लोकायुक्त का कार्यकाल पूरा होते गी नई नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट में दो याचिकाएं दाखिल हुईं।
मई 2015: सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की पीठ ने लोकायुक्त नियुक्त नहीं होने पर अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की चेतावनी दी।
11 
जून 2015:  राज्यपाल राम नाईक ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादवविधानसभा में नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य और लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा को पत्र लिखकर लोकायुक्त व उपलोकायुक्त नियुक्त करने का सुझाव दिया।
अगस्त 2015सरकार ने न्यायमूर्ति रविन्द्र सिंह को लोकायुक्त नियुक्त करने का प्रस्ताव राजभवन भेजा गया।
अगस्त 2015राज्यपाल राम नाईक ने कतिपय आपत्तियों के साथ सरकार का प्रस्ताव बिना मंजूरी के ही वापस भेज दिया।
अगस्त 2015: लोकायुक्त अधिनियम के नियमों का हवाला देकर राज्य सरकार ने न्यायमूर्ति रविन्द्र सिंह की नियुक्ति का प्रस्तावन दोबारा राजभवन भेजाइसे राजभवन ने लौटा दिया।
20 अगस्त 2015: राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को पत्र लिख चयन समिति में सामंजस्य बनाकर नाम चुनने का सुझाव दिया।

25 अगस्त 2015: राज्यपाल राम नाईक ने रविन्द्र सिंह को लोकायुक्त नियुक्त करने से इंकार करते हुए नया नाम मांगा

27 अगस्त 2015: विधानमंडल ने लोकायुक्त अधिनियम में संशोधन का बिल पास कियाजिसमें लोकायुक्त चयन समिति से से हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की भूमिका खत्म कर दी गयी थी।

29 अगस्त 2015: विधानमंडल से पारित बिल राजभवन भेजा गयामगर राज्यपाल ने उस पर हस्ताक्षर नहीं किए।

सितंबर 2015: सुप्रीम कोर्ट ने लोकायुक्त नियुक्त नहीं कर पाने पर मुख्य सचिव का व्यक्तिगत हलफनामा मांगा
27 सितंबर 2015: लोकायुक्त चयन के लिए मुख्यमंत्री अखिलेश यादवमुख्य न्यायाधीश डॉ.डीवाई चन्द्रचूड़ व नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद की बैठक बुलाई गईजिसमें न्यायमूर्ति चन्द्रचूड़ ने अधिनियम संशोधन बिल राजभवन में लंबित होने पर सांविधानिक स्थिति जानने का सुझाव दिया।

-14 दिसंबर 2015: सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति रंजन गोगोई व न्यायमूर्ति रमन्ना की पीठ ने 16 दिसंबर तक लोकायुक्त नियुक्त करने का निर्देश दिया

-15 दिसंबर 2015: चयन समिति के तीनों सदस्यों ने पांच घंटे की मैराथन बैठक हुई मगर किसी नाम पर एकराय बनी

-16 दिसंबर 2015: सुबह की पाली में किसी नाम पर सहमति नहीं बनने पर शाम पांच बजे फिर से बैठक का निर्णय हुआ। मगर दोपहर में न्यायमूर्ति रंजन गोगोई व न्यायमूर्ति एवी रमन्ना ने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए न्यायमूर्ति वीरेन्द्र सिंह यादव को लोकायुक्त नियुक्त कर दिया।

-16 दिसबंर 2015: हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने राज्यपाल को चिट्ठी लिखीजिसमें सुप्रीम कोर्ट को गुमराह करने का जिक्र था।

-17 दिसंबर 2015: सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के क्रम में वीरेन्द्र सिंह को लोकायुक्त नियुक्त करने का प्रस्ताव राजभवन भेजा

17 दिसंबर 2015: राज्यपाल राम नाईक ने मुख्य न्यायाधीश के 16 दिसंबर के पत्र की प्रति मुख्यमंत्री व स्वामी प्रसाद मौर्य को भेजी।

-18 दिसंबर 2015: हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति तीरथ सिंह ठाकुर से मुलाकात की।

-18 
दिसंबर 2015: राज्यपाल राम नाईक ने वीरेन्द्र सिंह को लोकायुक्त पद की शपथ दिलाने की तिथि 20 दिसंबर निर्धारित की।
-19 
दिसंबर 2015: अधिवक्ता सच्चिदानंद गुप्ता ने राज्य सरकार पर शीर्ष अदालत को गुमराह करने का इल्जाम लगाते हुए वीरेन्द्र सिंह की नियुक्ति रद करने की गुहार लगायी
-19 
दिसंबर 2015: शीर्ष अदालत की अवकाश कालीन पीठ ने वीरेन्द्र सिंह के शपथ ग्र्रहण पर रोक लगा दी और चार जनवरी को सुनवाई की तिथि निर्धारित की।
-1 
जनवरी 2016: मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने राज्यपाल के लिखे पत्रों का जवाब देते हुए कहा कि जस्टिस वीरेन्द्र सिंह के नाम लगातार चर्चा में रहा। नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य की भी इसमें सहमति थी।
जनवरी 2016: भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति तीरथ सिंह ठाकुर की पीठ ने वीरेन्द्र सिंह की शपथ ग्र्रहण पर रोक बरकरार रखते हुए मामले की सुनवाई का जिम्मा जस्टिस रंजन गोगोई की पीठ को सौंपा।
जनवरी 2015: विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य ने राज्यपाल व हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को लिखे पत्र में सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने किसी भी नाम पर सहमति नहीं जतायी थी।
19 
जनवरी 2016: कोर्ट में सुनवाई हुई मगर वह किसी मुकाम तक नहीं पहुंची
-20 जनवरी 2016: शीर्ष अदालत ने फैसला सुरक्षित किया मगर कहा कि लोकायुक्त की नियुक्ति वही करेंगे

-28 जनवरी 2016: न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने अपना फैसला सुनाया जिसमें वीरेंद्र सिंह की नियुक्ति रद कर दी गयी और हाईकोर्ट के सेवानिवृत न्यायमूर्ति संजय मिश्र को उत्तर प्रदेश का नया लोकायुक्त नियुक्त किया गया।

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अब तक उप्र के लोकायुक्त
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प्रदेश के पहले लोकायुक्त के रूप में न्यायमूर्ति विशंभर दयाल ने 14 सितंबर 1977 को कार्यभार संभाला। उनके बाद न्यायमूर्ति मिर्जा मोहम्मद मुर्तर्ज हुसैनजस्टिस कैलाश नाथ गोयलन्यायमूर्ति राजेश्वर सिंह व न्यायमूर्ति सुधीर चंद्र वर्मा लोक आयुक्त रहे। न्यायमूर्ति एनके मेहरोत्रा ने छठवें लोकयुक्त के रूप में 16 मार्च 2006 को पद संभाला था। अब न्यायमूर्ति संजय मिश्र सातवें लोकायुक्त हैं।

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अखिलेश यादव ने लोकायुक्त की उम्र सीमा खत्म की


उत्तर प्रदेश लोकायुक्त एवं उपलोकायुक्त अधिनियम-1975 में बना था। जिसमें लोकायुक्त व उपलोकायुक्त का कार्यकाल छह साल था। लोकायुक्त को लोकसेवकों केपद के दुरुपयोगभ्रष्टाचार की जांच का अधिकार है। साथ ही जांच में हासिल तथ्यों के साथ संस्तुतियां राज्य सरकार को भेजने का अधिकार है। किसी को दोषी या निर्दोष घोषित करने का लोकायुक्त को अधिकार नहीं है। सिर्फ साक्ष्य के आधार पर कार्रवाई व विशेषज्ञ जांच कराने की संस्तुति करने का अधिकार है। तीन माह में कार्रवाई नहीं होने पर राज्यपाल को स्पेशल रिपोर्ट भेजने की भी अधिनियम में व्यवस्था है। वर्ष 2012 में अखिलेश यादव सरकार ने इस अधिनियम में पहला संशोधन किया। इसमें अधिकारों में कोई कटौती या बढ़ोत्तरी नहीं की गयी। अलबत्ता लोकायुक्त एवं उपलोकायुक्त का कार्यकाल छह से बढ़ाकर आठ साल कर दिया। अखिलेश सरकार ने अधिनियम का सेक्शन 5(3) भी संशोधित कर दिया थाजिससे कार्यकाल पूरा करने वाला व्यक्ति दोबारा नियुक्ति के लिए अर्ह हो गया। उम्र की बाध्यता भी खत्म हो गयी।

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लोकायुक्त में शिकायत का तरीका
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कोषागार में दो हजार रुपए की राशि जमा करनी होती है। इसके अलावा मुफ्त मिलने वाली एक पुस्तिका पर बने फार्म के प्रारूप में तीन प्रतियां लोकायुक्त कार्यालय में जमा करनी होती है। इसके साथ नोटरी से सत्यापित हलफनामा देना होता हैजिसमें शिकायत कर्ता का नामपताफोन नम्बर के साथ आरोपों का ब्यौरा दर्ज किया जाता है। इल्जामों के समर्थन में साक्ष्य की सत्यापित प्रति लगायी जाती है। इस पर लोकायुक्त शिकायतकर्ता को बुलाकर उसका कथन (बयान) दर्ज करते हैं। प्रारम्भिक परीक्षण के बाद परिवाद दर्ज कर अन्वेषण (जांच) शुरू करते हैं। शिकायत के समर्थन में साक्ष्य वादी को उपलब्ध कराने होते हैं।
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संदेश की घोषणा

लोकायुक्त संगठन से उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क किया गया। मगर कोई भी उत्तर देने के लिए उपलब्ध नहीं हो सका। निष्पक्ष दिव्य संदेश घोषणा करता है कि जब भी लोकायुक्त संगठन की ओर से लिखित या मौखिक पक्ष उपलब्ध करायेगा, उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।