लोकायुक्त संगठन कथा-3
परवेज़ अहमद
लखनऊ। आप क्या जानते हैं कि उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त
को नौ सालों से ‘वाई श्रेणी’ सुरक्षा है ? जबकि लोकायुक्त एवं उपलोकायुक्त अधिनियम। उप नियम। राज्य
सरकार के बिजनेस रूल। लोकायुक्त की सेवा शर्तों में इतनी गहरी सुरक्षा दिये जाने का
कहीं उल्लेख नहीं है। वास्तव में गरीब-गुर्बो, तंत्र से निराश हो रहे लोगों को न्याय
दिलाने के लिए लोकायुक्त संगठन का गठन किया गया था, मगर 2016 से जनता के धन से उपमुख्यमंत्रियों
जैसी सुरक्षा क्यों उपलब्ध कराई जा रही है ? लखनऊ कमिश्नरेट पुलिस,
लोकायुक्त के प्रशासनिक सतर्कता विभाग के पास इसका जवाब नहीं है। दरअसल, यूपी सरकार
के दो दर्जन मंत्रियों, बाहुबली विधायकों, नौकरशाहों के विरुद्ध लोकायुक्त की रिपोर्ट
पर कार्रवाई के बाद 2015 में तत्कालीन लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा को मिल रही धमकियों
की इंटेलीजेंस रिपोर्ट के बाद ‘व्यक्तिगत सुरक्षा’ के लिए एक पीएसओ और चार सशस्त्र
सिपाहियों वाली एस्कोर्ट अखिलेश यादव सरकार ने उपलब्ध करायी थी। उसके पहले उन्हें सिर्फ
एक गनर मिला था। मेहरोत्रा के पद से हटने के बाद नये लोकायुक्त न्यायमूर्ति संजय मिश्र
ने नौ साल के कार्यकाल में जाहिरा तौर पर ऐसी कोई जांच नहीं की है, जिसके चलते जनता
की सुरक्षा में कटौती करके उन्हें सुरक्षा उपलब्ध करायी जाए।
इस समय उत्तर प्रदेश की औसतन आबादी 24 करोड़ है।
राज्य में उपलब्ध पुलिस बल की संख्या से इसका भाग दिया जाए तो तकरीबन 841 ( आठ सौ इकतालिस)
नागरिकों की सुरक्षा के लिए सिर्फ एक सिपाही आता है। जब कभी अपराध का ग्राफ बढ़ता है।
यातायात संचालन में दिक्कत होती है, तब पुलिस अधिकारी फोर्स नहीं होने की बात को ढाल
की तरह इस्तेमाल करते हैं। मगर लखनऊ में ढेरों को लोगों को स्टेटस सिंबल के लिए पुलिस
सुरक्षा मिली हुई है। लोकायुक्त संगठन भी इसमें से एक है। मौजूदा समय में लोकायुक्त
न्यायमूर्ति संजय मिश्र को दो पीएसओ ( पर्सनल सिक्योरिटी आफीसर) मिले हुये हैं। उनकी
सुरक्षा में लखनऊ कमिश्नरेट पुलिस की एक जिप्सी, चार अत्याधुनिक हथियारों से लैस सिपाही,
हैन्ड मेटडल डिडिकेक्टर के साथ दो पुरुष और दो महिला सिपाही भी तैनात हैं। जिस पर प्रतिमाह
लखनऊ पुलिस का तकरीबन छह से सात लाख रुपया खर्च हो रहा है। सिर्फ इतना नहीं लोकायुक्त
के साथ लखनऊ से बाहर जाने पर इन सिपाहियों का डीए, टीए और यात्रा संबंधी अऩ्य खर्च
भी सरकार को वहन करना पड़ता है।
2016 के बाद कौन सी रिपोर्ट गई, यह कोई नहीं जानता
न्यायमूर्ति संजय मिश्र के लोकायुक्त बनने के
बाद इस संगठन ने किन व्यक्तियों, अधिकारियों, राजनेताओं के खिलाफ रिपोर्ट भेजी, इसे
कोई नहीं जानता। विधानसभा सत्र के दौरान भी इस पर फिलहाल कोई चर्चा नहीं हुई है और
कार्रवाई का कोई भी प्रकरण प्रकाश में नहीं आया।
एऩके मेहरोत्रा को क्यों मिली थी सुरक्षा
उत्तर प्रदेश की तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार ने
न्यायमूर्ति एनके मेहरोत्रा को जीवन थ्रेड पर यह सुरक्षा उपलब्ध कराई थी। दरअसल, एऩके
मेहरोत्रा के लोकायुक्त रहते पांच साल पांच साल के अंतराल
में 119 जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध
लोकायुक्त संगठन में शिकायत हुई। 259 अधिकारी भ्रष्टाचार के घेरे आये। इनमें से 88 जनप्रतिनिधि व 33 अधिकारियों के खिलाफ
उन्होंने जांच की थी। बसपा सरकार में आधा दर्जन मंत्री बर्खास्त हुए थे। सपा सरकार
में प्रभावशाली मंत्री रहे गायत्री प्रजापति भी लोकायुक्त की जांच रिपोर्टों के आधार
पर ही आज भी ट्रायल झेल रहे हैं। इन्हीं परिस्थितियों के चलते उन्हें व्यक्तिगत सुरक्षा
आवंटित की गयी थी।
गणतीय नजरिया
एक सिपाही का औसत वेतन सामान्य वेतन 45 हजार रुपये।
हेडकांस्टेबिल का तकरीबन 55 हजार।अब 45 का छह से गुणा कीजिए दो लाख 70 हजार रुपये महीना
सिर्फ छह सिपाही का वेतन हो गया। एक दीवान, ड्राइवर, जिप्सी, मेटल डिडेटक्टर वाली सिपाही
का वेतन भी जोड़ लीजिए तो नौ साल में सिर्फ सुरक्षा का खर्च सात करोड़ के ऊपर चला जाता
है।
निष्पक्ष दिव्य संदेश की घोषणा
लोकायुक्त संगठन से उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क किया
गया। मगर कोई भी उत्तर देने के लिए उपलब्ध नहीं हो सका। निष्पक्ष दिव्य संदेश घोषणा करता है कि जब भी लोकायुक्त संगठन की ओर से लिखित
या मौखिक पक्ष उपलब्ध करायेगा, उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया
जाएगा।