1. जातीय रैलियों पर रोक
लखनऊ। अदालत ने एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसले में राजनीतिक दलों की जातिगत आधारित रैलियों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। कोर्ट ने माना है कि जातीय रैलियों से समाज बंटता है और यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। पीठ ने इसे संविधान की मंशा के खिलाफ बताते हुए कहा कि राजनीतिक पार्टियां व अन्य संगठन जातीय आधार पर रैलियां नहीं करेंगी। कोर्ट ने राजनीतिक दलों- कांग्रेस, भाजपा, सपा और बसपा को नोटिस भी जारी किया है। साथ ही केंद्र व राज्य सरकारों और निर्वाचन आयोग को भी अपना पक्ष रखने को कहा गया है। इस मामले में अगली सुनवाई 30 जुलाई को होगी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा सजायाफ्ता सांसद या विधायक की सजा की तारीख से ही उसे पद पर बने रहने के लिए अयोग्य मानने के फैसले के बाद जातीय रैलियों पर रोक को राजनीतिक दलों के लिए तगड़ा झटका माना जा रहा है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्डपीठ के वरिष्ठ न्यायमूर्ति उमानाथ सिंह व न्यायमूर्ति महेंद्र दयाल ने वकील मोतीलाल यादव की जनहित याचिका पर यह आदेश दिया है। याचिका में कहा गया है कि विभिन्न राजनीतिक दल चुनाव के मौके पर समाज को जातीय आधार पर बांटने का काम करने लगते हैं। जातीय नाम देकर रैलियों का आयोजन करना और चुनाव के बाद विशेष जाति के लोगों को अधिक लाभ देना संविधान व कानून दोनों के खिलाफ है। जाति के आधार पर बंटवारे से समाज में असंतुलन पैदा होता है और साफ-सुथरे व निष्पक्ष चुनाव की मंशा पर पानी फिर जाता है। इससे देश की राष्ट्रीय अखंडता पर भी असर पड़ता है और समाज में अलगाव व विघटन की स्थिति पैदा होती है।
याचिकाकर्ता का यह भी कहना था कि अगले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर सभी प्रमुख राजनीतिक दल वोट बैंक मजबूत करने के मकसद से जातियों के नाम पर अंधाधुंध रैलियां कर रहे हैं। बसपा की विगत सात जुलाई को लखनऊ में हुई ब्राह्मण समाज की रैली समेत क्षत्रिय रैली व वैश्य सम्मेलन का हवाला देते हुए याची ने कहा कि इन आयोजनों से समाज में विघटन की प्रवृत्ति पनप रही है और सामाजिक एकता व समरसता बिगड़ रही है। विभिन्न समुदायों व जातियों के बीच जहर घोलकर वैमनस्यता पैदा की जा रही है। संविधान में सभी नागरिकों को समान रूप से अधिकार दिए गए हैं। इसमें किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। याचिका में जातीय आधार पर रैलियों का आयोजन करने वाली राजनीतिक पार्टियों पर प्रतिबन्ध लगाने, उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगाने और उनका पंजीकरण निरस्त करने की गुहार लगाई गयी है। याची ने अदालत से मांग की है कि चुनाव आयोग को निर्देश दिया जाए कि वह जाति व धर्म के आधार पर होने वाली रैलियों व सम्मेलनों जैसे ब्राह्मण महासभा रैली, यादव रैली, क्षत्रिय रैली, कायस्थ रैली, वैश्य सम्मेलन, कुशवाहा सम्मेलन, मुस्लिम सम्मेलन, दलित रैली आयोजित करने वाली राजनीतिक पार्टियों के साथ-साथ ऐसी जातीय रैलियों पर प्रतिबन्ध लगाएं।
अदालत के इस फैसले ने सियासी दलों की जातीय राजनीति को गड़गड़ा दिया है। इन राजनीतिक दलों और नेताओं ने बड़े दुखी मन से फैसले का स्वागत किया है। उत्तर प्रदेष में कांग्रेस व भाजपा का पतन दो क्षेत्रीय दलों- सपा व बसपा की जातीय राजनीति के उदय के कारण ही हुआ है जिसे सोशल इंजीनियरिंग का नाम दे दिया गया। जातीय राजनीति का ही नतीजा है कि डकैत फूलन देवी दो बार लोकसभा पहुंचने में कामयाब रर्ही।
याद रहें बसपा के शुरूआती दौर में कांशीराम की रैलियों में सबसे पहले सवर्ण विरोधी नारे लगाये जाते थे। फिर वोट की राजनीति ने ऐसी करवट ली कि बसपा को अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा। ब्राह्मण मतों के लिए बसपा ने तिलक-तराजू और तलवार. सरीखे नारे को बदल कर हाथी नहीं गणोश है जैसे नारे बुलंद किए और दलित-ब्राह्मण इंजीनियरिंग के दम पर 2007 में प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली। सत्ता की खातिर सपा ने भी कई बार जातीगत समीकरण साधने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। मगर किसी भी दल ने जनता के कल्याण पर ध्यान नहीं दिया। सभी दलों ने जातिगत आधार पर अपना उल्लू सीधा किया, सत्ता पर कब्जा जमाया और विकास की आड़ में अपनी तिजोरियां भरने का काम किया है। 2012 के चुनाव में भाजपा ने ब्राह्मण मतों के ध्रवीकरण के लिए चाणक्य स्वाभिमान मंच का इस्तेमाल किया। इस मंच की प्रदेश में कई स्थानों पर सभाएं हुई, जिन्हें डा. मुरली मनोहर जोशी, केसरीनाथ त्रिपाठी, कलराज मिश्रा, शिवप्रताप शुक्ला आदि भाजपा के ब्राह्मण चेहरों ने संबोधित किया। कांग्रेस ने भी मुसलमानों को आरक्षण देने का मुद्दा उछाल कर वोट हासिल करने की कोशिश की। जातीय समीकरण ने ही कल्याण सिंह और मुलायम सिंह यादव को एक मंच पर ला खड़ा किया। उत्तर प्रदेष में तमाम दल जातीय आधार पर सक्रिय है और उनकी विचारधारा आपस में मेल नहीं खाती। कई दिग्गज नेताओं की पहचान केवल जाति के आधार पर ही जानी-पहचानी जाती है। कल्याण सिंह की पहचान लोध नेता, केन्द्रीय मंत्री अजित सिंह जाट नेता, मायावती दलित नेता और मुलायम सिंह की पहचान यादव नेता के रूप में होती है।
हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद राजनीतिक पार्टियों का रवैया बदलने की उम्मीद कम ही है। पार्टियां अब नाम बदलकर कार्यक्रम करेंगी। सपा प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन के नाम पर ब्राह्मण सम्मेलन करके पहले ही रास्ता दिखा चुकी है
रोक पर रार
उत्तर प्रदेष में अगले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बसपा-सपा में जातीय आयोजनों की होड़ है। बसपा प्रदेश भर में भाईचारा सम्मेलन के नाम से 21 ब्राह्मण व 17 दलित उम्मीदवारों के इलाके में सम्मेलन कर चुकी है जिसमें 17 जातियों को दलितों के समान अधिकार देने की पैरवी की गई। परशुराम जयंती पर सपा मुख्यालय पर ब्राह्मण जुटाए गए, फिर प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन के नाम पर ब्राह्मण सम्मेलन किया गया। प्रदेश में पिछड़ा वर्ग सम्मेलन भी किए जा रहे हैं।
फैसला स्वागत योग्य है। समाजवादी पार्टी तो शुरू से ही बिना किसी भेदभाव के सभी को समान अवसर देने की पक्षधर है। समाजवादी विचारधारा जातिवाद की विरोधी है। इस निर्णय से जाति व संप्रदाय की राजनीति करने वालों को सबक मिलेगा। समाजवादी पार्टी इस तरह की रैलियां नहीं आयोजित करती। हम जाति आधारित पार्टी नहीं है। मैं इस तरह की रैलियों के पक्ष में नहीं हूं। -मुलायम सिंह यादव
कांग्रेस, सपा, बसपा जैसे दल समाज को जाति के आधार पर बांटना चाहते हैं। हाईकोर्ट स्वयं संज्ञान लेकर जातीय व धार्मिक आधार वाली जनगणना रोके व सम्मेलन करने वालों को दंडित करें। -डॉ.लक्ष्मीकांत
वाजपेयी, भाजपा
दलों ने सामाजिक परिवर्तन की बजाय सत्ता हथियाने के लिए जातिवाद को बढ़ावा दिया। सपा-बसपा हमेशा ही जात-पात की राजनीति करते आए हैं। कांग्रेस ने कभी भी ऐसी राजनीति नहीं की। -पीएल पूनिया, कांग्रेस
निजी तौर पर मेरा मानना है कि जात-पात की राजनीति की नींव कांग्रेस ने रखी, बाद में क्षेत्रीय दलों ने सीमाएं लांघ दी। लोकतंत्र में यह कैंसर की तरह है, जिसे खत्म करना बहुत जरूरी है। -विजय बहादुर, बसपा नेता
हम फैसले का स्वागत करते हैं। सपा ने कभी जाति, धर्म की राजनीति नहीं की। सपा धर्मनिरपेक्षता को मानती है और यहां सभी धर्म और जाति के लोगों को बराबर सम्मान मिलता है। -शिवपाल यादव, सपा नेता
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अब मायावती की दाल नहीं गलेगी
लखनऊ। अब बसपा अध्यक्ष मायावती की जनता के बीच दाल नहीं गलने वाली है। वह अपने पार्टी नेताओं को सवर्ण समाज और विशेषकर ब्राह्मणों को अपने पाले में खींचने की सीख दे रही हैं। इसके लिए वे आरक्षण की लुभानेवाली घोषणाएं कर रही हैं। उनका यह नया सर्वजन प्रेम अवसरवादिता की हद है। बसपा राज्य में जातीय उन्माद फैला रही है। समाजवादी पार्टी जातिविहीन समाज व्यवस्था की पक्षधर है। डॉ. लोहिया, चैधरी चरण सिंह और मुलायम सिंह यादव कभी जाति की राजनीति के पक्ष में नहीं रहे। बसपा जातीयता का नंगानाच करा रही है।
समाजवादी पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता राजेंद्र चैधरी का कहना है कि कल तक मनुवाद को कोसने वाली मायावती को अचानक ब्राह्मणों के प्रति प्रेम उमड़ पड़ा है। उन्होंने सत्ता के लिए अपने दल के सिद्धांत, विचार और कार्यक्रम सभी को तिलांजलि दे दी है। काषीराम ने दलितों के हाथ में सत्ता की चाबी सौंपने के लिए संघर्ष किया और मायावती ने सत्ता की चाबी दलितों से छीनकर ब्राह्मणों को सौंप दी। अब बसपा से जुड़ा दलित वर्ग अपने को ठगा सा महसूस कर रहा है। पार्टी में उसे उचित भागीदारी से वंचित किया जा रहा है। मायावती ने दलित को बंधुआ मानकर उनके वोट का सौदा करने की ठान ली है।। ब्राह्मणों के नाम पर उनके राष्ट्रीय महासचिव के रिश्तेदारों को 24 लाल बत्तियों से नवाजा गया। लोकसभा के लिए अमीर और दंबग ब्राह्मणों को टिकट देकर दलितों की सत्ता में भागीदारी से ही खिलवाड़ हो रहा है। इनसे दलितों की परेशानियां सुने जाने की उम्मीद नहीं हैं। बसपा पूरी तरह भाजपा के रंग में रंग गई है। बसपा अध्यक्ष गुजरात में नरेंद्र मोदी का चुनाव प्रचार करने गई। नरेंद्र मोदी ने मुस्लिमों का नरसंहार कराया। अब गुजरात की कहानी उत्तर प्रदेश में दोहराने के लिए भाजपा नरेंद्र मोदी को ला रही है। बसपा अध्यक्ष को सत्ता का सुख पाने के लिए भाजपा के सहयोग की कई बार जरूरत हुई है।
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2. दागदार माननीयों को झटका
लखनऊ। आजकल उत्तर प्रदेष के बाहुबली माननीयों की नींद उड़ी हुई है। अदालत ने माफियों, बाहुबलियों और सियासी दलों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। अदालत ने जेल में बंद विचाराधीन नेताओं के चुनाव लड़ने का चलन समाप्त कर दिया है और कहा कि कोई व्यक्ति जो जेल या पुलिस हिरासत में है, वह विधाई निकायों का चुनाव नहीं लड़ सकता। कानून की निगाह में अपराधी और अदालत से सजायाफ्ता लोग अब संसद और विधानसभाओं में नहीं बैठ सकेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने राजनीति का अपराधीकरण रोकने की दिशा में अहम फैसला देते हुए अदालत से सजा पाए सांसद-विधायकों की सदस्यता बनाए रखने वाले कानून को असंवैधानिक ठहराया है। कोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 (4) को असंवैधानिक ठहराते हुए कहा है कि संसद को ऐसा कानून बनाने का अधिकार ही नहीं है।
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव 2012 में अपना दल, भारतीय समाज पार्टी, पीस पार्टी, कौमी एकता दल, इंडियन जस्टिस पार्टी, प्रगतिशील मानव समाज पार्टी जैसे छोटे दल बाहुबली और माफिया मुख्तार अंसारी, बृजेश सिंह, मुन्ना बजरंगी, अतीक अहमद, डीपी यादव के सियासी हमराही रह चुके हैं। अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी सपा व बसपा से चुनाव में उतर चुके हैं। लोकसभा चुनाव के मद्देनजर अंसारी बंधुओं ने कौमी एकता दल बनाया और उसके बैनर तले मुख्तार अंसारी वाराणसी से, उनके बड़े भाई अफजाल अंसारी बलिया से व बाबू सिंह कुशवाहा गाजीपुर से चुनाव लड़ने की फिराक में हैं। बाहुबली अतीक अहमद ने अपना दल के टिकट पर प्रतापगढ़ से चुनाव लड़ने का एलान किया है। माफिया डीपी यादव बदायूं के सहसवान सीट से एक बार फिर दो-दो हाथ करने को तैयार है। पिछली विधानसभा में वे और उनकी पत्नी इसी दल से विधायक थे। माफिया बबलू श्रीवास्तव, बाहुबली धनंजय सिंह, अभय सिंह, रामू द्विवेदी, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, रंगनाथ मिश्र, राकेशधर त्रिपाठी, बादशाह सिंह, रामवीर उपाध्याय, रामअचल राजभर समेत कई नेताओं की सियासी उम्मीदों पर पानी फिर सकता है।
उत्तर प्रदेष में दागी माननीयों की एक लम्बी चैड़ी फौज है। प्रदेश के कुल 403 विधायकों में से 189 यानी 47 प्रतिशत विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें से 98 पर हत्या, बलात्कार जैसी संगीन धाराओं में रिपोर्ट दर्ज है। सूत्रों अनुसार समाजवादी पार्टी के 224 विधायकों में से 56 पर गम्भीर मामलों सहित 111 केस दर्ज हैं। बसपा के 80 विधायकों में से 14 पर गम्भीर मामलों सहित 29 के खिलाफ मुकदमे चल रहे हैं। भाजपा के 47 में से 25 विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले हैं। इनमें 14 पर गंभीर आरोप हैं। कांग्रेस के 28 में से 13 विधायकों पर आपराधिक मामले हैं।
गंभीर अपराधों वाले टॉप टेन विधायकों में नंबर एक पर सपा के बीकापुर से विधायक मित्रसेन यादव हैं। उनके खिलाफ 36 मामले हैं। इनमें से 14 मामले हत्या के हैं। दूसरे नंबर पर माफिया डॉन बृजेश सिंह के भतीजे सुशील सिंह का नाम है। सकलडीहा से निर्दलीय विधायक सुशील सिंह पर 20 मामले दर्ज हैं। इनमें से 12 मामले हत्या के हैं। तीसरे नंबर पर जसराना के सपा विधायक रामवीर सिंह का नाम है। रामवीर के खिलाफ कुल 18 मामले दर्ज हैं। मुख्तार अंसारी के खिलाफ भी हत्या के आठ मामलों सहित 15 रिपोर्ट दर्ज हैं।
इस समय देश भर के 31 फीसदी सांसद और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं। ऐसे में दो साल या उससे अधिक अवधि की सजा जनप्रतिनिधियों पर भारी पड़ेगी। सुप्रीम कोर्ट के ऐसे जनप्रतिनिधियों की सदस्यता तत्काल प्रभाव से रद्द होने संबंधी फैसले से राजनीतिक दल सन्न हैं। इस फैसले ने देष के 1448 जन प्रतिनिधियों के भविष्य पर तलवार लटका दी है। इनमें से 162 सांसद हैं तो 1286 विधायक। खास बात यह है कि आपराधिक मामलों में अगर अदालत ने सजा सुनाई तो कई बड़ी राजनीतिक हस्तियों का भविष्य खतरें में पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के पीछे लखनऊ के एक गैर सरकारी संगठन लोक प्रहरी की पहल रही है। इस संगठन के सचिव एसएन शुक्ला ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ऐतिहासिक बताया है और कहा कि संगठन ने 2005 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी, फिर लिली थॉमस ने भी एक और याचिका दाखिल की। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों ही याचिकाओं के आधार पर यह ऐतिहासिक फैसला दिया है।
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अदालती फैसले पर रार
सुप्रीम कोर्ट का फैसला महत्वपूर्ण व स्वागत योग्य है। पिछले 20 वर्षों में राजनीति का अपराधीकरण हुआ है। धनबल और बाहुबल का प्रभाव बढ़ गया है। उम्मीद है कि सभी दल पर इस पर गंभीरता से विचार करेंगे। आशा है कि इसके सार्थक परिणाम सामने आएंगे। -डॉ. रीता बहुगुणा जोशी, कांग्रेस
फैसला देखकर टिप्पणी करूंगा। मैंने अभी सुप्रीम कोर्ट के फैसले को देखा नहीं है। कोर्ट ने किस ग्राउंड पर फैसला दिया है, यह भी मालूम नहीं है। -स्वामी प्रसाद मौर्य, बसपा
लोकतंत्र कहीं पुलिस के हाथ की कठपुतली न बन जाए। यह फैसला काफी क्रांतिकारी है लेकिन जहां पुलिस रोज सैकड़ों फर्जी मुकदमे लिखती हो, उनको मार डालती हो, आंदोलनकारियों को पीटती हो, उन पर गोली चलाती हो और उन पर मुकदमा भी लगाती हो वहां क्या यह कारगर साबित होगा। ऐसा न हो कि इस फैसले से लोकतंत्र ही मर जाए। इस फैसले को अगर सरकार व सत्ता ने विपक्ष के उत्पीड़न का माध्यम बना लिया तो आपातकाल से भी बुरी स्थिति बन जाएगी। -डॉ. सीपी राय, सपा
इस फैसले से जनप्रतिनिधित्व कानून में एक बड़ा बदलाव होगा और आपराधिक चरित्र के लोगों की मुश्किलें बढ़ेगी। अभी तक दागी चरित्र के राजनेता अदालत में दोषसिद्ध साबित होने के बावजूद सत्ता में बने रहते थे लेकिन अब ऐसा मुमकिन नहीं होगा। इस कानून का सकारात्मक असर सियासत में जरूर देखने को मिलेगा। -एसएन शुक्ला, लोक प्रहरी संगठन
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देश भर के कुल 31 फीसदी जनप्रतिनिधि दागी है। लोकसभा के 543 सांसदों में से 162 के खिलाफ मामले लंबित है। 1448 जनप्रतिनिधियों में से 641 के खिलाफ हत्या, बलात्कार, अपहरण, डकैती, शोषण जैसे संगीन मामले दर्ज है और 807 माननीयों के खिलाफ धमकी देने, चोरी करने, हाथ उठाने, लूटपाट करने, लोगों को भड़काने जैसे मामले चल रहे है।
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मुलायम, मायावती समेत 1448 पर तलवार
इस समय भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, उमा भारती, सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव, बसपा प्रमुख मायावती, पूर्व भाजपा नेता येदियुरप्पा, राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव, वाईएसआर कांग्रेस के प्रमुख जगनमोहन रेड्डी, अन्नाद्रमुक प्रमुख जयललिता, कांग्रेस नेता सुरेश कलमाडी, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण सहित कई नामचीन राजनीतिक हस्तियों के खिलाफ विभिन्न अदालतों में मामले लंबित हैं। इसके अलावा आपराधिक मामला झेल रहे नेताओं की एक लंबी फेहरिस्त है, जिनके भविष्य पर इस फैसले से प्रतिकूल असर पड़ सकता है। जहां तक भाजपा की बात है तो बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में आडवाणी, डॉ जोशी, कल्याण, उमा, विनय कटियार, कल्याण सिंह सहित कई अन्य नेताओं के खिलाफ मामला अदालत में लंबित है। इसके अलावा भ्रष्टाचार के मामले में पार्टी के पूर्व अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण, पूर्व मंत्री दिलीप सिंह जूदेव सहित दर्जन भर नेता अलग से घिरेंगे। फर्जी मुठभेड़ मामले में पार्टी महासचिव अमित शाह भी इस फैसले की जद में शामिल हो सकते हैं। फैसले की सर्वाधिक मार क्षेत्रीय दलों के नेताओं को भुगतनी पड़ सकती है। गौरतलब है कि मुलायम, जयललिता, मायावती, लालू प्रसाद, जगनमोहन के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले अदालतों में चल रहे हैं। इसके अतिरिक्त झामुमो प्रमुख शिबू सोरेन, एम करुणानिधि, ए राजा, कनिमोझी भी अलग-अलग आपराधिक मामला झेल रहे हैं। अगर इन हस्तियों को इन मामलों में किसी भी अदालत से सजा हुई तो इनके राजनीतिक कॅरिअर पर विराम लग सकता है। इस समय 162 सांसद दागी हैं, इनमें से 75 सांसदों के खिलाफ संगीन आरोप हैं। जबकि 4292 विधायकों में से 1286 विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं।
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भाजपा का एजेंडा-नफरत फैलाना
लखनऊ। मोदी दंगों की राजनीति कर वैमनस्य फैलाते हैं। कोई उन्हें गंभीरता से नहीं लेता। उनमें तानाशाही और मनमानी के सिवा कुछ नहीं है। भ्रष्टाचार और अपराध के रिकार्ड तोड़ काम करने वाली मोदी सरकार से गुजरात त्रस्त है। लोकसभा चुनाव में अपने ही प्रदेश में वह इज्जत नहीं बचा पाएंगे। क्या मुंह लेकर यूपी आएंगे। इस देश का वह काला दिन होगा जब मोदी जैसा व्यक्ति उच्च पद पर पहुंच जाए।
कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव व प्रदेश के प्रभारी मधुसूदन मिस्त्री ने अपने चार दिवसीय उत्तर प्रदेष दौरे के दौरान कहा कि राम हम सभी की आस्था का केंद्र हैं। अयोध्या भाजपा का चुनावी एजेंडा है और उसे केवल चुनाव के समय ही मंदिर निर्माण की याद आती है। इस मुद्दे पर भाजपा के नेता अलग-अलग बयानबाजी करते हैं। उनके नेता कभी राम मंदिर निर्माण की बात करते है तो कभी विकास की बात करने लगते हैं। मोदी अपना अलग ही राग अलाप रहे है। भाजपा के प्रदेष प्रभारी अमित षाह तो मंदिर निर्माण को लेकर अयोध्या में माथा तक टेकनें पहंुच गए। भाजपा का मुख्य एजेंडा नफरत व सांप्रदायिकता फैलाना है और उन्हें यह हक किसी भी कीमत पर नहीं दिया जा सकता है।
उन्होंने कांग्रेसी नेताओं को आपसी तालमेल बनाकर काम करने की नसीहत दी। कांग्रेसी नेताओं, प्रवक्ताओं व कार्यकर्ताओं की क्लास लगाई। नरेंद्र मोदी से निपटने के लिए टिप्स दिए। नए कांग्रेसियों को ज्यादा तरजीह न देने का अष्वासन दिया और फिर आने का वादा करके वापस लौट गए।
अपने प्रवास के दौरन उन्होंने सबसे पहले इटावा, मैनपुरी, औरैया, कन्नौज, कानपुर नगर एवं ग्रामीण, कानपुर देहात, उन्नाव तथा लखनऊ शहर के कांग्रेसी नेताओं से मुलाकात की। मिस्त्री से मिलने पहुंचे कांग्रेसियों को एक फॉर्म थमाया गया जिसमें उन्हें अपने जोन, जिला, ब्लॉक, लोकसभा क्षेत्र, विधानसभा क्षेत्र के अलावा निजी ब्यौरा जैसे जाति, उम्र, शैक्षिक योग्यता, राजनीतिक अनुभव, वर्तमान पद आदि की जानकारी भरकर देनी थी। इस फॉर्म के अंतिम कॉलम ने नेताओं की धडकने बढ़ा दी जिसमें उन्हें बताना था कि वह पार्टी के लिए कितना समय देंगे? उनसे सीधा सा सवाल किया गया कि- वह पार्टी को कितना समय देंगे। पूरा महीना, 20 दिन, 15 दिन, 10 दिन, तीन दिन या सिर्फ शनिवार व रविवार। यह सवाल हवाहवाई नहीं था बल्कि जवाब बाकायदा लिखा-पढ़ी मेें देना था। मास्टर मिस्त्री की क्लास चल रही थी और सोचने-विचारने का ज्यादा समय भी नहीं था। सभी ने उनको सवालों का लिखित जवाब थमाया और चलते बनें। मास्टर साहब ने फॉर्मो को अपनी फाइल में रख लिया। मिस्त्री अलग-अलग लोगों से कम ही मिले कुछ नेता अलग से भेंट करने में सफल भी रहें। मिस्त्री ने प्रवक्ताओं से कामकाज के बारे में जानकारी ली और मीडिया का ज्यादा से ज्यादा सहयोग लेने के लिए लगातार संवाद पर जोर दिया। सभी मुद्दों पर पूरी तैयारी के साथ मीडिया के सामने जाने की सलाह दीं। उनका कहना था कि प्रदेश कांग्रेस को सोशल मीडिया पर भी ध्यान देना चाहिए क्योंकि इसके जरिये बड़े वर्ग तक पहुंच बनाई जा सकती है।
मिस्त्री के इस दौरे से जोड़-तोड़ करने वाले नेताओं को निराषा जरूर हुई क्योंकि जिस तरह से सभी नेताओं का बायोडाटा तैयार किया जा रहा है, उसके बाद यह तय माना जा रहा है कि आने वाले समय में जनता के बीच काम करने वाले नेताओं को ही तरजीह मिलेगी। पार्टी सूत्रों के अनुसार इन फॉर्म का विश्लेषण करने के बाद ही नए सिरे से नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। हवाई नेताओं को किनारे करके जमीनी नेताओं को तरजीह देने की संभावनाएं अधिक दिखाई दे रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केंद्र में समर्थन की चिंता छोड़ सपा सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ किसी भी सीमा तक विरोध करना चाहिए। कांग्रेसियों ने सपा के प्रभाव वाले क्षेत्रों जैसे इटावा, मैनपुरी और औरैया में सपाइयों द्वारा दमनकारी रवैया अख्तियार करने की षिकायत भी की। उन्होंने कहा कि प्रशासन कांग्रेस कार्यकर्ताओं की बातों का संज्ञान तक नहीं लेता। कांग्रेस के केंद्रीय मंत्री इन जिलों में नहीं आते और पार्टी सपा नेताओं के खिलाफ प्रत्याशी भी नहीं उतारती है। इससे कांग्रेस की जमीन कमजोर होती जा रही है। नेताओं ने सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और इटावा, मैनपुरी जैसी सीटों पर प्रत्याशी उतारे जाने की जोरदार मांग की।
मिस्त्री ने कांग्रेस के टिकट के लिए दिल्ली में जोड़तोड़ में जुटे नेताओं को साफ संदेश दिया कि इससे कोई फायदा होने वाला नहीं है। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी की इच्छानुसार मध्य प्रदेश और राजस्थान चुनाव में प्रत्याशी चयन के सफल प्रयोग को पार्टी यहां भी आजमाएगी। इसके तहत सबसे पहले ब्लॉक कमेटी की बैठक में प्रत्याशी तय होगा। वे एक से लेकर तीन नामों का पैनल देंगे। इस बैठक की रिपोर्ट फोटो के साथ आगे भेजी जाएगी। इसके बाद जिला स्तर पर पैनल बनाया जाएगा। इन बैठकों में पार्टी की ओर से नियुक्त पर्यवेक्षक मौजूद रहेगा। प्रदेश चुनाव कमेटी इसी पैनल पर विचार करके प्रत्याशी का नाम राष्ट्रीय नेतृत्व को भेजेगी। सभी मौजूदा सांसद भी इसी दायरे में हैं। पार्टी के बाहरी पर्यवेक्षक हर लोकसभा क्षेत्र का एक बार भ्रमण कर फीडबैक ले चुके हैं। अब एक-एक सचिव के जिम्मे दो-दो जोन की जिम्मेदारी दी जा रही है। वे जिला स्तर पर समीक्षा और रूट लेवल संगठन को खड़ा करने का काम कराएंगे।
जोन आठ की बैठक में सबसे बाद में लखनऊ का नंबर था। बैठक में शामिल होने वाले राजधानी के ज्यादातर नेताओं ने पिछले लोकसभा चुनाव में लखनऊ सीट पर दूसरे नंबर पर रहीं पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. रीता बहुगुणा जोशी को ही आगामी चुनाव में टिकट देने की वकालत की। रीता के पैरवीकारों ने मिस्त्री को बताया कि डॉ. जोशी को प्रत्याशी बनाने की घोषणा काफी विलंब से हुई जिससे उन्हें पर्याप्त समय नहीं मिल पाया। अगर समय से उनकी उम्मीदवारी का ऐलान हो गया होता तो नतीजा कांग्रेस के पक्ष में भी हो सकता था। नेताओं का अधिक जोर प्रत्याशियों की घोषणा पहले करने पर था ताकि उन्हें चुनावी तैयारियों के लिए पर्याप्त समय मिल सके। कांग्रेसियों का कहना था कि पार्टी को सभी सीटों पर चुनाव लड़ना चाहिए। पिछले चुनाव में कांग्रेस ने 80 में से 63 सीटों पर ही प्रत्याशी खड़े किए थे। इटावा, मैनपुरी, कन्नौज, फीरोजाबाद, आजमगढ़, लालगंज, बांदा, हरदोई, मोहनलालगंज, अंबेडकरनगर, बलिया, जौनपुर, मछलीशहर, गाजीपुर, चंदौली, संतकबीरनगर तथा आंवला सीट कांग्रेस ने छोड़ दी थी।
मिस्त्री के साथ कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की अलग-अलग बैठक के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष निर्मल खत्री पत्रकारों से मुखातिब हुए और यूपी में सपा के खिलाफ दो-दो हाथ करने का ऐलान कर दिया। उन्होंने सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के सामने पार्टी की ओर से प्रत्याशी उतारने की मांग उठाई और कहा कि आमतौर पर कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर असमंजस रहता है कि सपा केंद्र में समर्थन दे रही है तो प्रदेश में उसके खिलाफ क्या स्टैंड लिया जाए? खत्री ने साफ किया कि हमें ऐसे ही किसी के लिए सीट नहीं छोड़ देनी चाहिए। जब हमारा उनसे कोई समझौता नहीं तो प्रत्याशी उतारा जाना चाहिए। प्रत्याशी न उतारे जाने से वोटर पार्टी से दूर चले जाते हैं। किस सीट पर प्रत्याशी उतारा जाएगा किस पर नहीं, यह फैसला यहां नहीं होता है। यह फैसला सक्षम स्तर से सही समय पर होगा। अमेठी में राहुल गांधी और रायबरेली में सोनिया गांधी के सामने सपा द्वारा प्रत्याशी न उतारे जाने की ओर ध्यान दिलाने पर खत्री ने कहा कि यह सपा पर निर्भर करता है कि वह क्या फैसला करती है।
इस अवसर पर प्रदेश कांग्रेस की ओर से केंद्र सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं के बारे में अपने नेताओं, कार्यकर्ताओं को बताने और फिर उसे जनता तक पहुंचाने के लिए एक पत्रिका जारी की गई है। इस पत्रिका में पार्टी ने सूचना के अधिकार, काम के अधिकार, शिक्षा के अधिकार, आपका पैसा-आपके हाथ स्कीम के साथ हाल ही में लागू खाद्य सुरक्षा अध्यादेश को अपनी उपलब्धियों के रूप में पेश किया है।
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कांग्रेस ने आगामी लोकसभा चुनाव में राहुल बनाम मोदी का रंग देने के भाजपा के मंसूबों पर पानी फेरने का मन बना लिया है। इसके लिए उसने पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के मुकाबले प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं करने का फैसला किया है। हालांकि भाजपा लगातार मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने का संकेत दे रही है, मगर कांग्रेस ने सोनिया गांधी की अगुवाई में ही चुनावी ताल ठोंकने का फैसला कर लिया है। अगर भाजपा मोदी को चुनाव से पहले प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर भी देती है तब भी कांग्रेस उनके खिलाफ राहुल का नाम आगे नहीं करेगी। कांग्रेस अपने इस फैसले के बचाव में अपनी पार्टी और संसदीय लोकतंत्र की परंपराओं का हवाला दे रही है।
दरअसल भाजपा पिछले कुछ समय से 2014 के चुनावी जंग को मोदी बनाम राहुल बनाने की कोशिशों में जुटी है जबकि कांग्रेस नहीं चाहती कि चुनाव मोदी और राहुल पर पूरी तरह केंद्रित हो जाए। कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने में अब भी राहुल ने अपनी ओर से दिलचस्पी नहीं दिखाई है। ऐसे में पार्टी के रणनीतिकारों ने चुनाव से पहले किसी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार न बनाने का फैसला किया है।
बसपा की चुनावी तैयारियां
आपने कांग्रेस व भाजपा को खूब देखा। अब एक बार बसपा को मौका दीजिए। हमारी पार्टी यदि बैलेंस ऑफ पावर बनकर केंद्र की सत्ता में आई तो पांच साल में सर्वसमाज के लिए इतना काम कर देंगी जितना 65 साल में कांग्रेस और भाजपा नहीं कर सकी। वे गरीबों, दलितों, पिछड़ों, धार्मिक अल्पसंख्यकों, युवाओं, महिलाओं, कर्मचारियों और व्यापारियों के साथ अन्य क्षेत्र के लोगों के हितों पर विशेष ध्यान देगी। यूपी में वह ऐसा करके दिखा चुकी हैं- मायावती
लखनऊ। बसपा के लिए लोकसभा चुनाव 2014 बहुत महत्वपूर्ण है। लोगबाग सपा सरकार से आजिज हैं और बसपा शासन को याद कर रहे हैं। 2017 में यूपी की सत्ता में पार्टी की तभी वापसी होगी जब लोकसभा चुनाव के नतीजे शानदार होंगे। अगर बसपा के विधायकों व विधानसभा प्रभारियों के क्षेत्रों में उनकी पार्टी के उम्मीदवारों की स्थिति खराब रही तो विधानसभा चुनाव में उनका टिकट कट जाएगा।
बहुजन समाज पार्टी ने लोकसभा चुनाव के लिए विधायकों और विधानसभा प्रभारियों की जवाबदेही तय कर दी है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा कि संसदीय सीट के जिन क्षेत्रों में पार्टी की परफॉरमेंस खराब रहेगी, वहां के विधायकों और विधानसभा प्रभारियों के टिकट पर पुनर्विचार किया जा सकता है। उन्होंने सर्वसमाज को सपा सरकार की नाकामियां और पिछली बसपा सरकार की उपलब्धियां बताने के निर्देश दिए।
पूर्व सीएम मायावती ने बसपा के जोन कोऑर्डिनेटरों और वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक में सर्वसमाज में पार्टी का जनाधार बढ़ाने, भाईचारा कमेटियों में बेहतर तालमेल बढ़ाने, निचले स्तर तक संगठन को मजबूत बनाने व सेक्टर, विधानसभा, जिला और मंडल स्तर पर पूर्व निर्धारित लक्ष्यों को समय से पूरा करने के निर्देश दिए।
मायवती ने कहा, सपा शासनकाल के दौरान व्याप्त जंगल राज’ से हर स्तर पर अन्याय, अपराध, भय, आतंक, भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने वाला वातावरण है। उन्होंने निर्देश दिए कि पीडि़तों को न्याय दिलाने और यथासंभव मदद का काम लगातार जारी रहना चाहिए। सपा के गुंडों, माफिया व अराजक तत्वों से प्रभावित लोगों को इंसाफ दिलाने का काम स्थानीय प्रशासनिक स्तर पर न हो तो कोर्ट-कचहरी का रास्ता अपनाया जाएं।
बतातें चलें कि विधानसभा स्तर पर हर महीने की दो तारीख को, जिला स्तर पर तीन और मंडल स्तर पर पांच तारीख को समीक्षा होती है। इसके बाद 10 तारीख को प्रदेश स्तरीय समीक्षा होती है।
भाजपा चुनाव प्रचार समिति के प्रमुख नरेंद्र मोदी अब बसपा सुप्रीमो मायावती के भी निशाने पर आ गए हैं। मायावती ने मोदी का नाम लिए बगैर उन्हें प्रांतवादी व संकीर्ण सोच रखने वाला नेता करार देते हुए लोगों को ऐसे व्यक्ति से सावधान रहने की सलाह दे डाली। वह ऐसी पार्टी की भी कड़े शब्दों में निंदा करती हैं जिसके एक नेता प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं लेकिन उत्तराखंड जाकर केवल अपने प्रांत के लोगों की ही मदद की बात करते हैं। बसपा सुप्रीमो ने कानून-व्यवस्था और विकास की उपेक्षा को लेकर सपा सरकार पर भी तगड़ा हमला बोला। उन्होंने कहा कि प्रदेश की जनता निराश है और अधिकारी-कर्मचारी हताश हैं। मेरी बात की पुष्टि मुख्यमंत्री के पिता मुलायम सिंह यादव खुद कई बार कर चुके हैं’।
सर्वसमाज से मुखातिब होते हुए उन्होंने कहा कि आपने कांग्रेस व भाजपा को खूब देखा। अब एक बार बसपा को मौका दीजिए। हमारी पार्टी यदि बैलेंस ऑफ पावर बनकर केंद्र की सत्ता में आई तो पांच साल में सर्वसमाज के लिए इतना काम कर देंगी जितना 65 साल में कांग्रेस और भाजपा नहीं कर सकी। वे गरीबों, दलितों, पिछड़ों, धार्मिक अल्पसंख्यकों, युवाओं, महिलाओं, कर्मचारियों और व्यापारियों के साथ अन्य क्षेत्र के लोगों के हितों पर विशेष ध्यान देगी। यूपी में वह ऐसा करके दिखा चुकी हैं। बसपा दलितों को प्रमोशन में आरक्षण देने के पक्ष में तो हैं ही, गरीब सवर्णों और गरीब अल्पसंख्यकों को भी आरक्षण की पक्षधर हैं। वह राष्ट्रीय स्तर पर सच्चर कमेटी की सिफारिशें लागू कर अल्पसंख्यकों के लिए शैक्षिक व आर्थिक विकास के अवसर बढ़ाएंगी। मायावती ने ब्राह्मण सम्मेलन से एक तरह से चुनाव प्रचार भी शुरू कर दिया। उन्होंने जनसमूह से आगामी लोकसभा चुनाव में पार्टी के प्रत्याशियों को भारी तादाद में वोट देने की अपील की और उम्मीद जताई कि इसमें चैंकाने वाले नतीजे आएंगे।
मायवती ने लोकसभा चुनाव के रोडमैप को पार्टी के प्रमुख पदाधिकारियों के सामने रखा। इसमें सपा सरकार की कमजोरियों का फायदा उठाने के लिए सपा सरकार में पीडि़त लोगों की मदद के लिए बसपा कार्यकर्ताओं को आगे आने को कहा गया हैं। ऐसे लोगों का पता लगाकर उनके पक्ष में खड़े होकर इन्हे न्याय दिलाने की जिम्मेदारी बसपा कार्यकर्ताओं को दी गई है। इसके साथ ही सोशल इंजीनियरिंग के फामर््ले को आगे बढ़ाने के लिए ब्राह्मणों के हित की जो बातें पार्टी में तय की गयी हैं, उन्हें ब्राहमण समाज और अन्य जातियों के बीच विस्तार से रखने की बात कही गयी है।
लखनऊ। अदालत ने एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसले में राजनीतिक दलों की जातिगत आधारित रैलियों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। कोर्ट ने माना है कि जातीय रैलियों से समाज बंटता है और यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। पीठ ने इसे संविधान की मंशा के खिलाफ बताते हुए कहा कि राजनीतिक पार्टियां व अन्य संगठन जातीय आधार पर रैलियां नहीं करेंगी। कोर्ट ने राजनीतिक दलों- कांग्रेस, भाजपा, सपा और बसपा को नोटिस भी जारी किया है। साथ ही केंद्र व राज्य सरकारों और निर्वाचन आयोग को भी अपना पक्ष रखने को कहा गया है। इस मामले में अगली सुनवाई 30 जुलाई को होगी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा सजायाफ्ता सांसद या विधायक की सजा की तारीख से ही उसे पद पर बने रहने के लिए अयोग्य मानने के फैसले के बाद जातीय रैलियों पर रोक को राजनीतिक दलों के लिए तगड़ा झटका माना जा रहा है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्डपीठ के वरिष्ठ न्यायमूर्ति उमानाथ सिंह व न्यायमूर्ति महेंद्र दयाल ने वकील मोतीलाल यादव की जनहित याचिका पर यह आदेश दिया है। याचिका में कहा गया है कि विभिन्न राजनीतिक दल चुनाव के मौके पर समाज को जातीय आधार पर बांटने का काम करने लगते हैं। जातीय नाम देकर रैलियों का आयोजन करना और चुनाव के बाद विशेष जाति के लोगों को अधिक लाभ देना संविधान व कानून दोनों के खिलाफ है। जाति के आधार पर बंटवारे से समाज में असंतुलन पैदा होता है और साफ-सुथरे व निष्पक्ष चुनाव की मंशा पर पानी फिर जाता है। इससे देश की राष्ट्रीय अखंडता पर भी असर पड़ता है और समाज में अलगाव व विघटन की स्थिति पैदा होती है।
याचिकाकर्ता का यह भी कहना था कि अगले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर सभी प्रमुख राजनीतिक दल वोट बैंक मजबूत करने के मकसद से जातियों के नाम पर अंधाधुंध रैलियां कर रहे हैं। बसपा की विगत सात जुलाई को लखनऊ में हुई ब्राह्मण समाज की रैली समेत क्षत्रिय रैली व वैश्य सम्मेलन का हवाला देते हुए याची ने कहा कि इन आयोजनों से समाज में विघटन की प्रवृत्ति पनप रही है और सामाजिक एकता व समरसता बिगड़ रही है। विभिन्न समुदायों व जातियों के बीच जहर घोलकर वैमनस्यता पैदा की जा रही है। संविधान में सभी नागरिकों को समान रूप से अधिकार दिए गए हैं। इसमें किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। याचिका में जातीय आधार पर रैलियों का आयोजन करने वाली राजनीतिक पार्टियों पर प्रतिबन्ध लगाने, उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगाने और उनका पंजीकरण निरस्त करने की गुहार लगाई गयी है। याची ने अदालत से मांग की है कि चुनाव आयोग को निर्देश दिया जाए कि वह जाति व धर्म के आधार पर होने वाली रैलियों व सम्मेलनों जैसे ब्राह्मण महासभा रैली, यादव रैली, क्षत्रिय रैली, कायस्थ रैली, वैश्य सम्मेलन, कुशवाहा सम्मेलन, मुस्लिम सम्मेलन, दलित रैली आयोजित करने वाली राजनीतिक पार्टियों के साथ-साथ ऐसी जातीय रैलियों पर प्रतिबन्ध लगाएं।
अदालत के इस फैसले ने सियासी दलों की जातीय राजनीति को गड़गड़ा दिया है। इन राजनीतिक दलों और नेताओं ने बड़े दुखी मन से फैसले का स्वागत किया है। उत्तर प्रदेष में कांग्रेस व भाजपा का पतन दो क्षेत्रीय दलों- सपा व बसपा की जातीय राजनीति के उदय के कारण ही हुआ है जिसे सोशल इंजीनियरिंग का नाम दे दिया गया। जातीय राजनीति का ही नतीजा है कि डकैत फूलन देवी दो बार लोकसभा पहुंचने में कामयाब रर्ही।
याद रहें बसपा के शुरूआती दौर में कांशीराम की रैलियों में सबसे पहले सवर्ण विरोधी नारे लगाये जाते थे। फिर वोट की राजनीति ने ऐसी करवट ली कि बसपा को अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा। ब्राह्मण मतों के लिए बसपा ने तिलक-तराजू और तलवार. सरीखे नारे को बदल कर हाथी नहीं गणोश है जैसे नारे बुलंद किए और दलित-ब्राह्मण इंजीनियरिंग के दम पर 2007 में प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली। सत्ता की खातिर सपा ने भी कई बार जातीगत समीकरण साधने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। मगर किसी भी दल ने जनता के कल्याण पर ध्यान नहीं दिया। सभी दलों ने जातिगत आधार पर अपना उल्लू सीधा किया, सत्ता पर कब्जा जमाया और विकास की आड़ में अपनी तिजोरियां भरने का काम किया है। 2012 के चुनाव में भाजपा ने ब्राह्मण मतों के ध्रवीकरण के लिए चाणक्य स्वाभिमान मंच का इस्तेमाल किया। इस मंच की प्रदेश में कई स्थानों पर सभाएं हुई, जिन्हें डा. मुरली मनोहर जोशी, केसरीनाथ त्रिपाठी, कलराज मिश्रा, शिवप्रताप शुक्ला आदि भाजपा के ब्राह्मण चेहरों ने संबोधित किया। कांग्रेस ने भी मुसलमानों को आरक्षण देने का मुद्दा उछाल कर वोट हासिल करने की कोशिश की। जातीय समीकरण ने ही कल्याण सिंह और मुलायम सिंह यादव को एक मंच पर ला खड़ा किया। उत्तर प्रदेष में तमाम दल जातीय आधार पर सक्रिय है और उनकी विचारधारा आपस में मेल नहीं खाती। कई दिग्गज नेताओं की पहचान केवल जाति के आधार पर ही जानी-पहचानी जाती है। कल्याण सिंह की पहचान लोध नेता, केन्द्रीय मंत्री अजित सिंह जाट नेता, मायावती दलित नेता और मुलायम सिंह की पहचान यादव नेता के रूप में होती है।
हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद राजनीतिक पार्टियों का रवैया बदलने की उम्मीद कम ही है। पार्टियां अब नाम बदलकर कार्यक्रम करेंगी। सपा प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन के नाम पर ब्राह्मण सम्मेलन करके पहले ही रास्ता दिखा चुकी है
रोक पर रार
उत्तर प्रदेष में अगले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बसपा-सपा में जातीय आयोजनों की होड़ है। बसपा प्रदेश भर में भाईचारा सम्मेलन के नाम से 21 ब्राह्मण व 17 दलित उम्मीदवारों के इलाके में सम्मेलन कर चुकी है जिसमें 17 जातियों को दलितों के समान अधिकार देने की पैरवी की गई। परशुराम जयंती पर सपा मुख्यालय पर ब्राह्मण जुटाए गए, फिर प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन के नाम पर ब्राह्मण सम्मेलन किया गया। प्रदेश में पिछड़ा वर्ग सम्मेलन भी किए जा रहे हैं।
फैसला स्वागत योग्य है। समाजवादी पार्टी तो शुरू से ही बिना किसी भेदभाव के सभी को समान अवसर देने की पक्षधर है। समाजवादी विचारधारा जातिवाद की विरोधी है। इस निर्णय से जाति व संप्रदाय की राजनीति करने वालों को सबक मिलेगा। समाजवादी पार्टी इस तरह की रैलियां नहीं आयोजित करती। हम जाति आधारित पार्टी नहीं है। मैं इस तरह की रैलियों के पक्ष में नहीं हूं। -मुलायम सिंह यादव
कांग्रेस, सपा, बसपा जैसे दल समाज को जाति के आधार पर बांटना चाहते हैं। हाईकोर्ट स्वयं संज्ञान लेकर जातीय व धार्मिक आधार वाली जनगणना रोके व सम्मेलन करने वालों को दंडित करें। -डॉ.लक्ष्मीकांत
वाजपेयी, भाजपा
दलों ने सामाजिक परिवर्तन की बजाय सत्ता हथियाने के लिए जातिवाद को बढ़ावा दिया। सपा-बसपा हमेशा ही जात-पात की राजनीति करते आए हैं। कांग्रेस ने कभी भी ऐसी राजनीति नहीं की। -पीएल पूनिया, कांग्रेस
निजी तौर पर मेरा मानना है कि जात-पात की राजनीति की नींव कांग्रेस ने रखी, बाद में क्षेत्रीय दलों ने सीमाएं लांघ दी। लोकतंत्र में यह कैंसर की तरह है, जिसे खत्म करना बहुत जरूरी है। -विजय बहादुर, बसपा नेता
हम फैसले का स्वागत करते हैं। सपा ने कभी जाति, धर्म की राजनीति नहीं की। सपा धर्मनिरपेक्षता को मानती है और यहां सभी धर्म और जाति के लोगों को बराबर सम्मान मिलता है। -शिवपाल यादव, सपा नेता
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अब मायावती की दाल नहीं गलेगी
लखनऊ। अब बसपा अध्यक्ष मायावती की जनता के बीच दाल नहीं गलने वाली है। वह अपने पार्टी नेताओं को सवर्ण समाज और विशेषकर ब्राह्मणों को अपने पाले में खींचने की सीख दे रही हैं। इसके लिए वे आरक्षण की लुभानेवाली घोषणाएं कर रही हैं। उनका यह नया सर्वजन प्रेम अवसरवादिता की हद है। बसपा राज्य में जातीय उन्माद फैला रही है। समाजवादी पार्टी जातिविहीन समाज व्यवस्था की पक्षधर है। डॉ. लोहिया, चैधरी चरण सिंह और मुलायम सिंह यादव कभी जाति की राजनीति के पक्ष में नहीं रहे। बसपा जातीयता का नंगानाच करा रही है।
समाजवादी पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता राजेंद्र चैधरी का कहना है कि कल तक मनुवाद को कोसने वाली मायावती को अचानक ब्राह्मणों के प्रति प्रेम उमड़ पड़ा है। उन्होंने सत्ता के लिए अपने दल के सिद्धांत, विचार और कार्यक्रम सभी को तिलांजलि दे दी है। काषीराम ने दलितों के हाथ में सत्ता की चाबी सौंपने के लिए संघर्ष किया और मायावती ने सत्ता की चाबी दलितों से छीनकर ब्राह्मणों को सौंप दी। अब बसपा से जुड़ा दलित वर्ग अपने को ठगा सा महसूस कर रहा है। पार्टी में उसे उचित भागीदारी से वंचित किया जा रहा है। मायावती ने दलित को बंधुआ मानकर उनके वोट का सौदा करने की ठान ली है।। ब्राह्मणों के नाम पर उनके राष्ट्रीय महासचिव के रिश्तेदारों को 24 लाल बत्तियों से नवाजा गया। लोकसभा के लिए अमीर और दंबग ब्राह्मणों को टिकट देकर दलितों की सत्ता में भागीदारी से ही खिलवाड़ हो रहा है। इनसे दलितों की परेशानियां सुने जाने की उम्मीद नहीं हैं। बसपा पूरी तरह भाजपा के रंग में रंग गई है। बसपा अध्यक्ष गुजरात में नरेंद्र मोदी का चुनाव प्रचार करने गई। नरेंद्र मोदी ने मुस्लिमों का नरसंहार कराया। अब गुजरात की कहानी उत्तर प्रदेश में दोहराने के लिए भाजपा नरेंद्र मोदी को ला रही है। बसपा अध्यक्ष को सत्ता का सुख पाने के लिए भाजपा के सहयोग की कई बार जरूरत हुई है।
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2. दागदार माननीयों को झटका
लखनऊ। आजकल उत्तर प्रदेष के बाहुबली माननीयों की नींद उड़ी हुई है। अदालत ने माफियों, बाहुबलियों और सियासी दलों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। अदालत ने जेल में बंद विचाराधीन नेताओं के चुनाव लड़ने का चलन समाप्त कर दिया है और कहा कि कोई व्यक्ति जो जेल या पुलिस हिरासत में है, वह विधाई निकायों का चुनाव नहीं लड़ सकता। कानून की निगाह में अपराधी और अदालत से सजायाफ्ता लोग अब संसद और विधानसभाओं में नहीं बैठ सकेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने राजनीति का अपराधीकरण रोकने की दिशा में अहम फैसला देते हुए अदालत से सजा पाए सांसद-विधायकों की सदस्यता बनाए रखने वाले कानून को असंवैधानिक ठहराया है। कोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 (4) को असंवैधानिक ठहराते हुए कहा है कि संसद को ऐसा कानून बनाने का अधिकार ही नहीं है।
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव 2012 में अपना दल, भारतीय समाज पार्टी, पीस पार्टी, कौमी एकता दल, इंडियन जस्टिस पार्टी, प्रगतिशील मानव समाज पार्टी जैसे छोटे दल बाहुबली और माफिया मुख्तार अंसारी, बृजेश सिंह, मुन्ना बजरंगी, अतीक अहमद, डीपी यादव के सियासी हमराही रह चुके हैं। अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी सपा व बसपा से चुनाव में उतर चुके हैं। लोकसभा चुनाव के मद्देनजर अंसारी बंधुओं ने कौमी एकता दल बनाया और उसके बैनर तले मुख्तार अंसारी वाराणसी से, उनके बड़े भाई अफजाल अंसारी बलिया से व बाबू सिंह कुशवाहा गाजीपुर से चुनाव लड़ने की फिराक में हैं। बाहुबली अतीक अहमद ने अपना दल के टिकट पर प्रतापगढ़ से चुनाव लड़ने का एलान किया है। माफिया डीपी यादव बदायूं के सहसवान सीट से एक बार फिर दो-दो हाथ करने को तैयार है। पिछली विधानसभा में वे और उनकी पत्नी इसी दल से विधायक थे। माफिया बबलू श्रीवास्तव, बाहुबली धनंजय सिंह, अभय सिंह, रामू द्विवेदी, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, रंगनाथ मिश्र, राकेशधर त्रिपाठी, बादशाह सिंह, रामवीर उपाध्याय, रामअचल राजभर समेत कई नेताओं की सियासी उम्मीदों पर पानी फिर सकता है।
उत्तर प्रदेष में दागी माननीयों की एक लम्बी चैड़ी फौज है। प्रदेश के कुल 403 विधायकों में से 189 यानी 47 प्रतिशत विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें से 98 पर हत्या, बलात्कार जैसी संगीन धाराओं में रिपोर्ट दर्ज है। सूत्रों अनुसार समाजवादी पार्टी के 224 विधायकों में से 56 पर गम्भीर मामलों सहित 111 केस दर्ज हैं। बसपा के 80 विधायकों में से 14 पर गम्भीर मामलों सहित 29 के खिलाफ मुकदमे चल रहे हैं। भाजपा के 47 में से 25 विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले हैं। इनमें 14 पर गंभीर आरोप हैं। कांग्रेस के 28 में से 13 विधायकों पर आपराधिक मामले हैं।
गंभीर अपराधों वाले टॉप टेन विधायकों में नंबर एक पर सपा के बीकापुर से विधायक मित्रसेन यादव हैं। उनके खिलाफ 36 मामले हैं। इनमें से 14 मामले हत्या के हैं। दूसरे नंबर पर माफिया डॉन बृजेश सिंह के भतीजे सुशील सिंह का नाम है। सकलडीहा से निर्दलीय विधायक सुशील सिंह पर 20 मामले दर्ज हैं। इनमें से 12 मामले हत्या के हैं। तीसरे नंबर पर जसराना के सपा विधायक रामवीर सिंह का नाम है। रामवीर के खिलाफ कुल 18 मामले दर्ज हैं। मुख्तार अंसारी के खिलाफ भी हत्या के आठ मामलों सहित 15 रिपोर्ट दर्ज हैं।
इस समय देश भर के 31 फीसदी सांसद और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं। ऐसे में दो साल या उससे अधिक अवधि की सजा जनप्रतिनिधियों पर भारी पड़ेगी। सुप्रीम कोर्ट के ऐसे जनप्रतिनिधियों की सदस्यता तत्काल प्रभाव से रद्द होने संबंधी फैसले से राजनीतिक दल सन्न हैं। इस फैसले ने देष के 1448 जन प्रतिनिधियों के भविष्य पर तलवार लटका दी है। इनमें से 162 सांसद हैं तो 1286 विधायक। खास बात यह है कि आपराधिक मामलों में अगर अदालत ने सजा सुनाई तो कई बड़ी राजनीतिक हस्तियों का भविष्य खतरें में पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के पीछे लखनऊ के एक गैर सरकारी संगठन लोक प्रहरी की पहल रही है। इस संगठन के सचिव एसएन शुक्ला ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ऐतिहासिक बताया है और कहा कि संगठन ने 2005 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी, फिर लिली थॉमस ने भी एक और याचिका दाखिल की। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों ही याचिकाओं के आधार पर यह ऐतिहासिक फैसला दिया है।
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अदालती फैसले पर रार
सुप्रीम कोर्ट का फैसला महत्वपूर्ण व स्वागत योग्य है। पिछले 20 वर्षों में राजनीति का अपराधीकरण हुआ है। धनबल और बाहुबल का प्रभाव बढ़ गया है। उम्मीद है कि सभी दल पर इस पर गंभीरता से विचार करेंगे। आशा है कि इसके सार्थक परिणाम सामने आएंगे। -डॉ. रीता बहुगुणा जोशी, कांग्रेस
फैसला देखकर टिप्पणी करूंगा। मैंने अभी सुप्रीम कोर्ट के फैसले को देखा नहीं है। कोर्ट ने किस ग्राउंड पर फैसला दिया है, यह भी मालूम नहीं है। -स्वामी प्रसाद मौर्य, बसपा
लोकतंत्र कहीं पुलिस के हाथ की कठपुतली न बन जाए। यह फैसला काफी क्रांतिकारी है लेकिन जहां पुलिस रोज सैकड़ों फर्जी मुकदमे लिखती हो, उनको मार डालती हो, आंदोलनकारियों को पीटती हो, उन पर गोली चलाती हो और उन पर मुकदमा भी लगाती हो वहां क्या यह कारगर साबित होगा। ऐसा न हो कि इस फैसले से लोकतंत्र ही मर जाए। इस फैसले को अगर सरकार व सत्ता ने विपक्ष के उत्पीड़न का माध्यम बना लिया तो आपातकाल से भी बुरी स्थिति बन जाएगी। -डॉ. सीपी राय, सपा
इस फैसले से जनप्रतिनिधित्व कानून में एक बड़ा बदलाव होगा और आपराधिक चरित्र के लोगों की मुश्किलें बढ़ेगी। अभी तक दागी चरित्र के राजनेता अदालत में दोषसिद्ध साबित होने के बावजूद सत्ता में बने रहते थे लेकिन अब ऐसा मुमकिन नहीं होगा। इस कानून का सकारात्मक असर सियासत में जरूर देखने को मिलेगा। -एसएन शुक्ला, लोक प्रहरी संगठन
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देश भर के कुल 31 फीसदी जनप्रतिनिधि दागी है। लोकसभा के 543 सांसदों में से 162 के खिलाफ मामले लंबित है। 1448 जनप्रतिनिधियों में से 641 के खिलाफ हत्या, बलात्कार, अपहरण, डकैती, शोषण जैसे संगीन मामले दर्ज है और 807 माननीयों के खिलाफ धमकी देने, चोरी करने, हाथ उठाने, लूटपाट करने, लोगों को भड़काने जैसे मामले चल रहे है।
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मुलायम, मायावती समेत 1448 पर तलवार
इस समय भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, उमा भारती, सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव, बसपा प्रमुख मायावती, पूर्व भाजपा नेता येदियुरप्पा, राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव, वाईएसआर कांग्रेस के प्रमुख जगनमोहन रेड्डी, अन्नाद्रमुक प्रमुख जयललिता, कांग्रेस नेता सुरेश कलमाडी, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण सहित कई नामचीन राजनीतिक हस्तियों के खिलाफ विभिन्न अदालतों में मामले लंबित हैं। इसके अलावा आपराधिक मामला झेल रहे नेताओं की एक लंबी फेहरिस्त है, जिनके भविष्य पर इस फैसले से प्रतिकूल असर पड़ सकता है। जहां तक भाजपा की बात है तो बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में आडवाणी, डॉ जोशी, कल्याण, उमा, विनय कटियार, कल्याण सिंह सहित कई अन्य नेताओं के खिलाफ मामला अदालत में लंबित है। इसके अलावा भ्रष्टाचार के मामले में पार्टी के पूर्व अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण, पूर्व मंत्री दिलीप सिंह जूदेव सहित दर्जन भर नेता अलग से घिरेंगे। फर्जी मुठभेड़ मामले में पार्टी महासचिव अमित शाह भी इस फैसले की जद में शामिल हो सकते हैं। फैसले की सर्वाधिक मार क्षेत्रीय दलों के नेताओं को भुगतनी पड़ सकती है। गौरतलब है कि मुलायम, जयललिता, मायावती, लालू प्रसाद, जगनमोहन के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले अदालतों में चल रहे हैं। इसके अतिरिक्त झामुमो प्रमुख शिबू सोरेन, एम करुणानिधि, ए राजा, कनिमोझी भी अलग-अलग आपराधिक मामला झेल रहे हैं। अगर इन हस्तियों को इन मामलों में किसी भी अदालत से सजा हुई तो इनके राजनीतिक कॅरिअर पर विराम लग सकता है। इस समय 162 सांसद दागी हैं, इनमें से 75 सांसदों के खिलाफ संगीन आरोप हैं। जबकि 4292 विधायकों में से 1286 विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं।
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भाजपा का एजेंडा-नफरत फैलाना
लखनऊ। मोदी दंगों की राजनीति कर वैमनस्य फैलाते हैं। कोई उन्हें गंभीरता से नहीं लेता। उनमें तानाशाही और मनमानी के सिवा कुछ नहीं है। भ्रष्टाचार और अपराध के रिकार्ड तोड़ काम करने वाली मोदी सरकार से गुजरात त्रस्त है। लोकसभा चुनाव में अपने ही प्रदेश में वह इज्जत नहीं बचा पाएंगे। क्या मुंह लेकर यूपी आएंगे। इस देश का वह काला दिन होगा जब मोदी जैसा व्यक्ति उच्च पद पर पहुंच जाए।
कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव व प्रदेश के प्रभारी मधुसूदन मिस्त्री ने अपने चार दिवसीय उत्तर प्रदेष दौरे के दौरान कहा कि राम हम सभी की आस्था का केंद्र हैं। अयोध्या भाजपा का चुनावी एजेंडा है और उसे केवल चुनाव के समय ही मंदिर निर्माण की याद आती है। इस मुद्दे पर भाजपा के नेता अलग-अलग बयानबाजी करते हैं। उनके नेता कभी राम मंदिर निर्माण की बात करते है तो कभी विकास की बात करने लगते हैं। मोदी अपना अलग ही राग अलाप रहे है। भाजपा के प्रदेष प्रभारी अमित षाह तो मंदिर निर्माण को लेकर अयोध्या में माथा तक टेकनें पहंुच गए। भाजपा का मुख्य एजेंडा नफरत व सांप्रदायिकता फैलाना है और उन्हें यह हक किसी भी कीमत पर नहीं दिया जा सकता है।
उन्होंने कांग्रेसी नेताओं को आपसी तालमेल बनाकर काम करने की नसीहत दी। कांग्रेसी नेताओं, प्रवक्ताओं व कार्यकर्ताओं की क्लास लगाई। नरेंद्र मोदी से निपटने के लिए टिप्स दिए। नए कांग्रेसियों को ज्यादा तरजीह न देने का अष्वासन दिया और फिर आने का वादा करके वापस लौट गए।
अपने प्रवास के दौरन उन्होंने सबसे पहले इटावा, मैनपुरी, औरैया, कन्नौज, कानपुर नगर एवं ग्रामीण, कानपुर देहात, उन्नाव तथा लखनऊ शहर के कांग्रेसी नेताओं से मुलाकात की। मिस्त्री से मिलने पहुंचे कांग्रेसियों को एक फॉर्म थमाया गया जिसमें उन्हें अपने जोन, जिला, ब्लॉक, लोकसभा क्षेत्र, विधानसभा क्षेत्र के अलावा निजी ब्यौरा जैसे जाति, उम्र, शैक्षिक योग्यता, राजनीतिक अनुभव, वर्तमान पद आदि की जानकारी भरकर देनी थी। इस फॉर्म के अंतिम कॉलम ने नेताओं की धडकने बढ़ा दी जिसमें उन्हें बताना था कि वह पार्टी के लिए कितना समय देंगे? उनसे सीधा सा सवाल किया गया कि- वह पार्टी को कितना समय देंगे। पूरा महीना, 20 दिन, 15 दिन, 10 दिन, तीन दिन या सिर्फ शनिवार व रविवार। यह सवाल हवाहवाई नहीं था बल्कि जवाब बाकायदा लिखा-पढ़ी मेें देना था। मास्टर मिस्त्री की क्लास चल रही थी और सोचने-विचारने का ज्यादा समय भी नहीं था। सभी ने उनको सवालों का लिखित जवाब थमाया और चलते बनें। मास्टर साहब ने फॉर्मो को अपनी फाइल में रख लिया। मिस्त्री अलग-अलग लोगों से कम ही मिले कुछ नेता अलग से भेंट करने में सफल भी रहें। मिस्त्री ने प्रवक्ताओं से कामकाज के बारे में जानकारी ली और मीडिया का ज्यादा से ज्यादा सहयोग लेने के लिए लगातार संवाद पर जोर दिया। सभी मुद्दों पर पूरी तैयारी के साथ मीडिया के सामने जाने की सलाह दीं। उनका कहना था कि प्रदेश कांग्रेस को सोशल मीडिया पर भी ध्यान देना चाहिए क्योंकि इसके जरिये बड़े वर्ग तक पहुंच बनाई जा सकती है।
मिस्त्री के इस दौरे से जोड़-तोड़ करने वाले नेताओं को निराषा जरूर हुई क्योंकि जिस तरह से सभी नेताओं का बायोडाटा तैयार किया जा रहा है, उसके बाद यह तय माना जा रहा है कि आने वाले समय में जनता के बीच काम करने वाले नेताओं को ही तरजीह मिलेगी। पार्टी सूत्रों के अनुसार इन फॉर्म का विश्लेषण करने के बाद ही नए सिरे से नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। हवाई नेताओं को किनारे करके जमीनी नेताओं को तरजीह देने की संभावनाएं अधिक दिखाई दे रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केंद्र में समर्थन की चिंता छोड़ सपा सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ किसी भी सीमा तक विरोध करना चाहिए। कांग्रेसियों ने सपा के प्रभाव वाले क्षेत्रों जैसे इटावा, मैनपुरी और औरैया में सपाइयों द्वारा दमनकारी रवैया अख्तियार करने की षिकायत भी की। उन्होंने कहा कि प्रशासन कांग्रेस कार्यकर्ताओं की बातों का संज्ञान तक नहीं लेता। कांग्रेस के केंद्रीय मंत्री इन जिलों में नहीं आते और पार्टी सपा नेताओं के खिलाफ प्रत्याशी भी नहीं उतारती है। इससे कांग्रेस की जमीन कमजोर होती जा रही है। नेताओं ने सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और इटावा, मैनपुरी जैसी सीटों पर प्रत्याशी उतारे जाने की जोरदार मांग की।
मिस्त्री ने कांग्रेस के टिकट के लिए दिल्ली में जोड़तोड़ में जुटे नेताओं को साफ संदेश दिया कि इससे कोई फायदा होने वाला नहीं है। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी की इच्छानुसार मध्य प्रदेश और राजस्थान चुनाव में प्रत्याशी चयन के सफल प्रयोग को पार्टी यहां भी आजमाएगी। इसके तहत सबसे पहले ब्लॉक कमेटी की बैठक में प्रत्याशी तय होगा। वे एक से लेकर तीन नामों का पैनल देंगे। इस बैठक की रिपोर्ट फोटो के साथ आगे भेजी जाएगी। इसके बाद जिला स्तर पर पैनल बनाया जाएगा। इन बैठकों में पार्टी की ओर से नियुक्त पर्यवेक्षक मौजूद रहेगा। प्रदेश चुनाव कमेटी इसी पैनल पर विचार करके प्रत्याशी का नाम राष्ट्रीय नेतृत्व को भेजेगी। सभी मौजूदा सांसद भी इसी दायरे में हैं। पार्टी के बाहरी पर्यवेक्षक हर लोकसभा क्षेत्र का एक बार भ्रमण कर फीडबैक ले चुके हैं। अब एक-एक सचिव के जिम्मे दो-दो जोन की जिम्मेदारी दी जा रही है। वे जिला स्तर पर समीक्षा और रूट लेवल संगठन को खड़ा करने का काम कराएंगे।
जोन आठ की बैठक में सबसे बाद में लखनऊ का नंबर था। बैठक में शामिल होने वाले राजधानी के ज्यादातर नेताओं ने पिछले लोकसभा चुनाव में लखनऊ सीट पर दूसरे नंबर पर रहीं पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. रीता बहुगुणा जोशी को ही आगामी चुनाव में टिकट देने की वकालत की। रीता के पैरवीकारों ने मिस्त्री को बताया कि डॉ. जोशी को प्रत्याशी बनाने की घोषणा काफी विलंब से हुई जिससे उन्हें पर्याप्त समय नहीं मिल पाया। अगर समय से उनकी उम्मीदवारी का ऐलान हो गया होता तो नतीजा कांग्रेस के पक्ष में भी हो सकता था। नेताओं का अधिक जोर प्रत्याशियों की घोषणा पहले करने पर था ताकि उन्हें चुनावी तैयारियों के लिए पर्याप्त समय मिल सके। कांग्रेसियों का कहना था कि पार्टी को सभी सीटों पर चुनाव लड़ना चाहिए। पिछले चुनाव में कांग्रेस ने 80 में से 63 सीटों पर ही प्रत्याशी खड़े किए थे। इटावा, मैनपुरी, कन्नौज, फीरोजाबाद, आजमगढ़, लालगंज, बांदा, हरदोई, मोहनलालगंज, अंबेडकरनगर, बलिया, जौनपुर, मछलीशहर, गाजीपुर, चंदौली, संतकबीरनगर तथा आंवला सीट कांग्रेस ने छोड़ दी थी।
मिस्त्री के साथ कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की अलग-अलग बैठक के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष निर्मल खत्री पत्रकारों से मुखातिब हुए और यूपी में सपा के खिलाफ दो-दो हाथ करने का ऐलान कर दिया। उन्होंने सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के सामने पार्टी की ओर से प्रत्याशी उतारने की मांग उठाई और कहा कि आमतौर पर कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर असमंजस रहता है कि सपा केंद्र में समर्थन दे रही है तो प्रदेश में उसके खिलाफ क्या स्टैंड लिया जाए? खत्री ने साफ किया कि हमें ऐसे ही किसी के लिए सीट नहीं छोड़ देनी चाहिए। जब हमारा उनसे कोई समझौता नहीं तो प्रत्याशी उतारा जाना चाहिए। प्रत्याशी न उतारे जाने से वोटर पार्टी से दूर चले जाते हैं। किस सीट पर प्रत्याशी उतारा जाएगा किस पर नहीं, यह फैसला यहां नहीं होता है। यह फैसला सक्षम स्तर से सही समय पर होगा। अमेठी में राहुल गांधी और रायबरेली में सोनिया गांधी के सामने सपा द्वारा प्रत्याशी न उतारे जाने की ओर ध्यान दिलाने पर खत्री ने कहा कि यह सपा पर निर्भर करता है कि वह क्या फैसला करती है।
इस अवसर पर प्रदेश कांग्रेस की ओर से केंद्र सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं के बारे में अपने नेताओं, कार्यकर्ताओं को बताने और फिर उसे जनता तक पहुंचाने के लिए एक पत्रिका जारी की गई है। इस पत्रिका में पार्टी ने सूचना के अधिकार, काम के अधिकार, शिक्षा के अधिकार, आपका पैसा-आपके हाथ स्कीम के साथ हाल ही में लागू खाद्य सुरक्षा अध्यादेश को अपनी उपलब्धियों के रूप में पेश किया है।
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कांग्रेस ने आगामी लोकसभा चुनाव में राहुल बनाम मोदी का रंग देने के भाजपा के मंसूबों पर पानी फेरने का मन बना लिया है। इसके लिए उसने पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के मुकाबले प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं करने का फैसला किया है। हालांकि भाजपा लगातार मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने का संकेत दे रही है, मगर कांग्रेस ने सोनिया गांधी की अगुवाई में ही चुनावी ताल ठोंकने का फैसला कर लिया है। अगर भाजपा मोदी को चुनाव से पहले प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर भी देती है तब भी कांग्रेस उनके खिलाफ राहुल का नाम आगे नहीं करेगी। कांग्रेस अपने इस फैसले के बचाव में अपनी पार्टी और संसदीय लोकतंत्र की परंपराओं का हवाला दे रही है।
दरअसल भाजपा पिछले कुछ समय से 2014 के चुनावी जंग को मोदी बनाम राहुल बनाने की कोशिशों में जुटी है जबकि कांग्रेस नहीं चाहती कि चुनाव मोदी और राहुल पर पूरी तरह केंद्रित हो जाए। कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने में अब भी राहुल ने अपनी ओर से दिलचस्पी नहीं दिखाई है। ऐसे में पार्टी के रणनीतिकारों ने चुनाव से पहले किसी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार न बनाने का फैसला किया है।
बसपा की चुनावी तैयारियां
आपने कांग्रेस व भाजपा को खूब देखा। अब एक बार बसपा को मौका दीजिए। हमारी पार्टी यदि बैलेंस ऑफ पावर बनकर केंद्र की सत्ता में आई तो पांच साल में सर्वसमाज के लिए इतना काम कर देंगी जितना 65 साल में कांग्रेस और भाजपा नहीं कर सकी। वे गरीबों, दलितों, पिछड़ों, धार्मिक अल्पसंख्यकों, युवाओं, महिलाओं, कर्मचारियों और व्यापारियों के साथ अन्य क्षेत्र के लोगों के हितों पर विशेष ध्यान देगी। यूपी में वह ऐसा करके दिखा चुकी हैं- मायावती
लखनऊ। बसपा के लिए लोकसभा चुनाव 2014 बहुत महत्वपूर्ण है। लोगबाग सपा सरकार से आजिज हैं और बसपा शासन को याद कर रहे हैं। 2017 में यूपी की सत्ता में पार्टी की तभी वापसी होगी जब लोकसभा चुनाव के नतीजे शानदार होंगे। अगर बसपा के विधायकों व विधानसभा प्रभारियों के क्षेत्रों में उनकी पार्टी के उम्मीदवारों की स्थिति खराब रही तो विधानसभा चुनाव में उनका टिकट कट जाएगा।
बहुजन समाज पार्टी ने लोकसभा चुनाव के लिए विधायकों और विधानसभा प्रभारियों की जवाबदेही तय कर दी है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा कि संसदीय सीट के जिन क्षेत्रों में पार्टी की परफॉरमेंस खराब रहेगी, वहां के विधायकों और विधानसभा प्रभारियों के टिकट पर पुनर्विचार किया जा सकता है। उन्होंने सर्वसमाज को सपा सरकार की नाकामियां और पिछली बसपा सरकार की उपलब्धियां बताने के निर्देश दिए।
पूर्व सीएम मायावती ने बसपा के जोन कोऑर्डिनेटरों और वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक में सर्वसमाज में पार्टी का जनाधार बढ़ाने, भाईचारा कमेटियों में बेहतर तालमेल बढ़ाने, निचले स्तर तक संगठन को मजबूत बनाने व सेक्टर, विधानसभा, जिला और मंडल स्तर पर पूर्व निर्धारित लक्ष्यों को समय से पूरा करने के निर्देश दिए।
मायवती ने कहा, सपा शासनकाल के दौरान व्याप्त जंगल राज’ से हर स्तर पर अन्याय, अपराध, भय, आतंक, भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने वाला वातावरण है। उन्होंने निर्देश दिए कि पीडि़तों को न्याय दिलाने और यथासंभव मदद का काम लगातार जारी रहना चाहिए। सपा के गुंडों, माफिया व अराजक तत्वों से प्रभावित लोगों को इंसाफ दिलाने का काम स्थानीय प्रशासनिक स्तर पर न हो तो कोर्ट-कचहरी का रास्ता अपनाया जाएं।
बतातें चलें कि विधानसभा स्तर पर हर महीने की दो तारीख को, जिला स्तर पर तीन और मंडल स्तर पर पांच तारीख को समीक्षा होती है। इसके बाद 10 तारीख को प्रदेश स्तरीय समीक्षा होती है।
भाजपा चुनाव प्रचार समिति के प्रमुख नरेंद्र मोदी अब बसपा सुप्रीमो मायावती के भी निशाने पर आ गए हैं। मायावती ने मोदी का नाम लिए बगैर उन्हें प्रांतवादी व संकीर्ण सोच रखने वाला नेता करार देते हुए लोगों को ऐसे व्यक्ति से सावधान रहने की सलाह दे डाली। वह ऐसी पार्टी की भी कड़े शब्दों में निंदा करती हैं जिसके एक नेता प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं लेकिन उत्तराखंड जाकर केवल अपने प्रांत के लोगों की ही मदद की बात करते हैं। बसपा सुप्रीमो ने कानून-व्यवस्था और विकास की उपेक्षा को लेकर सपा सरकार पर भी तगड़ा हमला बोला। उन्होंने कहा कि प्रदेश की जनता निराश है और अधिकारी-कर्मचारी हताश हैं। मेरी बात की पुष्टि मुख्यमंत्री के पिता मुलायम सिंह यादव खुद कई बार कर चुके हैं’।
सर्वसमाज से मुखातिब होते हुए उन्होंने कहा कि आपने कांग्रेस व भाजपा को खूब देखा। अब एक बार बसपा को मौका दीजिए। हमारी पार्टी यदि बैलेंस ऑफ पावर बनकर केंद्र की सत्ता में आई तो पांच साल में सर्वसमाज के लिए इतना काम कर देंगी जितना 65 साल में कांग्रेस और भाजपा नहीं कर सकी। वे गरीबों, दलितों, पिछड़ों, धार्मिक अल्पसंख्यकों, युवाओं, महिलाओं, कर्मचारियों और व्यापारियों के साथ अन्य क्षेत्र के लोगों के हितों पर विशेष ध्यान देगी। यूपी में वह ऐसा करके दिखा चुकी हैं। बसपा दलितों को प्रमोशन में आरक्षण देने के पक्ष में तो हैं ही, गरीब सवर्णों और गरीब अल्पसंख्यकों को भी आरक्षण की पक्षधर हैं। वह राष्ट्रीय स्तर पर सच्चर कमेटी की सिफारिशें लागू कर अल्पसंख्यकों के लिए शैक्षिक व आर्थिक विकास के अवसर बढ़ाएंगी। मायावती ने ब्राह्मण सम्मेलन से एक तरह से चुनाव प्रचार भी शुरू कर दिया। उन्होंने जनसमूह से आगामी लोकसभा चुनाव में पार्टी के प्रत्याशियों को भारी तादाद में वोट देने की अपील की और उम्मीद जताई कि इसमें चैंकाने वाले नतीजे आएंगे।
मायवती ने लोकसभा चुनाव के रोडमैप को पार्टी के प्रमुख पदाधिकारियों के सामने रखा। इसमें सपा सरकार की कमजोरियों का फायदा उठाने के लिए सपा सरकार में पीडि़त लोगों की मदद के लिए बसपा कार्यकर्ताओं को आगे आने को कहा गया हैं। ऐसे लोगों का पता लगाकर उनके पक्ष में खड़े होकर इन्हे न्याय दिलाने की जिम्मेदारी बसपा कार्यकर्ताओं को दी गई है। इसके साथ ही सोशल इंजीनियरिंग के फामर््ले को आगे बढ़ाने के लिए ब्राह्मणों के हित की जो बातें पार्टी में तय की गयी हैं, उन्हें ब्राहमण समाज और अन्य जातियों के बीच विस्तार से रखने की बात कही गयी है।
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