मुजफ्फरनगर के दंगों को लेकर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और यूपी सरकार के वजीर आजम खां घिर गए हैं। बुधवार की शाम उन्होंने 'दैनिक जागरणÓ से विशेष बातचीत में स्वीकारा था कि प्रभारी मंत्री के नाते मुजफ्फरनगर के दंगों परअधिकारियों से संपर्क साधा था, जिन्होंने उनकी एक न सुनी। मगर, गुरुवार को मीडिया को दी सफाई में उन्होंने अधिकारियों से बातचीत पर इनकार कर दिया। अब विपक्षी दल उनको घेरने में जुट गये हैं। इस्तीफे की मांग भी उठ गयी है।
पेश है मुजफ्फरनगर के दंगे, सियासी हालात, उन पर लग रहे आरोपों पर बुधवार की शाम जागरण संवाददाता परवेज अहमद के साथ हुई उनकी बातचीत के प्रमुख अंश-
मुजफ्फरनगर के दंगों पर: मेरा दिल तपड़पता रहा। प्रभारी मंत्री के नाते अफसरों से कहता रहा, उन्हें राय देता रहा, मगर उस पर अमल नहीं हुआ, कुछ लोगों को कुर्सी पर बैठने पर ही काबिलियत का गुमान हो जाता है, सच्चाई ये है कि कुर्सी पर बैठकर अफसर तो कहलाया जा सकता है लेकिन 'अफसरीÓ नहीं की जा सकती। मुजफ्फरनगर में भी इनसे लापरवाहियां हुईं।
मुजफ्फरनगर नहीं जाने पर: बगैर गये इस कदर इल्जाम हैं। मैं, न जाकर भी हर धर्म, जाति के मजलूमों की मदद की कोशिश में हूं। दिल, दिमाग से वहीं मौजूद हूं, जल्द जाऊंगा भी...।
मुसलमानों से रिश्तों पर: समाजवादी पार्टी और मुसलमानों के रिश्तों के बारे में लोग हल्की बातें कर रहे हैं। मुसलमानों का सपा से गहरा रिश्ता है। बात ये भी है कि मुसलमानों को किसी राजनैतिक दल की नहीं, राजनैतिक दलों को मुसलमानों की जरूरत है। 1500 सालों का मिजाज है यह कि मुसलमान यह देखता है कोई बात किसके जरिए कही जा रही है।
सपा सरकार में दंगों पर: दंगे हमेशा दुखद होते हैं। बहुत कुछ तबाह हो जाता है। अगर मुसलमान संजीदगी से सोचेंगे तो सपा के साथ और मजबूती से जुड़ेंगे। दूसरी सरकारों में मुसलमान दोयम दर्जे का नागरिक हो जाता है। उसे धमकाकर चुप करा दिया जाता है। देखिए, गुजरात में भी मुसलमानों ने मोदी (भाजपा) को वोट दिया लेकिन डर से कि कहीं बहन-बेटियां न उठा ली जाएं। कारोबार तहस-नहस न हो जाए। फर्जी मुकदमें न थोप जाएं।
दंगे खबर नहीं देने के प्रधानमंत्री के बयान पर: मुजफ्फरनगर दिल्ली सिर्फ 110 किलोमीटर है। फिर भी खबर नहीं मिली, आश्चर्य है। ऐसे में बांग्लादेश, नेपाल, पाकिस्तान, आसाम और चीन की सीमा पर क्या हो रहा है, उसकी खबर कैसे पा सकेंगे?
मोदी को भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने पर: यह भाजपा का मामला है। मगर, देखिए, 'कातिलÓ के जन्मदिन की खुशियां मनीं। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर चादर चढ़ायी गयी, वह भी मुख्यमंत्री फण्ड से। बुर्के बांटे गए। मर्दों को बुर्का पहनाकर खड़ा किया गया, जिनका पर्दाअफगानिस्तान से भी सख्त था, स सच्चाई न खुल जाए इसके लिए किसी ने मुंह तक नहीं खोला। इतनी टोपी, बुर्के खरीदे गये कि बाजार में कम हो गए। ये ही मुलायम ंिसह यादव को 'मुल्ला मुलायमÓ और अखिलेश यादव को 'अखिलेश खानÓ कहते हैं। दरअसल, फासिस्ट ताकतों को बुर्के और टोपी की सियासत रास आने लगी है।
यूपी में उन्माद और कत्ल पर: देखिए, एक वह कत्ल है जिसमें नस्लें कत्ल होती हैं, वह गुजरात में किया गया। दूसरी ओर ऐसी सियासी पार्टी की सरकार है जो गरीबों, अल्पसंख्यकों को हक देने में जुटी है। दस्तूरी और कानूनी फायदा पहुंचा रही है। दंगों व बदनामियों की लड़ी साबित करती है कि सरकार मुसलमानों को बराबरी पर लाने का प्रयास कर रही है। फिर भी कहता हूं कि पार्टी या सरकार कहीं गलती करेगी तो मुसलमानों के चौकीदार के रूप में हमेशा खड़ा मिलूंगा।
सपा से आजम की नाराजगी पर: जब यूपी में सरकार बनने के हालात बने, तब चर्चा झेड़ी गई कि मैं, डीपी यादव को पार्टी में शामिल करना चाहता था, नहीं होने पर नाराजगी हुई लेकिन यह सच नहीं है। हमारे कुछ साथियों की नादानी और मीडिया ने ये गफलत फैलायी।
अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने से नाखुशी पर ...एक तरफ तो यह कहा जाता है कि मैं परिवार का सदस्य हूं, पार्टी के फाउंडरों में हूं। नेता जी (मुलायम ंिसह यादव) का सबसे खास हूं।उनके साथ तीन बार मंत्री रहा। आपको बताता हूं कि जब नेता जी ने पूछा कि मुख्यमंत्री के रूप में किसका नाम रखा जाए तो मैंने बिना झिझक अखिलेश जी के नाम का प्रस्ताव किया। मेरे अदब, एहतराम में कोई कमी नहीं है। विभागों में मेरे अख्तियार में कमी नहीं है। दरअसल, मैं, एक ऐसा हूं, जो पुल के एक सिरे से चढ़कर दूसरे सिरे से उतर रहा है। समाजवादी पार्टी की खूबी ही यही है कि उसमें सबको सुनने और बर्दाश्त करने की काबिलियत है।
मुख्यमंत्री की कार्यप्रणाली पर: काम करने की जो कूवत मौजूदा वजीर-ए-आला (मुख्यमंत्री) में है, वह सामान्य लोगों में नहीं होती। जिस सूझ-बूझ की उनसे उम्मीद है, वह उससे बेहतर की कोशिश कर रहे हैं। वक्त दे रहे हैं। मैं, दावे के साथ कहता हूं कि इतना उर्जावान और धैर्यवान मुख्यमंत्री या नेता किसी दूसरे दल के पास नहीं है।
खुद की तुनक मिजाजी पर: ऐसी बातें मेरे नाम के साथ जोड़कर कहने का सियासी फैशन चल गया है। मैं, दीवार या पत्थर का टुकड़ा नहीं, इंसान हूं। अगर वसूलों के खिलाफ बात होगी तो फिर कहूंगा, बोलूंगा और नाराज भी होऊंगा। खामोश नहीं रह सकता। मेरे पास खोने के लिए वजारत (मंत्री पद) के सिवाय और कुछ नहीं।
अल्पसंख्यक इदारों में नियुक्तियों की अड़चनों पर: बसपा नेत्री मायावती ने अल्पसंख्यक आयोग को बहुसंख्यक बना दिया था। एक अध्यक्ष, दो उपाध्यक्ष और 21 सदस्य का कानून बना दिया। आयोग में सिर्फ चार अल्पसंख्यक सदस्य थे। उस कानून को बदलकर फिर अल्पसंख्यक बनाया जा रहा है। हाइकोर्ट को पूरी जानकारी नहीं दी गई, इसीलिए उनकी ओर से आदेश हुआ। जल्द ही अल्पसंख्यक इदारों में नियुक्तियां होंगी।
सपा कार्यकारिणी में नहीं जाने पर: यह कोई ऐसी बात नहीं थी। किसी ने बुलाया नहीं, किन्ही वजहों से गया नहीं। उस बात को अफसाना बना दिया गया।
मुख्यमंत्री के घर आने पर: अक्सर एक साथ बैठते हैं। कई दिगर मामलात थे। मेरे शिकवे भी थे, जो निजी नहीं थे। ठेका, पïट्टा,परमिट के नहीं थे। वसूलों से जुड़े थे, पार्टी के हित के थे। सरकार के लिए थे, जिन पर बात हुई। दोहरा रहा हूं कि मेरे पास खोने के लिए वजारत के सिवा कुछ नहीं है।
मुलायम ंिसह से रिश्तों पर: मुलायम ंिसह यादव इस देश के एक ऐसे सियासी रहनुमा हैं, जिन्होंने धर्म निरपेक्षता के लिए बहुत कुर्बानी दी है। उनके साथ मेरा जज्बाती और वैचारिक रिश्ता है। एक दूसरे के लिए कुछ भी करने का जज्बा है।
लेकिन पार्टी में ही आजम, नरेश और दूसरे नेता आपसे इस्तीफा मांग रहे हैं?
इनका म्यार (कद) इतना नहीं है कि मैं जवाब दूं। इनके बारे में कुछ भी कहना खुद की जुबान खराब करना है।
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