Wednesday, 9 November 2022

कहीं का ईंट, कहीं रोड़ा, प्रो.विनय ने भानुमति का कुनबा जोड़ा

 


-कम्प्यूटर साइंस की पोस्टग्रेजुएट डिग्री नहीं, पर हैं कम्प्यूटर के प्रोफेसर

-निजी कालेजों के सहायक प्रोफेसरों की शैक्षिक पड़ताल के बगैर बनाया एसोसिएट

परवेज अहमद

लखनऊ। बीटेक, कंम्प्यूटर साइंस। एमटेक, मैनेजमेन्ट एंड सिस्टम्स। पीएचडी, मैनेजमेट में।...फिर भी कम्प्यूटर साइंस प्रोफेसर बन दिया जाए  क्या तकनीकी/ प्राविधिक शिक्षा में  क्या यह संभव है ? आपका उत्तर होगा एआईसीटीई जैसी संस्था के होते हुए ये संभव नहीं है। पर, अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय (एकेटीयू) में कारनामा हुआ। तत्कालीन कुलपति प्रो.विनय पाठक ने डॉ.विनीत कुमार कंसल के एमटेक कम्प्यूटर साइंस न होने के बाद भी इस विभाग का प्रोफेसर नियुक्त कर दिया। कुछ दिन बाद उन्हे एकेटीयू का प्रतिकुलपति नियुक्त दिया। फिर घटक संस्थान आईईटी के निदेशक के रूप में चयन कर लिया।

ये तिलिस्मी खेल सिर्फ एक शिक्षक के साथ नहीं हुआ, बल्कि प्रो.विनय पाठक जिन-जिन विश्वविद्यालयों के कुलपति रहे वहां-वहां असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोशिएट प्रोफेसर और प्रोफेसरों की नियुक्ति में उन्होंने एआईसीटीई को नजर अंदाज कर अपनी सत्ता चलाई। तकनीकी शिक्षा की इस जादूगरी के सारे दस्तावेज अब एसटीएफ अधिकारियों को सौंपे जा रहे हैं। ये रहा नियुक्ति का मामला। इससे इतर प्रतिनियुक्ति पर एकेटीयू में कार्य कर रहे अनुराग त्रिपाठी को एसोसिएट से सीधे प्रोफेसर पद पर नियुक्त कर दिया। यह अब तक की नजीर है, नियमों के मुताबिक कोई भी विवि प्रतिनियुक्त पर कार्य कर रहे किसी भी शिक्षक को अपने विवि में प्रोन्नति नहीं दे सकता है। यही नहीं, अनुराग त्रिपाठी को वेतन भी एकेटीयू के मद से दिया जा रहा है। ये तत्कालीन कुलपति के इतने करीब थे कि विवि के मूल शिक्षक, प्रोफेसर होने के बावजूद इन्हें परीक्षा नियंत्रक नियुक्त कर दिया गया। जो अब भी इसी दायित्व का निवर्हन कर रहे हैं।

एकेटीयू के घटक संस्थान आईईटी में डॉ. अरुण कुमार तिवारी को एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति प्रदान की गयी जबकि इस पर नियुक्ति पाने वाले व्यक्ति को आठ साल तक नियमित असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्य अनिवार्य होता है। डॉ.तिवारी इससे पहले निजी कालेज में अनियमितत तौर पर सहायक आचार्य के पद पर कार्यरत थे, यही नहीं एकेटीयू में तीन साल की सेवा के अंदर ही प्रोफेसर पद पर प्रोन्नत भी कर दिया गया। और उन्हें इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा का समन्वयक बना दिया गया। कुलपति पद से हटने के बाद प्रो.विनय पाठक इसी विवि की कार्य समिति के सदस्य नामित हो गये, लिहाजा किसी भी व्यक्ति में विरोध का साहस ही नहीं बचा। इसी तरह डॉ सीता लक्ष्मी जी को निजी कालेज की नौकरी से सीधे एसोसिएट प्रोफेसर नियुक्त किया गया और तीन साल की सेवा के बाद उन्हें भी प्रोफेसर पद पर प्रोन्नति प्रदान कर दी गयी। उनके पास पीएचडी प्रवेश और पीएचडी अवार्ड जैसा महत्वपूर्ण कार्य सौंपा गया है।

सूत्रों का कहना है कि एकेटीयू के घटक कालेज में पवन कुमार तिवारी कम्प्यूटर साइंस डिपार्टमेन्ट में असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त किया गया। जबकि न उन्होने बीटेक भी नहीं किया है और सूत्रों का तो दावा यहां तक है कि पवन इस पद के लिए अप्लाई तक नहीं किया था, फिर भी उन्हें नियुक्ति मिल गयी। एकेटीयू के तत्कालीन कुलपति प्रो.विनय पाठक की कार्यशैली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आईईटी में असिस्टेंट प्रोफेसर अंग्रेजी का कोई पद ही स्वीकृत नहीं है, बावजूद इसके उन्होंने इस कालेज में डॉ.प्रगति को असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त कर दिया।

 

इंसेट

ईडी को भेजी गई एफआईआर की कापी

लखनऊ। लखनऊ कमिश्नरेट पुलिस ने इंदिरानगर थाने में प्रो.विनय पाठक और अजय मिश्र के खिलाफ दर्ज एफआईआर की कापी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की लखनऊ शाखा से सहायक निदेशक को भेज दी है। और दो लोगों की गिरफ्तारी का विवरण भी प्रवर्तन निदेशालय को भेज दिया गया है। कमिश्नरेट पुलिस ने  अपने जवाब में यह भी कहा है कि पूरे प्रकरण की विवेचना उत्तर प्रदेश की स्पेशल टास्क फोर्स कर रही है लिहाजा विवेचना से जुड़े तथ्य उसे एजेंसी से हासिल करें। सूत्रों का कहना है कि प्रवर्तन निदेशालय ने एसटीएफ अधिकारियों से भी इस प्रकरण में से जुड़े वित्तीय लेनदेन की जानकारी मांगी है।


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