Friday, 11 November 2022

जिसने फाइलें फाड़ी, वित्त नियंत्रक को मारा, वह गार्ड बना डिप्टी रजिस्ट्रार

-उच्च शिक्षा के बाहुबली प्रो.विनय पाठक के अजब-गजब खेल

-उच्च शिक्षा विभाग से असिस्टेंट रजिस्ट्रार की अर्हता संशोधित करायी, खुद लिया इम्तहान

परवेज़ अहमद

लखनऊ। जिस गार्ड ने वित्त अधिकारी से दस्तावेज छीनकर फाड़ डाले हों, पत्रावलियां क्षतिग्रस्त की हों और मारपीट की हो। लखनऊ के जानकीपुरम थाने में उसके विरुद्ध एफआईआर दर्ज हो, चार्जशीट लगी हो, उस गार्ड को एकेटीयू (अब्दुल कलाम प्राविधिक विवि) का असिस्टेंट रजिस्ट्रार नियुक्त कर दिया जाए फिर प्रोन्नति देकर डिप्टी रजिस्ट्रार बना दिया जाए- ये कारनामा क्या आपने  कहीं सुना? ये आपको सत्य प्रतीत होता है ?  जी हां, ये सत्य है। सौ फीसदी सत्य। इस कारनामे को उच्च व तकनीकी शिक्षा के सबसे प्रभावशाली कुलपति प्रो.विनय पाठक ने प्रदेश सरकार के तत्कालीन अधिकारियों के साथ सामंजस्य बनाकर  अंजाम दिया। राजभवन से लेकर उत्तर प्रदेश के उच्चशिक्षा विभाग के हाकिमों तक इस प्रकरण की शिकायत हुई परन्तु कोई अंतर नहीं आया।

प्रकरण की शुरूआत 2013 से हुई। उत्तर प्रदेश वित्त सेवा की सीधी भर्ती के अधिकारी वीरेन्द्र चौबे को शासन ने एकेटीयू का वित्त एवं लेखा अधिकारी नियुक्त हुआ। कार्यभार संभालने के कुछ दिनों के अंदर ही वित्त अधिकारी ने एकेटीयू, इस विवि के घटक संस्थान आईईटी में चल रहे आउट सोर्सिंग के गोरखधंधे को पकड़ना और भुगतान पर एतराज शुरू किया। इससे नाराज लोगों की गुट का नेतृत्व करते हुए गार्ड आरके सिंह ने इस 26 अक्टूबर 2013 को वित्त अधिकारी वीरेन्द्र चौबे को घेर लिया। उनके साथ मारपीट की गयी, कई पत्रावलियां फाड़ दी गयीं। उन्हें जान से मारने की धमकी दी गयी। विवि प्रशासन ने उन पर एफआईआर न करने का भारी दबाव बनाया फिर भी चौबे ने लखनऊ के जानकीपुरम थाने में एफआईआर दर्ज करा दी। गंभीर धाराओं में दर्ज इस एफआईआर के विवेचना में बड़ी संख्या में कर्मचारियों ने मारपीट और हंगामे की पुष्टि की थी। वर्ष 2016 में कुलपति प्रो.विनय पाठक की अध्यक्षता वाली समिति ने कर्मचारियों का विनियमितीकरण शुरू किया जिसका भारी विरोध शुरू हो गया। इसी बीच असिस्टेंट रजिस्ट्रार का पद भरे जाने की कार्रवाई शुरू हुई, जिसमें अनुभव, कार्य आदि की कठिन शर्तें दी थी लेकिन कुलपति प्रो.विनय पाठक ने शासन के तत्कालीन सचिव भुवनेश कुमार के जरिये असिस्टेंट रजिस्ट्रार के पद की अर्हता को शिथिल करायी। इसके लिए  तकनीकी शिक्षा विभाग के तत्कालीन विशेष सचिव अबरार अहमद की ओर से से पद अर्हता का संशोधन आदेश दिया गया। सहायक रजिस्ट्रार के लिए स्नातक में गुड सेकेन्ड क्लास के क्लाज के साथ परास्तानक भी जो जोड़ा गया। फिर आंतरिक परीक्षा में योग्य ठहराकर आरके सिंह को सहायक रजिस्ट्रार नियुक्त कर दिया गया। सूत्रों का कहना है कि इस बीच वीरेन्द्र चौबे से मारपीट के मामले में पुलिस ने आरके सिंह के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल कर दिया। इस नियुक्त के खिलाफ बढ़ी संख्या में शासन, राजभवन को शिकायतें भेजी गई। जांच के आदेश भी हुये, बावजूद इसके आरके सिंह को प्रोन्नति देकर डिप्टी रजिस्ट्रार नियुक्त कर दिया गया। सूत्रों का कहना है कि प्रो.विनय पाठक के कानपुर विवि का कुलपति बन जाने के बाद एकेटीयू के कुलपति नियुक्त प्रो.पीके मिश्र ने इस पर संबंधित प्रकरण की पत्रावली तलब और उसे कार्य परिषद में प्रस्तुत करना चाहा तो विवि के कार्य परिषद के सदस्य नियुक्त हो गये प्रो.विनय पाठक ने इसे एजेंडे में ही शामिल नहीं होने दिया।

एकेटीयू के सूत्रों का कहना है कि प्रो.विनय पाठक के भ्रष्टाचार की जांच कर रही स्पेशल टास्क फोर्स के जांच अधिकारी को भी इससे जुड़े दस्तावेज सौंपे गये हैं। जिसे जांच का हिस्सा बना लिया गया है। वित्त एवं लेखाधिकारी रहे वीरेन्द्र चौबे का कहना है कि वह दिन राजकीय सेवा का सबसे खराब दिन था, कालेज के एक गार्ड ने ही गुंडों जैसा व्यवहार किया था। मेरी एफआईआर में दर्ज प्रकरण में क्या हो रहा है, अभी उसकी जानकारी नहीं है। लेकिन आरके  सिंह ने जिस तरह से सरकारी दस्तावेज फाड़े थे, वह जघन्य अपराध है।

 

इंसेट एक

 

बांदा इंजीनियरिंग कालेज में 72 लाख का सीसीटीवी

-डीडीक्यीआईपी योजना के तहत 10 करोड़ आवंटित

-ब्लैक लिस्टेड कम्पनी को आउटसोर्सिंग का जिम्मा

लखनऊ। एकेटीयू के कुलपति रहने के दौरान ही प्रो.विनय पाठक का दबदबा सिर्फ विवि प्रबंधन में नहीं बल्कि संबंद्ध इंजीनियिरंग कालेजों के निदेशकों की नियुक्ति से लेकर खरीद-फरोख्त में भी था। तत्कालीन कुलपति की संस्तुतियों पर 2018 में बांदा इंजीनियरिंग कालेज का निदेशक शिव प्रताप शुक्ला को नियुक्त किया गया। ये कार्यकाल पूरा होने के बाद पांच साल के लिए दोबारा निदेशक बना दिया गया। इन्होंने कालेज परिसर के सर्विलांस के लिए 72 लाख रुपये का सीसीटीवी लगवा दिया गया। इसके लिए किसी कमेटी का गठन नहीं किया गया परन्तु जब शिकायतें हुई तो इन्होंने 14 सदस्यीय कमेटी का गठन किया जिसमें से सिर्फ तीन पॉजिटिव रिपोर्ट लगाई लेकिन एक भी महिला सदस्य नही थी जबिक सीसीटीवी गर्ल्स छात्रावास में भी लगाया गया था। यही नहीं बांदा इंजीनियरिंग कालेज के प्रबंधन ने आउट सोर्सिंग के जरिये डेढ़ सौ से ज्यादा कर्मचारियों को काम पर रखा और जिस आरएमएस सेल्यूशन को काम दिया गया, वह पहले से ही ब्लैक लिस्टेटड थे। इस कालेज में मानक से अधिक गेस्ट फैकेल्टी की नियुक्ति की गयी है। केमेस्ट्री में आवश्यकता अनुसार प्रोफेसर होने के बाद बावजूद इस कालेज में गेस्ट फेकेल्टी की नियुक्ति की गयी। इस कालेज में हुई वित्तीय अनियमिततओं पर जन सूचना अधिकार के तहत 50 अधिक लोगों ने सवाल पूछे हैं लेकिन कालेज ने किसी का भी उत्तर देना उचित नहीं समझा है। सूत्रों का कहना है कि प्रो.विनय पाठक के कुलपति रहते हुए इस कालेज को 10 करोड़ रुपये डीडीक्यीआईपी योजना के तहत आवंटित किये गये थे।

 

 

  

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