-एकेटीयू के कुलपित रहते डीडीयूक्यूआईपी के तीन सौ करोड़ के बंदरबांट का आरोप
- शोध, गुणवत्ता की बेहतरी के लिए भौतिक खातों में नहीं वचुर्अली ट्रासफर हुआ धन
परवेज अहमद
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में जिस तरह अंदाज में प्रो.विनय पाठक के एक बाद दूसरे, तीसरे और चौथे विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त हुए, उसी अंदाज में अब उनके भ्रष्टाचार की पर्तें खुलनी शुरू हो गयी हैं। सबसे लंबी फेहरिश्त अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय (एकेटीयू) की हैं। इस विश्वविद्यालय का कुलपित रहते हुए उन्होने दीनदयाल उपाध्याय क्वालिटी इमप्रूवमेंट प्रोग्राम (डीडीयूक्यूआईपी) के तीन सौ करोड़ रूपये का बंदरबांट कर लिया। दर्जनों शिकायतों के बाद भी इस प्रकरण में कोई जांच तक नहीं हुई। अब आगरा विवि के कुलपति रहते हुए घूसखोरी की एफआईआर के बाद अगर जांच का दायरा बढ़ा तो एकेटीयू के तत्कालीन कुलपति समेत कई आईएएस अधिकारियों की गर्दन फंसनी तय हैं। कहा जा रहा है कि डॉ.भीमराम आंबेडकर विश्वविद्यालय के भ्रष्टाचार एक बहुत छोटा हिस्सा है, एकेटीयू की पत्रावली पलटी गयीं तो भ्रष्टाचार के कई “वटवृक्ष” नजर आयेंगे।
उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी इंजीनियरिंग कालेजों को शैक्षिक, शोध, इंफ्रास्ट्रकचर, संसाधन की गुणवत्ता बेहतर करने के लिये डीडीयूक्यूआईपी शुरू की थी, जिसके इसके तहत प्रत्येक सरकारी इंजीनियरिंग कालेज को अधिकतम 25 करोड़ और न्यूनतम 10 करोड़ रूपये आवंटित किये जाने थे। यह कार्य एकेटीयू के माध्यम से किया जाना था, तत्कालीन कुलपति प्रो.विनय पाठक के नेतृत्व वाले दल ने इंस्टीट्यूट पर इंजीनियरिंग एन्ड टेक्नालाजी को 25 करोड़, कमला नेहरू इंस्टीट्यूट सुल्तानपुर व बुलंदेलखंड इंस्टीट्यूट आफ टेक्नीलाजी झांसी को 15-15 करोड़ रूपये आवंटित किये। साथ ही सेन्ट्रल एडवांस स्टडी के नाम पर 15 करोड़ और फेकेल्टी आर्कीटेक्चर के लिए 10 करोड़ रुपये आवंटित कर दिये। आठ अन्य इंजीनियरिंग कालेज को 10-10 करोड़ रुपये आवंटित किये गये थे।
शासन को भेजी गयी शिकायतों में आरोप है कि धनराशि आवंटन का 50 फीसदी हिस्सा भी कालेजों को ट्रांसफर नहीं किया गया, इसके स्थान पर एकेटीयू ने सीधे अपने स्तर से परर्चेंजिंग कर डाली। नियमों के अनुसार यह कार्य विवि प्रबंधन सीधे नहीं कर सकता था। सूत्रों का कहना है कि विवि के कतिपय ठेकेदारों के साथ सांठगांठ के बाद हजारों का सामान, लाखों, और लाखों का सामान करोड़ों में क्रय किया गया। सूत्रों का कहना है कि प्रो.विनय पाठक के नेतृत्व बाले दल ने सारे धन वर्चुअली ट्रांसफर किया, वास्तव में धन ट्र्सफर ही नहीं हुआ, इसका बंदर बांट किया गया।
जनता का था यह धन
दीन दयाल उपाध्याय दीनदयाल उपाध्याय क्वालिटी इमप्रूवमेंट प्रोग्राम में यह धन छात्रों की प्रवेश परीक्षा के जरिये एकतित्रत किया गया था। प्राविधिक शिक्षा के सूत्रों का कहना है कि सरकार की मंशा थी कि प्रवेश परीक्षा के लिए छात्रों से लिया गये धन का इस्तेमाल से ही इंजीनियरिंग कालेजों की गुणवत्ता बेहतर में किया जाए। इसीलिए उत्तर प्रदेश स्टेट इंजीनियिरंग इंस्ट्रेस जो कि सरकार सीधे कराती है, उसके धन को ही डीडीयूक्यूआईपी में डायवर्ट किया गया था। उच्च शिक्षा के सूत्रों का कहना है कि करोड़ों के इस घोटाले में विवि से लेकर शासन के अधिकारी तक शामिल हैं, प्रो.विनय पाठक के खिलाफ दर्ज भ्रष्ट्चार की जांच का दायरा बढ़ा तो सबसे पहले इसी तीन सौ करोड़ के घोटाले की पर्ते खुलेंगी। सूत्रों का कहना है कि योजना में खेल करने के लिए कुलपति ने नियमों के विपरीत जाकर एसे व्यक्ति को रजिस्ट्रार की नियुक्ति किया था, जो इस पद की अर्हता ही पूरी नहीं करता है। एफआईआर के बाद सोमवार को पूरे दिन एकेटीयू में तत्कालीन कुलपति के कार्यकाल में लिये गये फैसलों की पत्रावलियां खुर्-बुर्द की जाती रहीं।
कोट
हमें अभी इस प्रकरण की कोई जानकारी नहीं है। अब मामला संज्ञान में आया है तो इसे गंभीरता से दिखवाया जाएगा।– प्राविधिक शिक्षा मंत्री
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एसटीएफ की जांच घेरे में रहे प्रोफेसर को दिया था एनओसी
-ईडी भी लेगी मामले का संज्ञान
-एफआईआर में दो धाराएं गैर जमानती
विशेष संवाददाता
लखनऊ। आगरा के डॉ.भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के कुलपति रहते हुए ठेकेदार से घूस मांगने के मामले में नामजद हुये कानपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.विनय पाठक के खिलाफ जिन पांच धाराओं में एफआईआर हुई है, उनमें से सिर्फ दो नान वेलएबल हैं। जिसमें अधिकतम दस साल की सजा हो सकती है। लेकिन जिस तरह से एफआईआर की तहरीर में आरोपों की जिक्र है, अगर जांच अधिकारियों ने उस पर गंभीरता से विवेचना की तो उसकी आंच शासन के शीर्ष स्तर तक जाएगी। सूत्रों का कहना है कि हाल के दिनों में जिन लोगों को कुलपति का दायित्व दिया गया है, उनमें से एक पहले से ही एसटीएफ की रडॉर पर हैं, प्रश्न पत्र लीक करने के मामले में एसटीएफ अधिकारी उनसे कई बार पूछताछ कर चुके हैं और ये कुलपति लंबे समय तक कानपुर विवि के कुलपति प्रो.विनय पाठक के साथ न सिर्फ काम कर चुके हैं। उन्होंने ही कुलपति पद के लिए उन्हें एनओसी दी है। लखनऊ पुलिस का कहना है कि मामले की विवेचना की जा रही है। जल्द ही इस मामले में परिणाम दिखाई देगा। इस प्रकरण की संज्ञान इनफोर्समेन्ट डायरेक्टरेट (ईडी) भी ले सकता है।
रविवार को लखनऊ के इंदिरानगर थाने में दर्ज एफआईआर की तहरीर से स्पष्ट है कि प्रो.विनय पाठक ने कानपुर विवि का कुलपति नियुक्त हो जाने के बाद डिजिटेक्स टेक्नालाजिज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने भुगतान के लिए बात की और घूसखोरी के आश्वासन के बाद भुगतान हो भी गया तो क्या आगरा विवि के मौजूदा प्रबंधन ने भुगतान की पत्रावलियां प्रो.विनय पाठक तक पहुंचाई। जाहिर है भुगतान बैक डेटों में हुआ होगा, तहरीर के आधार पर इंदिरानगर पुलिस ने इन धाराओं का उल्लेख क्यों नहीं किया ? यही नहीं प्रो.विनय पाठक के कालेधन का लेन देन करने के मामले में बिचौलिये की भूमिका निभा रहे प्राइवेट व्यक्ति के विरूद्ध बिचौलिया की भूमिका निभाने की धारा क्यों नहीं लगाई गई, पुलिस ने ये कमजोर पहलू क्यों छोड़ा ? तहरीर में कई एसे बिन्दु हैं जो प्राविधिक शिक्षा विभाग की कार्य शैली और कुलपतियों की नियुक्ति की व्यवस्था को भी कटघरे में खड़े कर रही है।
अब सवाल ये है कि क्या पुलिस अथवा जांच अधिकारी इस भ्रष्टाचार से जुड़े मामले में शीर्ष स्तर पर पूछताछ की हिम्मत जुटा सकेंगे और एफआईआर के बाद 24घंटे बाद भी आरोपी कुलपति प्रो.विनय पाठक की गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई।
विनय पाठक पर एफआईआर की धारा और उसका अर्थ
आईपीसी-342 ( किसी व्यक्ति को ग़लत तरीके से प्रतिबंधित करना, एक वर्ष की सजा, आर्थिक दण्ड या दोनों से दण्डित किया जा सकता है।)
आईपीसी-386 (किसी व्यक्ति से , स्वयं उसकी या किसी अन्य व्यक्ति की मॄत्यु या गंभीर आघात के भय में डालकर ज़बरदस्ती वसूली, दस वर्ष तक की सजा । आर्थिक दण्ड के लिए भी उत्तरदायी होगा।
आईपीसी-504 (किसी व्यक्ति को साशय अपमानित करना, लोक शान्ति भंग या कोई अन्य अपराध कारित करना, दो वर्ष तक की सजा, जुर्माना या दोनों से, दण्डित किया जा सकता।)
आईपीसी-506 (आपराधिक धमकी, दो साल तक की सजा, आर्थिक दंड या दोनों)
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम-1988 की धारा-7 (लोक सेवकों द्वारा रिश्वत मांगना, लेना)
क्या भ्रष्टाचार का आरोपी पढायेगा छात्राओं को
घूसखोरी की रिपोर्ट और आन लाइन लेन देन का ब्यौरा एफआईआर में भी होने के बाद भी क्या वह विवि के छात्रों को अध्यापन कराने वाले शिक्षकों का नेतृत्व कानपुर विवि के कुलपति के रूप में प्रो.विनय पाठक के पास ही रहेगा यह अहम सवाल या फिर कुलाधिपति आनंदी बेन पटेल प्रदेश सरकार से एफआईआर और प्रारम्भिक विवेचना के बिन्दु तलब करके उन्हें कुलपति पद से बर्खास्त करेंगे। नव नियुक्त राष्ट्रपति ने अपने पहले वक्तब्य में ही अपनी सरकार की भ्रष्टाचार विरोधी नीति को सराहा था। क्या एसे में इस मामले का वह भी संज्ञान लेंगे। सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भ्रष्टाचार के मामले में सख्त रुख अख्तियार किया है। संकेत मिल रहे हैं कि जल्द ही इस प्रकरण की रिपोर्ट राजभवन भेजी जाएगी।
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