उच्च शिक्षा की गुणवत्ता, पारदर्शी व्यवस्था कटघरे में लाने वालों में लखनऊ विश्वविद्यालय प्रबंधन का भी शुमार
प्रो.आलोक राय का 34 दिन का कार्यकाल, भर्ती की और प्रोन्नतियों की तिथियां
घोषित की
परवेज अहमद
लखनऊ। उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा की गुणवत्ता, पारदर्शी व्यवस्था कटघरे में लाने
वालों में लखनऊ विश्वविद्यालय (एलयू) प्रबंधन का भी शुमार है। इलाहाबाद हाईकोर्ट में
दाखिल शपथ पत्र में कुलपति प्रो.आलोक राय की ओर से कहा गया कि तीन माह का कार्यकाल
शेष रहते नीतिगत निर्णय नहीं लिया जा सकता। कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल की ओर से भी यही
शपथ पत्र हाईकोर्ट में दिया गया है। पर, शपथ पत्र के चंद दिनों बाद प्रबंधन विज्ञान
संस्थान में 18 असिस्टेंट प्रोफेसर, दो लाइब्रेरियन की नियुक्ति कर दी गयी। प्रो.राय
का कार्यकाल 31 दिसम्बर तक है। यानी बमुश्किल 34 दिन। फिर भी 28, 29 नवम्बर, पांच,
नौ व 14 दिसंबर को शिक्षक प्रोन्नति समिति की तिथि घोषित कर दी गयी है। सवाल ये कि
विश्वविद्यालय ने हाईकोर्ट में झूठ बोला या प्रोन्नति तिथियां गलत ढंग से निर्धारित
हो रहीं ? कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से
पूरे प्रकरण की शिकायत की गयी है।
प्रदेश के प्रतिष्ठित राज्य विश्वविद्यालयों में शुमार लखनऊ विवि के तत्कालीन
कुलपति प्रो.एसपी सिंह ने कारिअर एडवांसमेन्ट योजना के तहत 24 अक्टूबर 2019 में शिक्षा
विभाग, ओरियंटल स्टडीज इन अरेबिक एन्ड परसियन विभाग, गणित और खगोल शास्त्र विभाग के
शिक्षकों की प्रोन्नति के लिए उच्च स्तरीय समिति बनाई। जिसने आधा दर्जन शिक्षकों को
प्रोन्नत करने की सहमति प्रदान की। शिक्षा विभाग के एसोसिएट प्रो.अरुण कुमार, प्रो.
श्रवण कुमार और परर्सियन विभाग एक प्रो.ए.ए.जाफरी को सशर्त प्रोन्नति की सहमति के साथ
लिफाफा बंद कर दिया। कुछ ही अंतराल में तत्कालीन कुलपति प्रो.एसपी सिंह के स्थान पर
तत्कालीन रजिस्ट्रार शैलेश शुक्ला को कुलपति का दायित्व दिया गया। उन्होंने यह कहते
हुए कि प्रोन्नतियों के निर्णय पर विश्वविद्यालय कार्य परिषद (ईसी) ने मंजूरी नहीं
दी है, इसलिए अंतिम निर्णय के लिए प्रकरण कुलाधिपति कार्यालय भेज दिया। इस बीच एसपी
शुक्ला ने भी प्रोन्नति कमेटी की मीटिंग की मगर अंतराल में उन्हें हटाकर प्रो.आलोक
राय को लखनऊ विश्वविद्यालय का पूर्णकालिक कुलपति बना दिया गया।
प्रत्यावेदन देने पर प्रोन्नति का आदेश जारी हुआ लेकिन जिन तीन शिक्षकों का लिफाफा बंद था, उन पर
निर्णय नहीं लिया। नतीजे में शिक्षा विभाग के दोनों शिक्षक हाईकोर्ट चले गये, अदालत
ने प्रोन्नति लिफाफा खोलने का आदेश दिया। अंतिम बचे पर्सियन विभाग के सहायक प्रो.एएस
जाफरी ने हाईकोर्ट का रुख किया, उनकी याचिका पर हाईकोर्ट ने लखनऊ विश्वविद्यालय के
काउंटर मांगा, जिस पर डिप्टी रजिस्ट्रार ने कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा कि उत्तर
प्रदेश विवि अधिनिमय 1973 के मुताबिक जब कुलपति का कार्यकाल सिर्फ तीन माह बचता है
तब नीतिगत निर्णय नहीं लिया जा सकता है।
परन्तु हाईकोर्ट में ये हलफनामा दाखिल करने के बाद 22 अक्टूबर 2022 यानी जब
कुलपति आलोक राय का कार्यकाल दो माह आठ दिन ही बचा था, तब उनकी अध्यक्षता में दर्शनशास्त्र,
अरबी एवं अरबी सम्यता, फ्रेंच ( अंग्रेजी एवं आधुनिक यूरोपियन भाषा) और पुस्तकालय विभाग
के 6 शिक्षकों को प्रोन्नत कर दिया गया। यही नहीं पुस्तकालय विज्ञान में दो नई नियुक्तियां
कर दी गयीं। स्ववित्त पोषित पाठयक्रम के सहारे प्रबंधन विज्ञान संस्थान पर 18 असिस्टेंट
प्रोफेसर की नियुक्तियां कर दी गयीं। प्रो.आलोक राय का कार्यकाल खत्म होने अब सिर्फ
35 दिन बचे हैं, तब विभिन्न विभागों के शिक्षकों की प्रोन्नित और नई भर्तियां करने
की तिथियां भी घोषित की जा रही हैं। सवाल ये है सच क्या है हाईकोर्ट में दाखिल किया
गया शपथ पत्र या फिर विवि में हो रहे ताबड़तोड़ नीतिगत फैसले ?
इन सारे सवालों के साथ कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल और मुख्यमंत्री
योगी आदित्यनाथ को शिकायत भेजी गयी है।
उत्तर प्रदेश विश्वविद्यालय अधिनियम व कुलाधिपति कार्यालय के पुराने आदेश में
जरूर ये बात कही गयी है कि तीन माह बचने पर कोई नीतिगत निर्णय नहीं लिया जा सकता है।
पर, वर्ष-2018 में हाईकोर्ट का एक निर्णय आया है, जिसमें कहा गया है कि कुलपति का जब
कार्यकाल तीन साल का है तो उसे अंतिम दिन तक काम करने, निर्णय लेने का अधिकार है। अभी
कुछ माह पहले कार्यकाल पूरा करने वाले मेरठ विश्वविद्यालय के कुलपति ने अंतिम दिन तक
निर्णय लिया जिस पर कोई आपत्ति नहीं हुई। उन्हीं नजीरों की तहत हम ज्यादा से ज्यादा
लोगों को प्रोन्नति दे रहे हैं और जरूरी नियुक्तियां कर रहे हैं। हाईकोर्ट के हलफनामें
के संदर्भ में उन्होंने कहा कि हम इसका परीक्षण करायेंगेः
आलोक राय, कुलपति, लखनऊ विश्वविद्यालय
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