Thursday, 24 November 2022

दो बार कुलपति बनाने का नियम, राजभवन ने विनय को तीसरा टर्म दिया

 -छोटे आरोपों में चार कुलपति हटाये, घूसखोरी में नामजद पाठक पर मेहरबानी बरकरार

 

परवेज़ अहमद

लखनऊ। उत्तर प्रदेश विश्वविद्यालय अधिनियम में किसी व्यक्ति को दो बार कुलपति बनाने का नियम है। बावजूद इसके अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय (एकेटीयू) के कुलपति का दो टर्म पूरा करने वाले प्रो.विनय पाठक को तीसरी बार छत्रपति शाहू जी महाराज कानपुर विश्वविद्यालय का कुलपति कैसे, किसने नियुक्त किया ?  कुलपति पद के दावेदारों के पैनल  के लिए गठित सर्च कमेटी और नियोक्ता अधिकारी कुलाधिपति ने क्या नियम का विश्लेषण  सुविधा अनुसार किया ? दूसरा अहम सवाल ये कि छोटे इल्जामों पर 4 विश्वविद्यालयों के कुलपतियों से इस्तीफा या उन्हें पदमुक्त करने वाली कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल भ्रष्टाचार की एफआईआर, हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत की याचिका खारिज होने के बाद भी कानपुर विवि के कुलपति के मामले में चुप्पी क्यों साधे हैं ?

ये सवाल विश्वविद्यालयों में चल रहे छात्र, शिक्षक आंदोलन में उठ रहे हैं। कानपुर नगर के छह पूर्व विधायकों ने पहले ही पत्र लिखकर ये सवाल उठाया है। विशेषज्ञ सवाल कर रहे हैं कि कानपुर विश्वविद्यालय के कुलपति को आखिर किसका संरक्षण है ? जिससे कार्रवाई में कुलाधिपति कार्यालय हिचक रहा । एक दशक में पहली बार ये परिस्थितियां हैं जब भ्रष्टाचार में नामजद कुलपति पर कार्रवाई को लेकर राजभवन की चुप्पी पर सवाल उठ रहे हैं।

वैसे, उत्तर प्रदेश विश्वविद्यालय अधिनियम-1973 (संशोधित) के पेज संख्या-18 पैरा संख्या-आठ व नौ में एक व्यक्ति को दो टर्म कुलपति नियुक्त करने का उल्लेख है। तीसरे टर्म का जिक्र नहीं है। विधिक जानकारों का कहना है कि अधिनियम में जिस नियम का उल्लेख नहीं हो, उस पर निर्णय नहीं लिया जा सकता। प्रो.विनय पाठक उत्तर प्रदेश के एकेटीयू में दो टर्म कुलपति रह चुके, तीसरे टर्म में नियुक्ति नियमों के विपरीत प्रतीत हो रही है। कुछ विधि विशेषज्ञों का कहना है कि अधिनियम मौन है तो कोई निर्णय से पहले राज्य के विधि विभाग, महाधिवक्ता, लॉ विशेषज्ञों का मत आवश्यक है। सूत्रों का कहना है कि कुलाधिपति कार्यालय ने प्रो.विनय पाठक को तीसरी बार कुलपति बनाने में इस प्रक्रिया संभवतः पालन नहीं किया। विधि के जानकारों का कहना है कि इतनी जहमत उन्ही परिस्थतियों में होती है, जब संबंधित का विकल्प उपलब्ध न हो। सवाल ये है कि क्या देश में प्रो.विनय पाठक का विकल्प नहीं था ? यही कारण है कि कुलाधिपति कार्यालय की कार्यशैली पर सवाल उठ रहा है।

गौरतलब ये है कि छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.विनय पाठक प्रदेश के इकलौत कुलपति हैं, जिन पर कुलपति रहते हुए भ्रष्टाचार की एफआईआर हुई, यही नहीं, उनके साथ घूसखोरी में संलिप्त दो लोग गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुके हैं। घूस की राशि ट्रांसफर होने के इलेक्ट्रानिक साक्ष्य है। यही कारण है कि आरोपी कुलपति प्रो.विनय पाठक की ओर से एफआईआर रद करने और अग्रिम जमानत की याचिका पर सभी पक्षों को सुनने, हलफनामा, पूरक हलफनामा पर बहस के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ  ने मेरिट पर खारिज कर दी। सवालों की श्रंखला इसलिए भी है कि कुलाधिपति कार्यालय ने छोटी शिकायतों का त्वरित परीक्षण करते हुए भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय लखनऊ, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी, अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद (अयोध्या), डॉ.भीमराव आंबेडकर विवि आगरा के कुलपति से कार्यकाल पूरा होने से पहले इस्तीफा मांग लिया या फिर उन्हें पद से सीधे बर्खास्त कर दिया। जबकि इनमें से किसी के खिलाफ भ्रष्टाचार की एफआईआर नहीं हुई। लेकिन छत्रपति शाहू जी महाराज विवि कानपुर के कुलपति प्रो.विनय पाठक पर एफआईआर, उनके खिलाफ आधा दर्जन से अधिक लोगों द्वारा भ्रष्टाचार के दस्तावेज कुलाधिपति कार्यालय को सौंपे जाने, हाईकोर्ट में दो याचिका होने के बाद कार्रवाई क्यों नहीं ? ये सवाल उच्च शिक्षा के गलियारों में गूंज रहा है।

  

 

अब तक ये कुलपति हटे !

भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय लखनऊ,  काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी, अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद (अयोध्या), चन्द्रशेखर आजाद कृषि विवि, डॉ.भीमराव आंबेडकर विवि आगरा के कुलपति से कार्यकाल पूरा होने से पहले इस्तीफा मांगा गया। या उन्हें पद से बर्खास्त कर दिया।

 

क्या कहता है एक्ट...

उत्तर प्रदेश विश्वविद्यालय अधिनियम, 1973 के चैप्टर चार आफीसर्स ऑफ द यूनिवर्सटीज के प्वाइंट संख्या-12 में कुलपति की नियुक्ति व शर्तो का उल्लेख है। इसके प्वाइंट 12 के अन्तर्गत प्वाइंट आठ व नौ में कुलपति के दो टर्म और 65 तक की उम्र का उल्लेख किया गया है। तीसरे टर्म का उल्लेख नहीं है। यानी, तीसरी बार कुलपति नहीं बनाया जा सकता है।

 

मौन का इंटरपेटेशन...

उच्च शिक्षा के नियम, कानून के जानकारों का कहना है कि अगर मौन का इंटरपेटेशन किया जाना आवश्यक है तो फिर उसके लिए राज्य के विधि विभाग, महाधिवक्ता अथवा संविधान विशेषज्ञ से विधिक राय लेनी चाहिए। और यह भी तब जब किसी व्यक्ति की नियुक्ति अपरिहार्य हो।

 

 

 

 

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