-देश के 532 सामुदायिक महाविद्य़ालय बंद करने का अधूरे बोर्ड में लिया निर्णय
-मानव संसाधन विकास संबंधी
स्थायी समिति ने इग्नू की 263वीं रिपोर्ट में किया खुलासा
परवेज अहमद
लखनऊ। क्या आप विश्वास
करेंगे कि राज्यसभा के दस, लोकसभा के 31 सदस्य यानी 41 सांसद जिस कथित शिक्षाविद के
शैक्षिक निर्णय को “निराशजनक, खेदजनक, अत्यंत
निराशाजनक और विहित मानकों के विरुद्ध” ठहरा चुके
हों। जिनकी रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखी गयी हो- वो शिक्षाविद उत्तर
प्रदेश के पांच विश्वविद्यालयों का छह बार कुलपति बनाया सकता है ? शायद नहीं। पर, यूपी की उच्च शिक्षा के संचालकों
ने ये सच कर दिखाया। और वह शिक्षाविद है प्रो.विनय पाठक, जो छत्रपति शाहू जी महाराज
कानपुर विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर कार्यरत हैं। उन पर अंबेडकर विवि आगरा के प्रिटिंग
वर्क के बदले बिचौलिये के जरिये करोड़ों घूस लेने का आरोप है। एफआईआर दर्ज है। संगठित
अपराध नियंत्रण के लिए गठित यूपी पुलिस की इकाई एसटीएफ उसकी एक महीने से जांच कर रही
है। उसके हाथ इतने दस्तावेज हाथ लग गये हैं कि समेटना मुश्किल हो रहा है, डीआईजी स्तर
का एक अतिरिक्त अधिकारी तैनात किये जाने पर विचार शुरू हो गया है।
उत्तर प्रदेश के तीन
सांसदों को शामिल करते हुए 31 अगस्त 2013 को
गठित 41 सांसदों की समिति ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय ( इग्नू)
के कार्यकरण का 263वां प्रतिवेदन 6 मई 2014 को राज्यसभा के सभापति व लोकसभा के अध्यक्ष
को सौंपा था। इसमें इग्नू की शैक्षिक, सामाजिक गतिविधियों, शोध कार्यो, नियुक्तियों
से जुड़े ढेरों प्रकरण पर विस्तार से चर्चा की गयी है। कुलपति प्रो.एम आलम की कार्यशैली
पर सवाल उठाये गये। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि समिति ने इग्नू द्वारा संचालित सामुदायिक
महाविद्यालय को योजना को बंद करने के तौर-तरीकों को नियम विरुद्ध बताया। यह योजना
4 जुलाई 2009 को शुरू हुई थी और इसके लिए 532 सामुदायिक महाविद्यालय खोले गये थे।
सांसदों ने अपनी रिपोर्ट
के पेज संख्या-17 के पैरा संख्या-5.19 में स्पष्ट करते हुए लिखा इस योजना को बंद करने
का निर्णय जिस शिक्षा समीक्षा समिति ने लिया, उसके अध्यक्ष वर्धमान महावीर मुक्त विश्वविद्यालय
के कुलपति प्रो.विनय पाठक थे। संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि इग्नू प्रबंध
मंडल की 118वीं बैठक के कार्यवृत्त में समीक्षा समिति के अध्यक्ष प्रो.विनय पाठक की
उपस्थिति में यह निर्णय हुआ, जबकि उस समय समिति का कोरम पूरा नहीं था। मनमानी तरीके
से निर्णय लिया गया। समिति ने शुरूआत में इस निर्णय पर निराशा जाहिर करते हुए कहा है
कि समिति का ध्यान 9 अप्रैल 2012 प्रबंध बोर्ड की 112वीं बैठक की ओर भी गया, जिसमें
सिर्फ छह सदस्यों ने हिस्सा लिया, इसमें से एक सचिव का प्रतिनिधित्व करने वाले विभाग
का संयुक्त सचिव था। सांविधानिक प्रावधान के मददेनजर संयुक्त सचिव को पूर्ण सदस्य नहीं
माना जा सकता है, समिति का यह दृढ़ मत है कि बिना गणपूर्ति ( कोरम पूरा हुए) के हुई
कोई भी बैठक, वह भी कार्यवाहक कुलपति की अध्यक्षता में विहित मानकों के विरुद्ध है।
ऐसी बैठकों में लिये गये निर्णयों पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। संसदीय समिति ने अपनी
रिपोर्ट में ढेरों खामियों का उल्लेख किया है और प्रकरण में अपेक्षित सुधार की जरूरत
जाहिर की है।
अब सवाल उठता है कि जिस प्रो.विनय पाठक के निर्णय को 41 ( राज्य सभा और
लोकसभा दोनों के) सांसद निराशजनक, खेदजनक और विधि विरुद्ध कह चुके हों, उसे उत्तर प्रदेश
में बार-बार कुलपति का दायित्व कैसे सौंपा गया ? कुलपति चयन में बायोडेटा
का ही परीक्षण होता है, अगर प्रो.विनय पाठक ने संसदीय समिति की टिप्पणी की बात अपने
बायोडेटा से छुपा ली अथवा उत्तर प्रदेश के कुलाधिपति को नहीं बताई तो क्या तथ्य राजभवन
को उनके विरुद्ध चोरी करने का मुकदमा दर्ज नहीं कराया जाना चाहिए ? ये सवाल अब चारों ओर से उठ
रहा है।
कोट
सामुदायिक महाविद्यालय के जरिये सदूर गांवों में रहने वाले युवक, युवतियों को
कौशल विकास प्रशिक्षण के साथ दूरस्थ शिक्षा के जरिये डिग्री कोर्स कराया जाता है।
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