Thursday, 24 November 2022

प्रो.विनय पाठक एक, किस्से-कारगुजारी अनेक !

छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर के कुलपति प्रो.विनय पाठक जिस भी विश्वविद्यालय में पूर्णकालिक या कार्यवाहक कुलपति रहे, वहां भ्रष्टाचार, नियमों की अनदेखी की नई इबारतें गढ़ीं। भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टालरेंस की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नीति के चलते लखनऊ के इंदिरानगर थाने में प्रो.विनय पाठक के खिलाफ घूसखोरी की एक रिपोर्ट लिखी गयी। हाईकोर्ट ने उन्हें अग्रिम जमानत देने से इंकार किया। तब उनकी मॉडस आपरेन्डी (कार्य शैली) के किस्से शिक्षकों के घरों, छात्रावासों, कैन्टीनों में सुनाये जा रहे हैं। हर ओर दो सवाल- पहला, अब प्रो.विनय पाठक की कौन सी इबारत खुलने वाली है। दूसरा, आखिर इतने तथ्य सामने होने के बाद भी कुलाधिपति कार्यालय खामोश क्यों ? सवालों की श्रंखला के बीच पढ़िये- छह साल  एकेटीयू के कुलपति रहे प्रो.विनय पाठक के सिर्फ दस किस्से ब-कलम-विशेष प्रतिनिधि परवेज अहमद

 

एकः

कानपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.विनय पाठक ने बौद्धिक संपदा पर सिर्फ झूठ नहीं बोला बल्कि यूनिवसिर्टी ऑफ एसेक्स (इंग्लैड) की रिसर्चर हेबा लकानेइ का 3 नवम्बर 2007 को पब्लिश्ड शोध पत्र का टाइपिक बदलकर तीन साल बाद अपने नाम से प्रकाशित करवा लिया। एचबीटीआई के कम्प्यूटर साइंस एन्ड इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के तत्कालीन लेक्चरर रोहित कटियार को-आर्थर हैं। कुलपति पद हासिल करने के लिए इस रिसर्च का उपयोग किया गया।

दोः

एकेटीयू में कुलपति रहने के दौरान जब निर्णयों, कार्यशैली पर एक वह्सिल ब्लोअर ने आवाज उठाई। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दाखिल की, तब उसका अपहरण कराने का प्रयास किया गया। तत्कालीन पुलिस अधिकारियों ने पीड़ित की एफआईआर लिखने से इंकार किया। तब उसने हाईकोर्ट से सुरक्षा मांगी। न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान, न्यायमूर्ति देवेन्द्र कुमार उपाध्याय के पीठ ने सरकार, एकेटीयू को चेताते हुए लखनऊ के तत्कालीन एसएसपी ( कुछ दिनों बाद कमिश्नर सिस्टम लागू हुआ) को याची की सुरक्षा का निर्देश दिया। भी कहा का उसका हैरेशमेंट न हो, यह सुनिश्चित किया जाए।

 

तीनः

सरकार मदद वाले डिग्री स्तरीय तकनीकी संस्थानों में प्रोफेसर, एसोसिएट और सहायक प्रोफेसर पद के लिये सामूहिक विज्ञापन 06 सिम्बर 2021 को निकाला। जबकि जिन कालेजों के लिये विज्ञापन थे, उनकी बीओजी ( बोर्ड ऑफ गर्न्वेर्स) स्वायत्तशासी संस्था है। विज्ञापन भी एक साथ निकाला पर प्रत्येक पद के लिए आवेदन शुल्क (20000 प्रत्येक पद) अलग-अलग मांगे गये। आरक्षण नियम नहीं बताये। आवेदन शुल्क चेयरमैन एफएसआरईसी के खाते में सामूहिक जमा कराया गया। इस वित्तीय, बौद्धिक भ्रष्टाचार की बिन्दुवार शिकायत राजभवन से हुई पर पत्रावली कथित रूप से गायब हो गई।

चारः

सरकारी धन निजी बैंकों में न जमा करने के शासनादेश ( संख्या-3/ 2016/ए-1-170/दस-2016-10 (33)/2010 दिनांक 23 फरवरी 2016) की खिल्ली उड़ाते हुये 650 करोड़ रुपये निजी संस्था में निवेश किया। 400 करोड़ पीएनबी हाउसिंग फन्ड, 50 करोड़ एचडीएफसी हाउसिंग और 200 करोड़ बैंकों से प्राप्त दरों के आधार पर निवेश कराये। पीएनबी हाउसिंग फन्ड निजी संस्था है। ( इन संस्थाओं के रिलेशनशिप मैनेजर एकाध करोड़ का निवेश करने पर ही ग्राहक को सुख-सुविधा उपलब्ध कराते हैं ) यहां राशि 650 करोड़ है।

पांचः

निजी संस्था में धन निवेश का फैसला प्रो.विनय पाठक का था। 24 मार्च 2018 को एकेटीयू की वित्त समिति के 50वें कार्यवृत्त में इसका उल्लेख है। मद संख्या-18 : 50: 11 में चेयरमैन प्रो.विनय पाठक ने वित्त अधिकारी, कुलसचिव ( दोनों एकेटीयू ) को पदेन और सेंटर फ़ॉर एडवांस स्टडीज के निदेशक मनीष गौड़ को सदस्य नामित किया। जमा राशि प्री म्येच्योर निकाली गयी, इससे कितना लाभ-नुकसान बट्टे खाते में डाला गया। ब्योरा उपलब्ध नहीं।

 

छहः

प्रो.विनय पाठक की अध्यक्षता वाली वित्त समिति ने 2018-19 में एकेटीयू के छात्रों का बीमा कराने के नाम पर छह करोड़ रुपये खर्च किये, पर किसी छात्र को बीमा कार्ड उपलब्ध नहीं कराया गया। कोविड के आतंक काल में जब छात्रों का स्वास्थ्य बीमा होना जरूरी था और आवश्यकता भी थी, तब छात्रों को उसका लाभ नहीं दिलाया। ये धन कहां और किस कंपनी में खर्च हुआ, आंतरिक आडिट से ही निपटा दिया गया।

 

सातः

जनवरी 2018 में परीक्षा शुचिता तार करने वाले मुन्ना भाई गैंग का आईईटी के तत्कालीन निदेशक प्रो.एएस विद्यार्थी ने खुलासा किया। प्रो.विनय पाठक के करीबी प्रोफेसरों व अधिकारियों को नोटिस जारी हुई तो कुलपति ने तत्कालीन समय के  मंत्री व अधिकारियों से प्रो.विद्यार्थी को ही निदेशक पद के कार्य से विरत करा दिया। मुन्ना भाई गैंग को मदद के मामले में जिन प्रोफेसरों, शिक्षकों को नोटिस जारी किया गया था, उसे वापस ले लिया गया। प्रो.विनय पाठक के घोषित करीबी प्रोफेसर को जांच अधिकारी बनाकर मामला खत्म कर दिया गया।

 

आठः

प्रो. विनय पाठक ने अपने रसूख से तत्कालीन वित्त अधिकारी अभिषेक कुमार त्रिपाठी को निलंबित कर दिया। अभिषेक त्रिपाठी ने शैक्षिक योग्यता न होने के आरोपों से घिरे आईईटी के निदेशक विनीत कंसल पर वित्तीय व प्रशासनिक अनियमितता के 14 आरोप लगाये थे। कुलपति व प्राविधिक शिक्षा विभाग से लिखित शिकायत भेजी थी, जिसमें वित्तीय हैंडबुक के आदेशों का उल्लेख थाय़कहा जाता है कि प्रो.पाठक ने शासन में अपने रसूख का इस्तेमाल करते हुए लेखा सेवा के अधिकारी अभिषेक कुमार को पहले पद से हटाने का आदेश कराया। तबादला कराया। फिर निलंबित कर दिया गया। आंतरिक जांच में विनीत कंसल को क्लीन चिट भी दिला दी।

 

नौः

छत्रपति शाहूजी महाराज विवि के कुलपति प्रो.विनय पाठक पर इल्जाम ये भी है कि जो भी अधिकारी, कर्मचारी, प्रोफेसर उनके निर्णयों के विरोध में सिर उठाता था, उसके खिलाफ अचानक अज्ञात शिकायत उनके पास पहुंच जाती थी, जिसे आधार बनाकर वह संबंधित प्रोफेसर, प्रशासनिक, वित्त अधिकारी को निलंबित कर या करा देते थे। अधिकार छीन लेते थे। एकेटीयू में आधा दर्जन नजीरें मौजूद हैं। जबकि शासन का स्पष्ट निर्देश है कि बिना पूरे नाम-पते और हलफनामे की शिकायत को इंटरटेन न किया जाए। एकेटीयू के शिक्षकों का दावा है कि ये शिकायतें प्रो.विनय पाठक की मॉडस आपरेन्डी ( कार्यशैली) का हिस्सा होती हैं।

 

दसः

एकेटीयू, उसके घटक संस्थान आईईटी, राजकीय इंजीनियरिंग कालेजों में होने वाले निर्माण कार्य, तकनीकी कार्य, मैन पॉवर, संसाधन विकास जैसे कार्यो उन्ही कंपनियों को मिले हैं, जिन पर प्रो.विनय पाठक का वरदहस्त है। ये ही नहीं, ठेकों के लिए टेंडर नियमों की परवाह नहीं होती। बिना शर्त, अनुभव वाली कंपनियों को भारी भरकम धनराशि के काम दिये गये हैं। जबकि इस पर केन्द्र सरकार की जांच कमेटियों ने बार-बार आपत्ति की लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ। कमेटी पर कमेटी बनायी जाती रही।

 

इंसेट

विदेशों में पिटाई भारत की भद

लखनऊ। छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.विनय पाठक बौद्धिक संपदा की कथित चोरी में भारत का नाम विदेशों में भी बदनाम किया है। दुनिया के मशहूर शोध जनरल पैटर्न रिक्गनीशन में  यूनिवर्सिटी ऑफ एसेक्स के डिपार्टमेन्ट ऑफ कम्प्यूटर साइंसेज की हेबा लकानेइ ने -एक्सट्रैक्टिंग अ डाइग्नोस्टिक गेट सिग्नेचर- नामक शीषर्क से 2 नवम्बर 2007 को रिसर्च पेपर प्रकाशित कराया। कमोवेश इसी पेपर को उठाकर प्रो.विनय पाठक और रोहित कटियार ने- क्लीनिकल गेट डेटा एनालिसिस बेस्ड ऑन टेम्पोरल फीचर्स- शीर्षक से कम्प्यूटर साइंस के जनरल आईजेसीएसआईएस में 11 फरवरी 2010 को प्रकाशित किया। हेड लाइन अलग देखकर चौंकियेगा नहीं- हेबा के रिसर्च पेपर के इन्ट्रोडक्शन की शुरूआत की पहली लाइन- नॉमर्ल वॉल्किंग इन ह्यूमन मे बी डिफाइन्ड ऐज अ मैथड ऑफ लोकोमोशन इनवॉल्विंग द यूज ऑफ टू लेग्स .....है। और कामा, फुल स्टाप तक की यही लाइन प्रो. विनय पाठक के रिसर्च पेपर में हैं। बौद्धिक संपदा की कथित चोरी के इस मामले में कनक्लयूजन ( निष्कर्ष) तक का शब्द नहीं बदला गया है। इस तरह के एक अपराध में भारत के एक कुलपति जेल जा चुके हैं। अब सोंचिए, अगर भारत का कोई छात्र कम्प्यूटर इंजीनियरिंग के लिए एसेक्स विवि पहुंच गया तो भारत कुलपतियों व भारत का इमेज का क्या होगा ?

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

      

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