-जिस रिसर्च पेपरों के कई शोधार्थी को-आर्थर थे, उसे प्रो.विनय पाठक की सोल प्रापर्टी स्वीकारा
-पाठक ने 2015 में जिन
11 पेपरों का खुद को सोल-आर्थर बताया, उसमें 4 के को-आर्थर थे प्रो.एसजी धाण्डे
परवेज़ अहमद
लखनऊ। छत्रपति शाहू जी
महाराज विश्वविद्यालय के कुलपति और उच्च शिक्षा के बाहुबली प्रो.विनय पाठक के विरूद्ध
चल रही घूसखोरी, नियम विपरीत नियुक्ति, रिसर्च चोरी की जांच घेरे में अब आईआईटी ( इंडियन
इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी) कानपुर के पूर्व निदेशक पदमश्री प्रो. संजय जी धाण्डे भी
आ गये हैं। कुलपति सर्च कमेटी का चेयरमैन रहते हुये उन्होने ही प्रो.विनय पाठक के प्रत्येक
“झूठ” पर सच की मुहर लगायी। नाम शार्ट लिस्ट कर नियुक्ति की संस्तुति की। फिर उन विश्वविद्यालयों
में लाभ का पद हासिल किया, जहां प्रो.विनय पाठक कुलपति रहे।
कम्प्यूटर साइंस, तकनीकी
शिक्षा में अभिनव प्रयोग के लिए वर्ष 2013 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की
सरकार ने प्रो.एस जी धाण्डे को पदमश्री
का तमगा दिया, उन दिनों वे भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी कानपुर) के निदेशक
थे। प्रो.विनय पाठक की पीएचडी कोर्स के “को-गाइड” रह चुके थे। उस अंतराल
में उन्होंने प्रो.विनय पाठक के साथ नेशनल, इंटरनेशनल जरनलों में कई रिसर्च पेपर पब्लिश
कराये। वर्ष 2015 में उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार थी, राज्यपाल के रूप में
राज्य विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति रामनाईक थे। तब अब्दुल कलाम तकनीकी विश्वविद्यालय
(एकेटीयू) के कुलपति पद के लिए उपयुक्त शिक्षाविद चयनित करने की प्रक्रिया शुरू हुई।
इसके लिये तत्कालीन कुलाधिपति राम नाईक ने आईआईटी-कानपुर के निदेशक एस जी धाण्डे को
सर्च कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया।किसी भी शिक्षाविद के कुलपति चयनित होने में सर्च
कमेटी की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पदमश्री धाण्डे ने उम्मीदवार प्रो.विनय पाठक
के बायोडेटा का अध्ययन किया। उस समय पाठक ने अपना जो बायोडेटा राजभवन भेजा था, उसके
एनेक्जर-2 में सोल आर्थर (मूल रिसर्चर, लेखक) के रूप में 11 नेशनल, इंटरनेशनल रिसर्च
पेपरों उल्लेख था- सचाई ये है कि इनमें से पांच पेपरों में अन्य लोगों के साथ प्रो.एसजी
धाण्डे को-आर्थर थे। जिन पेपरों के वह को-आर्थर थे, उसे उन्होंने प्रो.विनय पाठक की
सोल प्रापर्टी कैसे स्वीकारा ? रिसर्च पेपर और 2015 में
राजभवन को भेजे गये प्रो.पाठक के बॉयोटेडा की सत्यापित प्रतियां इस “संवाददाता” के पास हैं। जिससे साफ है
कि सर्च कमेटी के अध्यक्ष के रूप में प्रो.एसजी धाण्डे ने कुलपति पद पर विनय पाठक की
नियुक्ति सुनिश्चित करने के लिए नियम-कानून को ताक पर रख दिया। वर्ष 2018 में दूसरी
बार प्रो. विनय पाठक एकेटीयू के कुलपति नियुक्त हुए, उस समय भी सर्च कमेटी के अध्यक्ष
प्रो.एसजी धाण्डे ही थे। बायोडेटा का अध्ययन से इतर प्रो.एसजी धांण्डे छत्रपति शाहू
जी महाराज कानपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.विनय पाठक की पीएचडी के को-गाइड भी
हैं। जिससे इस तर्क की गुंजाइश नहीं है कि वे जिसका बायोडेटा शार्ट लिस्ट करते नियुक्ति
समिति के पास भेज रहे हैं, उससे व्यक्तिगत परिचित नहीं थे, इसलिए बॉयोडेटा अध्ययन में
ह्यूमन इरर हो गया।
पाठक ने कुलपति बनते ही धाण्डे को सलाहकार बनाया
अब्दुल कलाम प्राविधिक विवि के कुलपति का कार्य संभालने के बाद प्रो.विनय पाठक
ने आईआईटी के पूर्व निदेशक व अपनी नियुक्ति की सर्च कमेटी के अध्यक्ष प्रो.एसजी धांण्डे
को एकेटीयू का सलाहकार नियुक्त कर दिया। बदले में उन्हे विवि से भारी व निश्चित धनराशि
दी जाती। उन्हे एकेटीयू की शीर्ष संस्था कार्य परिषद (ईसी) का सदस्य भी नामित करा दिया।
ठहराव यहीं नहीं, बल्कि प्रो.पाठक के प्रयासों के चलते प्रो. धाण्डे आजमगढ़ राजकीय
इंजीनियरिंग कालेज के शासी निकाय (बीएजी) के अध्यक्ष बना दिये गये। अतर्रा बांदा समेत
कई इंजीनियरिंग कालेजों की कार्यकारी निकाय के सदस्य भी बन गये। अब उच्च शिक्षा के
गलियारों में सवाल उठ रहा है कि ये रिश्ता क्या कहलाता है ?
एसटीएफ परेशान आखिर कैसे हाथ डालें !
लखनऊ। प्रो.विनय पाठक
की घूसखोरी की जांच कर रही स्पेशल टॉस्क फोर्स उच्च व तकनीकी शिक्षा के काकस में इतने
बड़े-बडे नाम सामने आने से बेचैन है। उनके अधिकारियों को समझ में ही नहीं आ रहा है
कि शीर्ष स्तर पर ऊंची पकड़ रखने वालों पर हाथ कैसे डालें। एसटीएफ के बड़े अधिकारी
ने नाम न छापने की शर्त पर कहा हमें भ्रष्टाचार, घूसखोरी की जांच मिली है, जिसकी जांच
पड़ताल कर रहे हैं। इस मामले में विस्तृत जांच के लिए स्पेशल सेल बनाये जाने की जरूरत
है। निर्णय शीर्ष स्तर पर ही संभव है।
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