Saturday, 13 February 2016

कुछ यूं घूमा लोकायुक्त की नियुक्ति का कालचक्र

२८ जनवरी २०१६

ध्यानार्थ: नये लोकायुक्त की चुनौती से जुड़ी एक खबर और मिलेगी
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कुछ यूं हुआ पटाक्षेप
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जून 2012: लोकायुक्त की जांच में आरोपित हुए पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी के अधिवक्ता सईद सिद्दीकी ने लोकायुक्त अधिनियम में संशोधन को चुनौती देती याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल और नसीमुद्दीन के खिलाफ संस्तुतियां खारिज करने की गुहार लगायी।
-दो साल के अंतराल में कई दौर की सुनवाई हुई और शपथ पत्र दाखिल करने का सिलसिला चला।
24 अप्रैल 2014: देश की सबसे बड़ी अदालत के तीन जजों की पीठ ने लोकायुक्त अधिनियम में संशोधन पर रजामंदी जतायी, मगर यह भी कहा कि लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा का कार्यकाल पूरा होने के छह माह के अंदर नए लोकायुक्त का चयन की प्रक्रिया शुरू की जाए।
15 मार्च 2014: लोकायुक्त का कार्यकाल पूरा होते गी नई नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट में दो याचिकाएं दाखिल हुईं।
मई 2015: सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की पीठ ने
 लोकायुक्त नियुक्त नहीं होने पर अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की चेतावनी दी।
11 जून 2015:  राज्यपाल राम नाईक ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य और लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा को पत्र लिखकर लोकायुक्त व उपलोकायुक्त नियुक्त करने का सुझाव दिया।
5 अगस्त 2015: सरकार ने न्यायमूर्ति रविन्द्र सिंह को लोकायुक्त नियुक्त करने का प्रस्ताव राजभवन भेजा गया।
6 अगस्त 2015: राज्यपाल राम नाईक ने कतिपय आपत्तियों के साथ सरकार का प्रस्ताव बिना मंजूरी के ही वापस भेज दिया।
7 अगस्त 2015: लोकायुक्त अधिनियम के नियमों का हवाला देकर राज्य सरकार ने न्यायमूर्ति रविन्द्र सिंह की नियुक्ति का प्रस्तावन दोबारा राजभवन भेजा, इसे राजभवन ने लौटा दिया।
20 अगस्त 2015: राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को पत्र लिख चयन समिति में सामंजस्य बनाकर नाम चुनने का सुझाव दिया।
25 अगस्त 2015: राज्यपाल राम नाईक ने रविन्द्र सिंह को लोकायुक्त नियुक्त करने से इंकार करते हुए नया नाम मांगा
27 अगस्त 2015: विधानमंडल ने लोकायुक्त अधिनियम में संशोधन का बिल पास किया, जिसमें लोकायुक्त चयन समिति से से हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की भूमिका खत्म कर दी गयी थी।
29 अगस्त 2015: विधानमंडल से पारित बिल राजभवन भेजा गया, मगर राज्यपाल ने उस पर हस्ताक्षर नहीं किए।
सितंबर 2015: सुप्रीम कोर्ट ने लोकायुक्त नियुक्त नहीं कर पाने पर मुख्य सचिव का व्यक्तिगत हलफनामा मांगा
27 सितंबर 2015: लोकायुक्त चयन के लिए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, मुख्य न्यायाधीश डॉ.डीवाई चन्द्रचूड़ व नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद की बैठक बुलाई गई, जिसमें न्यायमूर्ति चन्द्रचूड़ ने अधिनियम संशोधन बिल राजभवन में लंबित होने पर सांविधानिक स्थिति जानने का सुझाव दिया।
-14 दिसंबर 2015: सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति रंजन गोगोई व न्यायमूर्ति रमन्ना की पीठ ने 16 दिसंबर तक लोकायुक्त नियुक्त करने का निर्देश दिया
-15 दिसंबर 2015: चयन समिति के तीनों सदस्यों ने पांच घंटे की मैराथन बैठक हुई मगर किसी नाम पर एकराय बनी
-16 दिसंबर 2015: सुबह की पाली में किसी नाम पर सहमति नहीं बनने पर शाम पांच बजे फिर से बैठक का निर्णय हुआ। मगर दोपहर में न्यायमूर्ति रंजन गोगोई व न्यायमूर्ति एवी रमन्ना ने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए न्यायमूर्ति वीरेन्द्र सिंह यादव को लोकायुक्त नियुक्त कर दिया।
-16 दिसबंर 2015: हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने राज्यपाल को चिट्ठी लिखी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट को गुमराह करने का जिक्र था।
-17 दिसंबर 2015: सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के क्रम में वीरेन्द्र सिंह को लोकायुक्त नियुक्त करने का प्रस्ताव राजभवन भेजा
17 दिसंबर 2015: राज्यपाल राम नाईक ने मुख्य न्यायाधीश के 16 दिसंबर के पत्र की प्रति मुख्यमंत्री व स्वामी प्रसाद मौर्य को भेजी।
-18 दिसंबर 2015: हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति तीरथ सिंह ठाकुर से मुलाकात की।
-18 दिसंबर 2015: राज्यपाल राम नाईक ने वीरेन्द्र सिंह को लोकायुक्त पद की शपथ दिलाने की तिथि 20 दिसंबर निर्धारित की।
-19 दिसंबर 2015: अधिवक्ता सच्चिदानंद गुप्ता ने राज्य सरकार पर शीर्ष अदालत को गुमराह करने का इल्जाम लगाते हुए वीरेन्द्र सिंह की नियुक्ति रद करने की गुहार लगायी
-19 दिसंबर 2015: शीर्ष अदालत की अवकाश कालीन पीठ ने वीरेन्द्र सिंह के शपथ ग्र्रहण पर रोक लगा दी और चार जनवरी को सुनवाई की तिथि निर्धारित की।
-1 जनवरी 2016: मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने राज्यपाल के लिखे पत्रों का जवाब देते हुए कहा कि जस्टिस वीरेन्द्र सिंह के नाम लगातार चर्चा में रहा। नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य की भी इसमें सहमति थी।
4 जनवरी 2016: भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति तीरथ सिंह ठाकुर की पीठ ने वीरेन्द्र सिंह की शपथ ग्र्रहण पर रोक बरकरार रखते हुए मामले की सुनवाई का जिम्मा जस्टिस रंजन गोगोई की पीठ को सौंपा।
6 जनवरी 2015: विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य ने राज्यपाल व हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को लिखे पत्र में सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने किसी भी नाम पर सहमति नहीं जतायी थी।
19 जनवरी 2016: कोर्ट में सुनवाई हुई मगर वह किसी मुकाम तक नहीं पहुंची
-20 जनवरी 2016: शीर्ष अदालत ने फैसला सुरक्षित किया मगर कहा कि लोकायुक्त की नियुक्ति वही करेंगे
-28 जनवरी 2016: न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने अपना फैसला सुनाया जिसमें वीरेंद्र सिंह की नियुक्ति रद कर दी गयी और हाईकोर्ट के सेवानिवृत न्यायमूर्ति संजय मिश्र को उत्तर प्रदेश का नया लोकायुक्त नियुक्त किया गया।
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लोकायुक्त में शिकायत का तरीका
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कोषागार में दो हजार रुपए की राशि जमा करनी होगी है, इसके अलावा मुफ्त मिलने वाली एक पुस्तिका पर बने फार्म के प्रारूप में तीन प्रतियां लोकायुक्त कार्यालय में जमा करनी होती है। इसके साथ नोटरी से सत्यापित हलफनामा देना होता है, जिसमें शिकायत कर्ता का नाम, पता, फोन नम्बर के साथ आरोपों का ब्यौरा दर्ज किया जाता है। शिकायत के साथ ही इल्जामों के समर्थन में साक्ष्य की सत्यापित प्रति भी लगायी जाती है। इस पर लोकायुक्त शिकायतकर्ता को बुलाकर उसका कथन (बयान) दर्ज करते हैं और प्रारम्भिक परीक्षण के बाद परिवाद दर्ज कर अन्वेषण (जांच) शुरू करते हैं। शिकायत के समर्थन में साक्ष्य वादी को उपलब्ध कराने होते हैं।
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अब तक उप्र केलोकायुक्त
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प्रदेश के पहले लोकायुक्त के रूप में न्यायमूर्ति विशंभर दयाल ने 14 सितंबर 1977 को कार्यभार संभाला। उनके बाद न्यायमूर्ति मिर्जा मोहम्मद मुतर्जा हुसैन, जस्टिस कैलाश नाथ गोयल, न्यायमूर्ति राजेश्वर सिंह व न्यायमूर्ति सुधीर चंद्र वर्मा लोक आयुक्त रहे। न्यायमूर्ति एनके मेहरोत्रा ने छठवें लोकयुक्त के रूप में 16 मार्च 2006 को पद संभाला था। न्यायमूर्ति संजय मिश्र अब सातवें लोकायुक्त होंगे।
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उत्तर प्रदेश लोकायुक्त एवं उपलोकायुक्त अधिनियम-1975 में बना था। जिसमें लोकायुक्त व उपलोकायुक्त का कार्यकाल छह साल था। लोकायुक्त को लोकसेवकों केपद के दुरुपयोग, भ्रष्टाचार की जांच का अधिकार है। साथ ही जांच में हासिल तथ्यों के साथ संस्तुतियां राज्य सरकार को भेजने का अधिकार है। किसी को दोषी या निर्दोष घोषित करने का लोकायुक्त को अधिकार नहीं है। सिर्फ साक्ष्य के आधार पर कार्रवाई व विशेषज्ञ जांच कराने की संस्तुति करने का अधिकार है। तीन माह में कार्रवाई नहीं होने पर राज्यपाल को स्पेशल रिपोर्ट भेजने की भी अधिनियम में व्यवस्था है। वर्ष 2012 में अखिलेश यादव सरकार ने इस अधिनियम में पहला संशोधन किया। इसमें अधिकारों में कोई कटौती या बढ़ोत्तरी नहीं की गयी। अलबत्ता लोकायुक्त एवं उपलोकायुक्त का कार्यकाल छह से बढ़ाकर आठ साल कर दिया। यह प्राविधान किया कि नई नियुक्ति तक पुराना लोकायुक्त पूरे अधिकार के साथ कार्य करता रहेगा। अखिलेश सरकार ने अधिनियम का सेक्शन 5(3) भी संशोधित कर दिया था, जिससे कार्यकाल पूरा करने वाला व्यक्ति दोबारा नियुक्ति के लिए अर्ह हो गया और उम्र की बाध्यता भी खत्म हो गयी। अब सरकार ने लोकायुक्त एवं उपलोकायुक्त अधिनियम-1975 में दूसरे संशोधन का बिल राजभवन भेज रखा है। 

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