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लखनऊ: दोपहर के ढाई बजे हैं। सामान्य दिनों में गुलजार रहने वाला समाजवादी पार्टी कार्यालय आज शांत सा है। कमरों में ताला पड़ा है और फरियादी भटक रहे हैं। जब इन फरियादियों की आवाजें सन्नाटा तोडऩे लगीं तो उन्हें इकट्ठा कर शिकायतें सहेज ली गईं और फिर सन्नाटा कायम हो गया।
बुधवार को सपा कार्यालयमें सन्नाटे सा आलम था तो अन्य दलों के प्रदेश कार्यालयों में समाजवादी परिवार के संघर्ष की गूंज होती रही। दरअसल सूबे का सत्ता संघर्ष सभी राजनीतिक दिलों के विमर्श का बड़ा बिंदु बना हुआ है। कांग्र्रेस, भाजपा व बसपा के प्रदेश मुख्यालयों में चटखारे लेकर चर्चा करते हुए इस पूरे विवाद को 'पारिवारिक समाजवादÓ का नाम दिया गया। ये लोग इस संघर्ष के परिणाम को लेकर अटकलें लगाने के साथ समीकरणों में बदलाव पर भी चर्चा करते रहे।
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...नेताजी सब ठीक कर देंगे
समाजवादी पार्टी के प्रदेश कार्यालय में सामान्य रूप से पहुंचने वाले फरियादी तो थे ही, मुख्यमंत्री निवास से निराश फरियादी भी वहां पहुंच गए थे। कार्यालय में अगल-बगल के कमरों में राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के साथ प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अखिलेश यादव और लोकनिर्माण मंत्री के रूप में शिवपाल सिंह यादव की नाम पट्टिकाएं लगी थीं। लोग इन कमरों के पास आते, झांकते और फिर बरामदे में इंतजार करने लगते। जब बहुत देर हो गई और कोई नहीं आया तो फरियादी कुछ शोर करने लगे। दफ्तर के बाहर मीडिया की ओवी वैन लाइन प्रसारण में लगी थीं, इसलिए वहां मौजूद कर्मचारी भी सक्रिय हो गए। आनन फानन में विधायक एसआरएस यादव को बुलाया गया। वे सभी फरियादियों को कांफ्रेंस हॉल में ले गए, वहां उनकी शिकायतों के आवेदन लिए और बिना बोले ही चले आए। इस बीच कुछ कार्यकर्ता आए तो वे उनसे भी मुखातिब नहीं हुए। किसी ने पूछा, यह सब क्या हो रहा है.... तो आवाज आई, 'चिंता मत करो सब ठीक हो जाएगा। नेताजी सब ठीक कर देंगेÓ।
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...बेअसर होगा यह नाटक
बहुजन समाज पार्टी कार्यालय के गेट में प्रवेश करते ही नीला कुर्ता पहने अकबरपुर के रामप्रवेश मिलते हैं। उनके साथ कुछ और कार्यकर्ता आए हैं। यहां बहुत भीड़ तो नहीं है किंतु जो कार्यकर्ता हैं वे उत्साहित हैं। यहां भी चर्चा सूबे के सत्ता संघर्ष को लेकर ही हो रही है। कार्यकर्ता कहते हैं कि बहनजी के बढ़ते प्रभाव को देखते हुई समाजवादी पार्टी ने यह नाटक किया है। एक कार्यकर्ता बोला, इससे कोई फायदा नहीं होना है। यह नाटक बेअसर होगा और अबकी सरकार तो बहनजी ही बनाएंगी।
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...पुत्रमोह सबसे खतरनाक
कांग्र्रेस कार्यालय में अल्पसंख्यक विभाग के संयोजक सिराज मेंहदी व मीडिया विभाग के संयोजक सत्यदेव त्रिपाठी के कमरों में पंचायत चल रही है। एक नेता बोले, 'अरे सब मुलायम का प्लांड प्रोग्र्राम है। वे अखिलेश को साफ-सुथरा और बहुत बड़ा कर देना चाहते हैंÓ। इस बीच दूसरे नेता बोले, 'जनता सब समझ रही है, इसका कोई असर नहीं होगा।Ó चर्चा क्षेत्रीय व राष्ट्रीय दलों तक पहुंच जाती है। एक आवाज आई, 'राष्ट्रीय दलों में ऐसी कोई गड़बड़ी नहीं होती, अब जनता को क्षेत्रीय दलों का दुष्परिणाम समझ में आ रहा होगा। इसका फायदा कांग्र्रेस को होगा और लोग हमसे जुड़ेंगेÓ। अचानक एक नेता उठे और बोले, 'देखो, सब इतना आसान नहीं है। पुत्रमोह सबसे खतरनाक होता है और यहां भी यही दिख रहा हैÓ।
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...विषय से न भटकेगी जनता
भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश मुख्यालय में मुख्यालय प्रभारी भारत दीक्षित के कमरे में कुछ नेता बैठे हैं। यहां भी चर्चा में प्रदेश का सत्ता संग्र्राम ही है। एक संगठन मंत्री कहते हैं, सब तरफ से निराश होकर सपा ने नई चाल चली है। यहां तो कोई इसे स्वाभाविक संघर्ष ही नहीं मान रहा। एक नेता बोले, 'सब स्क्रिप्टेड (पहले से तैयार पटकथा का हिस्सा) हैÓ। एक आवाज आई, 'भाजपा की मेहनत व बदलते माहौल से जनता का ध्यान बांटने की कोशिश हो रही हैÓ। चर्चा चलती रही और बार-बार निष्कर्ष निकलता रहा, 'अखिलेश की इमेज ब्रांडिंग के लिए हो रहा है यह सब, पर इस बार जनता विषय से न भटकेगीÓ।
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कितना स्वाभाविक कितना नियोजित
अन्तर्कथा
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-अखिलेश की इमेज बनाने के लिए तो नहीं लिखी गयी स्क्रिप्ट
- सपा का एक वर्ग अमर सिंह को ठहरा रहा जिम्मेदार
- सरकार में झगड़े की वजह बना कोई 'बाहरीÓ
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लखनऊ : समाजवादी कुनबे की कलह सतह पर आने के बाद सियासत के सारे मुद्दे पीछे हो गये हैं। लोग-बाग इसके निहितार्थ तलाश रहे हैं। विपक्षी दलों ने बुनियादी मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए इसे सपा का नाटक करार दिया है जबकि खुद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 'परिवार एक है, झगड़ा सरकार में है और अगर कोई बाहरी व्यक्ति हस्तक्षेप करेगा तो पार्टी और सरकार कैसे चलेगीÓ कहकर बहस को आगे बढ़ा दिया है।
मुख्यमंत्री ने बुधवार को पांच कालिदास मार्ग स्थित अपने सरकारी आवास पर एक आयोजन के दौरान मीडिया से यह बात कही। सवाल उठना स्वाभाविक है कि मुख्यमंत्री किसे बाहरी बता रहे हैं। क्या उनके निशाने पर अमर सिंह हैं। संकेतों से तो यह बात स्पष्ट थी और जब खुद अमर सिंह ने 'बाहरीÓ शब्द पर जवाब दिया तो इसकी पुष्टि भी हो गयी। मुद्दा यह है कि सपाई कुनबे की रार स्वाभाविक है या फिर इसकी स्क्रिप्ट लिखी गयी है। क्या यह अखिलेश यादव की इमेज बनाने का प्रयास है। क्या सपा सरकार में भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था और बढ़ते अपराधों से ध्यान हटाकर उन्हें लोकप्रिय साबित करने की कवायद है। विपक्षी दल तो कम से कम यही कह रहे हैं लेकिन, सपा का एक तबका इस रार और कलह के लिए अमर सिंह को जिम्मेदार ठहरा रहा है। अमर सिंह की सपा में वापसी के बाद से ही अंदरखाने चल रही लड़ाई खुलकर सामने आयी है। अमर सिंह को शिवपाल का करीबी माना जाता है। वैसे तीन माह पहले कौमी एकता दल के विलय और फिर उसे निरस्त किये जाने के बाद से ही परदे के पीछे चलने वाली लड़ाई खुले मंच पर दिखने लगी थी। बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी की पार्टी का सपा में विलय शिवपाल सिंह यादव का प्रयास था और उसे मुख्यमंत्री ने पूरा जोर लगाकर खारिज करा दिया। इस मसले पर चाचा-भतीजे के अहं की भभकती लौ पर नेताजी ने पानी की बौछार कर मामला ठंडा कर दिया। स्थिति यह हुई कि शिवपाल भी अखिलेश की भाषा बोलने लगे थे पर इसके लिए मुख्यमंत्री को शिवपाल के करीबी किंतु भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे दीपक सिंघल को मुख्य सचिव बनाना पड़ा। सिंघल को कभी पसंद न करने वाले मुख्यमंत्री ने उन्हें सवा दो माह तक बर्दाश्त किया। अगर दिल्ली में अमर सिंह द्वारा दी गयी पार्टी में दीपक सिंघल की मुख्यमंत्री पर कथित टिप्पणी की शिकायत सामने न आती तो शायद अभी वह मुख्य सचिव बने रहते। मुख्यमंत्री यह बर्दाश्त नहीं कर सके कि मुख्य सचिव उन पर टिप्पणी करें क्योंकि पहले भी कई सार्वजनिक मंचों पर सिंघल की जुबान फिसलती रही है।
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अखिलेश के फैसलों से सुलगी चिंगारी
मुख्यमंत्री के दो और बड़े फैसले विवाद का कारण बने। मुख्यमंत्री द्वारा सोमवार को खनन मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति और पंचायती राज मंत्री राजकिशोर सिंह की बर्खास्तगी से चिंगारी सुलग उठी। माना जा रहा है कि अवैध खनन के मामले में हाईकोर्ट व सीबीआइ जांच का कड़ा रुख देखते हुए मुख्यमंत्री ने गायत्री को मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखाया। ऐसी ही जांच से जुड़ा एक मामला राजकिशोर का भी है। राजकिशोर, शिवपाल सिंह यादव के ही करीबी माने जाते हैं और इसे भी शिवपाल की प्रतिष्ठा से जोड़ा गया। यह बात भी चर्चा में है कि मुख्य सचिव बनने के लिए दीपक सिंघल ने न केवल शिवपाल बल्कि परिवार के अन्य सदस्यों का भी सहयोग लिया था।
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सभी नेताजी के आज्ञाकारी तो रार क्यों
सपा प्रदेश अध्यक्ष बनाये जाने के बाद शिवपाल सिंह यादव से मुख्यमंत्री ने सभी महत्वपूर्ण विभाग छीन लिए तो उनके समर्थक दावा करने लगे कि वह इस्तीफा दे देंगे पर बुधवार को जिस तरह शिवपाल सिंह यादव ने नेताजी पर अपना विश्वास और भरोसा कायम करते हुए उनके दिशा निर्देश पर ही काम करने का एलान किया उससे मंगलवार सुबह से सुलगती आग, चिंगारी बनने के बजाय तब और ठंडी होती दिखी जब मुलायम सिंह यादव ने उन्हें इटावा से सीधे दिल्ली बुला लिया। इधर, बुधवार को राजधानी में अपने सरकारी आवास पर आयोजित एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने भी शिवपाल की ही भाषा बोलते हुए कहा कि जहां तक नेताजी (मुलायम सिंह यादव) की बात है तो उनकी बात कौन नहीं मानेगा? परिवार में नेता जी का सब कहना मानते हैं लेकिन, जब सभी नेताजी के आज्ञाकारी हैं तो रार क्यों है।
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नौकरशाहों का भी खेल
सपा का एक वर्ग इस झगड़े में नौकरशाहों की बड़ी भूमिका बता रहा है। अखिलेश यादव पर नौकरशाहों की सलाह से भी फैसले लेने के आरोप लग रहे हैं। सपा के कई विधायक और पुराने कार्यकर्ता ऐसा कह रहे हैं।
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शिवपाल तोड़ सकेंगे अखिलेश का रिकार्ड!
मुलायम सिंह ने अखिलेश से सपा के प्रदेश नेतृत्व की बागडोर लेकर ऐसे समय में शिवपाल सिंह यादव को सौंपी है जब 2017 का विधानसभा चुनाव सिर पर है। अखिलेश ने 2012 में प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए साइकिल यात्रा निकाली और पूर्ण बहुमत की सपा सरकार बनाई। अब शिवपाल के सामने अखिलेश के इस रिकार्ड को तोडऩे की चुनौती रहेगी। यह अलग बात है कि 2012 में पूर्ण बहुमत की सरकार आने के बाद ही नेताजी ने कहा था कि यह जनादेश उन्हें मुख्यमंत्री बनाने के लिए मिला है।
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शिवपाल के फैसले अस्वीकार
सपा सरकार में हाल में शिवपाल के मनमाफिक काम होने बंद हो गये थे। दो वर्षों में यह कुछ ज्यादा ही हो गया। मसलन, दीपक सिंघल को सिंचाई विभाग के साथ ही प्रमुख सचिव गृह भी बनाया गया लेकिन, मुख्यमंत्री उन्हें एक पखवारा भी बर्दाश्त नहीं कर सके। कहा जाता है कि पीडब्लूडी में आराधना शुक्ला को प्रमुख सचिव बनाया गया तो शिवपाल ने उन्हें हटाने के काफी प्रयास किए लेकिन, बात नहीं बनी।
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चुनावी हार से पहले समाजवादी बौखलाहट
-विपक्ष को सपा की कलह में नजर आ रही खुद को राहत
लखनऊ : विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी कुनबे में मचे घमासान पर नजर लगाए विपक्षी दलों को प्रदेश सरकार की विदाई के साथ अपनी जीत के आसार भी दिख रहे हैं।
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बाप-बेटे की ड्रामेबाजी : बसपा
बसपा प्रमुख मायावती ने समाजवादी सरकार में जारी उठापटक को बाप बेटे की ड्रामेबाजी करार देते हुए आरोप लगाया कि विधानसभा चुनाव से पहले अपनी खामियां छिपाने के लिए ही दिखावटी नाटकबाजी कर जनता को भ्रम में डाला जा रहा है।
प्रेस विज्ञप्ति में उन्होंने आरोप लगाया कि दो मंत्रियों को घोर भ्रष्टाचार के मामलों में बर्खास्त कर देने से प्रदेश सरकार का महापाप कम नहीं हो पाएगा। गायत्री प्रजापति व राजकिशोर सिंह जैसे भ्रष्टाचार में फंसे लोगों को संरक्षण देने की समाजवादी पार्टी में पुरानी परंपरा है। भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ लोकायुक्त की रिपोर्ट को दबाए रखने वाली सरकार से राज्यपाल द्वारा बार-बार पूछने पर भी कोई कार्रवाई न हो पाना समाजवादी नेतृत्व की मंशा को दर्शाता है। मायावती का कहना है कि बसपा शासन में ऐसे मामलों पर तत्काल सख्त कार्रवाई की जाती थी।
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मुख्यमंत्री को पद छोडऩे का निर्देश दें मुलायम: भाजपा
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य के अनुसार मुलायम सिंह बुरी तरह फेल सपा सरकार से जनता का ध्यान हटाने के लिए ही अपने पुत्र व मुख्यमंत्री की छवि बचाने का नाटक कर रहे हैं जबकि अखिलेश से इस्तीफा देने के लिए कहना चाहिए। सैफई परिवार जनधन की लूट, अराजकता व अपराधवृद्धि से त्रस्त जनता को भ्रमित करने का प्रयास कर रहा है।
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जनता को फैसला करने दें : कांग्रेस
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर का कहना है कि समाजवादी घमासान की वजह भ्रष्टाचारी व सत्ता के भूखे लोगों की अतिमहत्वाकांक्षा है। 27 साल से प्रदेश की जनता बदहाली झेलती चली आ रही हैं। सरकारी धन की लूट, भ्रष्टाचार व जमीनों के कब्जे के माहिर दलों से छुटकारे का जनता ने मन बना लिया हैं। विदाई की वेला पर समाजवादी कुनबे में बिखराव भी दिख रहा है। मुख्यमंत्री अखिलेश को चाहिए कि त्यागपत्र दे कर जनता के बीच जाने का साहस दिखाए।
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डूबती नाव के सवारों में कलह : लोकदल
राष्ट्रीय लोकदल के प्रदेश अध्यक्ष डा. मसूद अहमद का कहना है कि जिस तरह डूबती नाव के सवारों में कलह होती है उसी तरह से आकंठ भष्ट्राचार डूबे समाजवादी कुनबे की आपसी रार जनता के सामने आ रही है।
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बड़बोले सिंघल के जाने से सुकून
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-बेढंगी कार्यशैली और बड़बोलापन सिंघल को ले डूबा
-बॉस को हटाये जाने पर नौकरशाही में तरह-तरह की चर्चाएं
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लखनऊ : सत्तर दिन के अपने अत्यंत संक्षिप्त कार्यकाल में कड़कमिजाजी के शोशे छोडऩे और मातहतों को गाहे-बगाहे 'आइ एम द बॉसÓ का अहसास कराने वाले दीपक सिंघल को मुख्य सचिव पद से हटाये जाने पर बुधवार को नौकरशाही में चर्चाएं सरगर्म रहीं। उनसे ब्यूरोक्रेसी के बॉस की कुर्सी छिनने पर ज्यादातर नौकरशाहों की आंखों में सुकून झलका तो कई ने इसे 'यह तो होना ही थाÓ के अंदाज में बयां किया। ज्यादातर नौकरशाहों का मानना है कि मुख्य सचिव के तौर पर उनकी अधिनायकवादी कार्यशैली और बड़बोलापन ही उन्हें ले डूबा।
बीती छह जुलाई को जब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सिंघल को नौकरशाही की कमान सौंपी थी तो सत्ता प्रतिष्ठान में हर आम-ओ-खास को यह बखूबी इल्म था कि सरकार के मुखिया ने कलेजे पर पत्थर रखकर यह फैसला किया है। सिंघल की 'शोहरतÓ और कार्यशैली को जहां मुख्यमंत्री पसंद नहीं करते थे, वहीं कुछ विशिष्ट लोगों के प्रति उनकी निष्ठा को लेकर वह सशंकित भी थे। दबाव में ही सही, उन्होंने सिंघल को मुख्य सचिव बनाया और उनकी आशंकाएं सच साबित होती गईं। उधर सिंघल ने भी पहले दिन से खुद को सुपर बॉस साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बुधवार को सचिवालय में वरिष्ठ आइएएस अफसरों के कमरों से लेकर गलियारों तक लोग यह चर्चा करते रहे कि मुख्य सचिव रहते कैसे सिंघल बैठकों में पहुंचने वाले विशेष सचिवों को डपटकर मीटिंग रूम से बाहर कर दिया करते थे। इस बात की भी चर्चा रही कि कई बार बैठकों के एजेंडे से इतर वह अधिकारियों से अपनी व्यक्तिगत रुचि की जानकारियां हासिल करते और उसे डायरी में नोट करते। बैठकों में दबाव डाल कर महत्वपूर्ण दस्तावेजों पर दस्तखत करवा लेने का उनका तरीका महत्वपूर्ण पदों पर बैठे कई वरिष्ठ नौकरशाहों को बेहद नागवार गुजरा और कुछ ने तो इसकी शिकायत 'ऊपरÓ भी की। यह कहते हुए कि यह कार्यशैली शासकीय पद्धति के खिलाफ है। यही वजह थी कि बॉस के रूप में सिंघल ज्यादातर नौकरशाहों के गले नहीं उतर रहे थे। नोएडा-ग्रेटर नोएडा के मामलों में उनकी दिलचस्पी और सक्रियता की खबरें भी सत्ता शीर्ष तक पहुंचती रहीं।
सिंघल का बड़बोलापन भी चर्चा का विषय रहा। मुख्यमंत्री की मौजूदगी में कई कार्यक्रमों में उनकी जुबान फिसली। मसलन एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री जाते-जाते तोहफा देना चाहते हैं। हालांकि उन्होंने बीच में ही बात संभाली लेकिन तब तक तीर कमान से निकल चुका था। एक अन्य कार्यक्रम के दौरान उन्होंने आपस में गुफ्तगू करते मुख्यमंत्री और मुख्य सलाहकार आलोक रंजन को टोक कर उनका ध्यान अपने संबोधन की ओर आकृष्ट किया। इतने पर ही नहीं रुके और आलोक रंजन से कहा कि 'सलाहकार महोदय, आप सलाह बाद में दे दीजिएगा।Ó इस पर बगल में बैठे मुख्यमंत्री का चेहरा तन गया था। चाहे अफसरों को जेल भेजवाने का उनका चर्चित बयान रहा हो या थानेदारों को सीधे फोन कर कानून व्यवस्था का फीडबैक लेने का शोशा, सत्ता प्रतिष्ठान में इन्हें सुर्खियां बटोरने का सस्ता तरीका ही समझा गया। बैठकों में उन्हें कई बार यह कहते हुए भी सुना गया कि गोमती रिवर फ्रंट डेवलपमेंट मुख्यमंत्री की योजना है लेकिन उससे पहले यह मेरी योजना है।
इन चर्चाओं के बीच नये मुख्य सचिव राहुल भटनागर बुधवार को अपनी नई जिम्मेदारी के तहत मीटिंगों और समाजवादी किसान एवं सर्वहित बीमा योजना की लांचिंग के कार्यक्रम में व्यस्त रहे। उन्होंने राजभवन जाकर राज्यपाल राम नाईक से भी शिष्टाचार भेंट की।
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बहुत दिनों से सुलग रही थी चिंगारी
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-भ्रष्टाचार विरोधी छवि को मजबूत करने में जुटे अखिलेश
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लखनऊ : अखिलेश यादव अब सियासी राह में रोड़ा बनते लोगों को न सिर्फ हटा रहे हैं बल्कि अपनी भ्रष्टाचार विरोधी छवि को मजबूत करने में जुट गए हैं। अतिरेक कहीं देखने को मिलता है तो शिवपाल यादव के मामले में। चाचा के विभागों में कटौती कर अखिलेश ने खुद ही बगावती सुरों को हवा दे दी है। चुनाव में इसके नतीजे खराब भी हो सकते हैं।
मुलायम सिंह ने डैमेज कंट्रोल का जो नुस्खा इस बार अपनाया है, वह उलटा पड़ सकता है। मुलायम ने मंत्रियों की बर्खास्तगी को हरी झंडी देकर तो अखिलेश की बेदाग छवि का सफल संदेश दे दिया मगर शिवपाल मामले में वह चूक गए। शिवपाल के विभागों में कटौती की भरपाई उन्हें पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर नहीं हो सकती। यही एक कदम पूरे घटनाक्रम को जल्दबाजी का फैसला करार दे रहा है। जब अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने की बात हुई थी, तब अंदर खाने कई वरिष्ठ सपाई नाखुश थे जिनकी आवाज में शिवपाल यादव ने हां में हां मिलाई थी। अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी सत्ता के समानांतर केंद्र विकसित होते रहे जिन्हें समाजवादी परिवार के अंदर भी लोग हवा देते रहे। चूंकि परिवार का एक हिस्सा अघोषित रूप से शिवपाल और दूसरा अखिलेश के साथ रहा, इससे दोनों के बीच की खाई बढती चली गई। ऊपर से बर्खास्त मंत्री गायत्री प्रजापति के परिवार के अंदर बढ़ते दखल से भी कुनबे की रार में इजाफा हुआ।
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घर में पक्ष-विपक्ष
ऐन चुनाव के मौके पर सपा परिवार के लिए विकट चुनौती है। हालात यह हैं कि पक्ष और विपक्ष घर ही में दिख रहे हैं। उलझाव ऐसा कि विरोधी पार्टियों को अब हमलावर होना ही नहीं पड़ रहा है। पार्टी कार्यकर्ताओं को जब क्षेत्र में जुटने की जरूरत है तो ऐसे नाजुक मौके पर वह अंदरखाने मचे तमाशे का क्लाइमेक्स देख रहे हैं। पिछले चार साल का घटनाक्रम देखें तो साफ हो जाता है कि सपा परिवार में उपजे विवादों के बीज चार साल पहले ही पड़ गए थे। एक तरफ प्रोफेसर रामगोपाल और अखिलेश रहे तो दूसरी ओर शिवपाल। दोनों ही पक्ष एक दूसरे को मात देने का मौका तलाशते रहे और वार भी करते रहे। कौमी एकता दल के विलय को नकार अखिलेश गुट ने बढ़त बनाई तो शिवपाल गुट ने प्रो. रामगोपाल समर्थित एमएलसी और जिला पंचायत अध्यक्ष के खिलाफ अवैध कब्जों की जांच का मामला छेड़ दिया। शह मात का यह खेल अब निर्णायक मोड़ पर है।
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मुख्यमंत्री आवास 'पांच कालिदासÓ पर बढ़ी सतर्कता
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-मीडियाकर्मियों के भी मोबाइल बाहर रखवाए गये
- पहले से आयोजित दो कार्यक्रम निरस्त
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लखनऊ : मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पांच कालिदास मार्ग स्थित सरकारी आवास का माहौल बदला-बदला सा दिखा। मुख्यमंत्री ने पूर्व निर्धारित दो कार्यक्रमों को निरस्त कर दिया और इस बीच वहां आने-जाने वालों पर कड़ी निगाहें लगी रहीं। यहां तक कि मीडिया के लिए भी प्रतिबंध रहा।
मुख्यमंत्री ने बुधवार को अपने आवास पर पीडब्लूडी की सड़कों के सिलसिले में एक सरकारी कार्यक्रम आयोजित किया था। मंगलवार को शिवपाल सिंह यादव से पीडब्लूडी विभाग छीने जाने के बाद यह कार्यक्रम तय हुआ लेकिन बुधवार को इसे निरस्त कर दिया गया। हिन्दी संस्थान का भी एक कार्यक्रम निरस्त किया गया। दोनों कार्यक्रम रद हुए तो एक बार यह चर्चा उठी कि मुख्यमंत्री मीडिया को फेस नहीं करना चाहते पर कुछ ही समय बाद उन्होंने हाल ही में डेंगू की चपेट में आने से मृत अनुदेशक को दस लाख मुआवजा देने के लिए बुलाया तो मीडिया को भी आमंत्रित किया गया। वहां जाने पर सिर्फ कुछ छायाकारों को ही प्रवेश मिला। बाकी पत्रकारों को रोक दिया गया। इसके बाद सिने स्टार नवाजुद्दीन सिद्दीकी को समाजवादी किसान एवं सर्वहित बीमा योजना का ब्रांड अंबेसडर बनाया गया तो भी बहुत कम लोगों को प्रवेश मिला। जो फाइव केडी के अंदर जा सके उनके भी मोबाइल बाहर ही रखवा लिए गए।
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'यह परिवार का नहीं, सरकार का झगड़ाÓ
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बोले अखिलेश
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-घर के बाहर के लोग हस्तक्षेप करेंगे, तो पार्टी कैसे चलेगी
-नेताजी के कहने पर लिये निर्णय लेकिन कुछ फैसले मेरे
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लखनऊ : दो दिन से प्रदेश सरकार और समाजवादी परिवार में चल रहे घमासान के बाद बुधवार को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने चुप्पी तोड़ी। उन्होंने साफ कहा कि यह परिवार का नहीं सरकार का झगड़ा है।
पिछले सप्ताह राजधानी में धरना दे रही कंप्यूटर अनुदेशक किरण सिंह की मौत के बाद उसके परिवारीजन को आर्थिक सहायता देने के लिए बुधवार को अपने सरकारी आवास पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने कहा कि यह परिवार का झगड़ा बिल्कुल नहीं है। दरअसल, ये सरकार का झगड़ा है। उन्होंने खुद ही कहा कि मुख्य सचिव को हमने हटाया। सरकार में हमने बदलाव किये। उन्होंने संकेत दिये कि मुख्य सचिव को हटाने के बाद ही पूरा विवाद शुरू हुआ था। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कहा कि घर के बाहर के लोग हस्तक्षेप करेंगे तो पार्टी कैसे चलेगी। बाहरी लोगों का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जा सकता। जहां तक नेताजी (मुलायम सिंह यादव) की बात है तो उनकी बात कौन नहीं मानेगा? परिवार में नेता जी का सब कहना मानते हैं किंतु कभी-कभी कुछ निर्णय अपने आप भी लिये जाते हैं। मैंने नेताजी के कहने पर भी निर्णय लिये हैं और कुछ निर्णय स्वयं भी लिये हैं।
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'क्यूं भई चाचा! हां भतीजा!Ó
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-सोशल मीडिया पर छाई, चाचा-भतीजा की लड़ाई
-हैशटैग 'चाचावर्सेजभतीजाÓ व 'यादवपरिवारÓ हुए ट्रेंड
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लखनऊ : सूबे का सत्ता संग्राम सोशल मीडिया पर चाचा-भतीजे की लड़ाई के रूप में छाया रहा। हैशटैग 'चाचावर्सेजभतीजाÓ और 'यादवपरिवारÓ संग कटाक्ष किये गए।
चाचा-भतीजा की लड़ाई को 1977 में आई मनमोहन देसाई की फिल्म 'चाचा-भतीजाÓ से भी जोड़ा गया। धर्मेन्द्र और रणधीर कपूर अभिनीत इस फिल्म का एक गीत 'बुरे काम का बुरा नतीजा, क्यूं भई चाचा हां भतीजाÓ खूब चर्चित हुआ था। समाजवादी परिवार में चल रहे घमासान को सोशल मीडिया में सक्रिय लोगों ने चाचा-भतीजा के बीच विवाद का नाम देकर इस फिल्म का उदाहरण भी दिया। रणधीर कपूर व धर्मेन्द्र की फोटो के साथ शिवपाल व अखिलेश की फोटो लगाकर लिखा गया, 'और एक ये चाचा भतीजा हैंÓ। ट्विटर पर कोई इसे 'ब्रांड अखिलेशÓ से जोड़ रहा था, तो किसी ने 'हिस्ट्री इन द मेकिंगÓ बताकर लिखा कि मुलायम अब अपने बेटे को निर्विवाद नेता बना देना चाहते हैं। एक ट्वीट में इस पूरे घटनाक्रम को 'बुरे काम का बुरा नतीजाÓ करार दिया गया, वहीं अखिलेश समर्थक उन्हें 'क्लीन इमेजÓ वाला बताते भी दिखे। फेसबुक व ट्विटर पर तमाम लोग इस लड़ाई को कांग्र्रेस व भाजपा के लिए फायदेमंद बताते हुए दिखे। किसी ने कहा कि चाचा-भतीजा मंत्रालय व विभागों के लिए लड़ रहे हैं, साम्प्रदायिक भाजपा से लडऩे की फुर्सत किसी को नहीं है, ऐसे में कांग्र्रेस का ही फायदा होगी। एक अन्य अपडेट में 'यूपी मांगे भाजपा सरकारÓ के साथ लिखा गया कि चाचा-भतीजा आपस में लड़कर यूपी को पीछे ढकेल रहे हैं। ट्विटर पर कुछ देर के लिए हैशटैग 'अमर सिंहÓ भी ट्रेंड किया। लोगों ने अमर सिंह को 'ब्रोकरÓ व 'फैमिली ब्रेकरÓ तक बता दिया। एक अन्य हैशटैग 'यादवपरिवारÓ भी खूब ट्रेंड किया। किसी ने 'ओमशांतिओमÓ लिखकर शांति की अपील की, तो किसी ने लिखा, 'पूरा कुनबा चिडिय़ा उड़ खेल रहा हैÓ।
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नेता जी जो कहेंगे वही करूंगा : शिवपाल
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- चाचा-भतीजे के रिश्तों में खटास को नकारा
- कहा, संगठन की जिम्मेदारी संभालेंगे
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इटावा : समाजवादी परिवार में चल रही सियासी उठापटक के बीच बुधवार को सैफई में सपा के प्रदेश अध्यक्ष व कैबिनेट मंत्री शिवपाल ङ्क्षसह यादव ने कहा कि वह नेता जी (मुलायम सिंह) का आदेश मानेंगे, जो वह कहेंगे वही करूंगा। स्वयं मंत्री पद से और उनके पुत्र अंकुर यादव पीसीएफ चेयरमैन पद से इस्तीफा देने का फैसला भी वह नेता जी से बातचीत के बाद करेंगे। कहा कि वह संगठन की जिम्मेदारी संभालेंगे और आने वाले चुनाव के लिए तैयारी में जुटेंगे।
बुधवार को पत्रकारों से बातचीत में शिवपाल ने चाचा-भतीजे के रिश्तों में चल रही खटास को नकारते हुए कहा, यहां सब ठीक है। परिवार में नेता जी की बात कोई नहीं टाल सकता है। उन्होंने इशारों में मुख्यमंत्री को इंगित करते हुए कहा कि आपस में बहकाने व फूट डालने वाले लोग बहुत हैं, जिनसे हमें सावधान रहने की जरूरत है। जिम्मेदारी वाले पदों पर रहते हुए यह समझदारी बरतनी चाहिए। उन्हें तो कोई नहीं बरगला सकता परंतु दूसरों को भी यह बात समझनी चाहिए। यह पूछे जाने पर कि वह अखिलेश यादव की सरकार के साथ हैं या पार्टी के साथ, उन्होंने कहा, हम समाजवादी पार्टी और नेता जी के साथ हैं। कई विभाग हटाये जाने पर कहा कि यह मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है। कहा, अब तक जो लोग उपेक्षित पड़े थे उन्हें काम दिया जायेगा। चार साल में जो विकास कार्य हुए उनको लेकर जनता के बीच जाएंगे।
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परिवारीजन से किया विचार विमर्श
बदले हालात पर शिवपाल ने सैफई में परिवारीजन से विचार विमर्श किया। बुधवार तड़के करीब तीन बजे उनकी पत्नी सरला व पुत्र अंकुर यादव लखनऊ से सैफई पहुंच गये थे। शिवपाल के बहनोई अजंट ङ्क्षसह यादव सुबह उनसे मिलने पहुंचे। उनके छोटे भाई राजपाल ङ्क्षसह यादव व उनकी पत्नी प्रेमलता यादव भी पहुंचीं। मंगलवार रात जो नाराजगी का भाव उनके चेहरे पर दिखा था वह बुधवार सुबह बदला बदला नजर आया। नेता जी की बात के बाद वह काफी हद तक सामान्य दिखे।
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शिवपाल के समर्थन में नारेबाजी
सैफई का नजारा बुधवार सुबह बदला हुआ था। शिवपाल के समर्थन में सुबह पांच बजे से ही लोग जुटने लगे थे। भीड़ ने नारे लगाये शिवपाल तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं। अपरोक्ष रूप से कहीं न कहीं अपने घर में ही अपने समर्थकों की शक्ति का अहसास भी कराया गया। जसवंतनगर विधानसभा क्षेत्र से आये सैकड़ों लोग सिर्फ शिवपाल से मिलना चाहते थे। शिवपाल जैसे ही पहुंचे लोग नारे लगाने लगे। भीड़ में शिवपाल को निकलने का रास्ता नहीं मिला तो वह माइक लेकर कार की बोनट पर चढ़ गये। बोले, जोश में होश बरकरार रखना है। नेता जी का आदेश सिर माथे है। उसी को माना जायेगा। इस बीच शिवपाल की मुलायम से फोन पर कई बार बातचीत हुई। उन्हें दिल्ली बुलाया गया। दोपहर में चार्टर्ड प्लेन से वह व अंकुर यादव दिल्ली चले गए। हालांकि सुबह लखनऊ या दिल्ली जाने को लेकर ऊहापोह की स्थिति रही।
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सियासी कलह से सकते में समर्थक, धड़कनें तेज
-शिवपाल और अखिलेश के अगले कदम पर टिकी निगाहें
मैनपुरी : प्रदेश में सत्ता और समाजवादी पार्टी में सियासी कलह ने पार्टी नेताओं की नींद उड़ा दी है। अपने ही गढ़ में धड़ों में बंटे सपाई ताजा राजनीतिक घटनाक्रम को लेकर सकते में हैं। मंगलवार शाम से ही उनकी धड़कनें तेज हो गई हैं। शिवपाल यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के अगले कदम पर सभी की निगाहें टिकी हैं। दोनों के समर्थक लखनऊ और दिल्ली में डेरा डाले हैं। सबसे ज्यादा ङ्क्षचता उन्हें है, जो विधानसभा टिकट की दौड़ में हैं।
मैनपुरी सपा का गढ़ है। छोटे से लेकर सभी बड़े राजनीतिक पदों पर सपा का कब्जा है। ये राजनीतिक विडंबना है कि जिस क्षेत्र को सपा मुखिया मुलायम ङ्क्षसह यादव की कर्मभूमि माना जाता है, वहां वर्षों से उनकी ही पार्टी धड़ों में बंटी है। पार्टी के दो बड़े नेताओं के बीच की खटपट भले ही सार्वजनिक नहीं हुई, लेकिन उनके समर्थक यहां दो-दो हाथ करने से पीछे नहीं रहे। मंगलवार को सत्ता और पार्टी में आए सियासी भूचाल ने यहां भी समर्थकों को हिलाकर रख दिया। कैबिनेट मंत्री शिवपाल ङ्क्षसह यादव को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाने का एलान हुआ, तो शिवपाल यादव समर्थकों में खुशी की लहर दौड़ी, लेकिन कुछ ही देर बाद उनसे महत्वपूर्ण विभाग छीने जाने की खबर आई, तो मायूस हो गए। मंगलवार देर रात शिवपाल सैफई में अपने आवास पर पहुंचे, तो बड़ी संख्या में उनके समर्थक वहां पहुंच गए। दरअसल, मैनपुरी में जमीनी नेता के रूप में शिवपाल यादव की पहचान है। जिले में सपा मुखिया के बाद उनकी कार्यकर्ताओं में अधिक पकड़ है। विधानसभा चुनाव आने वाले हैं। ऐसे में टिकट की चाह रखने वाले ङ्क्षचतित हैं। राजनीतिक हालात पर हर पल नजर रख रहे हैं।
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नहीं लगा जनता दरबार, निराश लौटे फरियादी
- फरियादियों से कहा गया अब दरबार दो हफ्ते बाद लगेगा
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लखनऊ : गोद में छोटी बच्ची और लाठी के सहारे एक पैर पर चलती पत्नी के साथ अरविंद कुमार दुबे मंगलवार रात ही लखनऊ पहुंच गए थे। बड़ी उम्मीद लेकर आए अरविंद ने स्टेशन पर रात काटी और सुबह सात बजे कालीदास मार्ग स्थित मुख्यमंत्री आवास पहुंच गए। बारिश में तीन घंटे इंतजार किया, लेकिन 10 बजे जब पता चला कि मुख्यमंत्री का जनता दरबार नहीं लगेगा तो निराश लौटने के सिवा कोई चारा नहीं था।
सरकार और समाजवादी परिवार में खींचतान बुधवार को प्रदेश भर से यहां आए फरियादियों की पीड़ा पर भारी पड़ी। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बुधवार के अपने दो सरकारी कार्यक्रम निरस्त किए तो उनका जनता दरबार भी इसकी भेंट चढ़ गया। दूरदराज से गुहार लेकर आए फरियादी यह बताए जाने के बाद भी काफी देर तक बैठे रहे कि मुख्यमंत्री का जनता दरबार अब दो हफ्ते बाद लगेगा, फिर धीरे-धीरे वापस लौट गए। कन्नौज के अरविंद भी इनमें से एक थे। वह अपेक्षा लेकर आए थे कि मजदूरी करके जिस विकलांग पत्नी को बीएससी, एमए और बीएड कराया, उसे शिक्षक की नौकरी और रहने को आवास की प्रार्थना प्रदेश के सबसे बड़े दरबार में जरूर सुनी जाएगी।
इसी तरह सीतापुर की चंद्रकाली बुधवार के दरबार के इंतजार में कई दिनों से सपा के प्रदेश कार्यालय के बाहर टिकी थी, लेकिन आखिरकार उसे निराश लौटना पड़ा। विकलांग पुत्र के लिए वह मुख्यमंत्री से आर्थिक मदद की आस में लखनऊ पहुंची थी। मऊ की दोहरीघाट निवासी और लखनऊ में रह कर पढऩे वाली ओजस्वी राय भी गांव में पड़ोसियों के उत्पीडऩ और कब्जा करने के प्रयास की शिकायत लेकर मुख्यमंत्री आवास पहुंची थी। बाराबंकी निवासी विकलांग सुनीता देवी भी निराश लौटने वाले लोगों में शामिल थीं। सुनीता अपने लिए आर्थिक मदद और ससुराल पक्ष द्वारा सताई जा रही जेठ की बेटी के लिए इंसाफ मांगने आई थीं।
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