Tuesday, 20 December 2022

नागरिकों को ‘ गिनी पिग ’ बनाने में प्रो.विनय पाठक ने नहीं छोड़ी कसर

 -प्रोफेसर, विभाग, न एक्सपर्ट पैनल फिर एमफार्मा, बी-फार्मा, पीएचडी करा रहे

-140 निजी कालेजों को बी-फार्मा, 50 को एम-फार्मा की मान्यता प्रदान की

-विदेशों में विशेषज्ञ डॉक्टरों से ज्यादा अहमियत रखते हैं फार्माकॉलाजिस्ट

-दवा बनाना, मानव शरीर पर दवा का असर जानना, बीमारी के कारण ढूंढना भी कार्य

परवेज़ अहमद

लखनऊ। घूसखोरी के आरोपी व छत्रपति शाहू जी महाराज कानपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.विनय पाठक ने करोड़ों नागरिकों को गिनी पिग ’ ( नई दवाओं के शोध में इस्तेमाल पशु-पक्षी) बनाने में कसर नहीं छोड़ी है। अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय (एकेटीयू) में फार्माकॉलॉजी विभाग व संवर्ग का प्रोफेसर न होने के बाद भी 140 निजी कालेजों को बी-फार्मा ( बेचलर ऑफ फार्मेसी) की मान्यता प्रदान कर दी। आश्चर्यजनक रूप  पीएचडी कोर्स शुरू कराया। दर्जनों छात्र-छात्राओं को फार्माकॉलॉजी में पीएचडी डिग्री अवार्ड भी हो रही है। सवाल ये कि आखिर मानव जीवन व स्वास्थ्य से जुड़ी शिक्षा से खिलवाड़ क्यों और जिम्मेदार कौन?

राजस्थान, उत्तराखंड के ओपन विश्वविद्यालयों के कुलपति रहने के बाद 2015 में उत्तर प्रदेश के अब्दुल कलाम प्राविधिक विवि का कुलपति बनने के बाद प्रो.विनय कुमार पाठक ने बेचलर ऑफ फार्मेसी ( बी-फार्मा), मास्टर ऑफ फार्मेसी (एम-फार्मा) कोर्स की निजी कालेजों को मान्यता देना शुरू दिया। एकेटीयू मुख्य रूप से इंजीनियरिंग विवि हैं। यहां न तो फार्माकॉलॉजी विभाग है न  फार्माकॉलॉजी के प्रोफेसर हैं। सवाल ये जब विवि के पास प्रोफेसर, विभाग, विशेषज्ञ ही नहीं हैं तो निजी कालेजों को मान्यता कैसे दी जा रही है ? फार्मेसी काउंसिंल के नियमों का पालन कैसे हो रहा ? फार्मेसी काउंसिल क्या कर रहा ?  सवाल ये भी है कि जिन छात्र, छात्राओ को एकेटीयू पीएचडी डिग्री अवार्ड कर रहा-उन छात्र, छात्राओं के गाइड कौन हैं ? बिना प्रोफेसरों का एकेटीयू पीएचडी छात्र, छात्राओं की डीआरसी (  डिपार्टमेन्टल रिसर्च कमेटी) कैसे करा रहा ? कौन से और कहां के प्रोफेसर इसमें शामिल होते हैं। रिसर्च वर्क की क्रास चेकिंग कौन कर रहा और लिट्रेचर रिव्यू की गुणवत्ता कौन परख रहा है ?  

कितने कालेजों को है मान्यता

अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय ने उत्तर प्रदेश के 140 कालेजों को बी-फार्मा की मान्यता प्रदान कर रखी है, जिसने जरिये प्रतिवर्ष 15 हजार छात्र, छात्राएं बी-फार्मा की डिग्री लेकर निकल रहे हैं। और कुछ इसी विवि से मान्यता लेने वाले 50 से अधिक कालेजों में मॉस्टर ऑफ फार्मेसी (एम.फार्मा) की डिग्री ले रहे हैं। एमफार्मा के छात्रों का डिजर्टेशन कौन करा रहा है और मेडिसिन बनाने कैंसर के कारक खोजने जैसे कार्य कौन करा रहा है।

प्रो.विनय पाठक पर आरोप

प्रो.विनय पाठक पर आरोप है कि उन्होंने आईईटी के वित्त अधिकारी बीरेन्द्र चौबे से मारपीट  और सरकारी दस्तावेज फाड़ने के आरोप में चार्जशीटेंड गार्ड से डिप्टी रजिस्ट्रार बने आरके सिंह के माध्यम से निजी कालेजों को मान्यता प्रदान करायी गयी। प्रो. विनय पाठक ने निजी कालेजों को कोर्स की मान्यता, कालेजों की सबंद्धता का सारा कार्य डिप्टी रजिस्ट्रार आरके सिंह को दे रखा था। उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति की शिकायत भी शासन में हुई है। सवाल ये है कि आखिर मान्यता और सबद्धता से पहले शुद्ध चिकित्सा विज्ञान के इस कोर्स के लिए आवश्यक उपरकणों, लैब, पशुशाला आदि का निरीक्षण किसने किया ?

 

एम.फार्मा, बी.फार्मा में पढ़ाई

एम-फार्मा, बी-फार्मा की डिग्रीधारी का मुख्य कार्य मानव हित में नई दवा पर शोध, उपलब्ध दवा की गुणवत्ता, मानव शरीर पर प्रभाव और विभिन्न बीमारियों के कारक खोजना मुख्य कार्य है। यही कारण हैं यूरोप और पश्चिमी देशों में चिकित्सकों (डॉक्टरों) से अधिक अहमियत फार्माकॉलॉजी के विशेषज्ञों की होती है। शोध के क्षेत्र में कार्य कर रहे भारतीय चिकित्सक भी फार्माकॉलॉजी के विशेषज्ञों के साथ मिलकर ही बीमारियों पर शोध कार्य करते हैं। पर, प्रो.विनय पाठक की एक अदूरदर्शी नीति के चलते हर साल 15 हजार छात्र, छात्राएं गुणवत्ता विहीन डिग्री लेकर फार्माकॉलॉजी के क्षेत्र में जा रहे हैं।

 

रिसर्च की प्रक्रिया क्या है ?

प्रवेश परीक्षा, साक्षात्कार के बाद कोई छात्र, छात्रा पीएचडी में इनरोल होती है। जिसके बाद वह गाइड के साथ मिलकर टापिक तय करता है और उस पर काम करता है। निय़म के मुताबिक किसी भी प्राइवेट कालेज का प्रोफेसर बिना सरकारी को-गाइड के शोध नहीं करा सकता है। इत्तिफाक से फार्माकॉलॉजी में पीएचडी के लिए एकेटीयू के पास एक भी प्रोफेसर नहीं हैं, तो फिर निजी कालेज शोध करा कैसे रहे हैं  ? और मेडिकल कालेजों, चिकित्सा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपने छात्रों को छोड़कर निजी कालेजों के फार्मा के छात्रों के को-गाइड बन कैसे रहे हैं  ? यही नहीं शोध कार्यों की प्रगति परखने के लिए न्यूनतम प्रत्येक तीन माह में डीआरसी ( डिपार्टमेन्ट ऑफ रिसर्च कमेटी) होनी जरूरी होती है। जिस विश्वविद्यालय ने कोर्स की मान्यता दी होती है, उसके प्रोफेसरों को इसमें शामिल होना अनिवार्य होता है। जब एकेटीयू के पास कोई प्रोफेसर ही नहीं है तो फिर डीआरसी किसके जरिये कराई जा रही है।

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