कुलपति ‘ निर्माता मशीन ’ जैसे गंभीर आरोपों से घिरे, अंबेडकर विवि आगरा के परीक्षा कार्यों के ठेका आवंटन में डेढ़ करोड़ की घूस में नामजदगी के एक माह बाद प्रो.विनय पाठक पर कार्रवाई नहीं हुई। जिस पर प्रभावित पक्षों में से कुछ ने अदालत की ड्योढ़ी खटखटानी शुरू की है। लंबित याचिकाएं नये सिरे से सुनने की गुहार है। भाषा विवि के शिक्षक डॉ.आरिफ अब्बास ने कार्य परिषद की दस मीटिंगों को अवैध ठहराते उन्हें रद करने की अदालत से मांग की है। लविवि के वाणिज्य विभाग से सेवानिवृत प्रो.नरसिंह ने प्रो.विनय पाठक की कुलपति पद पर नियुक्ति, अर्हता पर सवाल उठाते हुये उन्हें बर्खास्त करने की हाईकोर्ट से गुहार लगाई। दो समाजसेवियों ने एकेटीयू के मामले में लोकायुक्त संगठन में परिवाद दाखिल किये हैं। प्रो.पाठक की कार्यशैली को लेकर 2017 से हाईकोर्ट में दाखिल याचिका जल्द सुनने कानूनी प्रयास तेज हो गये हैं।
प्रो.विनय पाठक की अर्हता कुलपति के योग्य नही, बर्खास्त किया जाएः हाईकोर्ट
में याचिका
परवेज़ अहमद
लखनऊ। छत्रपति शाहू जी महाराज कानपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.विनय पाठक
ने एकेटीयू का कुलपति रहते हुये आईईटी के कुलसचिव का धारणाधिकार ( प्रतिनियुक्ति पर
रहने पर मूल पद रिक्त न होना ) समाप्त करने की कार्रवाई कर दी, परन्तु हरकोर्ट बटलर
तकनीकी विश्वविद्यालय (एचबीटीयू) के कम्प्यूटर साइंस विभाग के प्रोफेसर का अपना पद
सुरक्षित रखने के दांव-पेंच चल रहे हैं। लविवि
के अर्थशास्त्र विभाग से रिटायर व शिक्षाविद प्रो.नरसिंह की ओर से हाईकोर्ट की लखनऊ
खंडपीठ में दाखिल याचिका में प्रो.विनय पाठक
कुलपति पद पर अयोग्य बताते हुए उन्हें बर्खास्त करने, अर्जित वेतन वूसली की मांग की
गयी है। अदालत ने सरकार, कुलाधिपति, यूजीसी समेत आधा दर्जन फरीकों को जबाव का अंतिम
मौका दिया है। दिसम्बर के दूसरे हफ्ते में अगली सुनवाई संभव है।
उच्च शिक्षा कानूनों में कोई शिक्षक, प्रशासनिक अधिकारी दो वर्ष तक अवकाश पर
रह सकता है। प्रतिनियुक्ति मिलने पर मूल पद पर उसका धारणाधिकार तीन साल तक रहता है।
कुछ विश्वविद्यालयों की परिनियमावली में धारणाधिकार पांच साल तक बढ़ाने का नियम है।
परन्तु, प्रो.विनय पाठक एचबीटीआई के कम्प्यूटर साइंस विभाग से 13 सालों से अवकाश पर
हैं। फिर भी उनका धारणाधिकार बना है। सूत्रों कहना है कि एचबीटीयू के तत्कालीन निदेशक
प्रो.जयशंकर राय ने उत्तराखंड के ओपन विवि में कुलपति नियुक्त होने पर प्रो.विनय पाठक
को तीन साल की प्रतिनियुक्ति मंजूरी दी थी। जिसे उन्होंने पुनः बढ़ाया। पांच साल बाद
जब प्रो.विनय पाठक ने एचबीटीयू में धारणाधिकार बरकरार रखने का दबाव बनाया। तब तत्कालीन
निदेशक ने उत्तर प्रदेश के प्राविधिक शिक्षा विभाग को जानकारी देकर मार्ग दर्शन मांगा।
सरकार ने कहा एचबीटीयू की बीओजी ( बोर्ड आफ डायरेक्टर्स) प्रो.विनय पाठक के आवेदन पर
सहानुभूति पूर्वक विचार कर लें। सहानुभूति पर जोर दिया गया था, उसके बाद से लगातार
अवकाश स्वीकृत किया जा रहा है, धारणाधिकार भी बना हुआ है। इसे मुख्य सवाल वाली प्रो.नरसिंह
की याचिका के अधिवक्ता डॉ.वीके सिंह का कहना है कि एक व्यक्ति को लाभ के लिए नियमों
को खिलौना बनाया जा रहा ? प्रो.विनय पाठक की शैक्षिक
योग्यता भी कुलपति बनने योग्य नहीं थी। बायोडेटा में प्रो.पाठक ने एचबीटीयू के जिन
पदों का उल्लेख किया है, वह पद परिनियमावली में नहीं हैं। कुलपति बनने के लिए दस साल
का प्रोफेसर होना अनिवार्य है, ये अवधि भी विनय पाठक ने पूरी नहीं की है। ऐसे व्यक्ति
को बार-बार कुलपति कैसे बनाया जा रहा है ? उनका कहना है कि याचिका में
प्रो.विनय पाठक के शोध, कार्यशैली, भ्रष्टाचार का उल्लेख करते पद से बर्खास्त करने,
कुलपति के कार्यकाल के वेतन की वसूली करने और एचबीटीयू के कम्प्यूटर साइंस विभाग के
प्रोफेसर पद से उनका धारणाधिकार खत्म करने की अदालत से मांग की गयी है। प्रो.नरसिंह
के अधिवक्ता डॉ.वीके सिंह का कहना है कि प्रो.विनय पाठक को बार-बार कुलपति बनाया जाना
उच्च शिक्षा के साथ खिलवाड़ है, जिसकी सचाई अदालत के सामने रखी जा रही है। उन्होंने
बताया कि इस याचिका में प्रदेश सरकार, प्राविधिक शिक्षा विभाग, कुलाधिपति, एचबीटीयू
के कुलपति, छत्रपति शाहूजी महाराज कानपुर विवि के कुलपति प्रो.विनय पाठक को पार्टी
बनाया गया है। अदालत ने इन प्रतिवादियों शपथ पत्र देने का अंतिम मौका दिया है। इस केस
में दिसम्बर के दूसरे हफ्ते में सुनवाई संभव है। कुलपति प्रो.विनय पाठक 13 सालों से
एचबीटीयू के कम्प्यूटर साइंस विभाग से अवकाश पर हैं। अपना धारणाधिकार बनाये रखना चाहते
हैं, परन्तु एकेटीयू के कुलपति के रूप में घटक संस्थान आईईटी के कुलसचिव एसएन शुक्ला
का धारणाधिकार तीन साल में खत्म कराने का प्रस्ताव कार्य परिषद से पास करा दिया। अधिवक्ता
डॉ.वीके सिंह का कहना है कि न्यायालय के सामने इन विधि विरुद्ध हो रहे इन सभी बातों
को रखा जाएगा।
भाषा विवि की ईसी की अवैध, फैसलों पर रोक लगाई जाएः जज से गुहार
विशेष प्रतिनिधि
लखनऊ। ख्वाजा मोईनउद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय कुलपति रहने के दौरान प्रो.विनय
पाठक के फैसलों को नियम विरुद्ध ठहराते हुये सिविल डिवीजन जज की अदालत में सिविल वाद
दायर किया गया है। जिसमें विवि कार्य परिषद की दस मीटिंगों को विधि विरुद्ध बताया गया
है। विवि की परिनियमावली में निर्धारित पद धारकों को सदस्य बनाये बगैर मनमाने तरीके
से सदस्य नामित किये गये। छात्रों की फीस व सरकारी अनुदान का दुरुपयोग किया जा रहा
है।
राज्य विश्वविद्यालयों की कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल ने प्रो.विनय पाठक को ख्वाजा
मोईन उद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया था, उस समय लोक निर्माण
विभाग के पास लंबित विवि का 25 करोड़ रुपये आवंटित किया गया था। विनय पाठक ने इस राशि
को खर्च करने के लिए जो कार्य परिषद गठित करायी, उसमें पूर्व कुलपति व विश्वविद्यालय
के सबसे वरिष्ठ को सदस्य नहीं बनाया। विवि के शिक्षक डॉ.आरिफ अब्बास की ओर से अदालत
में सिविल वाद दाखिल करने वाले अधिवक्ता सैयद अजीजुल हसन रिजवी ने कुलपति के रूप में
प्रो.विनय पाठक द्वारा कराई गयी छह और मौजूदा कुलपति एऩबी सिंह द्वारा कराई गई कार्य
परिषद विवि की परिनियमावली के आधार पर अवैध है।
सिविल वाद दायर करने के लिये याची के अधिवक्ता की ओर से चार लाख रुपये शुल्क
भी जमा किया गया है। याची का कहना है कि कार्य परिषद की इन दस मीटिंगों में करोड़ों
रुपये के निर्माण कार्य, खरीद-फरोख्त की गयी है। प्रोन्नितयों और नई भर्ती के फैसले
भी हैं। इस वाद पर अदालत ने प्रो.विनय पाठक, नये कुलपति प्रो.एनबी सिंह, कुलसचिव समेत
आधा दर्जन लोगों को जवाब दाखिल करने के लिए नोटिस भेज रखा है। अधिवक्ता रिजवी का कहना
है कि भाषा विश्वविद्यालय में राज्य सरकार, विवि की परिऩियमावली और कुलाधिपति के आदेशों
की अवहेलना की जा रही है।
आरोप लगाया गया है कि पूर्णकालिक कुलपति की नियुक्ति की सर्च कमेटी के लिए सिद्दार्थ
विश्वविद्यालय कपिलवस्तु के पूर्व कुलपति प्रो.सुरेन्द्र दुबे को नामित किया गया है,
उनका प्रो.विनय पाठक की पहले से ही नजदीकी है। इसी तरह स्ववित्त योजना के तहत संचालित
पाठ्यक्रमों के लिए वित्त समिति कार्य परिषद द्वारा सृजित शिक्षणेत्तर श्रेणी के पदों
को संविदा के आधार पर नियुक्ति की गयी, जिसमें पूर्व से कार्य कर रहे कर्मचारियों को
सेवा मुक्त कर दिया गया, जबकि उत्तर प्रदेश शासन के नियमों के मुताबिक सेवा प्रदाता
कंपनी के जरिये कार्य रहे लोगों को बिना किसी ठोस कारण के सेवा से बाहर नहीं किया जा
सकता है। प्रो.विनय पाठक की अध्यक्षता वाली कार्य परिषद ने परिसर में दीन दयाल शोध
पीठ स्थापित करने का निर्णय कराया और उस पर लाखों रुपये खर्च कर दिय गये। अदालत से
इस गंभीर विषय पर कार्रवाई करते हुए कार्य परिषद के सभी दस निर्णयों पर रोक लगाने की
मांग की गयी है।
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