यूपी राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम-1973 में चार सदस्यों का चुनाव होना चाहिए
परवेज़ अहमद
लखनऊ। छत्रपति शाहू जी महाराज कानपुर विवि के कुलपति
प्रो.विनय पाठक और लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.आलोक राय ने विरोध के संभावित
स्वर कुचलने के लिए कार्य परिषद में आवश्यक चार निर्वाचित सदस्यों का चुनाव ही नहीं
कराया। निर्वाचित सदस्यों की गैरमौजूदगी में ढेरों ऐसे निर्णय हुये जिससे विश्वविद्यालयों
को वित्तीय नुकसान हुआ और प्रशासनिक असंतुलन बढ़ गया। नियुक्ति और प्रोन्नतियों में
भेदभाव किये गये, जिसकी शिकायत कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल और मुख्यमंत्री योगी आदित्य़नाथ
से की गयी।
यूपी राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम-1973 के मुताबिक सरकारी विश्वविद्यालय में
नई नीतियां, प्रोफेसर, छात्र हितों के नाम पर कुलपति, रजिस्ट्रार, डीन, प्रॉक्टर के
प्रशासनिक, वित्तीय फैसले तभी पूर्ण होते हैं जब कार्य परिषद की मंजूरी मिल जाती है।
किसी सदस्य की आपत्ति पर बहुमत से अंतिम निर्णय होता है। आपत्ति के बिन्दु मिनट बुक्स
में दर्ज कर दिये जाते हैं। नियमों के मुताबिक राज्य विश्वविद्यालयों में कुलपति अध्यक्ष,
प्रतिकुलपति सदस्य, कुलसचिव पदेन सचिव होते हैं। वरिष्ठ प्रोफेसर, एससी और ओबीसी के
दो-दो नुमाइंदे भी सदस्य होते हैं। चार सदस्य कुलाधिपति नामित करता है, जिनमें से एक
हाईकोर्ट का प्रतिनिधि होता है। चार सदस्य कोर्ट सभा से निर्वाचित होते हैं। वर्ष
2014 के बाद का इतिहास है कि कुलपतियों की अनियमितता, सरकारी धन के दुरुपयोग, नियम
विरुद्ध प्रोन्नतियों पर आपत्तियां निर्वाचित सदस्यों ने ही दाखिल की हैं। क्योंकि
इन चार सदस्यों के अतिरिक्त सभी सदस्य शिक्षक होते हैं जो सीधे कुलपति के प्रशासनिक
प्रेक्षण में कार्य करते हैं, लिहाजा आपत्ति से गुरेज करते हैं। सवाल उठाने पर ईसी
से बाहर कर दिया जाने या उनके विरुद्ध किन्ही मामलों में जांच समितियां बना देने का
इतिहास भी रहा है।
लिहाजा लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.आलोक राय, छत्रपति शाहू जी महाराज
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विनय पाठक व उनके करीबी कुलपतियों ने विरोध का स्वर
घोंटने के लिए कार्य परिषद के सदस्यों का निर्वाचन नहीं कराया। निर्वाचित सदस्यों की
कार्य परिषद में नुमाइंदही न होने के चलते कुलपतियों ने यदि गलत फैसले किये तो भी त आवाज नहीं उठी। यही नहीं,
दोनों कुलपतियों ने मनमानी तरीके से इमरजेंट
मीटिंग बुलाई। फैसलों पर सहमति की मुहर लगवा ली। लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.
आलोक राय कार्यकाल के अंतिम दिनों में ताबड़तोड़ प्रोन्नतियां कर रहे हैं, जिसमें नियमों
की अनदेखी के आरोप लग रहे हैं। फिर भी इमरजेंट मीटिंग बुलाकर प्रोन्नतियों पर कार्य
समिति की मंजूरी ली जा रही है। सूत्रों का कहना है कि प्रो.राय के कार्यकाल में दस
से अधिक इमरजेंट मीटिंग हुईं, जिसमें कोई ऐसा प्रस्ताव पास नहीं हुआ, जिसकी इमरजेंसी रही हो। इसी तरह छत्रपति शाहू जी
महाराज, भीम राव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा, भाषा विश्वविद्यालय का कुलपति रहते प्रो.विनय
पाठक ने निर्माण, नियुक्ति, सिक्योरिटी, कैन्टीन के ठेकों की मंजूरी के लिए कार्य परिषद
की कई मीटिंग की परन्तु परिषद के चार सदस्यों का चुनाव नहीं कराया। सूत्रों का कहना
है कि एक दूसरे की मदद से जिन शिक्षाविदों ने कुलपति पद हासिल किया है, उन्होंने भी
कार्य परिषद के सदस्यों के लिए चुनाव नहीं कराया। चौधरी चरण सिंह विवि मेरठ, बरेली
के विवि में कार्य परिषद के सदस्यों का चुनाव नहीं कराया गया है। इसे विरोध का स्वर
कुचलने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
कैसे होता है चुनाव
यूपी राज्य विश्वविद्यालय
अधिनियम-1973 की धारा 22, 23 और 24 में कोर्ट सभा का उल्लेख है। यह एक तरह का कोलेजियम
है। जिसमें विश्वविद्यालय के आजीवन सदस्य, अध्यापकों के प्रतिनिधि, छात्र-छात्राओं
के प्रतिनिधि, राज्य विधान मंडल के प्रतिनिधि सदस्य होते हैं। इनमें से ही चार सदस्यों
को चुनाव के जरिये कार्य परिषद का सदस्य चुना जाता है। ये चुनाव कुलपति व कुलसचिव का
आदेश पर ही होते हैं। निर्वाचित सदस्य विश्वविद्य़ालय के नियमित कर्मचारी नहीं होते
हैं इसलिए वह धडल्ले से विरोध के स्वर बुलंद करते हैं। कुलपतियों ने इसी स्वर को गुम
करने के लिए चुनाव न कराने की राह चुन लगी है।
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