ये तारीख थी-2 जून 1969। उत्तर प्रदेश के फैजाबाद ( अब अयोध्या) का तापमान 45 डिग्री छू रहा था। लू के थपेड़े थे। फिर भी लोग पसीने से तर-ब-तर थे। इसी दिन......के घर बालक का जन्म हुआ, बधाइयां बजीं। मिठाइयां बंटी।...नामकरण हुआ- विनय पाठक। पर, काल के कपाल पर लिखे को कौन मिटा सकता है ? कालांतर में ये बच्चा बड़ा हुआ तो उसके नाम के आगे डॉक्टर फिर प्रोफेसर लिखा गया-कल का यही बच्चा आज झूठ, फरेब, भ्रष्टाचार का पर्याय बन उच्च और तकनीकी शिक्षा व्यवस्था को “मुंह चिढ़ा” रहा है। हैरत है, इस बच्चे ने अपने बायोडेटा ( शैक्षिक, व्यक्तिगत पहचान) से जैविक पिता, पैतृक शहर का नाम तक डिलीट कर दिया। राजनीतिक, शैक्षिक, नौकरशाही की तिकड़ी के बल पर राजस्थान, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के नये-नये विश्वविद्यालयों के कुलपति का ओहदा संभाल रहे प्रो.विनय पाठक ने ऊंची तालीम के मंदिरों को भ्रष्टाचार के ठिकानों में कुछ इस तरह से तब्दील किया कि शीतकालीन मौसम में भी छात्रों, शिक्षकों, प्रशासनिक अधिकारियों, नौकरशाहों, कुलाधिपति दफ्तर और जांच एजेंसी स्पेशल टॉस्क फोर्स तक के माथे पर पसीना छलक रहा है।
किस विवि में कैसा भ्रष्टाचार
डॉ.भीम राव आंबेडकर विवि आगरा ( कार्यवाहक
कुलपति, प्रो.विनय पाठक)
-5 मई 2022। असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर की भर्ती की
गयी, जिसमें नियमों की अनदेखी। किसी का शोध सही नहीं, किसी की डिग्री सही नहीं। किसी
की अंकतालिकाएं, एपीई के अंक सही नहीं।
-ललित कला संस्थान को तोड़कर 40 करोड़ रुपये निर्माण पर खर्च किये गये। कार्य
दायी संस्था निर्धारित कर काम कराया गया। निर्माण अधूरा है, भुगतान पूरा।
-इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एण्ड टेक्नॉलाजी के सामने एक 20 करोड़ खर्च, अभी
फर्नीचर तक नहीं आये।
-इंस्टीट्यूट ऑफ बेसिक साइंस में कम्प्यूटर लैब पर 70 लाख खर्च, इस भवन का न
नक्शा पास था-न ही कोई एस्टीमेट तैयार किया गया।
- सेमेस्टर, आतंरिक परीक्षा के प्रश्न पत्र छापने का काम उसकी कंपनी को दिया,
जिसे प्रोफेसर विनय पाठक की मुखौटा कंपनी कहा जाता है। अजय मिश्र की गिरफ्तारी के बाद
काफी तक इसकी पुष्टि भी हो गयी है।
ख्वाजा मोइनउद्दीन भाषा विवि, लखनऊ ( कार्यवाहक कुलपति प्रो.विनय पाठक)
- रूसा योजना का 25 करोड़ रुपया
खुर्द-बुर्द किया गया, ये धन पीडब्ल्यूडी की ब्रांच राजकीय निर्माण निगम के जरिये किया
गया। जबकि ये राशि के गोलमाल का प्रजेंटेशन राज्यपाल के तत्कालीन प्रमुख सचिव महेश
गुप्ता के सामने किया गया।
- विश्वविद्यालय की परचेज कमेटी
ने छात्रावासों में इस्तेमाल होने वाले जो तख्त 4 हजार रुपये का खरीदा था, वही तख्त
10 हजार रुपये प्रति नग के हिसाब से 2 हजार खरीदे।
- छात्र-छात्राओं के इस्तेमाल
की जो आलमारी चंद दिन पहले 15 हजार की खरीदी गयी थीं, उसे ही 35 हजार प्रति नग दिखाकर
भुगतान निकाला गया। दो सौ आलमारी खरीदी गई। ( फाइनेंसियल हैंडबुक का पालन नहीं किया)
- मात्र आठ साल पहले बने कुलपति
आवास की मरम्मत पर एक करोड़ रुपये खर्च दिये। भुगतान मौजूदा कुलपति कर रहे हैं।
- पांच साल पहने बने विश्वविद्यालय
के गेस्ट हाउस की मरम्मत पर 35 लाख रुपये खर्च किये गये।
- आउट सोर्सिंग और परीक्षा
का काम अजय मिश्र (जेल में बंद) की कंपनी को दिया गया, इसके लिए टेंडर के स्थान पर
कोटेशन का इस्तेमाल किया गया।
- एआईसीटीई से अनुमोदित इंजीनियरिंग
संकाय के पाठयक्रम के लिए एकत्रित धन को कुलसचिव, वित्त अधिकारी के जरिये दूसरे मद
में खर्च करा दिया, संकाय सपना बन गया।
- आरक्षण नियमों का उल्लंघन
करके शिक्षकों का प्रमोशन किया। जो आरक्षण की जरिये भर्ती हुए थे, उन्हें जनरल कोटे
में प्रमोशन देकर दोनों वर्गो का नुकसान किया।
- नियमों की अनदेखी कर मसूद
अहमद फलाही को डिप्टी रजिस्ट्रार नियुक्त किया गया, जिसकी शिकायत पर कुलाधिपति आनंदीबेन
पटेल के विशेष कार्यधिकारी डॉ.पंकज एल जानी ने जांच का आदेश दिया, पर जांच कहां गई,
किसी को पता नहीं।
हरकोर्ट बटलर प्रौद्योगिकी विवि कानपुर ( कार्यवाहक
कुलपति, प्रो.विनय पाठक)
- लंबे समय से कार्यरत आउट
सोर्सिंग कंपनी को हटाकर कथित रूप से अपनी मुखौटा कंपनी को मैन पावर, सुरक्षा, सफाई,
चपरासी जैसे कार्यों का जिम्मा दिया गया, जिसके लिए प्रतिसाल पांच करोड़ से अधिक का
भुगतान करने का आरोप है।
- निर्माण कार्यो , लैब, प्रोन्नतियों
को मंजूरी दी गयी, जिसमें आरक्षण नियमों का पालन नहीं किया गया।
- इस विश्वविद्यालय में इनकी
गड़बडियों की पूर्व में हो चुकी शिकायत पर तत्कालीन प्रमुख सचिव कुमार कमलेश की अध्यक्षता
में एक जांच समिति ने विस्तृत जांच की, जिसके दस्तावेज ही गायब हो गये हैं।
एकेटीयू, लखनऊ ( पूर्णकालिक
कुलपति , प्रो. विनय पाठक –दो टर्म )
- शिक्षकों की भर्ती से लेकर
रजिस्ट्रार, डिप्टी रजिस्ट्रार, इंजीनियरिंग कालेजों के निदेशक नियुक्त करने में भारी
भ्रष्टाचार है । पांच सौ से अधिक पत्रावलियों की एसटीएफ स्क्रीनिंग कर रही है।
- इस विवि में भ्रष्टाचार कितना
गहरा है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां के प्रोफेसर, प्रशासनिक
अधिकारी ही एक दूसरे के खिलाफ ऑफ द रिकार्ड गड़बड़ियों के दस्तावेज एसटीएफ को सौंप
रहे हैं।
- एक दूसरे के खिलाफ कर्मचारियों,
अधिकारियों से हासिल दस्तावेज पढ़कर एसटीएफ अधिकारी कुलसचिव और मौजूदा कुलपति से दस्तावेज
मांग रहे हैं।
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