10th april 2016 publi
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-विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पाण्डेय पहुंचे राज्यपाल से मिलने
-लंबित विधेयकों से लेकर अधिकारों तक पर हुई चर्चा
-आजम की टिप्पणियों को फिर आपत्तिजनक कहा नाईक ने
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : विधेयक रोकने को लेकर विधानसभा में राजभवन की कार्यशैली पर टिप्पणी से शुरू 'रारÓ पर विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय की शनिवार को राज्यपाल राम नाईक से हुई मुलाकात में भी 'करारÓ जैसी स्थितियां न बन सकीं। राज्यपाल ने सांविधानिक शक्तियों का हवाला देते हुए विधेयक विचाराधीन रखने के कारण जरूर गिना दिये। माना जा रहा है अब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जल्द ही राज्यपाल से मिल सकते हैं।
शनिवार शाम को ही राजधानी में हुए एक कार्यक्रम में राज्यपाल ने यह भी कह दिया कि उन्होंने विधेयकों को उनकी कानूनी कमियों के कारण रोका है। इससे पहले विधानसभा अध्यक्ष व राज्यपाल में 50 मिनट तक छह विधेयकों को लंबित रखने के कारणों पर चर्चा हुई। सूत्रों का कहना है कि राज्यपाल ने विधानसभा के बजट सत्र के दौरान संसदीय कार्य मंत्री आजम खां द्वारा की गयी टिप्पणियों को आपत्तिजनक ठहराया। कहा कि वह मुख्यमंत्री से चर्चा करेंगे। अध्यक्ष ने भी मुख्यमंत्री से चर्चा की बात कही। राजभवन प्रवक्ता ने बताया कि राज्यपाल ने मुलाकात के दौरान कौन-कौन से विधेयक किन कारणों से उनके पास विचाराधीन हैं, इसकी जानकारी अध्यक्ष को दी और दो जून, 1949 को संविधान सभा में राज्यों के प्रशासनिक एवं विधायी विषयों पर मुख्यमंत्रियों से सूचनाएं और अभिलेख तलब करने संबंधी राज्यपालों के अधिकारों और मुख्यमंत्रियों के कर्तव्यों पर हुई बहस की प्रति विधानसभा अध्यक्ष को सौंपी। संविधान सभा में अनुच्छेद 147 पर बहस प्रारम्भ हुई थी जिसे अंतत: संविधान सभा द्वारा अनुच्छेद 167 के रूप में स्वीकार किया गया। इसमें राज्यपाल को सरकार से कोई भी दस्तावेज, सूचना तलब करने का अधिकार है।
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राजभवन में विचाराधीन विधेयक
1-उत्तर प्रदेश नगर निगम (संशोधन) विधेयक-2015
नगर निगम से लेकर नगर पालिका परिषद व नगर पंचायतों के लिए सरकार एक कानून चाहती है। वर्तमान में नगर पालिका परिषद व नगर पंचायतों के लिए सौ वर्ष पुराना उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम-1916 जबकि नगर निगमों के लिए उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम-1959 है। विधेयक में चूंकि कर्तव्यों एवं दायित्वों के निर्वहन में किसी तरह की चूक के लिए प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने पर नगर पालिका परिषद व नगर पंचायतों के अध्यक्षों की तरह कारण बताओ नोटिस जारी होते ही महापौर के भी वित्तीय एवं प्रशासनिक अधिकार पर रोक लगाने और जांच में दोषी पाए जाने पर सरकार द्वारा उन्हें पद से हटाने की व्यवस्था है, इसलिए महापौर इसे संविधान की मंशा के विपरीत बताते हुए इसका विरोध कर रहे हैं।
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2.-उत्तर प्रदेश नगर पालिका विधि (संशोधन) विधेयक-2015 इससे राज्य सरकार नगर निगम में नामित पार्षदों को निगम की बैठक तथा नगर पालिका परिषद व नगर पंचायत में नामित सदस्य को नगर पालिका की बैठकों में मत देने के अधिकार को समाप्त करना चाहती है। गौरतलब है वर्ष 2005 में उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम-1916 व उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम-1959 में संशोधन कर सरकार ने नामित पार्षदों व सदस्यों को मत देने का अधिकार दिया था। अब मनोनीत पार्षदों व सदस्यों को बैठकों में मत देने के अधिकार को संविधान के विपरीत मानते हुए सरकार, उत्तर प्रदेश विधि (संशोधन) विधेयक के माध्यम से मताधिकार समाप्त करना चाहती है। राज्य सकार नगर निगम में 10 पार्षद और नगर पालिका परिषद में पांच व नगर पंचायतों में तीन सदस्य नामित कर सकती है।
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3. उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग (संशोधन) विधेयक, 2015
इसमें अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष को राज्यमंत्री का दर्जा देने प्रस्ताव है। इसके लिए राज्य सरकार ने अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1994 में संशोधन करने का निर्णय लिया था।
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4.- उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय, सैफई इटावा विधेयक, 2015
उप्र ग्रामीण आयुर्विज्ञान एवं अनुसंधान संस्थान का गठन 15 दिसंबर 2005 को हुआ था। छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय से संबद्ध संस्थान को विश्वविद्यालय का दर्जा देने के लिए आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय, सैफई विधेयक -2015 राज्यपाल को भेजा था, इसमें विश्वविद्यालय का कुलाधिपति मुख्यमंत्री को बनाने की बात थी। कुलाधिपति के बिन्दु पर ही एतराज जताते हुए राज्यपाल ने बिल रोक रखा है।
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5 -उत्तर प्रदेश लोक आयुक्त तथा उप लोक आयुक्त (संशोधन) विधयेक, 2015
इसमें लोकायुक्त चयन समिति से हाईकोर्ट मुख्य न्यायाधीश की भूमिका खत्म करने और उनके स्थान पर नयी चयन समिति का प्रस्ताव है। मौजूदा समय में लोकायुक्त समिति में मुख्यमंत्री, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सदस्य हैं। इस बिल के विचाराधीन रहते ही सुप्रीम कोर्ट ने लोकायुक्त की नियुक्ति कर दी।
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6- डॉ.राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान विधेयक, 2015
इसमें लखनऊ स्थित राम मनोहर लोहिया संयुक्त चिकित्सालय का लोहिया आयुर्विज्ञान में विलय कर विश्वविद्यालय का दर्जा देने और मुख्यमंत्री को इसका कुलाधिपति नियुक्त करने की बात है, सामान्यत: विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति राज्यपाल होते हैं। मुख्यमंत्री को कुलाधिपति बनाने के प्रस्ताव पर राजभवन को एतराज है।
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-विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पाण्डेय पहुंचे राज्यपाल से मिलने
-लंबित विधेयकों से लेकर अधिकारों तक पर हुई चर्चा
-आजम की टिप्पणियों को फिर आपत्तिजनक कहा नाईक ने
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : विधेयक रोकने को लेकर विधानसभा में राजभवन की कार्यशैली पर टिप्पणी से शुरू 'रारÓ पर विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय की शनिवार को राज्यपाल राम नाईक से हुई मुलाकात में भी 'करारÓ जैसी स्थितियां न बन सकीं। राज्यपाल ने सांविधानिक शक्तियों का हवाला देते हुए विधेयक विचाराधीन रखने के कारण जरूर गिना दिये। माना जा रहा है अब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जल्द ही राज्यपाल से मिल सकते हैं।
शनिवार शाम को ही राजधानी में हुए एक कार्यक्रम में राज्यपाल ने यह भी कह दिया कि उन्होंने विधेयकों को उनकी कानूनी कमियों के कारण रोका है। इससे पहले विधानसभा अध्यक्ष व राज्यपाल में 50 मिनट तक छह विधेयकों को लंबित रखने के कारणों पर चर्चा हुई। सूत्रों का कहना है कि राज्यपाल ने विधानसभा के बजट सत्र के दौरान संसदीय कार्य मंत्री आजम खां द्वारा की गयी टिप्पणियों को आपत्तिजनक ठहराया। कहा कि वह मुख्यमंत्री से चर्चा करेंगे। अध्यक्ष ने भी मुख्यमंत्री से चर्चा की बात कही। राजभवन प्रवक्ता ने बताया कि राज्यपाल ने मुलाकात के दौरान कौन-कौन से विधेयक किन कारणों से उनके पास विचाराधीन हैं, इसकी जानकारी अध्यक्ष को दी और दो जून, 1949 को संविधान सभा में राज्यों के प्रशासनिक एवं विधायी विषयों पर मुख्यमंत्रियों से सूचनाएं और अभिलेख तलब करने संबंधी राज्यपालों के अधिकारों और मुख्यमंत्रियों के कर्तव्यों पर हुई बहस की प्रति विधानसभा अध्यक्ष को सौंपी। संविधान सभा में अनुच्छेद 147 पर बहस प्रारम्भ हुई थी जिसे अंतत: संविधान सभा द्वारा अनुच्छेद 167 के रूप में स्वीकार किया गया। इसमें राज्यपाल को सरकार से कोई भी दस्तावेज, सूचना तलब करने का अधिकार है।
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राजभवन में विचाराधीन विधेयक
1-उत्तर प्रदेश नगर निगम (संशोधन) विधेयक-2015
नगर निगम से लेकर नगर पालिका परिषद व नगर पंचायतों के लिए सरकार एक कानून चाहती है। वर्तमान में नगर पालिका परिषद व नगर पंचायतों के लिए सौ वर्ष पुराना उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम-1916 जबकि नगर निगमों के लिए उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम-1959 है। विधेयक में चूंकि कर्तव्यों एवं दायित्वों के निर्वहन में किसी तरह की चूक के लिए प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने पर नगर पालिका परिषद व नगर पंचायतों के अध्यक्षों की तरह कारण बताओ नोटिस जारी होते ही महापौर के भी वित्तीय एवं प्रशासनिक अधिकार पर रोक लगाने और जांच में दोषी पाए जाने पर सरकार द्वारा उन्हें पद से हटाने की व्यवस्था है, इसलिए महापौर इसे संविधान की मंशा के विपरीत बताते हुए इसका विरोध कर रहे हैं।
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2.-उत्तर प्रदेश नगर पालिका विधि (संशोधन) विधेयक-2015 इससे राज्य सरकार नगर निगम में नामित पार्षदों को निगम की बैठक तथा नगर पालिका परिषद व नगर पंचायत में नामित सदस्य को नगर पालिका की बैठकों में मत देने के अधिकार को समाप्त करना चाहती है। गौरतलब है वर्ष 2005 में उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम-1916 व उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम-1959 में संशोधन कर सरकार ने नामित पार्षदों व सदस्यों को मत देने का अधिकार दिया था। अब मनोनीत पार्षदों व सदस्यों को बैठकों में मत देने के अधिकार को संविधान के विपरीत मानते हुए सरकार, उत्तर प्रदेश विधि (संशोधन) विधेयक के माध्यम से मताधिकार समाप्त करना चाहती है। राज्य सकार नगर निगम में 10 पार्षद और नगर पालिका परिषद में पांच व नगर पंचायतों में तीन सदस्य नामित कर सकती है।
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3. उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक आयोग (संशोधन) विधेयक, 2015
इसमें अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष को राज्यमंत्री का दर्जा देने प्रस्ताव है। इसके लिए राज्य सरकार ने अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1994 में संशोधन करने का निर्णय लिया था।
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4.- उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय, सैफई इटावा विधेयक, 2015
उप्र ग्रामीण आयुर्विज्ञान एवं अनुसंधान संस्थान का गठन 15 दिसंबर 2005 को हुआ था। छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय से संबद्ध संस्थान को विश्वविद्यालय का दर्जा देने के लिए आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय, सैफई विधेयक -2015 राज्यपाल को भेजा था, इसमें विश्वविद्यालय का कुलाधिपति मुख्यमंत्री को बनाने की बात थी। कुलाधिपति के बिन्दु पर ही एतराज जताते हुए राज्यपाल ने बिल रोक रखा है।
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5 -उत्तर प्रदेश लोक आयुक्त तथा उप लोक आयुक्त (संशोधन) विधयेक, 2015
इसमें लोकायुक्त चयन समिति से हाईकोर्ट मुख्य न्यायाधीश की भूमिका खत्म करने और उनके स्थान पर नयी चयन समिति का प्रस्ताव है। मौजूदा समय में लोकायुक्त समिति में मुख्यमंत्री, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सदस्य हैं। इस बिल के विचाराधीन रहते ही सुप्रीम कोर्ट ने लोकायुक्त की नियुक्ति कर दी।
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6- डॉ.राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान विधेयक, 2015
इसमें लखनऊ स्थित राम मनोहर लोहिया संयुक्त चिकित्सालय का लोहिया आयुर्विज्ञान में विलय कर विश्वविद्यालय का दर्जा देने और मुख्यमंत्री को इसका कुलाधिपति नियुक्त करने की बात है, सामान्यत: विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति राज्यपाल होते हैं। मुख्यमंत्री को कुलाधिपति बनाने के प्रस्ताव पर राजभवन को एतराज है।
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