Friday, 15 January 2016

पानीदारी के लिए रवायतों का सहारा

पानीदारी के लिए रवायतों का सहारा

नोट- उम्मीद  2016
परवेज अहमद, लखनऊ : चोहड़े, पहाड़ी नालों पर चेकडैम, तलाबों की मेड़बंदी के प्रयासों के बावजूद दूर नजर आ रही  मंजिल तक पहुंचने के लिए एक टोली ने बुंदेली रवायतों को फिर बढ़ावा देने का प्रयास शुरू किया है। जिसमें प्रसूता से 'कुँआ पूजाÓ और वधू की विदाई के समय पानीदार कुंओं में तांबे का सिक्का डालने और राह में मिलने वाली नदी की पूजा अर्चना शामिल है। मकसद, कुँआ,नदी के प्रति आस्था पैदा कर जल संरक्षण के लिए प्रेरित करना है और इसमें कामयाबी भी मिल रही है।
बुंदेलखण्ड में पानी का हमेशा संकट रहा। यही वजह है कि पानी की दुश्वारी पर जितने गीत इस क्षेत्र में लिखे गए, उतने गीतों की नजीर सूबे के दूसरे हिस्सों में नहीं मिलती। कहा जाता है कि तत्कालीन मनीषियों ने जल संरक्षण के जागरूकता के लिए मांगलिक कार्यो के दौरान कुआं, नदी पूजा की परंपरा शुरू हुई थी। लोगों में तार्किक क्षमता केविस्तार के साथ ही ऐसी परंपरा पर विराम लगना शुरू हो गया।
 जालौन, ललितपुर, मऊरानीपुर, झांसी में जल संरक्षण के प्रति जागरूकता अभियान चला रही 'परमार्थÓ के सचिव संजय सिंह कहते हैं कि क्षेत्रीय लोगों को एक जुटकर जल संरक्षण का अभियान चलाया गया। जलपुरुष राजेन्द्र सिंह के साथ मिलकर जल सहेलियों का गठन किया। उन्हें राजस्थान के अलवर ले जाकर जल संरक्षण का प्रशिक्षण दिलाया और 'पानी पंचायतÓ का गठन किया गया। प्रत्येक पंचायत में 15 से 25 महिलाओं को स्थान दिया गया। इससे लोगों में जल संरक्षण का भाव तो पैदा हुआ लेकिन लक्ष्य दूर था। लिहाजा जल सहेलियों को बरसों पुरानी रवायतों के जरिये जल संरक्षण का अभियान तेज करने का प्रयास किया जा रहा है। वह बताते हैं कि प्रसूति के बाद कामकाज के लिए घर से बाहर निकलने से पहले कुँआ पूजन सैकड़ों साल पुरानी रवायत रही है, इसे फिर जिंदा करने का प्रयास किया जा रहा है। कुँआ पूजा के लिए जाने वाली प्रसूता के साथ महिलाएं, बच्चे भी गीत गाते हुए जाते हैं। इन गीतों में ही जल संरक्षण के प्रति जागरूकता के गीत भी शामिल करने का प्रयास होगा।
बुंदेलखण्ड में वधू को विदा कराकर जाते समय जलदार कुँअे में तांबे के सिक्के डालने की परम्परा है। वैज्ञानिक तथ्यों से स्पष्ट है कि तांबे के सिक्के से पानी शुद्ध होता है। जब हम अपने बेटे की शादी करते हैं और बहू को घर लाते हैं उस दौरान जो नदी मिलती है नदी को पूजते हैं और नारियल चढाते हैं। नदियों के प्रति सम्मान की इसी धरोहर को संजोने का अभियान छेड़ा गया है। वह कहते हैं कि इस अभियान के लिए वह कोई सरकारी मदद नहीं लेते हैं। अभियान में जनता व निजी क्षेत्र के लोगों की ही मदद ले रहे हैं। वह कहते हैं कि अगर बरसों पुरानी परंपरा ने फिर रफ्तार पकड़ी तो निश्चित रूप से लोगों में जल संरक्षण के प्रति चेतना बढ़ेगी और बुंदेलखण्ड को एक बार फिर पानीदार बनाने में मदद मिलेगी।  

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