२४.१२.२०१३
लखनऊ:...बदहवासी, बेचैनी और बेबसी...समाजवादी पार्टी पूरे साल इन्ही हालात से मुकाबिल रही। उसके लिए तसल्लीबख्स कुछ रहा तो सिर्फ रैलियों में जुट गयी भीड़। जिससे वह मूल जनाधार (वोट बैंक) साथ होने की आस लगाकर कठिन दिख रहे 'लक्ष्य-2014Ó को साधने में जुटी है।
यूं तो समाजवादी पार्टी वर्ष 2013 को याद नहीं रखना चाहेगी, क्योंकि इस साल उसके हिस्से में उपलब्धियों के नाम पर कुछ नहीं आया। अलबत्ता सत्तारूढ़ दल की खामियों के कई दाग उसके हिस्से में आ गए। पहले राज्य की सत्ता के चार केन्द्र होने के संदेश से गर्वेन्स प्रभावित हुआ फिर राज्य व कैबिनेट मंत्रियों के बीच अधिकारों की लड़ाई ने समाजवादी पार्टी का चैन छीना। पार्टी के लिए बेचैनी का सबब यहीं नहीं थमा।सीएमओ को अगवा करने, जानवर तस्करी के स्टिंग में राज्यमंत्री की भूमिका ने भी समाजवादी पार्टी को इस साल असहज किया। डिप्टीएसपी जिया उल हक की साजिश में मंत्री का नाम, नाच-गाना का शौक में विधायक की गिरफ्तारी, जमीनों पर कब्जे, पार्टी नेताओं की गुंडई,प्रतापगढ़, फैजाबाद, अंबेडकरनगर में सांप्रदायिक उपद्रव और फिर बागपत, शामली, मेरठ और मुजफ्फरनगर के दंगों ने पार्टी को इस साल की बार बदहवासी की स्थिति तक पहुंचाया। शायद इन्ही परिस्थितियों में पार्टी ने अपराधियों से दूरी बना लेने की छवि पर अतीक अहमद की अगवानी का 'दागÓ फिर से थोप लिया।
इससे उपजी सियासी परिस्थितियों को बारीकी से समझ रहे राजनीति के 'सुजानÓ मुलायम ंिसह यादव सावर्जनिक मच से गुबार निकाल चुके हैं, यह उनकी बेबसी है कि पार्टी का मूल जनाधार हाथ से बालू की तरह खिसक रहा है। दंगों से मुसलमान नाराज हैं। पूरी हिस्सेदारी नहीं मिलने से ब्राह्रïमण बिफरा हुआ है। जिन्हें समेटना चुनौती से कम नहीं है, इसीलिए वह यह कहने लगे हैं कि युवाओं को सत्ता तक पहुंचाया लेकिन क्या वे उन्हें सत्ता तक ले जाएंगे। यानी सपा के लिए अगर इस साल कुछ भी तसल्लीबख्श रहा तो सिर्फ इतना कि आजमगढ़, मैनपुरी, बरेली और बदायूं की उसकी रैलियों में खासी भीड़ जुटी। जिसके आधार पर ही वह मूल वोट बैंक साथ होने की आस में है।
लखनऊ:...बदहवासी, बेचैनी और बेबसी...समाजवादी पार्टी पूरे साल इन्ही हालात से मुकाबिल रही। उसके लिए तसल्लीबख्स कुछ रहा तो सिर्फ रैलियों में जुट गयी भीड़। जिससे वह मूल जनाधार (वोट बैंक) साथ होने की आस लगाकर कठिन दिख रहे 'लक्ष्य-2014Ó को साधने में जुटी है।
यूं तो समाजवादी पार्टी वर्ष 2013 को याद नहीं रखना चाहेगी, क्योंकि इस साल उसके हिस्से में उपलब्धियों के नाम पर कुछ नहीं आया। अलबत्ता सत्तारूढ़ दल की खामियों के कई दाग उसके हिस्से में आ गए। पहले राज्य की सत्ता के चार केन्द्र होने के संदेश से गर्वेन्स प्रभावित हुआ फिर राज्य व कैबिनेट मंत्रियों के बीच अधिकारों की लड़ाई ने समाजवादी पार्टी का चैन छीना। पार्टी के लिए बेचैनी का सबब यहीं नहीं थमा।सीएमओ को अगवा करने, जानवर तस्करी के स्टिंग में राज्यमंत्री की भूमिका ने भी समाजवादी पार्टी को इस साल असहज किया। डिप्टीएसपी जिया उल हक की साजिश में मंत्री का नाम, नाच-गाना का शौक में विधायक की गिरफ्तारी, जमीनों पर कब्जे, पार्टी नेताओं की गुंडई,प्रतापगढ़, फैजाबाद, अंबेडकरनगर में सांप्रदायिक उपद्रव और फिर बागपत, शामली, मेरठ और मुजफ्फरनगर के दंगों ने पार्टी को इस साल की बार बदहवासी की स्थिति तक पहुंचाया। शायद इन्ही परिस्थितियों में पार्टी ने अपराधियों से दूरी बना लेने की छवि पर अतीक अहमद की अगवानी का 'दागÓ फिर से थोप लिया।
इससे उपजी सियासी परिस्थितियों को बारीकी से समझ रहे राजनीति के 'सुजानÓ मुलायम ंिसह यादव सावर्जनिक मच से गुबार निकाल चुके हैं, यह उनकी बेबसी है कि पार्टी का मूल जनाधार हाथ से बालू की तरह खिसक रहा है। दंगों से मुसलमान नाराज हैं। पूरी हिस्सेदारी नहीं मिलने से ब्राह्रïमण बिफरा हुआ है। जिन्हें समेटना चुनौती से कम नहीं है, इसीलिए वह यह कहने लगे हैं कि युवाओं को सत्ता तक पहुंचाया लेकिन क्या वे उन्हें सत्ता तक ले जाएंगे। यानी सपा के लिए अगर इस साल कुछ भी तसल्लीबख्श रहा तो सिर्फ इतना कि आजमगढ़, मैनपुरी, बरेली और बदायूं की उसकी रैलियों में खासी भीड़ जुटी। जिसके आधार पर ही वह मूल वोट बैंक साथ होने की आस में है।
No comments:
Post a Comment