Sunday, 18 September 2016

समाजवादी कुनबे में कलह-२

१३ सितंबर २०१६

 समाजवादी कुनबे में कल
1.-हटाये गए मुख्य सचिव दीपक सिंघल
2.-शिवपाल बनाए गए प्रदेश सपा अध्यक्ष
3-शिवपाल से छिने महत्वपूर्ण विभाग
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सब हेड
- लगातार तीन फैसलों से सियासत व नौकरशाही में हलचल
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 लखनऊ : मंगलवार को समाजवादी कुनबे की रार खुलकर सामने आ गई। बकरीद की छुट्टी के बावजूद लगातार तीन फैसलों ने उत्तर प्रदेश की सियासत और नौकरशाही में हलचल पैदा कर दी। सुबह मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मुख्य सचिव दीपक सिंघल की छुट्टी करते हुए उनकी जगह राहुल भटनागर की ताजपोशी कर दी तो शाम होते-होते सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने अपने अनुज और मंत्री शिवपाल सिंह यादव को पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पद की कमान सौंप दी। अभी तक यह दायित्व मुख्यमंत्री के ही पास था। इसके कुछ देर बाद ही मुख्यमंत्री ने मंत्री शिवपाल सिंह यादव से सभी महत्वपूर्ण विभाग ले लिए। समाजवादी कुनबे में ये तीनों फैसले बड़े कलह की ओर इशारा कर रहे हैं।
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शिवपाल बनाये गये सपा के प्रदेश अध्यक्ष
 इससे पहले जारी प्रदेश अध्यक्ष बनाये जाने के बाद शिवपाल के रुख पर टिकी निगाहें, खबर को रद कर दिया गया है।
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मुलायम सिंह यादव ने शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी ऐसे समय पर सौंपी है जिसे परिवार की अन्तर्कलह दूर करने का प्रयास माना जा रहा है। दरअसल, मंत्रियों गायत्री प्रसाद प्रजापति और राजकिशोर सिंह की बर्खास्तगी और मंगलवार को मुख्य सचिव दीपक सिंघल को अचानक हटा दिए जाने से यह सवाल उठने लगा था कि चाचा-भतीजा के बीच फिर रार बढ़ेगी। दीपक सिंघल और राजकिशोर शिवपाल के ही करीब माने जाते हैं। वैसे भी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और मंत्री शिवपाल सिंह यादव के तल्ख रिश्ते समय-समय पर सार्वजनिक होते रहे हैं। कभी शिवपाल ने आगे बढ़कर इस पर विराम लगाया तो कभी खुद मुख्यमंत्री ने पर इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि दोनों के बीच सब कुछ सामान्य नहीं है। दो दिनों के घटनाक्रम में मुख्यमंत्री के फैसले तो यही कहते हैं। ऐसे में यह बात उठने लगी थी कि शिवपाल की नाराजगी बढ़ेगी। हालांकि शिवपाल सिंह यादव ने मुख्य सचिव को हटाये जाने को मुख्यमंत्री के विशेषाधिकार की बात कहकर सधा हुआ बयान दिया लेकिन समर्थकों को कुछ दूसरी तरह की ही चर्चा होने लगी।
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पुत्र का मोह, भाई की चिंता
मुलायम ने विधानसभा चुनाव के पहले हर मोर्चे पर कील-कांटा दुरुस्त करने की पहल की है। वह अखिलेश की छवि के प्रति जितना सजग दिख रहे हैं उतना ही उन्हें अपने अनुज की भावनाओं का भी ख्याल है। शिवपाल संगठन के मजे खिलाड़ी हैं। उन्हें जोड़-तोड़ की राजनीति में माहिर माना जाता है। चुनाव के दृष्टिगत वह बेहतर ढंग से संगठन का संचालन कर सकेंगे क्योंकि मुख्यमंत्री की व्यस्तता भी बढ़ी है। वैसे भी पहले शिवपाल को सपा का प्रदेश प्रभारी बनाया गया तो यह संदेश गया कि संगठन अब उन्हीं के हाथ में होगा। शिवपाल ने विधान पंचायत चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि विधान परिषद के चुनाव में अखिलेश ने ही अपना प्रभाव दिखाया।
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सिंघल की ताजपोशी से दूर हुई शिवपाल की नाराजगी
सिंघल लंबे समय तक शिवपाल के विभागों के प्रमुख सचिव रहे और जब उन्हें ंिसंचाई के साथ ही गृह विभाग दिया गया तो मुख्यमंत्री पखवारे भर भी बर्दाश्त नहीं कर पाए। सिंघल को गृह विभाग से हटा दिया गया। सिंघल को जिस समय मुख्य सचिव बनाया गया उन्हीं दिनों मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल के विलय और कुछ अन्य मुद्दों को लेकर चाचा-भतीजे के मतभेद सार्वजनिक हो गए थे। बात इस हद तक बढ़ी कि खुद मुलायम सिंह यादव को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा। इस लड़ाई के दरमियान ही दीपक सिंघल मुख्य सचिव बनाए गए तो यह संदेश गया कि शिवपाल को खुश करने की पहल हुई है। अब सिंघल मुख्य सचिव की कुर्सी से हटाए गए हैं तो दूसरी ओर शिवपाल के करीबी अमर सिंह को भी मुख्यमंत्री ने महत्व देना कम कर दिया है। शिवपाल के ही करीबी समझे जाने वाले राजकिशोर सिंह की बर्खास्तगी की कड़ी भी इसी से जुड़ गई है। राजकिशोर सदन से लेकर सार्वजनिक स्थलों पर शिवपाल के ही करीब देखे जाते हैं।

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मुख्य सचिव को हटाना सीएम का विशेषाधिकार : शिवपाल
-गायत्री व राजकिशोर को हटाने की जानकारी नहीं थी
जेएनएन, कानपुर : मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा मंगलवार को मुख्य सचिव दीपक सिंघल को हटाये जाने के मुद्दे पर कैबिनेट मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने कहा कि यह मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है। वह जिस अधिकारी को चाहें रखें और जिस अधिकारी को चाहें हटा सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने गायत्री प्रजापति और राजकिशोर सिंह उनसे पूछे बगैर मंत्रिमंडल से हटाया है। इस बारे में उन्हें या नेताजी मुलायम सिंह यादव को भी कोई जानकारी नहीं थी। मंगलवार को इटावा और कानपुर देहात जिले के आंट गांव में पत्रकारों से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि यह मुख्यमंत्री की मर्जी पर निर्भर करता है कि वे किससे सलाह लें या न लें। अगर मुख्यमंत्री उनसे सलाह मांगेंगे तो वे अपनी सलाह देंगे। जो मुख्यमंत्री के नजदीक है वही हमारे नजदीक है, मुख्यमंत्री का निर्णय सभी को मान्य होता है।
इटावा में उन्होंने कहा कि चुनाव नजदीक हैं जो गड़बड़ी करेगा उसे जाना होगा चाहे वह नेता हो या अफसर। हमारी जबावदेही जनता के प्रति है इसलिए मुख्यमंत्री जो भी निर्णय ले रहे हैं उसमें जनहित जुड़ा हुआ है।
बाद में कानपुर देहात में मैथा के आंट गांव में पत्रकारों से मुखातिब हुए शिवपाल ने कहा कि सरकार में कौन रहेगा और कौन नहीं रहेगा, यह भी मुख्यमंत्री के अधिकार में है। वे जिसे चाहे हटा सकते हैं। उन्होंने कहा कि इससे ज्यादा इस पर वह कुछ नहीं कहना चाहते हैं। अवैध खनन में गायत्री प्रजापति के शामिल होने के सवाल पर उन्होंने कहा कि यह जांच का बिंदु है।
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बदले नजर आये शिवपाल
इटावा : सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम ङ्क्षसह यादव द्वारा मंगलवार की शाम कैबिनेट मंत्री व छोटे भाई शिवपाल ङ्क्षसह यादव को सपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाये जाने के फैसले के बाद शिवपाल बदले नजर आए। शाम को शिवपाल लोगों से बातचीत कर रहे थे परंतु फैसला आने के बाद देर रात उन्होंने किसी से बातचीत नहीं की और चल दिए।
देर रात इटावा के ङ्क्षसचाई डाक बंगले में जब मीडिया के लोगों ने उनसे बात करने की कोशिश की तो उन्होंने बात नहीं की। एक दम तेजी से डाक बंगले से शिवपाल निकले और कहा कि कोई बात नहीं होगी, कहकर अपनी गाड़ी में बैठकर सैफई के लिए चले गये। बताया गया है कि किसी के फोन आने के बाद उनके चेहरे पर नाराजगी के भाव दिखाई दिये। इससे पहले शाम करीब सात बजे मुलायम ङ्क्षसह यादव ने उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाये जाने की सूचना फोन पर दी थी। हालांकि वे शाम को जेल में भी कुछ लोगों से मिलने गये और देर रात ङ्क्षसचाई विभाग के डाक बंगले में भी कुछ लोगों से मुलाकात की।
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:शिवपाल के चेहरे पर शिकन, वक्त 'मुलायमÓ या 'कठोरÓ
 पूर्व में भेजी गई खबर 'मुख्य सचिव को हटाना सीएम का विशेषाधिकार : शिवपालÓ के स्थान पर इसी खबर का प्रयोग करें।
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-करीबियों को हटाए जाने के बाद भी थे सामान्य
-मुख्यमंत्री के फैसले को बताया उनका विशेषाधिकार
-अपना मंत्रालय छिनने के बाद खामोशी से सैफई रवाना
कानपुर : सूबे की सियासत कर रहे इस आला सियासी परिवार में मंगलवार को दोपहर से रात तक धूप-छांव का खेल चलता रहा। कद्दावर मंत्री शिवपाल यादव के चेहरे के रह-रहकर बदले भावों को थोड़ा पढऩे की कोशिश करें तो यूं ही लगा कि वह खुद उलझे रहे कि ये वक्त उनके लिए 'मुलायमÓ है या 'कठोरÓ। उनके अजीम दीपक सिंघल की कुर्सी छिनने के बाद 'चाचा-भतीजेÓ प्रकरण गर्माने से पहले परिवार और दल के मुखिया मुलायम सिंह ने छोटे भाई को प्रदेश की कमान सौंपकर बेहतर 'संतुलनÓ का प्रयास किया। मगर, रात होते ही उनके मंत्रालय में फेरबदल पर सवालों के बदले मिली शिवपाल की खामोशी और चेहरे पर शिकन।
इटावा में लोक निर्माण विभाग के डाक बंगले में और बाद में कानपुर देहात के आंट गांव में पत्रकारों से बातचीत करते हुए शिवपाल यादव ने कहा कि यह मुख्यमंत्री की मर्जी पर निर्भर करता है कि वह किससे सलाह लें या न लें। अगर मुख्यमंत्री उनसे सलाह मांगेंगे तो वह अपनी सलाह देंगे। बाद में कानपुर देहात जिले के मैथा के आंट गांव में पत्रकारों से मुखातिब हुए शिवपाल ने मंत्रिमंडल से खनन मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति व पंचायतीराज मंत्री राज किशोर को हटाने के फैसले पर भी मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार दोहराया। हां, इतना जरूर कहा कि सीएम ने उनसे या नेताजी से बिना पूछे दोनों मंत्रियों को हटाया है।
बेशक, यहां शिवपाल यादव अब तक 'कूलÓ थे, लेकिन शायद देश के खांटी राजनीतिज्ञ माने जाने वाले मुलायम सिंह यादव ने परिवार में कुछ 'गर्माहटÓ महसूस कर ली। बताया जाता है कि शाम को शिवपाल यादव के पास नेताजी का फोन आया कि आपको प्रदेशाध्यक्ष बनाया जा रहा है। जाहिर है, इस फैसले ने उनका कद बढ़ाया। तभी तो बेफिक्री से फिर कार्यकर्ताओं से मुलाकात और बतियाने में जुट गए। शाम लगभग 8.30 बजे डाक बंगले पहुंचे और वहां भी लोगों से मुलाकात की। मगर, नौ बजे वह सीधे बाहर आए। तब तक उनसे लोक निर्माण विभाग लिये जाने की खबर आम हो गई थी। मीडिया ने प्रतिक्रिया जाननी चाही, लेकिन वह किसी बात से इन्कार कर कार में बैठ सीधे सैफई रवाना हो गए। खबर है कि अखिलेश के इस कठोर फैसले के बाद मुलायम सिंह दिल्ली से लखनऊ के लिए रवाना हो गए हैं। चर्चा है कि सुबह नेताजी या शिवपाल कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं। उधर, शिवपाल के इटावा स्थित आवास पर पहुंच उनके समर्थकों ने जिंदाबाद के नारे लगाए तथा संघर्ष में उनका साथ देने की हुंकार भरी।
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दिग्गजों के सामने अखिलेश को मिला था सपा नेतृत्व
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 लखनऊ : मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष का पद भले ले लिया गया हो लेकिन उनके हिस्से में लगातार सात वर्षों तक पार्टी की प्रदेश इकाई का नेतृत्व संभालने का रिकार्ड दर्ज है। छोटी उम्र में जब अखिलेश को सपा प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई तब पार्टी के दिग्गज नेताओं के सामने नेतृत्व करना आसान नहीं था। जनेश्वर मिश्र, मोहन सिंह, ब्रजभूषण तिवारी और शारदानंद अंचल  जैसे कद्दावर नेताओं की मौजूदगी के बावजूद अखिलेश ने सपा की कमान संभाली थी। इसके पहले मुलायम सिंह यादव के इस्तीफे से रिक्त हुई कन्नौज लोकसभा सीट पर जब वह चुनाव मैदान में उतरे तब वहां एक नारा गूंजता था- टीपू को सुलतान बना दो। टीपू यानि अखिलेश ने कन्नौज के उप चुनाव से सफर शुरू किया तो कभी मात नहीं खायी। सियासी दांव-पेंच में पहली बार उन्हें झटका लगा है। 2012 के विधानसभा चुनाव के पहले अखिलेश यादव ने साइकिल यात्रा निकाली और पूरे प्रदेश में सीधा जनसंपर्क किया। अखिलेश यादव के प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सपा की सरकार बनी और वाकई टीपू सुलतान बन गये। वर्ष 2000 में शुरू हुआ उनका सियासी सफर 16 वर्षों की यात्रा में ऐसे मुकाम पर पहुंच गया जहां उन्हें बाहरी चुनौतियों के साथ-साथ घर-परिवार से जूझना पड़ रहा है। इस अवधि में अखिलेश परिपक्व होने के साथ-साथ शतरंज की बिसात पर मोहरे बिछाना भी सीख गये हैं।
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 मंत्रिमंडल का विस्तार जल्द संभव
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- क्षत्रिय व अति पिछड़ी जाति के नेताओं को आगे लाने की तैयारी
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 लखनऊ : मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दो मंत्रियों की बर्खास्तगी की है और अभी एक-दो और उनके निशाने पर हैं। इस बीच कुछ नए चेहरों को भी मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने की बात चल पड़ी है। बर्खास्त किए गए मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति अति पिछड़ी जाति के हैं जबकि राजकिशोर सिंह क्षत्रिय हैं। सपा इस लिहाज से भी संतुलन साधने की कोशिश करेगी। इसके साथ जातीय संतुलन के लिए भी कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं।
 विधानसभा चुनाव सामने है। अखिलेश यादव दोबारा सत्ता में लौटने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा रहे हैं। वह सरकार की छवि के साथ ही अपने इमेज को लेकर भी सतर्क हैं। मंत्रियों से लेकर नौकरशाही में अपनी मर्जी से फेरबदल कर वह विपक्ष का मुंह बंद करना चाहते हैं। विपक्ष ने लगातार कहा है कि उत्तर प्रदेश में साढ़े चार मुख्यमंत्री काम करते हैं। अखिलेश के सामने नई चुनौतियां भी हैं। भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे होने और खराब छवि के बावजूद गायत्री प्रसाद प्रजापति और राजकिशोर सिंह वोट के समीकरण में सपा के लिए मुफीद रहे हैं। ऐसे में उन्हें किनारे करने से कहीं न कहीं गैप भरने की भी चुनौती है। चर्चा है कि अभी एक-दो और मंत्री बर्खास्त किए जा सकते हैं। मुख्यमंत्री तीन से चार मंत्रियों को शपथ दिला सकते हैं। संकेत मिल रहे हैं कि कम से कम दो मंत्री अति पिछड़ी जाति के बनाए जा सकते हैं जबकि क्षत्रिय को भी मौका मिल सकता है। विस्तार में पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी उप्र दोनों को अवसर मिल सकता है।
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अति पिछड़ी जातियों को जोडऩे की चलेगी मुहिम
लोकसभा चुनाव से पहले सपा ने गायत्री प्रसाद प्रजापति को अति पिछड़ी जातियों को जोडऩे की मुहिम सौंपी। गायत्री के नेतृत्व में सपा की सामाजिक न्याय अधिकार यात्रा जिलों-जिलों में घूमी। यह सही है कि इस यात्रा का कोई असर नहीं हुआ और मुलायम परिवार के अलावा सपा लोकसभा की कोई सीट भी नहीं जीत सकी पर गायत्री का कद बढ़ गया। उन्हें स्वतंत्र प्रभार के राज्यमंत्री से प्रोन्नत कर कैबिनेट मंत्री बना दिया गया। तब सपा सरकार ने एक शासनादेश जारी कर कहार, कश्यप, केवट, मल्लाह, निषाद, कुम्हार, प्रजापति, धीवर, बिंद, भर, राजभर, धीमर, बाथम, तुरहा, गोडिय़ा, मांझी और मछुआ आदि जातियों को ग्राम्य विकास की योजनाओं में अनुसूचित जाति के समान लाभ देने की बात की। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने गायत्री को आगे कर उनको इन जातियों के नेता के रूप में प्रस्तुत किया। जाहिर है कि गायत्री को साइड लाइन करने के बाद अब इन जातियों को जोडऩे की पहल नए सिरे से सपा करेगी। सपा ने लोकसभा चुनाव के दौरान भी एमएलसी नरेश उत्तम, राम आसरे विश्वकर्मा, राजपाल कश्यप, हीरा ठाकुर और राम सुंदर दास जैसे कुछ नेताओं को आगे किया था। अब इस चुनाव में इन नेताओं को आगे कर फिर से मुहिम शुरू करने की तैयारी है। सूत्रों की माने तो जल्द ही सामाजिक न्याय यात्रा की तारीख घोषित कर दी जाएगी।
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समाजवादी कुनबे की कलह-सितंबर-२०१६

12sept 2016

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-अवैध खनन पर हाई कोर्ट का सख्त रुख देख मुख्यमंत्री ने गायत्री प्रजापति को हटाया
-भ्रष्टाचार और जमीन कब्जे की शिकायतें बनीं राज किशोर सिंह की विदा का सबब
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लखनऊ : भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे भूतत्व एवं खनिकर्म मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति और पंचायती राज, पशुधन व लघु सिंचाई मंत्री राजकिशोर सिंह को अखिलेश मंत्रिमंडल से सोमवार को बर्खास्त कर दिया गया। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सिफारिश पर राज्यपाल राम नाईक ने दोनों मंत्रियों को बर्खास्त किया है। अवैध खनन को बढ़ावा देने पर मुख्यमंत्री गायत्री से अरसे से नाराज थे जबकि जमीन कब्जा करने और भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण राजकिशोर भी उनके निशाने पर थे।
बर्खास्त किये गए गायत्री को जहां सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव का करीबी बताया जाता है, वहीं राजकिशोर मंत्री शिवपाल सिंह यादव के नजदीक रहे हैं। दोनों मंत्रियों की बर्खास्तगी को सरकार की छवि सुधारने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। बहुचर्चित गायत्री प्रजापति की बर्खास्तगी हाई कोर्ट द्वारा प्रदेश में अवैध खनन की सीबीआइ जांच के अपने आदेश को वापस लेने के सरकार के अनुरोध को नामंजूर करने के तीन दिन बाद हुई है। हाईकोर्ट ने नौ सितंबर को उस एप्लीकेशन को खारिज कर दिया था जिसमें सरकार ने अदालत से प्रदेश में अवैध खनन की सीबीआइ जांच के अपने आदेश को वापस लेने का आग्रह किया था। हाई कोर्ट ने 28 जुलाई को प्रदेश में अवैध खनन की सीबीआइ जांच कराने का आदेश दिया था। माना जा रहा है कि अवैध खनन को लेकर शासन की खराब होती छवि और इस मुद्दे पर हाई कोर्ट के आदेश से शासन के लिए उपजी असहज स्थिति को देखते हुए मुख्यमंत्री गायत्री को बर्खास्त करने के लिए मजबूर हुए।
मंत्रियों के खिलाफ मुख्यमंत्री की यह कार्रवाई हाल ही में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के उस बयान के बाद आयी है जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि सपा सत्ता में वापसी चाहती है तो उसे जमीन कब्जा करने वालों और भ्रष्टाचार में लिप्त पार्टी नेताओं से छुटकारा पाना होगा।
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बर्खास्त मंत्रियों के विभाग बांटे
दोनों मंत्रियों को बर्खास्त करने के साथ ही मुख्यमंत्री ने उनके विभाग भी बांट दिये हैं। समाज कल्याण मंत्री राम गोविंद चौधरी को पंचायती राज विभाग का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है जबकि उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) मूलचंद चौहान को भूतत्व एवं खनिकर्म विभाग की अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गई है। वहीं लघु सिंचाई और पशुधन विभाग मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के अधीन होंगे।
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 बर्खास्तगी से सीएम ने दिखाए तेवर
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-कोई अवरोध बर्दाश्त करने के मूड में नहीं अखिलेश
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लखनऊ : विपक्ष भले ही सपा सरकार के दो मंत्रियों की बर्खास्तगी को नाटक करार दे रहा है लेकिन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने देर से ही सही, तेवर दिखाए हैं। विधानसभा चुनाव से पहले उनका यह फैसला कम से कम इस बात का संकेत है कि अब उनकी मर्जी भी चलने लगी है और अब अखिलेश सख्ती के मूड में हैं। मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति और राजकिशोर सिंह की बर्खास्तगी इसका नमूना है।
 सत्ता में अपनी अहमियत के लिए पहचान रखने वाले गायत्री प्रसाद प्रजापति मुख्यमंत्री की नापसंदगी के बावजूद अरसे से मंत्री बने हुए थे। वह सार्वजनिक स्थलों पर भी बेजा टिप्पणी करने से बाज नहीं आते थे और उनकी कारनामे भी सुर्खियां बनते रहे। जाहिर है चुनाव से पहले उन्हें किनारे कर मुख्यमंत्री ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। गायत्री के संरक्षणदाताओं के नाम भी छिपे नहीं हैं। लेकिन, इनकी परवाह ने करते हुए बर्खास्तगी का फैसला लिया गया तो निसंदेह इसमें बड़ी रणनीति छिपी है।
दूसरे मंत्री राजकिशोर की भी स्थिति कुछ ऐसी ही रही। विधान परिषद सदस्य के चुनाव और उसके पहले जिला पंचायत चुनाव में भी राजकिशोर ने अपने भाई के लिए जिस तरह सपा नेतृत्व पर दबाव बनाया और बदले में भाई के लिए पद और खुद के लिए एक महत्वपूर्ण मंत्रालय हासिल किया वह मुख्यमंत्री को नागवार लगा था। शिकायतें भी इनकी खूब हुईं। चुनाव मैदान में जाने से पहले मुख्यमंत्री ने इन्हें किनारे करना ही श्रेयस्कर समझा।
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बर्खास्त मंत्रियों के भविष्य पर सवालिया निशान
यूं तो समाजवादी पार्टी ने अभी यह साफ नहीं किया है कि गायत्री प्रजापति और राजकिशोर सिंह सपा में बने रहेंगे या नहीं लेकिन मुख्यमंत्री के तेवर से स्पष्ट हो गया है कि विधानसभा चुनाव में इन्हें वह शायद ही मौका दें। अमेठी के विधायक प्रजापति ने अमीता सिंह को चुनाव हराकर पहली बार जीत हासिल की थी। इसके बाद उनका संजाल फैलता गया। राजकिशोर सिंह बस्ती के हरैया विधानसभा क्षेत्र से कई बार चुनाव जीते और अपनी सुविधा अनुसार दल भी बदलते रहे हैं। मुख्यमंत्री अगर दोनों बर्खास्तगी से साफ सुथरी छवि का संदेश देना चाहते हैं तो जाहिर है कि इनको उम्मीदवार बनाने से परहेज करेंगे। हालांकि समाजवादी पार्टी में फैसलों के ऊपर भी फैसलों की रवायत है, इसलिए किसी भी तरह की गुंजायश से इन्कार नहीं किया जा सकता है। संभव है कि दोनों सपा के ही टिकट पर चुनाव लड़ जाएं। सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री फिलहाल तो दोनों को सपा उम्मीदवार बनाने के मूड में नहीं है।
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 पहले भी चली बर्खास्तगी की तलवार
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-करीब डेढ़ दर्जन मंत्रियों को साढ़े चार वर्ष में बर्खास्त कर चुके अखिलेश
-कई दोबारा शपथ लेने में भी हुए कामयाब
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 ऐन चुनाव से पहले मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति और राजकिशोर सिंह की बर्खास्तगी ने सूबे का सियासी ताप जरूर बढ़ा दिया है लेकिन, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने साढ़े चार वर्ष के कार्यकाल में करीब 15 मंत्रियों पर बर्खास्तगी की तलवार चलायी है।
वर्ष 201& में एक महिला आइएएस अधिकारी पर खादी ग्रामोद्योग मंत्री राजाराम पांडेय ने टिप्पणी की तो पूरे देश में इसकी निंदा शुरू हो गयी। मुख्यमंत्री ने इसका संज्ञान लिया और पांडेय को बर्खास्त कर दिया। अखिलेश सरकार में पांडेय सबसे पहले बर्खास्त होने वाले मंत्री रहे। बाद में उनका निधन हो गया। मुख्यमंत्री ने वर्ष 2014 में अदालती आरोपों से घिरे मंत्री मनोज पारस और सियासी दांव-पेंच के तहत कृषि मंत्री आनन्द सिंह को भी बर्खास्त किया। अयोध्या से चुनाव जीते और मुख्यमंत्री के करीबी रहे पवन पांडेय की शिकायतें कुछ ज्यादा बढ़ गयीं तो उन पर भी बर्खास्तगी की तलवार चली। पांडेय पर अवैध खनन रोकने गये एक आइपीएस अधिकारी के साथ अभद्रता का आरोप लगा था। स्टांप तथा न्याय शुल्क पंजीयन व नागरिक सुरक्षा मंत्री महेन्द्र अरिदमन सिंह, पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री अंबिका सिंह, वस्त्र उद्योग मंत्री शिवकुमार बेरिया, खेल मंत्री नारद राय, प्राविधिक शिक्षा मंत्री शिवाकांत ओझा, प्राविधिक शिक्षा राज्य मंत्री आलोक शाक्य और बेसिक शिक्षा राज्य मंत्री योगेश प्रताप के अलावा स्वतंत्र प्रभार के लघु उद्योग मंत्री भगवत शरण गंगवार को भी मुख्यमंत्री ने बर्खास्त किया। यह अलग बात है कि कई लोगों को फिर मौका भी मिला। हाल में मंत्री मनोज पांडेय को भी मुख्यमंत्री ने बर्खास्त कर दिया। सर्वाधिक सुर्खियों में माध्यमिक शिक्षा मंत्री बलराम यादव की बर्खास्तगी रही जिन्हें कुछ ही दिनों बाद दोबारा शपथ दिलाकर वही विभाग लौटा दिया गया। देखा जाए तो मुख्यमंत्री ने कई मंत्रियों से इस्तीफे भी लिए। कुंडा में सीओ जियाउल हक की हत्या के बाद रघुराज प्रताप सिंह या फिर गोंडा में अधिकारियों से अभद्र व्यवहार पर विनोद कुमार सिंह उर्फ पंडित सिंह का इस्तीफा भी मुख्यमंत्री के अनुकूल रहा। हालांकि इन दोनों की मंत्रिमंडल में वापसी हो गयी। अपने कार्यकाल में अखिलेश मुस्लिम मंत्रियों पर मेहरबान रहे। उन्होंने किसी मुसलमान मंत्री पर बर्खास्तगी की कार्रवाई नहीं की।
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 गायत्री के लिए मुसीबत बनेगी सीबीआइ जांच
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-हाईकोर्ट के आदेश के बाद शुरू हो गयी गायत्री की उल्टी गिनती
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लखनऊ : सरकार नहीं चाहती थी कि अवैध खनन की सीबीआइ जांच हो लेकिन हाईकोर्ट नहीं मानी। इसी के साथ सत्ता प्रतिष्ठान में खलबली मची और खनन मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति की उल्टी गिनती शुरू हो गयी। दरअसल, खनन विभाग में जिस तरह नियमों की अनदेखी की गयी उससे यह तो साफ था कि जिम्मेदार लोग इसके दायरे में आएंगे।
 गायत्री प्रसाद प्रजापति खनन विभाग संभालने के कुछ दिनों बाद ही विवादों में आ गये। उन पर विपक्षी दलों और स्वयंसेवी संस्थाओं ने गंभीर आरोप लगाए। खनन माफिया का नेटवर्क बनाकर पूरे प्रदेश में अवैध ढंग से बालू खनन किया गया। पर्यावरणविद और कई प्रमुख लोग गायत्री के खिलाफ सड़क पर उतरे लेकिन सपा मुखिया खुद उनके बचाव में आते रहे। दिलचस्प यह कि जब मुलायम सिंह यादव मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को नसीहत देते तब गायत्री उनकी बगल में मौजूद होते। मंत्रियों को हटाने, विभाग बदलने और बर्खास्तगी तक के दौरान गायत्री का नाम कई बार आया लेकिन उन पर कार्रवाई नहीं हुई।
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मुलायम ने दी हरी झंडी
मुलायम सिंह यादव ने बर्खास्तगी पर भले ही अनभिज्ञता जतायी हो लेकिन, यह चर्चा बड़े दावे के साथ की जा रही है कि दिल्ली की एक पार्टी में मुलायम की सहमति के बाद ही गायत्री और राजकिशोर की बर्खास्तगी की पृष्ठभूमि बनी। गायत्री के बारे में एक शीर्ष अफसर ने मुलायम को ब्यौरा दिया। इसमें दो और कद्दावर शामिल थे जबकि राजकिशोर का नाम भी किसी जांच में सामने आ रहा है। इसलिए उन्हें किनारे लगाने की बात तय हुई।
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 लोकायुक्त से क्लीन चिट
गायत्री प्रजापति के खिलाफ लोकायुक्त के यहां चार जांचें थी जो अब बंद हो चुकी हैं। इसके बाद से गायत्री प्रसाद प्रजापति के तेवर और तीखे हो गये थे। इस दौरान अवैध खनन में भी खूब तेजी आयी। गायत्री के खिलाफ शिकायत करने वाले कई शिकायतकर्ता बदल गये। अलबत्ता सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर ने गायत्री के खिलाफ लोकायुक्त से की गयी शिकायत को लेकर लगातार सक्रियता दिखाई।
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 एसआइटी जांच की मांग
नूतन ठाकुर ने लोकायुक्त से 26 दिसंबर 2014 को गायत्री प्रजापति की शिकायत की। 25 मई 2015 को लोकायुक्त ने प्रजापति को क्लीन चिट दे दी। इसके बाद नूतन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में प्रजापति की संपत्ति की एसआइटी जांच के लिए याचिका दाखिल की। यह याचिका कोर्ट में लंबित है।
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नौकरों के नाम संपत्ति
नूतन ने गायत्री के सिंडीकेट में विकास वर्मा, पिंटू यादव और पिंटू सिंह को प्रमुख सहयोगी बताया है। गायत्री के पुत्र अनिल प्रजापति और अनुराग प्रजापति, पुत्री सुधा और अंकिता तथा पत्नी महराजी के नाम संपत्ति है। उनकी महिला सहयोगी गुड्डा, गुड्डा की बहन पूनम, भाई रमाशंकर और जगदीश प्रसाद, ड्राइवर राम सहाय, सहयोगी रामराज, सुरेन्द्र कुमार बैठा, प्रमोद कुमार सिंह, सरोज कुमार, जन्मेजय खरवार और देवतादीन के नाम नूतन की शिकायत में प्रमुखता से आये हैं।
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गायत्री के लोगों की कंपनी
एक-डीसेंट कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली (निदेशक-अनिल प्रजापति) दो- लाइफ क्योर मेडिकल एंड रिसर्च सेंटर प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली (निदेशक-अनिल प्रजापति) तीन-एमजी कोलोनाइजर, (पूर्व निदेशक- गायत्री प्रजापति, बाद में पुत्र अनिल प्रजापति) चार- शुभांग एक्सपोर्ट लिमिटेड, कोलकाता (निदेशक- अनिल प्रजापति) पांच- ड्रीम डेस्टिनेशन इन्फ्रा-लैंड सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड, लखनऊ (निदेशक-आलोक श्रीवास्तव) छह-पावनी देवेलोपेर्स प्राइवेट लिमिटेड (निदेशक- विकास वर्मा) सात- वैष्णो इन्फ्राहाइट्स प्राइवेट लिमिटेड (निदेशक-विकास वर्मा)।
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 तय था सरकार तक पहुंचेगी जांच की आंच
'नदियों से अवैध खनन की शिकायतें आ रही हैं लेकिन सरकार को दिखाई नहीं दे रहा। अवैध खनन की सूचना न होना, आंखों में धूल झोंकने जैसा है।Ó
-इलाहाबाद हाईकोर्ट-28 जुलाई, 2016
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-खनन को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिकाओं की भरमार
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 प्रदेश में अवैध खनन का मुद्दा हाईकोर्ट में आने के बाद ही तय हो गया था कि इसकी जांच की आंच सरकार तक पहुंचेगी। यही वजह है कि सीबीआइ जांच रोकने के लिए सरकार ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया लेकिन अधिकारियों के विरोधाभासी बयान ही उसके आड़े आ गए।
प्रदेश में अवैध खनन को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक दर्जन से अधिक याचिकाएं लंबित हैं। याचिकाएं देवरिया, संभल, बदायंू, बागपत, कौशाम्बी, शामली, जालौन, बांदा, हमीरपुर, सहारनपुर, मिर्जापुर आदि जिलों से दाखिल हुई हैं। सीबीआइ जांच का आदेश अमर सिंह व अन्य दर्जनों याचिकाओं की सुनवाई में 28 जुलाई को दिया गया था। उस वक्त कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की थी कि नदियों में अवैध खनन हो रहा है और सरकार को दिखाई नहीं दे रहा। तत्कालीन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश वीके शुक्ल तथा न्यायमूर्ति एमसी त्रिपाठी की खंडपीठ ने यह तक कह दिया था कि अधिकारी आंखों में धूल झोंकने का काम कर रहे हैं। कोर्ट ने सीबीआइ से आठ सितंबर तक प्रारंभिक जांच रिपोर्ट मांगी थी।
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हठधर्मिता से किरकिरी
इसके बाद सरकार ने इस आदेश को रीकॉल किए जाने की अर्जी दी और जांच पर रोक लगाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। सरकार जांच रोकने के लिए किस हद तक गंभीर थी, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि शासकीय अधिवक्ताओं की फौज तो कोर्ट में खड़ी ही हुई, सुप्रीम कोर्ट से वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन तक को बुलाया गया। सरकार ने बहुत दलील दी कि कोर्ट का आदेश एकतरफा है और उसका पक्ष नहीं सुना गया लेकिन इस सवाल का जवाब न दिया जा सका कि आखिर सीबीआइ जांच में आपत्ति क्या है। कोर्ट में याचियों की ओर से अवैध खनन के फोटोग्र्राफ पेश किए जा चुके थे।
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विरोधाभासी बयान
प्रमुख सचिव की ओर से कहा गया कि प्रदेश में कहीं भी अवैध खनन नहीं हो रहा है। दूसरी और सरकार की ओर से ही कहा गया कि अवैध खनन रोकने के लिए कड़े कदम उठाए गए हैं और कई ट्रक पकड़े भी गए हैं।
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अवमानना की भी परवाह नहीं
इलाहाबाद : अफसरों ने इस प्रकरण को गंभीरता से लिया ही नहीं। मसलन हमीरपुर के एडीएम ने कोर्ट में हलफनामा दिया कि उनके यहां अवैध खनन नहीं हो रहा। इस अदालत ने दो एडवोकेट कमिश्नर वहां पड़ताल के लिए भेज दिए। उन्होंने एडीएम की रिपोर्ट को झूठा पाया। इस पर कोर्ट खफा हुई और डीएम को अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए लिखा।
सहारनपुर में अवैध खनन के नाम पर जब्त बालू का मामला सामने आया। प्रशासन ने बिना नीलामी के ही उन्हीं लोगों को बालू ले जाने की छूट दे दी जिनसे जब्त की गई थी। तीन दिन पहले ही कोर्ट ने सहारनपुर के डीएम और प्रमुख सचिव खनन को तलब किया है।
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बाजीगरी और विवादों से गलबहियां
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-आरोपों के चलते सुर्खियों में बने रहे गायत्री प्रजापति
 लखनऊ : गायत्री प्रसाद प्रजापति ने कामयाबी की सीढिय़ां तेजी से चढ़ीं। सपा मुखिया मुलायम का वरदहस्त उन्हें हासिल रहा। भ्रष्टाचार के आरोपों और विवादों ने उन्हें सुर्खियों का विषय बनाया तो अपने खिलाफ शिकायतों को भेदने में भी वह काफी कामयाब रहे।
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तीसरी कोशिश में बने विधायक
199& में बहुजन क्रांति दल के उम्मीदवार के तौर पर पहली बार अमेठी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लडऩे वाले गायत्री प्रसाद प्रजापति तब महज 1526 वोट पाकर सातवें स्थान पर रहे थे। तीन साल बाद 1996 में उन्होंने सपा प्रत्याशी के तौर पर विधानसभा चुनाव में दोबारा भाग्य आजमाया और तीसरे पायदान पर रहे। तीसरे प्रयास में 2012 में हुए चुनाव में वह बतौर सपा उम्मीदवार कांग्रेस की अमीता सिंह को हराकर पहली बार विधानसभा पहुंचने में सफल रहे।
फरवरी 201& से जनवरी 2014 तक अखिलेश यादव ने मंत्रिमंडल का तीन बार विस्तार किया और तीनों बार शपथ लेने वाले गायत्री की स्थिति सरकार में पहले से मजबूत होती चली गई। पहली बार विधायक बने गायत्री को फरवरी 201& में हुए मंत्रिमंडल विस्तार में सिंचाई महकमे का राज्य मंत्री बनाया गया। जुलाई 201& में मुख्यमंत्री ने उन्हें तरक्की देते हुए भूतत्व एवं खनिकर्म में राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) का दर्जा दिया और जनवरी 2014 में उन्हें प्रमोट कर कैबिनेट मंत्री बना दिया। 2014 के लोकसभा चुनाव में 17 अति पिछड़ी जातियों को लामबंद करने के लिए बागडोर गायत्री को सौंपी गई।
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1.71 करोड़ की संपत्ति
गायत्री ने 2012 के विधानसभा चुनाव में दाखिल किये गए हलफनामे में अपनी अचल संपत्ति 1.21 करोड़ रुपये और चल संपत्ति 50.88 लाख रुपये दर्शायी थी।
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 तड़क-भड़क और दामन पर भ्रष्टाचार के छींटे
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-विवादों में रहना राजकिशोर सिंह का शगल
-लगते रहे हैं धनबल, बाहुबल के इस्तेमाल के आरोप
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लखनऊ : गले में सोने का मोटा लॉकेट, कलाई पर ब्रेसलेट, भड़कीली डिजाइन वाली शर्ट और पैरों में अक्सर सफेद तो कभी रंगीन चमकीले जूते। विधानभवन के लिफ्टमैन भी बखूबी जानते हैं कि यह हुलिया अखिलेश मंत्रिमंडल से सोमवार को बर्खास्त किये गए पंचायती राज, पशुधन और लघु सिंचाई मंत्री राजकिशोर सिंह का है।
राजकिशोर के दामन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से जुड़े जमीन घोटाले की जांच में उनका नाम आना उनकी बर्खास्तगी की अहम वजह माना जा रहा है। पंचायती राज विभाग में भर्तियों में घपले की शिकायतें रही हों या हाल ही में पंचायती राज और ग्राम्य विकास विभागों के बीच चली तनातनी, मुख्यमंत्री उनकी कार्यशैली से खुश नहीं थे। अखिलेश मंत्रिमंडल से बर्खास्त किये गए प्राविधिक शिक्षा विभाग के पूर्व मंत्री शिवाकांत ओझा ने प्रतापगढ़ में चेकडैम घोटाले का आरोप लगाया था। इस मामले में भी सरकार की काफी किरकिरी हुई थी।
बस्ती की हर्रैया सीट से 2002 में बसपा के टिकट पर पहली बार विधानसभा चुनाव जीतकर आये राजकिशोर तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के नेतृत्व में बसपा-भाजपा की साझा सरकार में उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण मंत्री बनाये गए थे। सत्ता से मायावती सरकार की बेदखली के बाद मुलायम सरकार बनवाने में राजकिशोर की अहम भूमिका रही थी। वह बसपा के 40 विधायकों के साथ सपा में शामिल हो गए थे। गाढ़े वक्त में की गई इस मदद का मुलायम ने भी उन्हें सिला दिया-अपनी सरकार में भी उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण मंत्री का दर्जा देकर। वर्ष 2007 में राजकिशोर दोबारा हर्रैया सीट से बतौर सपा उम्मीदवार जीते। वर्ष 2007 में वह तीसरी बार विधायक बने। अखिलेश सरकार में भी वह उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण मंत्री बनाये गए लेकिन 2014 में उनका महकमा बदल कर उन्हें बदलकर लघु ङ्क्षसचाई मंत्री बना दिया गया। वर्ष 2014 में अपने भाई बृजकिशोर सिंह उर्फ डिंपल को बस्ती सीट से बतौर सपा प्रत्याशी लोकसभा चुनाव जितवाने के लिए उन पर प्रशासनिक मशीनरी के दुरुपयोग के साथ धनबल और बाहुबल इस्तेमाल के भी आरोप लगे। पिछले साल हुए पंचायत चुनाव में अपने सियासी रसूख को और बढ़ाते हुए वह बस्ती के जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर अपने बेटे देवेंद्र प्रताप सिंह उर्फ शानू को बैठाने में कामयाब रहे। विधान परिषद चुनाव में समाजवादी पार्टी ने उनके भाई बृजकिशोर का टिकट काटा तो मुख्यमंत्री ने राजकिशोर को पंचायती राज विभाग का अतिरिक्त प्रभार सौंप कर और बृजकिशोर को ऊर्जा सलाहकार बनाकर भरपाई की।
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गवर्नर का पत्र 'ताबूत में आखिरी कीलÓ
पिछले सप्ताह कुछ लोगों ने राज्यपाल राम नाईक से मिलकर लिखित शिकायत की थी कि मंत्री राजकिशोर सिंह सहित सपा के कुछ नेताओं ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी है। सूत्रों के मुताबिक राज्यपाल ने शिकायत को गंभीरता से लेते हुए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पत्र लिखने के साथ ही बात भी की। ऐसे में राजकिशोर की बर्खास्तगी के पीछे नाईक के पत्र की भी अहम भूमिका मानी जा रही है।
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बर्खास्तगी नाकाफी, मुख्यमंत्री दें इस्तीफा
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-सरकार में आपरेशन क्लीन से विपक्ष संतुष्ट नहीं, साधा निशाना

 लखनऊ : मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा भ्रष्टाचार व अन्य आरोपों में फंसे दो कैबिनेट मंत्रियों को बर्खास्त करने से विपक्षी पार्टियां संतुष्ट नहीं है। कार्रवाई को अधूरी करार देते हुए विपक्ष ने सरकार पर निशाना साधते हुए मुख्यमंत्री से त्यागपत्र देने की मांग की है।
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बर्खास्तगी की नौटंकी से अब कुछ नहीं होने वाला : राम अचल
बसपा के प्रदेश अध्यक्ष राम अचल राजभर ने मंत्रियों की बर्खास्तगी को अखिलेश सरकार की नौटंकी करार देते हुए कहा कि जनता सब समझ रही है। राजभर ने कहा कि सपा सरकार हर क्षेत्र में फेल हो गई है। अब जनता की नजर में छवि सुधारने के लिए इस तरह की नौटंकी करने से कुछ नहीं होने वाला है क्योंकि प्रदेश की जनता अबकी चुनाव में इनके झांसे में आने वाली नहीं है। राजभर ने दावा किया कि चुनाव में जनता सपा सरकार को उखाड़ फेंकेगी और सत्ता में बसपा की वापसी होगी।
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मुख्यमंत्री ने खुद को बचाने को किया बर्खास्तगी का नाटक : केशव
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य ने कहा है कि मुख्यमंत्री ने खुद को बचाने के लिए बर्खास्तगी का नाटक किया है। यह सौ-सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली, वाली कहावत को चरितार्थ करने जैसा है। मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार के खिलाफ थे तो हाईकोर्ट द्वारा खनन के भ्रष्टाचार की सीबीआइ जांच रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट क्यों गए? मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार के आरोपों से बच नहीं सकते। केशव ने भाजपा में भ्रष्टाचारियों के लिए कोई जगह नहीं होने की बात भी कही।
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सुलतान को बचाने के लिए पियादों की बलि : राजबब्बर
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर ने दो मंत्रियों को बर्खास्त करने की कार्रवाई को छलावा बताया। आरोप लगाया कि सूबे के सुलतान को बचाने के लिए ही दो पियादों की बलि ली गयी। मुख्यमंत्री को सरकार की विदाई के समय भ्रष्टाचार नजर आया है। सरकारी सरंक्षण मिले बगैर इतने व्यापक स्तर पर अराजकता नहीं हो सकती है। छवि सुधार की कोशिश में लगी सपा अपने दामन को साफ नहीं कर सकेगी क्योंकि जनता ने प्रदेश में बड़े बदलाव का मन बना लिया है। बेहतर यही है कि मुख्यमंत्री नैतिकता के आधार पर अपने पद से इस्तीफा दें और जनादेश प्राप्त करने के लिए जनता के बीच में जाएं।  
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भ्रष्टाचारियों को अब तक क्यों बचाया : डा. मसूद
राष्ट्रीय लोकदल के प्रदेश अध्यक्ष डा. मसूद अहमद ने मुख्यमंत्री द्वारा भ्रष्टाचार के आरोप में मंत्रियों की बर्खास्तगी पर सवाल उठाते हुए कहा कि अखिलेश यादव जनता को बताए कि भ्रष्टाचारियों को अब तक क्यों बचाए रखा? सीबीआइ जांच के दबाव में मुख्यमंत्री ने मजबूरन मंत्रियों पर कार्रवाई का फैसला किया है। ऐसे निर्णय लेकर अपनी छवि को निखारने की उम्मीद लगा रही सपा को जनता सबक सिखाएगी। मसूद ने कहा कि लोकायुक्त ने बसपाकाल के कई मंत्रियों पर कार्रवाई की संस्तुति मुख्यमंत्री को की परंतु अब तक उन फाइलों का पता ही नहीं। इससे सिद्ध होता है कि सपा-बसपा दोनों भ्रष्टाचार की पोषक हैं।
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 बसपा की तर्ज पर सपा का डेमैज कंट्रोल
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- चुनाव से पहले छवि सुधारने को और भी मंत्रियों के गिर सकते हैं विकेट
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 लखनऊ : विधान सभा चुनाव से पहले छवि सुधारने के लिए समाजवादी पार्टी ने भी पूर्ववर्ती बसपा सरकार की तर्ज पर मंत्रियों का विकेट गिरा कर डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश शुरू की है। सोमवार को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जिस तरह गायत्री प्रसाद प्रजापति व राजकिशोर सिंह को बर्खास्त किया है उससे मंत्रिपरिषद के अन्य सदस्यों में भी बेचैनी बढ़ गई है।
कभी सर्वाधिक चहेते मंत्री रहें गायत्री प्रसाद व राजकिशोर सिंह को अचानक बर्खास्त करने के बाद अभी कई अन्य विवादित मंत्रियों को भी मुख्यमंत्री द्वारा बाहर का रास्ता दिखाने की चर्चा जोरों पर है। सूत्रों का कहना है कि बर्खास्त किए जाने वाले मंत्रियों की फेहरिस्त में अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े नाम भी शामिल है। उक्त मंत्रियों का भी विकेट गिराया जाना था परन्तु ईद उल अजहा के कारण फिलहाल बर्खास्तगी टाल दी है। ईद के बाद मुख्यमंत्री का आपरेशन क्लीन तेज होगा। मंत्रिपरिषद के साथ नौकरशाही में भी अहम बदलाव होंगे।
काम नहीं आया मंत्रियों को हटाना : वर्ष 2012 के चुनाव में सरकार बनाए रखने के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती ने भ्रष्टाचार व अन्य कारणों से करीब तीन दर्जन मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखाया था। छवि सुधारने को बसपा शासन में मंत्रियों की भेंट चढ़ाने का फार्मूला कारगर न हो सका था और मायावती की सूबे की सत्ता में वापसी की उम्मीद धरी रह गयी। बसपा के उस फार्मूले पर समाजवादी पार्टी ने चुनाव निकट आते ही मंत्रियों का विकेट गिरा कर सत्ता में बने रहने की आस लगायी है।  
नये विधायकों को मौका मिलने की उम्मीद : मुख्यमंत्री द्वारा विवादित मंत्रियों की छुट्टी करने का अभियान को देख कर जहां एक और मायूसी हैं, वही नये विधायकों को लाटरी लगने की आस भी जगी है। सूत्रों का कहना है कि छवि सुधारने और युवा वर्ग को रिझाने के लिए अखिलेश कुछ नए चेहरों को भी मंत्रिपरिषद में स्थान दे सकते हैं। इसके साथ ही जियाउद्दीन रिजवी का मंत्री पद के लिए शपथ ग्रहण का इंतजार भी खत्म हो सकता है।
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रास नहीं आया पंचायतराज विभाग
पंचायतीराज विभाग में मंत्री पद को संभालने वालों की विदाई दुखदायी रही है। शुरुआती दौर में वरिष्ठ नेता बलराम यादव को पंचायतीराज विभाग सौंपा गया। बलराम जैसा अनुभवी नेता को कंबल साड़ी वितरण योजना फ्लाप होने के कारण विभाग से हटाया गया। इतना ही ग्रामीण क्षेत्रों में पकड़ बढ़ाने की इस महत्वाकांक्षी चुनावी घोषणा से समाजवादी पार्टी को पीछा ही छुड़ाना पड़ा। बलराम यादव के बाद पंचायत राज विभाग कैलाश यादव को सौंपा गया परन्तु उनके आकस्मिक निधन के कारण मंत्री पद रिक्त हुआ। राजकिशोर सिंह को जिन परिस्थितियों में पंचायती राज विभाग सौंपा था उसको सियासी कद बढ़ाना माना जा रहा था, लेकिन मात्र आठ माह ही राजकिशोर मंत्री रह सके।
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 सपा फिर अखिलेश के अंदाज में
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- मुख्यमंत्री के बढ़ते दखल से बदल रही सपा की तस्वीर
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लखनऊ : सपा प्रमुख मुलायम सिंह के करीबी गायत्री प्रसाद प्रजापति व शिवपाल यादव के चहेते राजकिशोर सिंह को एक झटके में मंत्रिपरिषद से बर्खास्त किया जाना समाजवादी पार्टी के नए युग का अहसास करा देता है। यानी समाजवादी पार्टी अब अखिलेश यादव की मंशा से ही चलेगी।
कहने को सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव है लेकिन पार्टी के अहम फैसले लेने में प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव की ही चलती है। मंत्रिपरिषद के पिछले फेरबदल में अचानक मनोज पांडेय को बाहर का रास्ता दिखाना हो या कौमी एकता दल से मेल की घोषणा होने के बाद नाता तोड़ लेने का फैसला। अखिलेश की मर्जी हो तो एनआरएचएम घोटाले के आरोपी कांग्रेसी विधायक मुकेश श्रीवास्तव जैसे भी समाजवादी कुनबे में शामिल हो जाएंगे तब छवि बनने बिगडऩे का सवाल नहीं होगा।
सोमवार को भ्रष्टाचार के आरोपी दो मंत्रियों को हटाए जाने के सवालों को सपा प्रमुख मुलायम सिंह का अनभिज्ञ बनकर टाल जाना साबित करता है कि 2017 में समाजवादी साइकिल केवल अखिलेश के इशारे पर दौड़ेगी। उधर जानकारों का कहना है कि समाजवादी पार्टी सोची समझी रणनीति के तहत ही अखिलेश को युवा अवतार के तौर पर सामने ला रही है। अखिलेश की बेदाग छवि पर लगे 'डमी मुख्यमंत्रीÓ होने के आरोपों को भी हटाया जा रहा है ताकि सत्ता की दौड़ में समाजवादी बने रहें।
सूत्रों के मुताबिक आने वाले दिनों में अखिलेश यादव की कड़क नेता वाली छवि को मजबूती प्रदान करने के लिए कई चौंकाने वाले निर्णय लिए जाएंगे।

Tuesday, 6 September 2016

जियाउद्दीन की शपथ में फंसा समीकरणों का पेंच

07 sept 2017
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 जियाउद्दीन की शपथ में फंसा समीकरणों का पेंच

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 लखनऊ : प्रदेश की सोलहवीं विधानसभा की निर्धारित उम्र पूरी होने के करीब बढ़ रही है फिर भी जियाउद्दीन रिजवी की शपथ न होने कौतूहल का विषय है, ऊपर से अब राज्यपाल ने मुख्यमंत्री से सवाल पूछकर इसको और हवा दे दी है। रिजवी 27 जून को मंत्री नामित हुए थे। कहा जा रहा है कि उनकी शपथ पार्टी के सियासी समीकरणों की पेंच में उलझी है।
सूत्रों के मुताबिक सियासी समीकरणों में बदलाव व सपा के अंदर चल रहे वैचारिक द्वंद के चलते निर्णय अटका हुआ है। दरअसल, सरकार में सिर्फ साठ मंत्री बनाये जा सकते हैं और 59 मंत्री हैं। जियाउद्दीन के शपथ के साथ कोटा पूरा हो जाएगा। 27 जून को मंत्रिमंडल के सातवें विस्तार में मुख्यमंत्री ने पार्टी के ब्राह्मïïण नेता मनोज पाण्डेय को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया था। इसके चंद दिनों के बाद घोषित सपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से राजेश दीक्षित (पूर्व राष्ट्रीय सचिव) बाहर कर दिये गए। राजेश दिल्ली में सपा के ब्राह्मïण चेहरे के रूप में स्थापित थे। दो ब्राह्मïïण नेताओं के मुख्य धारा से बाहर होने का प्रभाव विधानसभा चुनाव पर पडऩे की चर्चा शुरू हुई और समाजवादी सोच के ब्राह्मïणों ने मनोज के पक्ष में लामबंदी शुरू की तो नेतृत्व ने मंथन शुरू कर दिया। सूत्रों का कहना है कि दूसरी बार के विधायक रिजवी के विरोधियों ने नेतृत्व के सामने यह भी तर्क रखा कि वह जिस बिरादरी से आते हैं, उसका वोट प्रतिशत बहुत कम है और हाल के दिनों में इसी वर्ग का एक एमएलसी बनाया जा चुका है और एक स्वतंत्र प्रभार की राज्यमंत्री हैं। हालांकि सूत्रों का कहना है कि जियाउद्दीन मुख्यमंत्री की पंसद हैं। ऐसे में राज्यपाल के पत्र लिखकर पूछने के बाद इस प्रकरण में जल्द अंतिम निर्णय होने के आसार हैं।
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 समाजवाद से परिवारवाद की ओर
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- आजम के पुत्र अब्दुल्ला उतर सकते हैं चुनाव मैदान में
- बलराम यादव, महबूब, रेवतीरमण सिंह, राजकिशोर, विनोद सिंह के पुत्र भी लड़ सकते हैं चुनाव
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 लखनऊ : समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने दल में 'परिवारÓ को स्थापित करना शुरू किया, तब उनके हमकदम छोटे लोहिया यानी जनेश्वर मिश्र ने इसके मर्म को परखकर एक सिद्धांत गढ़ा और इस परिपाटी को नाम दिया 'संघर्ष का परिवारवादÓ। फिर मंत्री, विधायक, ओहदेदार अपने परिवारों को स्थापित करने लगे। ताजा कड़ी आजम खां ने यह कहकर जोड़ी कि उनके बेटे अब्दुल्ला आजम को राजनीति में जाने की इजाजत है मगर उनका टिकट मुलायम सिंह घोषित करेंगे।
सपा विधायकों, मंत्रियों ने अपने परिवार के सदस्यों को दल में स्थापित करने का सिलसिला तो काफी पहले से शुरू कर रखा है, मगर अब सिद्धांतों की सियासत का दावा करने वाले आजम खां भी सूची में शामिल हो गए हैं। शुरुआत उनकी पत्नी को राज्यसभा भेजने के साथ हुई थी मगर अब वह खुद बेटे अब्दुल्ला को उसी जहाज पर बैठाने की जुगत में लग गए हैं जिसे वह जाने-अनजाने कुछ दिन पहले 'डूबता जहाजÓ कह चुके हैं।
उधर सपा का परिवारवाद लोगों को हजम नहीं हो रहा। खासकर ऐसे मौके पर जब भाजपा अपने सांसदों, मंत्रियों और विधायकों के परिवार के सदस्यों को जनप्रतिनिधि न बनाने का धड़ल्ले से प्रचार कर रही है। टिकट निर्धारण में गोपनीय रिपोर्ट को आधार बनाने वाले पार्टी नेता चयन मानक ताख पर रखते जा रहे हैं। आलम यह है कि जिस मंत्री के परिवार से जितने पदाधिकारी हैं, वह सपा रणनीतिकारों का उतना ज्यादा करीबी माना जा रहा है। इस फेहरिस्त में शिवपाल यादव, प्रो.रामगोपाल यादव, आजम खां, महबूब अली, राजकिशोर सिंह, विनोद कुमार उर्फ पंडित सिंह, बलराम यादव, पारसनाथ यादव, रेवती रमण सिंह, नरेश अग्रवाल जैसे कई और नाम हैं।
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दो साल से सक्रिय हैं अब्दुल्ला
जासं, रामपुर : मुहम्मद आजम खां के बेटे मुहम्मद अब्दुल्ला आजम करीब सवा दो साल पहले राजनीति में सक्रिय हुए। लोकसभा चुनाव के दौरान जब चुनाव आयोग ने आजम खां पर पाबंदी लगा दी थी तब अब्दुल्ला ने ही कमान संभाली थी। उन्होंने जनसभाओं में मंच से आजम खां के विचारों से जनता को अवगत कराया, दिल्ली में चुनाव आयोग के खिलाफ धरना दिया। चुनाव जीतने के बाद हुए राजनीतिक कार्यक्रमों में भी अब्दुल्ला शामिल होते रहे। पिछले साल अगस्त में समाजवादी पार्टी ने प्रदेशभर में साइकिल रैली निकाली तो आजम खां ने रामपुर में साइकिल रैली की कमान अब्दुल्ला को सौंपी। उस दिन अब्दुल्ला ने आजम खां के अंदाज में ही तकरीर की। पिछले काफी दिनों से स्वार-टांडा क्षेत्र के लोग आजम खां से अब्दुल्ला को चुनाव लड़ाने की मांग कर रहे थे। तीन दिन पहले स्वार में हुई जनसभा में आजम खां ने अब्दुल्ला को स्वार-टांडा विधानसभा से चुनाव लड़ाने की बात कही। एमटेक शिक्षा प्राप्त अब्दुल्ला मुहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के सीईओ भी हैं।
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अगस्त-२०१६ का पहला पखवारा

०१.०८.२०१६
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हाईकोर्ट: क्यों न छह लेन किया जाए इलाहाबाद-वाराणसी राजमार्ग

हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार व राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण से मांगी जानकारी
विधि संवाददाता, इलाहाबाद : हाईकोर्ट ने इलाहाबाद वाराणसी राष्ट्रीय राजमार्ग पर कांवरियों की भीड़ के चलते यातायात की समस्या को देखते हुए राजमार्ग को छह लेन करने के मामले में केंद्र सरकार एवं राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण से एक हफ्ते में जवाब मांगा है। याचिका की अगली सुनवाई आठ अगस्त को होगी।
कांवडिय़ों की भीड़ के चलते इस राजमार्ग पर हो रही यातायात अव्यवस्था को लेकर दाखिल विनोद कालरा की जनहित याचिका पर मुख्य न्यायमूर्ति डीवी भोसले तथा न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की खण्डपीठ ने सुनवाई की। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सालों से कांवडिय़ा वाराणसी जाते हैं। राज्य सरकार को इस दौरान आने वाली यातायात की कठिनाइयों का पूरा अनुभव है तो सरकार समस्या को देखते हुए सड़क का चौड़ीकरण क्यों नहीं करती।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि चार लेन सड़क के बीच डिवाइडर है। एक तरफ कांवडिय़ा वाराणसी जाते हैं तो दूसरी तरफ से यातायात चालू रहता है। कांवडिय़ों के कारण दो लेन से यातायात में भारी कठिनाई आ रही है। सड़क 90 फीट चौड़ी होनी चाहिए। प्राधिकरण के अधिवक्ता का कहना था कि सड़क चौड़ीकरण का मसला सरकार का नीतिगत मसला है जिस पर प्राधिकरण कोई कार्यवाही नहीं कर सकता। इस पर कोर्ट ने भारत संघ को भी याचिका में पक्षकार बनाते हुए नोटिस जारी की है तथा भारत सरकार व प्राधिकरण से राजमार्ग के चौड़ीकरण के मामले में जानकारी मांगी है।
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बंगले न छीनने को बनेगा नया कानून !
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- सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर शासन में हुआ मंथन
- विधानमंडल सत्र में कानून में संशोधन संभव
लखनऊ : प्रदेश सरकार विधान मंडल से कानून बनाकर पूर्व मुख्य मंत्रियों, अधिकारियों-कर्मचारियों की एसोसिएशन, स्वयंसेवी संस्था और पत्रकारों को आवास आवंटित करने की गुंजाइश पर मंथन कर रही है। इसी माह संभावित विधानमंडल के मानसून सत्र में उत्तर प्रदेश मिनिस्टर्स (सेलरी, एलाउंसेज एन्ड मिसलेनियस प्रोविजन) एक्ट 1981 में संशोधन कर सकती है।
न्यायमूर्ति एआर दवे, न्यायमूर्ति एनवी रमना व न्यायमूर्ति आर भानुमति की पीठ ने सोमवार को सुनाए फैसले में पूर्व मुख्यमंत्रियों के आवास का आवंटन रद करने के साथ ही उस नियमावली को भी रद कर दिया था, जिसके तहत आवास आवंटन के आदेश होते हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का अध्ययन करने में जुटे कानून विदों का मानना है कि अदालत ने गैर सरकारी व्यक्तियों के आवास का आवंटन रद करने का फैसला भी दिया है। जिससे ट्रस्टों के अलावा, 149 सरकारी-अद्र्धसरकारी कर्मचारी संगठनों के कार्यालय, पत्रकारों, विभिन्न महकमों के सलाहकार, अध्यक्ष, सरकारी अधिवक्ताओं के आवासों का आवंटन भी रद होगा। सूत्रों का कहना है सुप्रीम कोर्ट केफैसले से बड़े वर्ग और सभी राजनीतिक दलों के नेताओं के प्रभावित होने का निष्कर्ष निकलने के बाद राज्य सरकार आवास आवंटन बरकरार रखने की संभावनाओं पर मंथन शुरू कर दिया है।
सूत्रों का कहना है कि सरकार मंत्रियों को आवास आवंटित करने के लिए वर्ष 1981 में बने एक्ट में संशोधन  पर विचार कर रही है। मानसून सत्र में एक्ट में संशोधन संबंधी प्रस्ताव रखा जा सकता है।
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व्यवस्थाधिकारियों से मांगा ब्यौरा
राज्य संपत्ति अधिकारी ने सरकारी कालोनियों, विधायक निवासों में कर्मचारी संगठन, राजनीतिक दलों, स्वयंसेवी संस्थाओं, पत्रकारों को आवंटित आवासों का ब्यौरा मांगा है। उनसे बकाया किराये का ब्यौरा मांगा गया है। राज्य संपत्ति अधिकारी बृजराज यादव ने बताया कि विद्युत विभाग के अधिकारियों से बिजली के बिल का बकाया भी पूछा गया है। यादव का कहना है कि अगले तीन दिनों के अंदर ब्योरा तैयार कर लिया जाएगा। फिर अदालत के फैसले के अनुरुप कार्यवाही शुरू की जाएगी।
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आवास खाली करने का नोटिस
अदालत के फैसले पर विधि विशेषज्ञों की राय आने के बाद आवंटियों को आवास खाली करने का नोटिस जारी किया जाएगा। ब्यौरा तैयार हो रहा है। जल्द ही इस दिशा में कार्यवाही शुरू हो जाएगी।
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किसका कितना किराया बाकी
पूर्व मुख्यमंत्री मायावती-3 लाख 49 हजार लगभग
पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह-15249 रुपए लगभग
पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह-एक लाख 28 हजार लगभग
पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी- 16027 रुपए लगभग
पूर्व मुख्यमंत्री (दिवंगत)-राम प्रकाश गुप्ता-3.28 लाख लगभग
पूर्व मुख्यमंत्री राम नरेश यादव-15 हजार रुपए लगभग
पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव-कोई किराया नहीं बाकी -------------------
रास्ता अभी बाकी
कोर्ट ने भले पूर्व मुख्य मंत्रियों को आवास आवंटित करने का आदेश गैर कानूनी ठहरा दिया हो मगर विधानसभा से कानून पारित कराने का रास्ता बरकरार है। इतना ही नहीं कानून को पूर्व से ही लागू किया जा सकता है।-उमेश वर्मा, वरिष्ठ अधिवक्ता हाईकोर्ट
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तलाश रहे ब्योरा
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अध्ययन किया जा रहा है। अदालत  ने जिस नियम को रद किया है, उसके जरिये आवंटित आवासों का ब्यौरा तलाशा जा रहा है। विशेषज्ञों की राय मिलने के बाद कार्रवाई होगी-बृजराज यादव, राज्य संपत्ति अधिकारी, उत्तर प्रदेश

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 सपा 'सुरोंÓ का भी संग्राम छेड़ेगी
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-शिवपाल का नाम गीतों में पिरोया गया, गीतों से अभी परे हैं प्रो. रामगोपाल
परवेज अहमद,लखनऊ:  'क्रांति रथ यात्राÓ के सारथी अखिलेश यादव के व्यक्तित्व को गीतों में पिरोकर वर्ष 2012 का समर फतह करने वाली समाजवादी पार्टी अब शिवपाल यादव की 'कार्यशैलीÓ को सुर-संगीत में लयबद्ध करा रही है। जिसका इस्तेमाल विधानसभा चुनाव होने की संभावना है।
यूं तो सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के संघर्षो को गीत के रूप में स्वरबद्ध करने का इतिहास पुराना है, मगर तब सारे गीत मुलायम-लोहिया पर ही केन्द्रित होते रहे हैं। वर्ष 2012 के चुनाव में प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव के युवा चेहरे को केन्द्रित कर गीत की श्रंखला बनी, जिसने चुनावी मिशन की कामयाबी में कारगर भूमिका निभायी। लोकसभा चुनाव के समय एक पूर्व सांसद का गढ़ा मुहावरा रूपांतरित होकर 'मन से हैं मुलायम, इरादे लोहा हैंÓ गीत के रूप में सामने आया जो सपाइयों की जुबान पर चढ़ा। अब फिर चुनावी मौसम दरपेश हुआ तो अब तक अछूते शिवपाल को केन्द्रित कर गीतों की श्रंखला तैयार होना शुरू हो गई। इटावा के नरेन्द्र यादव द्वारा लिखित व गजल गायक कमाल खान के स्वर वाले गीतों में से एक केबोल हैं-'मिट रहे चेहरों से देखो मलाल है-शिवपाल हैं, यूपी के सच्चे लाल हैं!Ó दूसरा गीत है-'जनता से किए वादे जो, सब पूरे करवाये शिवपालजी...नेताजी का साथ वैसे ही निभा रहे शिवपाल जी। Ó मशहूर गायक जावेद अली ने मुख्यमंत्री अखिलेश की शान और उन्हें सपा का चेहरा बताने वाला गीत गाया है, जिसके बोल हैं-यूपी को प्रगति पथ पर, है यकीं तुम लाओगे, हर इच्छा और हर इक सपना पूरा कर दिखलाओगे...तरक्की का शुभारंभ, प्रगति का श्री गणेश ...अखिलेश... अखिलेश। अब मुलायम परिवार की बात की जाए तो सिर्फ प्रो.रामगोपाल यादव संगीतबद्ध होने से अछूते हैं। गीतों की यह सियासत कैसी है...कितना सटीक है? इस पर समाजवादी चिंतन सभा के अध्यक्ष दीपक मिश्र करते हैं कि गाने हमेशा से संवाद का बेहतर माध्यम रहे हैं।
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१०.०८.२०१६
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 सैफई कैफेÓ में मिलेगी गाय के दूध की चाय
-नौजवानों को रोजदार देना मकसद, कैफे की स्थापना उसी दिशा में प्रयास- अखिलेश यादव
-राज्य के दूसरे पयर्टन स्थलों में भी सैफई कैफे की चेन खुलेगी

परवेज अहमद, लखनऊ : हरी मटर का समोसा...और कड़कड़ाती चटनी के साथ आलू-भुना। गाय के शुद्ध दूध की चाय...भैंस के दूध की फिल्टर कॉफी। दिल-दिमाग को सुकून देता वातावरण और शानदार लाउंज। जी हां, कौशल विकास मिशन से प्रशिक्षत युवकों की टोली जल्द ही सरकार की मदद से ऐसी खूबियों वाली फूड चेन स्थापित करेगी और नाम होगा  'सैफई कैफे!Ó, पहला कैफे भी सैफई में ही खुलेगा।
प्रदेश में खान-पान का बड़ा बाजार है। हाल के महीनों में राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय सैलानियों का रुझान भी यहां के पयर्टन स्थलों की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में सरकार ने दूसरे राज्यों व विदेशी सैलानियों को लुभाने की लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की सुविधा वाले कैफे खोलने की दिशा में कदम बढ़ाया है। 'सैफई कैफेÓ नाम से शुरू होने वाली इस चेन में कौशल विकास मिशन से प्रशिक्षित युवकों को प्राथमिकता मिलेगी। चार युवकों का चयन हो गया है। ड्रीम प्रोजेक्ट की शुरुआत पैतृक गांव सैफई से करने की जानकारी देते हुए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कहते हैं कि खान-पान का बाजार बड़ा है। हर सूबे की खास रेसेपी है। कहीं का समोसा खास है तो कहीं की जलेबी। कहीं का डोसा लाजबाव है तो कहीं का नानवेज। और नाश्ता-खाना सबको चाहिए। सैफई में गांव के लोगों की जमीन है। उनके मदद लेकर कैफे शुरू करायेंगे। चंबल सफारी, बर्ड
सेंचुरी तैयार है। सैलानी बढेंग़े तो कैफे की जरूरत होगी। कही पर निगाहें और कहीं पर निशाना के अंदाज में मुख्यमंत्री कहते है कि 'गाय के शुद्ध दूध की चाय पीनी होगी तो कई लोगों को सैफई, चंबल सफारी का रुख
करना होगा। गाय तो गांव वाले ही पालते हैं।Ó अखिलेश यादव पयर्टन की दृष्टि से महत्वपूर्ण शहरों में सैफई कैफे स्थापित कराने का संकेत देते हैं। कहते हैं कि समाजवादी
सरकार नौजवानों को उनके पैरों पर खड़ा करना चाहती है। यह उसी दिशा में एक प्रयास है। प्रमुख सचिव पयर्टन नवनीत सहगल का कहना है कि सैफई कैफे को विस्तार देने की दिशा कदम बढ़ाया जाएगा।
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लाउंज अन्तराष्ट्रीय स्तर के होंगे
'सैफई कैफेÓ का इंटीरियर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कैफे जैसा होगा। शानदार लाउंज होंगे। देशी-विदेशी संगीत सुनने की सुविधा होगी। एक इनफरमेशन कार्नर होगा, जहां प्रदेश के पयर्टन स्थलों का इतिहास और खूबियां जानी जा सकेंगी। आन कॉल टैक्सी की सुविधा होगी।
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सैफई कैफे में क्या खास
इडली-सांभर, इडली फ्राई, दही बड़ा, कई तरह के डोसा, उत्पम, टमाटर उत्पम, फिल्टर कॉफी, लस्सी, गगरी का म_ा, शुद्ध दूध की चाय और सरसों के तेल में बने समोसे भी इस कैफे में होंगे। भुने, भाप में तैयार व्यंजनों की सिरीज की भी योजना है।

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१२.०८.२०१६
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 'शक्तिÓ भरोसे दौड़ेगा सपा का चुनावी रथ
 -अखिलेश यादव की रथयात्रा शारदीय नवरात्र से
-मुलायम 18 सभाएं करेंगे, डिंपल भी करेंगी प्रचार
-सबका आशीष लेकर चलाएंगे विकास रथ: अखिलेश
परवेज अहमद, लखनऊ : सफलता के'हाथ सौ होते हैं और हारे दुश्मन के हजार हाथ होते हैंÓ। समाजवादी पार्टी  इसी कहावत सी सियासी दुश्मनों से मुकाबिल है। संभवत: यही कारण है कि मुख्यमंत्री व सपा के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव का 'विकास रथÓ चुनाव की पथरीली  जमीन पर दौड़ाने से पहले ज्योतिषाचार्यों से बेहतर 'मुहूर्तÓ खंगलवाया जा रहा है। शारदीय नवरात्र से यात्रा शुभ बतायी गयी है।
सत्तारूढ़ रहते चुनावी समर में कूदने के अपने नफा-नुकसान है। संसाधनों की उपलब्धता जहां जनता तक पहुंचाने में फायदेमंद होती है, वहीं जनता के मस्तिष्क में विपक्ष के आरोपों की ओर झुकाव होता है। सपा यह मानकर चल भी रही है मुख्य प्रतिद्वंदी भाजपा होगी। और मुददे और सवाल नए होंगे। शायद इसीलिए अखिलेश के विकास रथ की शुरूआत का समय नवरात्र निर्धारित किया गया है।  मिशन-2017 में मुलायम सिंह यादव सिर्फ 18 रैलियां करेंगे, जिसकी रूपरेखा भी तैयार हो गयी है, मगर पहली बार कन्नौज की सांसद डिंपल यादव भी कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में प्रचार का जिम्मा संभालेंगी। सूत्रों का कहना है कि इस बार का अखिलेश का विकास रथ 'बुलट प्रूफÓ है। वह क्रांति रथ से बड़ा है। इंटरनेट, टीवी की सुविधा के साथ हाईड्रोलिक लिफ्ट और दूर तक सुनाई देने वाले स्पीकरों की सुविधा भी है। इसमें सरकारी काम निपटने का एक कोना भी है। सूत्रों का कहना है कि विकास रथ जिस ओर कूच करने वाला होगा, उस ओर दो दिन पहले युवा ब्रिगेड की टोली पहुंचेगी। जो उत्तेजक राग और ढोल नगाड़ों की धुन पर तैयार गीत बजायेगी। नुक्कड़ नाटक करेगी।  युवजन सभा, लोहिया वाहिनी, छात्रसभा, मुलायम सिंह यूथ ब्रिगेड रथ पहुंचने से पहले क्षेत्र में न सिर्फ सकारात्मक वातावरण बनाएगी बल्कि क्षेत्रीय समस्याएं चिन्हित कर उसकी जानकारी अखिलेश को उपलब्ध करायेगी, भाषणों में उसका उपयोग होगा। अखिलेश यादव ने 2012 के चुनाव में नौजवानों पर पर भरोसा जताया था, इस बार भी युवा जोश ही मुख्य भूमिका में होगा। मगर फर्क यह होगा कि इस बार पांच साल का हिसाब भी देना होगा। अखिलेश इस परिस्थिति को समझ भी रहे हैं, इसीलिए भाजपा व समर्थक दलों के 73 सांसदों को पत्र लिखकर विकास में सहयोग न करने की उलाहना दी है तो अपने दल के सांसदों को भी विकास कार्यों में दिलचस्पी लेने का संदेश दिया है।
नवरात्र यानी अक्टूबर में चुनावी अभियान शुरूआत का एक कारण अभियान को लगातार अक्षुण्य रखना भी है और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दैनिक जागरण से कहा भी कि 'एक बार रथ पर सवार हुआ तो फिर जनता तक अपनी बात पहुंचाकर लौटूंगा। हम विकास को  मुद्दा बनायेंगे, जनता को केन्द्र और राज्य सरकार के विकास की तुलना का मौका मिलेगा। तय उन्हें करना है।Ó वह जोड़ते हैं कि समाजवादी सभी धर्म जाति को सम्मान देने में यकीन करते हैं। रथ पर सवार होने से पहले सभी धर्म गुरुओं और आस्थावानों का आशीष लिया जाएगा।
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१४.०८.२०१६
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- दिसंबर में चुनाव की तैयारी में जुटी सपा
-प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने जिलाध्यक्षों, विधायकों, प्रत्याशियों को भेजा निर्देश
-एक से सात सितंबर तक बूथ प्रशिक्षण शिविर में प्रत्याशियों, विधायकों की मौजूदगी अनिवार्य

परवेज अहमद, लखनऊ : प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी दिसंबर माह में चुनावी डुगडुगी की संभावना के आधार पर लाव-लश्कर दुरुस्त कर रही है। एक से सात सितंबर तक विधानसभा क्षेत्रों में प्रस्तावित प्रशिक्षण शिविरों में प्रत्याशियों, विधायकों और क्षेत्रीय मंत्रियों को मौजूद रहने की हिदायत दी गयी है। शिविरों की निगरानी प्रेक्षक भी तैनात किये गए हैं।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की ओर से संगठन व विभिन्न पदों पर आसीन ओहदेदारों को भेजे गये निर्देश में कहा गया है कि दिसंबर में विधानसभा चुनाव की संभावना है। ऐसे में बूथ कमेटियों के गठन के साथ विधानसभा क्षेत्रों में कार्यकर्ता सम्मेलन, प्रशिक्षण शिविर लगाये जाएं। जिन जिलों में पांच से कम विधानसभा क्षेत्र हैं, वहां एक दिन छोड़कर शिविर लगाये जाएं, अन्य क्षेत्रों में एक दिन में एक ही विधानसभा क्षेत्र में प्रशिक्षण शिविर लगाया जाए। इसमें कम से कम तीन हजार कार्यकर्ताओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। यादव ने कहा है कि 'एक बूथ-बीस यूथÓ की बूथ कमेटियां गठित की जानी है, मगर अब तक 315 विधानसभा क्षेत्रों में ही कमेटियां बनी हैं। बचे हुए क्षेत्रों में 20 अगस्त कमेटियां गठित कर लेने की हिदायत दी गई है।
प्रदेश सचिव व विधान परिषद सदस्य एसआरएस की ओर से जिलाध्यक्षों को भेजे गये मुख्यमंत्री अख्रिलेश यादव के पत्र में कहा गया है कि समाजवादी सरकार ने साढ़े चार साल के कार्यकाल में जो भी विकास कार्य कराए हैं, उनके होर्डिंग, बैनर प्रभावी ढंग से लगाये जाएं। कार्यकर्ता घर-घर जाकर लोगों से संपर्क करें।
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बूथ कार्यकर्ता को जिम्मेदारी बतायें
विधायकों, प्रत्याशियों और जिलाध्यक्षों से कहा गया है कि वह बूथ कमेटियों के सदस्यों को साफ शब्दों में यह बतायें कि मतदान के दिन और उससे पहले उन्हें क्या-क्या कार्य करने हैं, उनका उत्तरदायित्व क्या है? बूथ कमेटी के सदस्यों की दिक्कतों को भी सुनकर उसे अतिशीघ्र सुलझाया जाए।
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विधायक भी लगाएं होर्डिंग
सपा के प्रदेश अध्यक्ष ने विधायकों को भी निर्देशित किया है कि उनके क्षेत्र में जो भी विकास कार्य हुए हैं और कराये गये हैं, उसकी जानकारी देने वाले बोर्ड क्षेत्र में लगाये जायें। सरकार की समाजवादी पेंशन, किसानों की आर्थिक मदद और केन्द्र सरकार के सौतेलेपन का प्रचार करने को कहा गया है।
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घोषणा पत्र योग्य समस्या जानें
विधायकों व प्रत्याशियों से कहा गया है कि वह इन्ही प्रशिक्षण शिविरों में यह भी जानने का प्रयास करेंगे कि अब मुख्य समस्या क्या है ताकि उसे पार्टी चुनावी घोषणा पत्र का हिस्सा बनाकर विपक्षी दलों को उसका जवाब दे सके। सपा के प्रदेश सचिव एसआरएस यादव ने कहा कि मुख्यमंत्री के निर्देश जिलाध्यक्षों व पार्टी के अन्य पदाधिकारियों को भेज दिये गये हैं। बूथ प्रशिक्षण शिविर एक से सात सितम्बर तक पूरा करा लिया जाएगा।



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२२.०८.२०१६
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 दावेदारों का दम फिर से टटोल रही सपा
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-गुपचुप तैयार हो रहे सर्वे के आधार पर होगा प्रत्याशियों का चयन
-विधायकों की करवट से पार्टी चौकन्नी, नए सिरे से दमखम तौलकर टिकट बांटने की तैयारी
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परवेज अहमद, लखनऊ : कुछ महीनों के अंदर होने वाले विधानसभा चुनाव में फिर जादुई आंकड़े तक पहुंचने की आस बांधे समाजवादी पार्टी (सपा) टिकट बंटवारे में गफलत नहीं चाहती। इसीलिए पार्टी सरकारी खुफिया, निजी एजेंसी और 'अपने लोगोंÓ से विधायकों, दावेदारों का दम-खम टटोलने के प्रयास में लगी है।
पार्टी की इस रणनीति से वाकिफ हो गए कई विधायक अब एक आंख से विकल्प और दूसरी से दल का रुख भांपने का प्रयास कर रहे हैं। यह चर्चा भी खुलकर हो रही है कि मंडलीय प्रेक्षक रहे युवा विधान परिषद सदस्यों ने नेतृत्व को जो रिपोर्ट सौंपी है, उसमें तमाम किन्तु-परन्तु हैं ही, ढेरों विधायकों की जमीनी पकड़ कमजोर होने के संकेत भी हैं। लखनऊ व बाराबंकी, इलाहाबाद, मेरठ मंडल के प्रेक्षकों ने ऐसे विधायकों पर सवाल खड़े कर दिये हैं, जिन्हें आमतौर पर जनाधार वाला कहा जाता है।पहली बार चुनकर विधानसभा पहुंचे विधायकों में से कुछ पर प्रतिष्ठा और जनता की भावना संभालने में कामयाब न हो पाने की बात भी है।
ऐसी रिपोर्ट से बेचैन सपा के रणनीतिकारों ने नए सिरे विधायकों, टिकट के दावेदारों का दम-खम पता करने का अभियान शुरू किया है। सरकारी, खुफिया और 'अपने लोगोंÓ से पार्टी जहां विधायकों, टिकट के दावेदारों के हाल ले रही है, वहीं निजी एजेंसी से जातीय प्रभाव और धार्मिक भावनाओं के प्रभाव का आकलन करा रही है। यह भी हकीकत है कि टिकट बंटवारे की कसौटी की अपने मानकों पर कसने के  अलावा सपा के पास ज्यादा विकल्प नहीं है।
इसे अतीत से जोड़कर देखें तो सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव खुद कई बार विधायकों, मंत्रियों को आईना दिखा चुके हैं, यदि उनके कहे को समीक्षा का प्राथमिक चरण मान लिया जाए तो आधे से ज्यादा मंत्री 2017 के टिकट के मानकों पर फेल कहे जा सकते हैं। माना जा रहा है कि जिन क्षेत्रों में प्रत्याशी का ज्यादा विरोध उभरने की संभावना है वहां अंतिम समय में टिकट घोषित होंगे। जबकि हाशिए पर चल रहे विधायक जल्द उम्मीदवारी तय कराना चाहते हैं ताकि वह अपना फैसला ले सकें। ब्राह्मïण चेहरा व पूर्व राष्ट्रीय सचिव राजेश दीक्षित कहते हैं कि दोबारा सरकार बनाने के लिए सब को एकजुट करना होगा। सपा समाज के किसी भी वर्ग को उपेक्षित नहीं करने की नीति पर चल रही है। प्रदेश प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी का कहना है कि चुनाव से पहले सभी दल हालात का जायजा लेते हैं, सपा भी इसी दिशा में काम कर रही है।
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०१.०८.२०१६
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क्यों न छह लेन किया जाए इलाहाबाद-वाराणसी राजमार्ग
हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार व राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण से मांगी जानकारी

इलाहाबाद : हाईकोर्ट ने इलाहाबाद वाराणसी राष्ट्रीय राजमार्ग पर कांवरियों की भीड़ के चलते यातायात की समस्या को देखते हुए राजमार्ग को छह लेन करने के मामले में केंद्र सरकार एवं राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण से एक हफ्ते में जवाब मांगा है। याचिका की अगली सुनवाई आठ अगस्त को होगी।
कांवडिय़ों की भीड़ के चलते इस राजमार्ग पर हो रही यातायात अव्यवस्था को लेकर दाखिल विनोद कालरा की जनहित याचिका पर मुख्य न्यायमूर्ति डीवी भोसले तथा न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की खण्डपीठ ने सुनवाई की। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सालों से कांवडिय़ा वाराणसी जाते हैं। राज्य सरकार को इस दौरान आने वाली यातायात की कठिनाइयों का पूरा अनुभव है तो सरकार समस्या को देखते हुए सड़क का चौड़ीकरण क्यों नहीं करती।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि चार लेन सड़क के बीच डिवाइडर है। एक तरफ कांवडिय़ा वाराणसी जाते हैं तो दूसरी तरफ से यातायात चालू रहता है। कांवडिय़ों के कारण दो लेन से यातायात में भारी कठिनाई आ रही है। सड़क 90 फीट चौड़ी होनी चाहिए। प्राधिकरण के अधिवक्ता का कहना था कि सड़क चौड़ीकरण का मसला सरकार का नीतिगत मसला है जिस पर प्राधिकरण कोई कार्यवाही नहीं कर सकता। इस पर कोर्ट ने भारत संघ को भी याचिका में पक्षकार बनाते हुए नोटिस जारी की है तथा भारत सरकार व प्राधिकरण से राजमार्ग के चौड़ीकरण के मामले में जानकारी मांगी है।
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 बंगले न छीनने को बनेगा नया कानून !
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- सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर शासन में हुआ मंथन
- विधानमंडल सत्र में कानून में संशोधन संभव
 लखनऊ : प्रदेश सरकार विधान मंडल से कानून बनाकर पूर्व मुख्य मंत्रियों, अधिकारियों-कर्मचारियों की एसोसिएशन, स्वयंसेवी संस्था और पत्रकारों को आवास आवंटित करने की गुंजाइश पर मंथन कर रही है। इसी माह संभावित विधानमंडल के मानसून सत्र में उत्तर प्रदेश मिनिस्टर्स (सेलरी, एलाउंसेज एन्ड मिसलेनियस प्रोविजन) एक्ट 1981 में संशोधन कर सकती है।
न्यायमूर्ति एआर दवे, न्यायमूर्ति एनवी रमना व न्यायमूर्ति आर भानुमति की पीठ ने सोमवार को सुनाए फैसले में पूर्व मुख्यमंत्रियों के आवास का आवंटन रद करने के साथ ही उस नियमावली को भी रद कर दिया था, जिसके तहत आवास आवंटन के आदेश होते हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का अध्ययन करने में जुटे कानून विदों का मानना है कि अदालत ने गैर सरकारी व्यक्तियों के आवास का आवंटन रद करने का फैसला भी दिया है। जिससे ट्रस्टों के अलावा, 149 सरकारी-अद्र्धसरकारी कर्मचारी संगठनों के कार्यालय, पत्रकारों, विभिन्न महकमों के सलाहकार, अध्यक्ष, सरकारी अधिवक्ताओं के आवासों का आवंटन भी रद होगा। सूत्रों का कहना है सुप्रीम कोर्ट केफैसले से बड़े वर्ग और सभी राजनीतिक दलों के नेताओं के प्रभावित होने का निष्कर्ष निकलने के बाद राज्य सरकार आवास आवंटन बरकरार रखने की संभावनाओं पर मंथन शुरू कर दिया है।
सूत्रों का कहना है कि सरकार मंत्रियों को आवास आवंटित करने के लिए वर्ष 1981 में बने एक्ट में संशोधन  पर विचार कर रही है। मानसून सत्र में एक्ट में संशोधन संबंधी प्रस्ताव रखा जा सकता है।
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व्यवस्थाधिकारियों से मांगा ब्यौरा
राज्य संपत्ति अधिकारी ने सरकारी कालोनियों, विधायक निवासों में कर्मचारी संगठन, राजनीतिक दलों, स्वयंसेवी संस्थाओं, पत्रकारों को आवंटित आवासों का ब्यौरा मांगा है। उनसे बकाया किराये का ब्यौरा मांगा गया है। राज्य संपत्ति अधिकारी बृजराज यादव ने बताया कि विद्युत विभाग के अधिकारियों से बिजली के बिल का बकाया भी पूछा गया है। यादव का कहना है कि अगले तीन दिनों के अंदर ब्योरा तैयार कर लिया जाएगा। फिर अदालत के फैसले के अनुरुप कार्यवाही शुरू की जाएगी।
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आवास खाली करने का नोटिस
अदालत के फैसले पर विधि विशेषज्ञों की राय आने के बाद आवंटियों को आवास खाली करने का नोटिस जारी किया जाएगा। ब्यौरा तैयार हो रहा है। जल्द ही इस दिशा में कार्यवाही शुरू हो जाएगी।
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किसका कितना किराया बाकी
पूर्व मुख्यमंत्री मायावती-3 लाख 49 हजार लगभग
पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह-15249 रुपए लगभग
पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह-एक लाख 28 हजार लगभग
पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी- 16027 रुपए लगभग
पूर्व मुख्यमंत्री (दिवंगत)-राम प्रकाश गुप्ता-3.28 लाख लगभग
पूर्व मुख्यमंत्री राम नरेश यादव-15 हजार रुपए लगभग
पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव-कोई किराया नहीं बाकी -------------------
रास्ता अभी बाकी
कोर्ट ने भले पूर्व मुख्य मंत्रियों को आवास आवंटित करने का आदेश गैर कानूनी ठहरा दिया हो मगर विधानसभा से कानून पारित कराने का रास्ता बरकरार है। इतना ही नहीं कानून को पूर्व से ही लागू किया जा सकता है।-उमेश वर्मा, वरिष्ठ अधिवक्ता हाईकोर्ट
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तलाश रहे ब्योरा
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अध्ययन किया जा रहा है। अदालत  ने जिस नियम को रद किया है, उसके जरिये आवंटित आवासों का ब्यौरा तलाशा जा रहा है। विशेषज्ञों की राय मिलने के बाद कार्रवाई होगी-बृजराज यादव, राज्य संपत्ति अधिकारी, उत्तर प्रदेश
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 सपा 'सुरों का भी संग्राम छेड़ेगी
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 -शिवपाल का नाम गीतों में पिरोया गया, गीतों से अभी परे हैं प्रो. रामगोपाल

परवेज अहमद,लखनऊ: 'क्रांति रथ यात्राÓ के सारथी अखिलेश यादव के व्यक्तित्व को गीतों में पिरोकर वर्ष 2012 का समर फतह करने वाली समाजवादी पार्टी अब शिवपाल यादव की 'कार्यशैलीÓ को सुर-संगीत में लयबद्ध करा रही है। जिसका इस्तेमाल विधानसभा चुनाव होने की संभावना है।
यूं तो सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के संघर्षो को गीत के रूप में स्वरबद्ध करने का इतिहास पुराना है, मगर तब सारे गीत मुलायम-लोहिया पर ही केन्द्रित होते रहे हैं। वर्ष 2012 के चुनाव में प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव के युवा चेहरे को केन्द्रित कर गीत की श्रंखला बनी, जिसने चुनावी मिशन की कामयाबी में कारगर भूमिका निभायी। लोकसभा चुनाव के समय एक पूर्व सांसद का गढ़ा मुहावरा रूपांतरित होकर 'मन से हैं मुलायम, इरादे लोहा हैंÓ गीत के रूप में सामने आया जो सपाइयों की जुबान पर चढ़ा। अब फिर चुनावी मौसम दरपेश हुआ तो अब तक अछूते शिवपाल को केन्द्रित कर गीतों की श्रंखला तैयार होना शुरू हो गई। इटावा के नरेन्द्र यादव द्वारा लिखित व गजल गायक कमाल खान के स्वर वाले गीतों में से एक केबोल हैं-'मिट रहे चेहरों से देखो मलाल है-शिवपाल हैं, यूपी के सच्चे लाल हैं!Ó दूसरा गीत है-'जनता से किए वादे जो, सब पूरे करवाये शिवपालजी...नेताजी का साथ वैसे ही निभा रहे शिवपाल जी। Ó मशहूर गायक जावेद अली ने मुख्यमंत्री अखिलेश की शान और उन्हें सपा का चेहरा बताने वाला गीत गाया है, जिसके बोल हैं-यूपी को प्रगति पथ पर, है यकीं तुम लाओगे, हर इच्छा और हर इक सपना पूरा कर दिखलाओगे...तरक्की का शुभारंभ, प्रगति का श्री गणेश ...अखिलेश... अखिलेश। अब मुलायम परिवार की बात की जाए तो सिर्फ प्रो.रामगोपाल यादव संगीतबद्ध होने से अछूते हैं। गीतों की यह सियासत कैसी है...कितना सटीक है? इस पर समाजवादी चिंतन सभा के अध्यक्ष दीपक मिश्र करते हैं कि गाने हमेशा से संवाद का बेहतर माध्यम रहे हैं।
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१०.०८.२०१६
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 सैफई कैफेÓ में मिलेगी गाय के दूध की चाय
-नौजवानों को रोजदार देना मकसद, कैफे की स्थापना उसी दिशा में प्रयास- अखिलेश यादव
-राज्य के दूसरे पयर्टन स्थलों में भी सैफई कैफे की चेन खुलेगी

परवेज अहमद, लखनऊ : हरी मटर का समोसा...और कड़कड़ाती चटनी के साथ आलू-भुना। गाय के शुद्ध दूध की चाय...भैंस के दूध की फिल्टर कॉफी। दिल-दिमाग को सुकून देता वातावरण और शानदार लाउंज। जी हां, कौशल विकास मिशन से प्रशिक्षत युवकों की टोली जल्द ही सरकार की मदद से ऐसी खूबियों वाली फूड चेन स्थापित करेगी और नाम होगा  'सैफई कैफे!Ó, पहला कैफे भी सैफई में ही खुलेगा।
प्रदेश में खान-पान का बड़ा बाजार है। हाल के महीनों में राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय सैलानियों का रुझान भी यहां के पयर्टन स्थलों की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में सरकार ने दूसरे राज्यों व विदेशी सैलानियों को लुभाने की लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की सुविधा वाले कैफे खोलने की दिशा में कदम बढ़ाया है। 'सैफई कैफेÓ नाम से शुरू होने वाली इस चेन में कौशल विकास मिशन से प्रशिक्षित युवकों को प्राथमिकता मिलेगी। चार युवकों का चयन हो गया है। ड्रीम प्रोजेक्ट की शुरुआत पैतृक गांव सैफई से करने की जानकारी देते हुए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कहते हैं कि खान-पान का बाजार बड़ा है। हर सूबे की खास रेसेपी है। कहीं का समोसा खास है तो कहीं की जलेबी। कहीं का डोसा लाजबाव है तो कहीं का नानवेज। और नाश्ता-खाना सबको चाहिए। सैफई में गांव के लोगों की जमीन है। उनके मदद लेकर कैफे शुरू करायेंगे। चंबल सफारी, बर्ड
सेंचुरी तैयार है। सैलानी बढेंग़े तो कैफे की जरूरत होगी। कही पर निगाहें और कहीं पर निशाना के अंदाज में मुख्यमंत्री कहते है कि 'गाय के शुद्ध दूध की चाय पीनी होगी तो कई लोगों को सैफई, चंबल सफारी का रुख
करना होगा। गाय तो गांव वाले ही पालते हैं।Ó अखिलेश यादव पयर्टन की दृष्टि से महत्वपूर्ण शहरों में सैफई कैफे स्थापित कराने का संकेत देते हैं। कहते हैं कि समाजवादी
सरकार नौजवानों को उनके पैरों पर खड़ा करना चाहती है। यह उसी दिशा में एक प्रयास है। प्रमुख सचिव पयर्टन नवनीत सहगल का कहना है कि सैफई कैफे को विस्तार देने की दिशा कदम बढ़ाया जाएगा।
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लाउंज अन्तराष्ट्रीय स्तर के होंगे
'सैफई कैफेÓ का इंटीरियर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कैफे जैसा होगा। शानदार लाउंज होंगे। देशी-विदेशी संगीत सुनने की सुविधा होगी। एक इनफरमेशन कार्नर होगा, जहां प्रदेश के पयर्टन स्थलों का इतिहास और खूबियां जानी जा सकेंगी। आन कॉल टैक्सी की सुविधा होगी।
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सैफई कैफे में क्या खास
इडली-सांभर, इडली फ्राई, दही बड़ा, कई तरह के डोसा, उत्पम, टमाटर उत्पम, फिल्टर कॉफी, लस्सी, गगरी का म_ा, शुद्ध दूध की चाय और सरसों के तेल में बने समोसे भी इस कैफे में होंगे। भुने, भाप में तैयार व्यंजनों की सिरीज की भी योजना है।

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१२.०८.२०१६
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 'शक्तिÓ भरोसे दौड़ेगा सपा का चुनावी रथ

-अखिलेश यादव की रथयात्रा शारदीय नवरात्र से
-मुलायम 18 सभाएं करेंगे, डिंपल भी करेंगी प्रचार
-सबका आशीष लेकर चलाएंगे विकास रथ: अखिलेश

परवेज अहमद, लखनऊ : सफलता के'हाथ सौ होते हैं और हारे दुश्मन के हजार हाथ होते हैंÓ। समाजवादी पार्टी  इसी कहावत सी सियासी दुश्मनों से मुकाबिल है। संभवत: यही कारण है कि मुख्यमंत्री व सपा के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव का 'विकास रथÓ चुनाव की पथरीली  जमीन पर दौड़ाने से पहले ज्योतिषाचार्यों से बेहतर 'मुहूर्तÓ खंगलवाया जा रहा है। शारदीय नवरात्र से यात्रा शुभ बतायी गयी है।
सत्तारूढ़ रहते चुनावी समर में कूदने के अपने नफा-नुकसान है। संसाधनों की उपलब्धता जहां जनता तक पहुंचाने में फायदेमंद होती है, वहीं जनता के मस्तिष्क में विपक्ष के आरोपों की ओर झुकाव होता है। सपा यह मानकर चल भी रही है मुख्य प्रतिद्वंदी भाजपा होगी। और मुददे और सवाल नए होंगे। शायद इसीलिए अखिलेश के विकास रथ की शुरूआत का समय नवरात्र निर्धारित किया गया है।  मिशन-2017 में मुलायम सिंह यादव सिर्फ 18 रैलियां करेंगे, जिसकी रूपरेखा भी तैयार हो गयी है, मगर पहली बार कन्नौज की सांसद डिंपल यादव भी कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में प्रचार का जिम्मा संभालेंगी। सूत्रों का कहना है कि इस बार का अखिलेश का विकास रथ 'बुलट प्रूफÓ है। वह क्रांति रथ से बड़ा है। इंटरनेट, टीवी की सुविधा के साथ हाईड्रोलिक लिफ्ट और दूर तक सुनाई देने वाले स्पीकरों की सुविधा भी है। इसमें सरकारी काम निपटने का एक कोना भी है। सूत्रों का कहना है कि विकास रथ जिस ओर कूच करने वाला होगा, उस ओर दो दिन पहले युवा ब्रिगेड की टोली पहुंचेगी। जो उत्तेजक राग और ढोल नगाड़ों की धुन पर तैयार गीत बजायेगी। नुक्कड़ नाटक करेगी।  युवजन सभा, लोहिया वाहिनी, छात्रसभा, मुलायम सिंह यूथ ब्रिगेड रथ पहुंचने से पहले क्षेत्र में न सिर्फ सकारात्मक वातावरण बनाएगी बल्कि क्षेत्रीय समस्याएं चिन्हित कर उसकी जानकारी अखिलेश को उपलब्ध करायेगी, भाषणों में उसका उपयोग होगा। अखिलेश यादव ने 2012 के चुनाव में नौजवानों पर पर भरोसा जताया था, इस बार भी युवा जोश ही मुख्य भूमिका में होगा। मगर फर्क यह होगा कि इस बार पांच साल का हिसाब भी देना होगा। अखिलेश इस परिस्थिति को समझ भी रहे हैं, इसीलिए भाजपा व समर्थक दलों के 73 सांसदों को पत्र लिखकर विकास में सहयोग न करने की उलाहना दी है तो अपने दल के सांसदों को भी विकास कार्यों में दिलचस्पी लेने का संदेश दिया है।
नवरात्र यानी अक्टूबर में चुनावी अभियान शुरूआत का एक कारण अभियान को लगातार अक्षुण्य रखना भी है और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दैनिक जागरण से कहा भी कि 'एक बार रथ पर सवार हुआ तो फिर जनता तक अपनी बात पहुंचाकर लौटूंगा। हम विकास को  मुद्दा बनायेंगे, जनता को केन्द्र और राज्य सरकार के विकास की तुलना का मौका मिलेगा। तय उन्हें करना है।Ó वह जोड़ते हैं कि समाजवादी सभी धर्म जाति को सम्मान देने में यकीन करते हैं। रथ पर सवार होने से पहले सभी धर्म गुरुओं और आस्थावानों का आशीष लिया जाएगा।

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१४.०८.२०१६
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 -दिसंबर में चुनाव की तैयारी में जुटी सपा
-प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने जिलाध्यक्षों, विधायकों, प्रत्याशियों को भेजा निर्देश
-एक से सात सितंबर तक बूथ प्रशिक्षण शिविर में प्रत्याशियों, विधायकों की मौजूदगी अनिवार्य

परवेज अहमद, लखनऊ : प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी दिसंबर माह में चुनावी डुगडुगी की संभावना के आधार पर लाव-लश्कर दुरुस्त कर रही है। एक से सात सितंबर तक विधानसभा क्षेत्रों में प्रस्तावित प्रशिक्षण शिविरों में प्रत्याशियों, विधायकों और क्षेत्रीय मंत्रियों को मौजूद रहने की हिदायत दी गयी है। शिविरों की निगरानी प्रेक्षक भी तैनात किये गए हैं।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की ओर से संगठन व विभिन्न पदों पर आसीन ओहदेदारों को भेजे गये निर्देश में कहा गया है कि दिसंबर में विधानसभा चुनाव की संभावना है। ऐसे में बूथ कमेटियों के गठन के साथ विधानसभा क्षेत्रों में कार्यकर्ता सम्मेलन, प्रशिक्षण शिविर लगाये जाएं। जिन जिलों में पांच से कम विधानसभा क्षेत्र हैं, वहां एक दिन छोड़कर शिविर लगाये जाएं, अन्य क्षेत्रों में एक दिन में एक ही विधानसभा क्षेत्र में प्रशिक्षण शिविर लगाया जाए। इसमें कम से कम तीन हजार कार्यकर्ताओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। यादव ने कहा है कि 'एक बूथ-बीस यूथÓ की बूथ कमेटियां गठित की जानी है, मगर अब तक 315 विधानसभा क्षेत्रों में ही कमेटियां बनी हैं। बचे हुए क्षेत्रों में 20 अगस्त कमेटियां गठित कर लेने की हिदायत दी गई है।
प्रदेश सचिव व विधान परिषद सदस्य एसआरएस की ओर से जिलाध्यक्षों को भेजे गये मुख्यमंत्री अख्रिलेश यादव के पत्र में कहा गया है कि समाजवादी सरकार ने साढ़े चार साल के कार्यकाल में जो भी विकास कार्य कराए हैं, उनके होर्डिंग, बैनर प्रभावी ढंग से लगाये जाएं। कार्यकर्ता घर-घर जाकर लोगों से संपर्क करें।
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बूथ कार्यकर्ता को जिम्मेदारी बतायें
विधायकों, प्रत्याशियों और जिलाध्यक्षों से कहा गया है कि वह बूथ कमेटियों के सदस्यों को साफ शब्दों में यह बतायें कि मतदान के दिन और उससे पहले उन्हें क्या-क्या कार्य करने हैं, उनका उत्तरदायित्व क्या है? बूथ कमेटी के सदस्यों की दिक्कतों को भी सुनकर उसे अतिशीघ्र सुलझाया जाए।
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विधायक भी लगाएं होर्डिंग
सपा के प्रदेश अध्यक्ष ने विधायकों को भी निर्देशित किया है कि उनके क्षेत्र में जो भी विकास कार्य हुए हैं और कराये गये हैं, उसकी जानकारी देने वाले बोर्ड क्षेत्र में लगाये जायें। सरकार की समाजवादी पेंशन, किसानों की आर्थिक मदद और केन्द्र सरकार के सौतेलेपन का प्रचार करने को कहा गया है।
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घोषणा पत्र योग्य समस्या जानें
विधायकों व प्रत्याशियों से कहा गया है कि वह इन्ही प्रशिक्षण शिविरों में यह भी जानने का प्रयास करेंगे कि अब मुख्य समस्या क्या है ताकि उसे पार्टी चुनावी घोषणा पत्र का हिस्सा बनाकर विपक्षी दलों को उसका जवाब दे सके। सपा के प्रदेश सचिव एसआरएस यादव ने कहा कि मुख्यमंत्री के निर्देश जिलाध्यक्षों व पार्टी के अन्य पदाधिकारियों को भेज दिये गये हैं। बूथ प्रशिक्षण शिविर एक से सात सितम्बर तक पूरा करा लिया जाएगा।
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२२.०८.२०१६
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 दावेदारों का दम फिर से टटोल रही सपा
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-गुपचुप तैयार हो रहे सर्वे के आधार पर होगा प्रत्याशियों का चयन
-विधायकों की करवट से पार्टी चौकन्नी, नए सिरे से दमखम तौलकर टिकट बांटने की तैयारी
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परवेज अहमद, लखनऊ : कुछ महीनों के अंदर होने वाले विधानसभा चुनाव में फिर जादुई आंकड़े तक पहुंचने की आस बांधे समाजवादी पार्टी (सपा) टिकट बंटवारे में गफलत नहीं चाहती। इसीलिए पार्टी सरकारी खुफिया, निजी एजेंसी और 'अपने लोगोंÓ से विधायकों, दावेदारों का दम-खम टटोलने के प्रयास में लगी है।
पार्टी की इस रणनीति से वाकिफ हो गए कई विधायक अब एक आंख से विकल्प और दूसरी से दल का रुख भांपने का प्रयास कर रहे हैं। यह चर्चा भी खुलकर हो रही है कि मंडलीय प्रेक्षक रहे युवा विधान परिषद सदस्यों ने नेतृत्व को जो रिपोर्ट सौंपी है, उसमें तमाम किन्तु-परन्तु हैं ही, ढेरों विधायकों की जमीनी पकड़ कमजोर होने के संकेत भी हैं। लखनऊ व बाराबंकी, इलाहाबाद, मेरठ मंडल के प्रेक्षकों ने ऐसे विधायकों पर सवाल खड़े कर दिये हैं, जिन्हें आमतौर पर जनाधार वाला कहा जाता है।पहली बार चुनकर विधानसभा पहुंचे विधायकों में से कुछ पर प्रतिष्ठा और जनता की भावना संभालने में कामयाब न हो पाने की बात भी है।
ऐसी रिपोर्ट से बेचैन सपा के रणनीतिकारों ने नए सिरे विधायकों, टिकट के दावेदारों का दम-खम पता करने का अभियान शुरू किया है। सरकारी, खुफिया और 'अपने लोगोंÓ से पार्टी जहां विधायकों, टिकट के दावेदारों के हाल ले रही है, वहीं निजी एजेंसी से जातीय प्रभाव और धार्मिक भावनाओं के प्रभाव का आकलन करा रही है। यह भी हकीकत है कि टिकट बंटवारे की कसौटी की अपने मानकों पर कसने के  अलावा सपा के पास ज्यादा विकल्प नहीं है।
इसे अतीत से जोड़कर देखें तो सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव खुद कई बार विधायकों, मंत्रियों को आईना दिखा चुके हैं, यदि उनके कहे को समीक्षा का प्राथमिक चरण मान लिया जाए तो आधे से ज्यादा मंत्री 2017 के टिकट के मानकों पर फेल कहे जा सकते हैं। माना जा रहा है कि जिन क्षेत्रों में प्रत्याशी का ज्यादा विरोध उभरने की संभावना है वहां अंतिम समय में टिकट घोषित होंगे। जबकि हाशिए पर चल रहे विधायक जल्द उम्मीदवारी तय कराना चाहते हैं ताकि वह अपना फैसला ले सकें। ब्राह्मïण चेहरा व पूर्व राष्ट्रीय सचिव राजेश दीक्षित कहते हैं कि दोबारा सरकार बनाने के लिए सब को एकजुट करना होगा। सपा समाज के किसी भी वर्ग को उपेक्षित नहीं करने की नीति पर चल रही है। प्रदेश प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी का कहना है कि चुनाव से पहले सभी दल हालात का जायजा लेते हैं, सपा भी इसी दिशा में काम कर रही है।

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सितंबर-२०१६ खास-खास खबरें

१.०९.२०१६
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ब्यूरो : नवंबर अंत तक चुनावी तैयारी पूरी कर लेगा आयोग

-ईवीएम मशीनों के सत्यापन का कार्य पूरा
-सियासी दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में तकनीकी परीक्षण 15 से

राज्य ब्यूरो, लखनऊ : विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटे  चुनाव आयोग ने असोम, तमिलनाडू ,केरल व बंगाल से आई चार लाख ईवीएम (इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन) का सत्यापन पूरा करा लिया है। अब 15 सितंबर से सियासी दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में मशीनों का तकनीकी परीक्षण शुरू होगा, यह कार्य नवंबर के आखिर तक पूरा हो जाएगा।
 प्रत्याशियों की संख्या केइतिहास को ध्यान में रखकर चुनाव आयोग ने विधानसभा-2017 के लिए साढ़े चार लाख ईवीएम मशीनों का इंतजाम किया है। ये मशीने बंगाल, तमिलनाडू,केरल, असोम से मगंवाई गई है, जिसका सत्यापन भी पूरा हो गया है। मशीनों के सत्यापन में इस बार विशेष मोबाइल एप्लीकेशन का इस्तेमाल किया गया जबकि अब तक ईटीएस (ईवीएम ट्रैकिंग सिस्टम) साफ्टवेयर के जरिये मशीनों का सत्यापन करना होता था। पुराने साफ्टवेयर में पूरा एक कम्प्यूटर सिस्टम गोदामों के पास लगाया जाता था, जबिक मोबाइल एप्लीकेशन में इसकी आवश्यकता नहीं पढ़ी।
चुनाव आयोग के अधिकारियों का कहना है कि 15 सितंबर से ईवीएम का तकनीकी परीक्षण शुरू होगा, इसमें प्रत्येक राजनीतिक दल के प्रतिनिधियों की मौजूदगी सुनिश्चित की जाती है। इसके लिए राजनीतिक दलों को नोटिस भेजकर प्रतिनिधि नामित करने को कहा गया है। सूत्रों का कहना है कि तकनीकी परीक्षण का कार्य नवंबर माह तक पूरा हो जाएगा। आयोग की मतदाता सूची का पहला ड्राफ्ट भी 15 सितंबर को प्रकाशित हो जाएगा। मतदान केन्द्रों पर रैम्प, पानी का कार्य भी नवंबर तक पूरा कर लेने का लक्ष्य है।
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ईवीएम का बंटवारा
बंगाल विधानसभा चुनाव में इस्तेमाल ईवीएम से सहारनपुर, मुरादाबाद, बरेली, कानपुर, आगरा, अलीगढ़ मंडलों की सीटों पर चुनाव कराये जाएंगे। केरल की ईवीएम का इस्तेमाल मेरठ मंडल में होगा। असोम में इस्तेमाल हुई मशीनों से फैजाबाद व वाराणसी मंडल में चुनाव होगा। जबकि तमिलनाडू विधानसभा के चुनाव में इस्तेमाल मशीनों से झांसी, लखनऊ, चित्रकूट, आजमगढ़, बस्ती, गोरखपुर, देवीपाटन, विंध्याचल और इलाहाबाद मंडलों के क्षेत्रों में चुनाव कराया जाएगा।
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Monday, 5 September 2016

समाजवादी स्मार्ट फोन : बुकिंग अभी, डिलेवरी चुनाव बाद




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-समाजवादी स्मार्ट फोन योजना की मुख्यमंत्री ने की घोषणा
-एक माह में शुरू हो जाएगा ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन
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लखनऊ : मुफ्त लैपटॉप के बाद स्मार्ट फोन बांटने के संकेत देने के चौथे दिन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 'समाजवादी स्मार्ट फोन योजनाÓ का एलान कर दिया। फोन के लिए आवेदन प्रक्रिया तो एक माह के अंदर ही शुरू हो जाएगी लेकिन फोन अगले वर्ष की दूसरी छमाही (जून 2017) से मिलेगा। इस बीच सूबे में विधानसभा के चुनाव होने हैं। ऐसे में फिर से सपा की सरकार बनने की दशा में ही प्रदेशवासियों को स्मार्ट फोन मिल सकेगा।
समाजवादी स्मार्ट फोन योजना के संबंध में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के फैसले की जानकारी सोमवार को सरकारी प्रवक्ता ने दी। मुफ्त लैपटॉप देने की कामयाबी के बाद सपा सरकार ने अब 'समाजवादी स्मार्ट फोन योजनाÓ शुरू करने का निर्णय किया है। मुख्यमंत्री का मानना है कि इससे जनता व सरकार के बीच टू-वे कम्युनिकेशन को बढ़ावा मिलेगा। जनता एवं लाभार्थियों से योजना के संबंध में फीडबैक मिल सकेगा। समाजवादी स्मार्ट फोन अत्याधुनिक तकनीक युक्त होगा जिसमें सरकारी योजनाओं का ब्यौरा भी होगा।
 नौकरी के आवेदन से लेकर विद्यार्थियों के लिए पठनीय सामग्री, प्रवेश, परिणाम भी इसी माध्यम से उपलब्ध कराये जाएंगे। मुख्यमंत्री ने कहा कि 18 लाख नि:शुल्क लैपटॉप बांटने में गुणवत्ता व भ्रष्टाचार की कोई शिकायत नहीं मिली। समाजवादी स्मार्ट फोन योजना को भी भ्रष्टाचार मुक्त रखा जाएगा इसीलिए आवेदक को आन लाइन रजिस्ट्रेशन कराना होगा और पहले आओ, पहले पाओ की नीति पर मोबाइल फोन का वितरण लाभार्थी के घर पर होगा।
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योजना की खास बातें
- ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रिया एक माह के अंदर शुरू होगी
-स्मार्ट फोन अगले वर्ष की दूसरी छमाही (जून-2017) में बंटेंगे यानी चुनाव बाद फिर से समाजवादी सरकार बननी चाहिए
-उत्तर प्रदेश के नागरिक ही मोबाइल पाने के पात्र होंगे  
- जनवरी 2017 को आवेदक की उम्र 18 साल होना आवश्यक होगा
-आवेदक का हाईस्कूल पास होना अनिवार्य होगा
-सरकारी अधिकारी-कर्मचारी और उनके आश्रित स्मार्ट मोबाइल फोन के पात्र नहीं होंगे
-निजी क्षेत्र में कार्यरत व्यक्ति व उसके आश्रित की सालाना आय दो लाख से ऊपर होने पर पात्रता नहीं होगी
-स्मार्ट मोबाइल फोन पहले आओ, पहले पाओ की नीति पर डाक सेवा के जरिए संबंधित व्यक्ति के घर भेजे जाएंगे
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ऐसे करना होगा आवेदन
- ऑनलाइन आवेदन के साथ हाईस्कूल की अंक तालिका की कापी अटैच (संलग्न) करनी होगी
-आवेदनपत्र की सूचना आवेदक को स्वत: प्रमाणित करनी होगी
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मोबाइल की खासियत
- किसी भी कंपनी के स्मार्ट फोन में उपलब्ध फीचर्स सरकारी फोन में भी होंगे। कई एकल एप्लीकेशन भी होंगे
-सरकारी योजनाओं का ऑडियो, वीडियो एवं सूचनात्मक टेक्स्ट मैटर इसमें आता रहेगा।
- बाजार दर, मौसम, अभिनव कार्यपद्धति (बेस्ट प्रैक्टिसेस) भी यह फोन बतायेगा
-दूध संग्रह एवं परिवहन केन्द्र, मूल्य और कारोबार की नई तकनीकें भी बतायेगा।
-सरकारी नौकरियों की रिक्तियां, आवेदन के एप्लीकेशन फोन में होंगे। पाठ्य सामग्री भी उपलब्ध रहेगी।
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जनता का धन जनता को लौटाती है सपा
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-जनता का धन जनता को लौटाने की नीति पर भरोसा करते हैं समाजवादी : एसआरएस
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 लखनऊ : मुख्यमंत्री व समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने चुनावी साल में 'समाजवादी स्मार्टफोन योजनाÓ का एलान कर 'बुद्धि दांवÓ चला है। विधानसभा चुनाव में यह कितना कारगर होगा, यह तो समय बताएगा। हालांकि समाजवादी पार्टी इसे जनता का धन जनता को लौटाने की नीति बता रही है।
समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव सार्वजनिक रूप से कहते रहे हैं कि विपक्ष में चालू लोग हैं। उनसे पार पाने के लिए समाजवादियों को 'बुद्धि दांवÓ का इस्तेमाल करना होगा। विधानसभा चुनाव का समय तेजी से करीब आ रहा है और विपक्षी अखाड़े में भी आ गये हैं। ऐसे समय में युवा मतदाताओं को रिझाने के लिए मुख्यमंत्री ने मुफ्त स्मार्टफोन का एलान कर बुद्धि दांव लगाया है। दरअसल, मुफ्त फोन के लिए आवेदन अगले माह ही शुरू हो जाएगा। योजना भी पहले आओ-पहले पाओ वाली है। ऐसे में बड़ी संख्या में लोगों के आवेदन आएंगे और अगर उनका मोह स्मार्टफोन की ओर बना रहा तो निश्चित रूप से सपा को इसका चुनावी लाभ मिलेगा। मगर सच्चाई तो चुनाव परिणाम के साथ ही आएगी। समाजवादी पार्टी के प्रदेश सचिव व विधान परिषद सदस्य एसआरएस यादव कहते हैं कि सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जनता का धन जनता को लौटाने की नीति पर यकीन करते हैं। 15 लाख छात्रों को लैपटाप बांटकर सरकार ने वादा पूरा करने के अपने भरोसे को और पुख्ता किया है। स्मार्टफोन अब जरूरत है, ऐसे में सरकार का यह फैसला आम जनता को लाभ पहुंचाने वाला है। युवा मुख्यमंत्री नौजवानों की सोच और उनकी जरूरत के आधार पर नीतियां तय करते हैं।
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कार्यकर्ता अब सुन नहीं, सुना भी रहा

५ सितंबर २०१६
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-सपा का विधानसभा वार बूथ कार्यकर्ता सम्मेलन 'कहीं फेल-कहीं पासÓ
-पार्टी का दावा सम्मेलनों में उमड़ रहे कार्यकर्ता, हो रहा उत्साह का संचार
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 लखनऊ : समाजवादी पार्टी को सरकार की विकास योजनाओं के प्रचार-प्रसार में शिथिलता की कार्यकर्ताओं से जो शिकायत थी, वह विधानसभा बूथ सम्मेलनों में सामने आ रही है मगर इस बार कार्यकर्ता उपेक्षा का दर्द बयां करने से हिचक नहीं रहा है। पार्टी के लिए यही नसीहत का समय भी है।
विधानसभा चुनाव-2017 की प्रक्रिया साल के आखिरी माह में शुरू हो जाने की संभावना के मद्देनजर समाजवादी पार्टी (सपा) विधानसभा बूथ सम्मेलनों के जरिये जमीनी कार्यकर्ताओं 'उत्साहÓ का संचार करने में जुटी है। प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव की हिदायत पर राज्य के सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में बूथ कमेटियों के प्रभारियों, सदस्यों के प्रशिक्षण शिविर लगने हैं, जिसकी शुरुआत एक सितंबर से हो गयी है। जिन क्षेत्रों में अब तक सम्मेलन हुए वहां चुनावी तैयारी के साथ मतदान के दिन बूथ कमेटी के सदस्यों के कर्तव्यों एवं दायित्वों की जानकारी दी गयी है। पार्टी की ओर से जिला,महानगर अध्यक्ष, महासचिव, सांसद, पूर्व सांसद, विधायक, पूर्व विधायक और हाल में ही विधान परिषद सदस्य बन गए युवा नेता प्रदेश में चल रही विकास योजनाओं की जानकारी साझा कर रहे हैं। एक बूथ-बीस यूथ की सच्चाई को परखा जा रहा है। सपा महासचिव अरविंद सिंह गोप का दावा है कि सम्मेलनों अपेक्षा से ज्यादा कार्यकर्ता जुट रहे हैं। उनमें दोबारा सरकार बनाने का उत्साह हिलोरे ले रहा है। अब तक जिन सौ से अधिक विधानसभा में बूथ सम्मेलन हुए हैं, वहां जनसभा जैसा दृश्य रहा है। हकीकत यह है कि अब तक के सम्मेलनों में 'कहीं पास-कहीं फेलÓ सा हाल रहा है। इलाहाबाद, जालौन, झांसी, बांदा, मेरठ, लखीमपुर, जौनपुर में उम्मीद के मुताबिक कार्यकर्ता नही जुटे। साफ है कि इन क्षेत्रों के ओहदेदारों के कार्यकर्ताओं से रिश्ते आत्मीय नहीं है। अलबत्ता बाराबंकी सदर में सुरेश यादव, जैदपुर में रामगोपाल लखीमपुर में उत्कर्ष वर्मा, सीतापुर के महमूदाबाद में नरेन्द्र सिंह वर्मा और  लखनऊ पूर्वी डॉ.श्वेता सिंह ने अपेक्षा से ज्यादा कार्यकर्ताओं को जुटाया। दरअसल, लखनऊ से दिल्ली तक कूच करने व नीतियां तय करने वालों ने संगठन को अपेक्षित तवज्जो नहीं दिया। जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करने वाले ओहदेदारों पर कोई कार्रवाई भी नहीं हुई। बूथ सम्मेलनों में पहुंचने वाले कार्यकर्ता भी जनप्रतिनिधियों से उपेक्षा मिलने का दर्द बयां करने में पीछे नहीं रह रहे हैं। यही कारण है कि योजनाओं की उपलब्धियां असल मतदाता तक नहीं पहुंची हैं।