Tuesday, 3 January 2023

जांच की चुनौती स्वीकारी तो क्या कुलाधिपतियों से पूछताछ कर सकेगी सीबीआई

 -यूपी सरकार के गृह विभाग के प्रोफार्मा पर निर्भर, सीबीआई जांच करेगी या नहीं

--पांच दिन में स्पष्ट होगा कि सीबीआई प्रो. विनय पाठक की जांच करेगी या नहीं

 

परवेज अहमद

लखनऊ। उच्च, तकनीकी शिक्षा की नीतियां निर्धारक बन गये छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.विनय पाठक की किन बिन्दुओं पर जांच की संस्तुति राज्य सरकार  ने की है ? इस सवाल का उत्तर अभी रहस्यमय है। अगर सिर्फ 29 अक्टूबर को इंदिरानगर में दर्ज घूसखोरी की जांच सीबीआई से कराने का केन्द्रीय कार्मिक मंत्रालय से अनुरोध किया गया है। तब केस खुला होने का तर्क देकर जांच से सीबीआई इंकार कर सकती है। यदि, दिल्ली, राजस्थान, उत्तराखंड और यूपी के दो तकनीकी, तीन सामान्य विश्वविद्यालयों के भ्रष्टाचार की जांच संस्तुति है तो विवेचना अस्वीकार करना सीबीआई के लिये कठिन होगा। क्योंकि दस्तावेज कहते हैं प्रो.विनय पाठक कुलपति बनने की अर्हता नहीं रखते थे। उनके शोध पत्र चोरी के हैं। लिहाजा कुलपति सर्च कमेटियों के सदस्य और तीन राज्यों के कुलाधिपति पूछताछ के दायरे में होंगे। अहम बात ये है कि सीबीआई अग जांच का अनुरोध स्वीकारती है तो क्या कुलाधिपतियों से पूछताछ कर सकेगी ? अगर पांच दिन में तस्वीर साफ होगी।

सूत्रों का कहना है कि विवेचना हाथ में लेने के बाद अगर सीबीआई ने साहस जुटाया तो 2015 से अब तक उत्तर प्रदेश के प्राविधिक शिक्षा, उच्च शिक्षा और राजभवन में तैनात रहे आधा दर्जन अधिकारियों से न सिर्फ पूछताछ होगी बल्कि कई अधिकारी यूपी के खनन, एनएचएम घोटाले की तरह सरकारी गवाह बन जाएंगे या अभियुक्त। उत्तराखंड, राजस्थान के पूर्व कुलाधिपति और कई आईएएस अधिकारी भी जांच के घेरे में आयेंगे। य़ोगी आदित्यनाथ सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट कल्याण सिंह कैंसर इंस्टीट्यूट की नियुक्तियां भी जांच की जद में आयेगी। कैंसर इंस्टीट्यूट में प्रो.विनय पाठक के साथ राजस्थान की ओपन यूनिवसिर्टी में आरोपी रहे लोगों को नियमों के विपरीत नियुक्त किया गया है।

एकेटीयू के इंजीनियर आशीष मिश्र, सहायक कुलसचिव आरके सिंह समेत दो दर्जन लोग सीधे जांच के घेरे में होंगे। एकेटीयू को मौजूदा निजाम भी संबद्धता देने, वित्तीय अनियमितता करने की जांच से घिरेगा। डॉ.भीमराम आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा में तो निर्माण कार्यों से लेकर चिकित्सा विज्ञान यानी मेडिकल छात्रों के दस्तावेजों में हेरफेर, मान्यता, स्क्रूटनी, निर्माण कार्य और नियुक्तियों, दागी संस्था से परीक्षा कार्य कराने का संजाल खुल जाएगा। लखनऊ के ख्वाजा मोईन उद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय में नियुक्तियों, कुलपति आवास, गेस्ट हाउस और 11 करोड़ की वित्तीय स्वीकृतियों का मामला भी खुलेगा।

छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर में प्रतिकुलपति की नियुक्ति, कर्मचारियों की नियुक्ति, संबद्धता का मामला भी सामने आयेगा। एचबीटीयू का कच्चा-चिट्ठा भी खुलेगा। यही नहीं, इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय में भ्रष्टाचार होने की रिपोर्ट लिखने वाले 41 सांसदों की रिपोर्ट भी खुलेगी। उत्तराखंड की तत्कालीन कुलाधिपति माग्रेट अल्वा, यूपी के तत्कालीन कुलाधिपति राम नाईक भी जांच के घेरे में होंगे। पर, अहम सवाल ये ही है कि उत्तर प्रदेश के गृह विभाग ने सीबीआई जांच के लिए केन्द्रीय कार्मिक मंत्रालय को भेजे प्रोफार्मा में किन बिन्दुओं का उल्लेख किया है। नियमों के मुताबिक सीबीआई सिर्फ उतने बिन्दुओं की ही जांच करती है जितने की अपेक्षा की जाती है। उससे इतर वह विशेष परिस्थितियों में ही जाती है।

 

इंसेट-एक

सीबीआई की एफआईआर बतायेगी किसकी-किसकी जांच

सीबीआई जब तक जांच अपने हाथ में नहीं लेती है, तब तक सिर्फ कयास है लेकिन सीबीआई ने जांच हाथ में ली तो सबसे पहले नई एफआईआर दर्ज करेगी, जिससे साफ होगा कि उसकी जांच का दायरा क्या है ? अगर उसने जांच में प्रो.विनय पाठक जहां भी कुलपति, निदेशक, कार्य परिषद, बोर्ड आफ मैनेजमेन्ट के सदस्य रहे, उन सबकी जांच करने की एफआईआर लिखी तो उसके सामने पहला सवाल ही ये होगा कि 29 अक्टूबर 2022 को एफआईआर दर्ज होने के बाद कुलाधिपति कार्यालय ने उनसे क्या-क्या जवाब तलब किया। नियमों के विपरीत जाकर इतना लंबा अवकाश कैसे स्वीकृत हुआ और अगर प्रो.विनय पाठक गंभीर बीमार हैं तो किस डॉक्टर ने उन्हें गंभीर होने का प्रमाण पत्र दिया।

 

इंसेट-दो

एनएचएम घोटाले का जिन्न भी बाहर निकलेगा

प्रो.विनय पाठक के भ्रष्टाचार की सीबीआई ने जांच शुरू की तो एक बार फिर मायावती सरकार के बहुचर्चित एनएचएम घोटाले की पत्रावलियां खुलेंगी। क्योंकि प्रो.विनय पाठक  ने कुलपति के रूप में जिन चार कंपनियों को परीक्षा, सुरक्षा और ठेके-पट्टे का काम दिया, उनमें से दो एनएचएम घोटाले फंसी थी, दो के खिलाफ दो चार्जशीट भी दाखिल है। एक सरकारी संस्था भी जांच के दायरे में आयेगी।

 

इंसेट-3

लविवि की बीएड परीक्षा जांच घेरे में होगी

सीबीआई ने सिर्फ इंदिरानगर में दर्ज घूसखोरी की एफआईआर ही जांच की तो लखनऊ विश्वविद्यालय प्रबंधन द्वारा कराई गई बीएड प्रवेश परीक्षा स्वतः जांच के घेरे में आ जाएगी। इस परीक्षा से जुड़े करोड़ों रुपये के ठेके उन्ही अजय मिश्र की कंपनी को दिये गये, जो एनएचएम घोटाले में चार्जशीटेड है और विनय पाठक के लिए घूसखोरी की रकम ठिकाने लगाने के आरोप में जेल में हैं। सूत्रों का कहना है कि इस परीक्षा की लागत गुजरे एक साल की लागत से 20 गुना ज्यादा बढ़ गयी थी। दूसरी बार लविवि कुलपति नियुक्त प्रो.आलोक राय भी जांच की आंच में तपेंगे।

 

 

क्या ठंडा कर दी गयी प्रो.विनय पाठक के खिलाफ जांच

 परवेज़ अहमद

लखनऊ । यूपी विश्वविदयालयों में भ्रष्टाचार की परत दर परत खुलने और उसके केन्द्र बिन्दु छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.विनय पाठक भूमिका की पड़ताल सीबीआई से कराने की संस्तुति से कई सवाल उठ गये हैं। भ्रष्टाचार का दायरा  क्या इतना विस्तृत है कि यूपी एसटीएफ पड़ताल करने में सक्षम नहीं है या जांच के घेरे में ऐसी संस्थाएं हैं, जिन पर हाथ डालना इस एजेंसी के लिए संभव नहीं है ? या केन्द्रीय एजेंसी से जांच कराने की पीछे राजनीतिक कारण भी हैं। वैसे, अभी सीबीआई ने जांच अपने हाथ में नहीं ली है, परन्तु अगर उसने खुले हाथ से जांच की तो सांविधानिक पदों पर आसीन या इस पद पर रह चुकी हस्तियों का घिरना तय हैं। आधा दर्जन से अधिक आईएएस भी इसकी लपेट में आयेंगे।

अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री रहते हुये वर्ष 2015 में प्रो.विनय पाठक को अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय (एकेटीयू) का कुलपति नियुक्त किया गया था। तत्कालीन प्राविधिक शिक्षा मंत्री ने प्रो.विनय पाठक को कुलपति बनाने की पत्रावली तैयार कराई। उस समय प्राविधिक शिक्षा की प्रमुख सचिव मोनिका.एस.गर्ग ने ऐतराज हाजिर किया। आपत्ति को नजर अंदाज कर तत्कालीन कुलाधिपति रामनाईक ने प्रो.विनय पाठक के शोध गाइड व कानपुर आईईटी के पूर्व निदेशक प्रो.संजय मोहन धांडे को कुलपति सर्च कमेटी का चेयरमैन बनाया। जिन्होंने पाठक को कुलपति बनाने की संस्तुति की। 2015 में प्रो.विनय पाठक ने कुलपति के रूप में जब नियम विरुद्ध निर्णय शुरू किये तो शिकायतों का क्रम चल पड़ा। कुलाधिपति कार्यालय और प्रदेश सरकार ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की। हाईकोर्ट में तीन जनहित याचिका दाखिल हुई। पर उन्हें कुलपति का अतिरिक्त चार्ज मिलता रहा। आनंदीबेन पटेल के कुलाधिपति का कार्य संभालने के बाद प्रो.विनय पाठक की शक्ति में और इजाफा हो गया। उन्हें ख्वाजा मोईऩउद्दीन विवि, छत्रपति शाहू जी महाराज विवि और भीमराम आंबेडकर विवि का कुलपति बनाया गया।

29 अक्टूबर को लखनऊ के इंदिरानगर थाने में विश्वविद्यालयों में परीक्षा का कार्य करने वाली संस्था के निदेशक डेनिस मारियो ने प्रो.विनय पाठक पर डेढ़ करोड़ घूस मांगने और  राशि मुखौटा कंपनी के संचालक अजय मिश्र के जरिये राजस्थान की एक कंपनी को भेजने की एफआईआर हुई। एसटीएफ के एडीजी अमिताभ यश ने डिप्टी एसपी अवनीश्वर श्रीवास्तव व दीपक सिंह की दो टीमें बनाईं। जिसकी प्रारम्भिक जांच में नियुक्तियों, ठेके, सुरक्षा, कैन्टीन, परीक्षा, प्रोन्नतियों से लेकर शैक्षिक, गैरशैक्षिक कार्यों में भ्रष्टाचार साक्ष्य उपलब्ध होना शुरू हो गये। भ्रष्टाचार का दायरा भीम राव आंबेडकर विवि से निकलकर एचबीटीयू, ख्वाजा मोईनउद्दीन भाषा विवि, छत्रपति शाहू जी महाराज कानपुर विवि, एकेटीयू तक फैला दिखा। एसटीएफ ने इन विश्वविद्यालयों से ढेरों दस्तावेज कब्जे में लिये। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भ्रष्टाचार से जुड़े तथ्यों की जानकारी दी गयी। सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री ने जीरो टालरेंस के तहत भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कार्रवाई का आदेश दिया। जांच आगे बढ़ी तो राजभवन व वहां तैनात रहे अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गयी। दो माह की लंबी जांच में ये भी खुलासा हुआ कि प्रो.विनय पाठक कुलपतियों की नियुक्ति कराते थे। आधा दर्जन से अधिक विश्वविद्यालयों के कुलपतियों का अतीत सवालों के घेरे में है। वे शैक्षिक योग्यता के मानक पूरे नहीं करते। फिर भी उन्हें कुलपति बनाया गया। इन विश्वविद्यालयों में अजय मिश्र और उनकी सहयोगी कंपनी सैकड़ों करोड़ का ठेका लिये है। इस बीच एसटीएफ ने अजय जैन, संजय सिंह को गिरफ्तार किया। प्रो.विनय पाठक को नोटिस भेजे गये लेकिन वह नहीं गए। एफआईआर की धारा में इजाफा किया गया। यूपी एसटीएफ ढेरों लोगों की गिरफ्तारी की तैयारी कर रही थी। कई कुलपति, कुलसचिव, सहायक और उपकुलसचिव, इंजीनियर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे मिले।

शुक्रवार को अचानक राज्य सरकार ने प्रो.विनय पाठक प्रकरण की सीबीआई जांच की संस्तुति कर दी। सवाल ये है कि आखिर  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सीबीआई जांच कराने का निर्णय क्यों लिया  ? क्या भ्रष्टाचार का दायरा कई राज्यों में है इसलिए सीबीआई जांच की संस्तुति हुई ? या फिर शुरूआती जांच में ही मौजूदा कुलाधिपति और एक पूर्व कुलाधिपति की भूमिका सवालों के घेरे में आने पर ये जांच सीबीआई को  सौंपी गयी। सूत्रों का कहना है कि जिस अवधि में प्रो.विनय पाठक ने भ्रष्टाचार का संजाल फैलाया, उस अवधि के दौरान उत्तर प्रदेश के दोनों कुलाधिपति राजनीतिक रूप से बहुत शक्तिशाली हैं। सत्ता प्रतिष्ठान के बीच ठकराहट रोकने के लिए प्रो.विनय पाठक प्रकरण की जांच सीबीआई को सौंपी गयी। आने वाले दिनों में इस जांच के फैसले और सीबीआई की एफआईआर से ये साफ होगा कि जांच केनद्रीय एजेंसी को सौंपने के पीछे सरकार की मंशा क्या थी ? 

 

यूपी में प्रमुख सीबीआई जांच

-पालना घोटाला :

-शत्रु संपत्ति कब्जा :

-पीसीएस भर्ती घोटाला :

-अपर निजी सचिव भर्ती घोटाला :

-जवाहर बाग अपर पुलिस अधीक्षक हत्याकांड :

-खाद्यान्न घोटाला :

-ऊर्जा विभाग का पीएफ घोटाला-2018 : 

- लखनऊ का रिवर फ्रन्ट घोटाला :

-यूपी का खनन घोटाला :

- प्रयागराज के 51 मामलों की सीबीआई :

- चीनी मिल बिक्री घोटाला :

-जल निगम भर्ती घोटालाः

-यमुना एक्सप्रेसवे घोटाला :

-उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े मनरेगा घोटाला:

-एनएचएम घोटाले की जांच :

Monday, 26 December 2022

भाषा विवि में गड़बड़ियों पर याचिका, पुराने मामले में सहायक प्रोफेसर निलंबित

 -प्रो.मसऊद आलम की जांच कमेटी की रिपोर्ट पर पर्शियन विभाग डॉ.आरिफ अब्बास पर कार्रवाई

-विश्वविद्यालय में शिक्षकों की गुटीय प्रतिद्वंदिता तेज होने की संभावना, नुकसान छात्रों का होगा

-कुलपति ने कार्य परिषद की इमरजेंट मीटिंग बुलाई, आरिफ ने सदस्यों को लीगल स्थिति बताई

-सिविल जज सीनियर डिवीजन मलिहाबाद और हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में चल रहा मुकदमा

 

परवेज़ अहमद

लखनऊ । निर्माण कार्य, वित्तीय स्वीकृतियों के विरोध और प्रो.विनय पाठक के कार्यकाल से अभी तक ख्वाजा मोईनउद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय की दस कार्य परिषद मीटिंगों को अवैध ठहराते हुये अदालत में चुनौती देने वाले सहायक प्रोफेसर डॉ.आरिफ अब्बास को निलंबित कर दिया गया। उन पर विवि के दूसरे शिक्षक के साथ विवाद के पुराने मामले में कार्रवाई हुई है। इससे विवि में शिक्षकों की प्रतिद्वंदिता और तेज होने के संकेत हैं। निलंबन के फैसले पर मुहर के लिये कुलपति प्रो.एनबी सिंह ने 23 दिसंबर को कार्य परिषद की इमरजेंट मीटिंग बुलाई है।

भाषा विवि के पर्शियन विभाग के सहायक प्रोफेसर आरिफ अब्बास ने पांच महीने पहले सिविल अदालत, जिला अदालत में मई 2022 में दो वाद दाखिल किये थे, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि भाषा विवि के पूर्व कुलपति प्रो.विनय पाठक व मौजूदा कुलपति प्रो.एनबी सिंह नियम विरुद्ध वित्तीय व प्रशासनिक निर्णय कर रहे हैं। गुजरे साल से अभी तक की कार्य परिषद की दस मीटिंगों की वैधता को भी याचिका में चुनौती दी गयी। याचिका में  गय कि विवि की परिनियमावली में निर्धारित पद धारकों को नजर अंदाज कर मनमाने तरीके से कार्य परिषद के सदस्य नामित किये गये। छात्रों की फीस व सरकारी अनुदान का दुरुपयोग हो रहा। सुनवाई के बाद सिविल जज (सीडि) मलिहाबाद ने आरोपों के संबंधित मूल दस्तावेज संरक्षित करने, कुलपति आवास, गेस्ट हाउस का निरीक्षण कर रिपोर्ट अदालत को सौंपने के लिए कोर्ट कमिश्नर नियुक्त किया। इस पर अमल से पूर्व भाषा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.एनबी सिंह व कुलसचिव अजय कृष्ण यादव ने हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में ई-फाइलिंग के जरिये आदेश पर रोक के लिए याचिका दाखिल की थी, जिस पर 20 दिसंबर को सुनवाई हुई। ई-याचिका करने वाले विवि ने ही तथ्य उपलब्ध कराने के लिए हाईकोर्ट से और समय देने की मांग की परन्तु उस समय डॉ.आरिफ अब्बास के अधिवक्ता ने अदालत के सामने अपना पक्ष रखा। अदालत ने जनवरी 2023 की तारीख दे दी लेकिन सिविल जज के आदेश पर स्थगन आदेश नहीं दिया। गुरुवार को भाषा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.एनबी सिंह ने पार्शियन विभाग के सहायक प्रोफेसर अब्बास आरिफ को निलंबित कर दिया है। उन पर 27 मई 2022 को दिये गये उनके प्रार्थना पत्र को मनगढ़ंत, झूठा और विश्वविद्यालय की गरिमा गिराने वाला बताकर निलंबित कर दिया गया है।

 

 

मसऊद कमेटी की रिपोर्ट को कार्रवाई की आधार बनाया

पर्शियन विभाग के सहायक प्रोफेसर आरिफ अब्बास पर कार्रवाई के लिये कला एवं मानविकी संकाय के प्रो. मसऊद आलम कमेटी की रिपोर्ट को आधार बनाया गया है। इस कमेटी में  वाणिज्य विभाग के प्रो.एहतेशाम अहमद व डॉ.रुचिता सुजय चौधरी सदस्य थीं। जिन्होंने अपनी रिपोर्ट में लिखा- सहायक प्रोफेसर आऱिफ अब्बास ने पेशबंदी में 25 मई 2022 को डॉ.सिद्धार्थ सुदीप के विरुद्ध गाली-गलौच, मारपीट के जो आरोप लगाये थे, वह मनगढ़ंत एवं कपोलकल्पित पाये गये हैं। शिक्षकों व कर्मचारियों के प्रति अशोभनीय टिप्पणी इनकी आम-शैली है। जांच रिपोर्ट में ये भी लिखा गया है कि शिक्षक के रूप में दायित्वों का निवर्हन न लेकर सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने एवं शांति भंग करने वाले अराजकतत्वों को उकसाने में सक्रियता दिखायी जा रही है। इसलिए इन्हें निलंबित किया जा रहा है।

 

कुलपति ने विशेषाधिकार का इस्तेमाल किया

पार्शियन विभाग के सहायक प्रोफेसर आरिफ अब्बास को निलंबित करने का आदेश जारी करने के लिये ख्वाजा मोइनउद्दीन भाषा विवि के कुलपति प्रो.एनबी सिंह ने विशेषाधिकार का इस्तेमाल किया। नियमों के आधार पर शिक्षक निलंबन का आदेश विवि के कुलसचिव को जारी करना चाहिए परन्तु अब्बास के निलबंन का आदेश सीधे प्रो.एऩबी सिंह ने किया, जो उनका विशेषाधिकार है।

 

शिया धर्म गुरु कल्बे जवाद ने सीएम, रक्षामंत्री को लिखा पत्र

शियाधर्म गुरु मौलाना कल्बे जवाद ने मुख्यमंत्री, केन्द्रीय रक्षामंत्री व लखनऊ के सांसद राजनाथ को पत्र लिखकर डॉ.आरिफ अब्बास के निलंबन को उत्पीड़नात्मक कार्रवाई ठहराया है। मौलाना ने कहा है यदि कभी दो शिक्षकों के बीच विवाद था भी तो वह सांप्रदायिक कैसे हो सकता है। जांच अधिकारिय़ों ने रिपोर्ट में सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की बात किन साक्ष्यों के आधार पर लिखी। मौलाना कहा है कि प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच कराई जानी चाहिए। गुण दोष के आधार पर कार्रवाई की जानी चाहिए। यही बातें उन्होंने लखनऊ के सांसद व केन्द्रीय रक्षा मंत्री को भी लिखी हैं।

 

कोट-एक

मैंने, अदालत में कुलपति प्रो. एनबी सिंह, प्रो.मसऊद, प्रो.ऐहतशाम को जांच कमेटी बनाये जाने से पहले  ही पार्टी बना रखा है। निचली अदालत ने उनकी कार्यशैली की परख के लिए कोर्ट कमिश्नर नियुक्त कर रखा है। हाईकोर्ट में वाद लंबित हैं। ऐसे में मेरे विरुद्ध उस मामले में जिसमें लिखित समझौता हो चुका था, उस मामले में कार्रवाई भेदभाव का स्पष्ट प्रतीक है। सारी स्थिति से अब हाईकोर्ट को अवगत कराया जाएगा। ईसी के सदस्यों को भी वस्तु-स्थिति से आज ही अवगत करा दिया है, निलंबन के निर्णय पर विधिक तरीके से पक्ष रखा जाएगा।– डॉ.आरिफ अब्बास, सहायक प्रोफेसर, पार्शियन विभाग, ख्वाजा मोईनउद्दीन भाषा विवि लखनऊ

 

कोट-2

डॉ.आरिफ अब्बास एक शिक्षक के रूप में अपने पदीय दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करने में रुचि न लेकर सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने एवं शांति भंग करने वाले अराजकतत्वों को उकसाने में अत्यधिक सक्रियता दिखा रहे हैं, जिससे एक शिक्षक की गौरवगरिमा का ह्रास होने के साथ विश्वविद्यालय की छवि धूमिल हुई है। तत्क्रम में सम्यक विचारोपरान्त विवि की प्रथम नियमावली व राज्य विवि अधिनियम-1973 में प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए उन्हें निलंबित किया गया- प्रो.एनबी सिंह, कुलपति मोईनउद्दीन भाषा विवि, लखनऊ

 

Tuesday, 20 December 2022

अदालतों की कुंडियां खटखटाने का दौर तेज !

 कुलपति निर्माता मशीन जैसे गंभीर आरोपों से घिरे, अंबेडकर विवि आगरा के परीक्षा कार्यों के ठेका आवंटन में डेढ़ करोड़ की घूस में नामजदगी के एक माह बाद प्रो.विनय पाठक पर कार्रवाई नहीं हुई। जिस पर प्रभावित पक्षों में से कुछ ने अदालत की ड्योढ़ी खटखटानी शुरू की है। लंबित याचिकाएं नये सिरे से सुनने की गुहार है। भाषा विवि के शिक्षक डॉ.आरिफ अब्बास ने कार्य परिषद की दस मीटिंगों को अवैध ठहराते उन्हें रद करने की अदालत से मांग की है। लविवि के वाणिज्य विभाग से सेवानिवृत प्रो.नरसिंह ने प्रो.विनय पाठक की कुलपति पद पर नियुक्ति, अर्हता पर सवाल उठाते हुये उन्हें बर्खास्त करने की हाईकोर्ट से गुहार लगाई। दो समाजसेवियों ने एकेटीयू के मामले में लोकायुक्त संगठन में परिवाद दाखिल किये हैं। प्रो.पाठक की कार्यशैली को लेकर 2017 से हाईकोर्ट में दाखिल याचिका जल्द सुनने कानूनी प्रयास तेज हो गये हैं।  

 

प्रो.विनय पाठक की अर्हता कुलपति के योग्य नही, बर्खास्त किया जाएः हाईकोर्ट में याचिका

परवेज़ अहमद

लखनऊ। छत्रपति शाहू जी महाराज कानपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.विनय पाठक ने एकेटीयू का कुलपति रहते हुये आईईटी के कुलसचिव का धारणाधिकार ( प्रतिनियुक्ति पर रहने पर मूल पद रिक्त न होना ) समाप्त करने की कार्रवाई कर दी, परन्तु हरकोर्ट बटलर तकनीकी विश्वविद्यालय (एचबीटीयू) के कम्प्यूटर साइंस विभाग के प्रोफेसर का अपना पद   सुरक्षित रखने के दांव-पेंच चल रहे हैं। लविवि के अर्थशास्त्र विभाग से रिटायर व शिक्षाविद प्रो.नरसिंह की ओर से हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में दाखिल याचिका में  प्रो.विनय पाठक कुलपति पद पर अयोग्य बताते हुए उन्हें बर्खास्त करने, अर्जित वेतन वूसली की मांग की गयी है। अदालत ने सरकार, कुलाधिपति, यूजीसी समेत आधा दर्जन फरीकों को जबाव का अंतिम मौका दिया है। दिसम्बर के दूसरे हफ्ते में अगली सुनवाई संभव है।

उच्च शिक्षा कानूनों में कोई शिक्षक, प्रशासनिक अधिकारी दो वर्ष तक अवकाश पर रह सकता है। प्रतिनियुक्ति मिलने पर मूल पद पर उसका धारणाधिकार तीन साल तक रहता है। कुछ विश्वविद्यालयों की परिनियमावली में धारणाधिकार पांच साल तक बढ़ाने का नियम है। परन्तु, प्रो.विनय पाठक एचबीटीआई के कम्प्यूटर साइंस विभाग से 13 सालों से अवकाश पर हैं। फिर भी उनका धारणाधिकार बना है। सूत्रों कहना है कि एचबीटीयू के तत्कालीन निदेशक प्रो.जयशंकर राय ने उत्तराखंड के ओपन विवि में कुलपति नियुक्त होने पर प्रो.विनय पाठक को तीन साल की प्रतिनियुक्ति मंजूरी दी थी। जिसे उन्होंने पुनः बढ़ाया। पांच साल बाद जब प्रो.विनय पाठक ने एचबीटीयू में धारणाधिकार बरकरार रखने का दबाव बनाया। तब तत्कालीन निदेशक ने उत्तर प्रदेश के प्राविधिक शिक्षा विभाग को जानकारी देकर मार्ग दर्शन मांगा। सरकार ने कहा एचबीटीयू की बीओजी ( बोर्ड आफ डायरेक्टर्स) प्रो.विनय पाठक के आवेदन पर सहानुभूति पूर्वक विचार कर लें। सहानुभूति पर जोर दिया गया था, उसके बाद से लगातार अवकाश स्वीकृत किया जा रहा है, धारणाधिकार भी बना हुआ है। इसे मुख्य सवाल वाली प्रो.नरसिंह की याचिका के अधिवक्ता डॉ.वीके सिंह का कहना है कि एक व्यक्ति को लाभ के लिए नियमों को खिलौना बनाया जा रहा ? प्रो.विनय पाठक की शैक्षिक योग्यता भी कुलपति बनने योग्य नहीं थी। बायोडेटा में प्रो.पाठक ने एचबीटीयू के जिन पदों का उल्लेख किया है, वह पद परिनियमावली में नहीं हैं। कुलपति बनने के लिए दस साल का प्रोफेसर होना अनिवार्य है, ये अवधि भी विनय पाठक ने पूरी नहीं की है। ऐसे व्यक्ति को बार-बार कुलपति कैसे बनाया जा रहा है ? उनका कहना है कि याचिका में प्रो.विनय पाठक के शोध, कार्यशैली, भ्रष्टाचार का उल्लेख करते पद से बर्खास्त करने, कुलपति के कार्यकाल के वेतन की वसूली करने और एचबीटीयू के कम्प्यूटर साइंस विभाग के प्रोफेसर पद से उनका धारणाधिकार खत्म करने की अदालत से मांग की गयी है। प्रो.नरसिंह के अधिवक्ता डॉ.वीके सिंह का कहना है कि प्रो.विनय पाठक को बार-बार कुलपति बनाया जाना उच्च शिक्षा के साथ खिलवाड़ है, जिसकी सचाई अदालत के सामने रखी जा रही है। उन्होंने बताया कि इस याचिका में प्रदेश सरकार, प्राविधिक शिक्षा विभाग, कुलाधिपति, एचबीटीयू के कुलपति, छत्रपति शाहूजी महाराज कानपुर विवि के कुलपति प्रो.विनय पाठक को पार्टी बनाया गया है। अदालत ने इन प्रतिवादियों शपथ पत्र देने का अंतिम मौका दिया है। इस केस में दिसम्बर के दूसरे हफ्ते में सुनवाई संभव है। कुलपति प्रो.विनय पाठक 13 सालों से एचबीटीयू के कम्प्यूटर साइंस विभाग से अवकाश पर हैं। अपना धारणाधिकार बनाये रखना चाहते हैं, परन्तु एकेटीयू के कुलपति के रूप में घटक संस्थान आईईटी के कुलसचिव एसएन शुक्ला का धारणाधिकार तीन साल में खत्म कराने का प्रस्ताव कार्य परिषद से पास करा दिया। अधिवक्ता डॉ.वीके सिंह का कहना है कि न्यायालय के सामने इन विधि विरुद्ध हो रहे इन सभी बातों को रखा जाएगा।

 

 

भाषा विवि की ईसी की अवैध, फैसलों पर रोक लगाई जाएः जज से गुहार

विशेष प्रतिनिधि

लखनऊ। ख्वाजा मोईनउद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय कुलपति रहने के दौरान प्रो.विनय पाठक के फैसलों को नियम विरुद्ध ठहराते हुये सिविल डिवीजन जज की अदालत में सिविल वाद दायर किया गया है। जिसमें विवि कार्य परिषद की दस मीटिंगों को विधि विरुद्ध बताया गया है। विवि की परिनियमावली में निर्धारित पद धारकों को सदस्य बनाये बगैर मनमाने तरीके से सदस्य नामित किये गये। छात्रों की फीस व सरकारी अनुदान का दुरुपयोग किया जा रहा है।

राज्य विश्वविद्यालयों की कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल ने प्रो.विनय पाठक को ख्वाजा मोईन उद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया था, उस समय लोक निर्माण विभाग के पास लंबित विवि का 25 करोड़ रुपये आवंटित किया गया था। विनय पाठक ने इस राशि को खर्च करने के लिए जो कार्य परिषद गठित करायी, उसमें पूर्व कुलपति व विश्वविद्यालय के सबसे वरिष्ठ को सदस्य नहीं बनाया। विवि के शिक्षक डॉ.आरिफ अब्बास की ओर से अदालत में सिविल वाद दाखिल करने वाले अधिवक्ता सैयद अजीजुल हसन रिजवी ने कुलपति के रूप में प्रो.विनय पाठक द्वारा कराई गयी छह और मौजूदा कुलपति एऩबी सिंह द्वारा कराई गई कार्य परिषद विवि की परिनियमावली के आधार पर अवैध है।

सिविल वाद दायर करने के लिये याची के अधिवक्ता की ओर से चार लाख रुपये शुल्क भी जमा किया गया है। याची का कहना है कि कार्य परिषद की इन दस मीटिंगों में करोड़ों रुपये के निर्माण कार्य, खरीद-फरोख्त की गयी है। प्रोन्नितयों और नई भर्ती के फैसले भी हैं। इस वाद पर अदालत ने प्रो.विनय पाठक, नये कुलपति प्रो.एनबी सिंह, कुलसचिव समेत आधा दर्जन लोगों को जवाब दाखिल करने के लिए नोटिस भेज रखा है। अधिवक्ता रिजवी का कहना है कि भाषा विश्वविद्यालय में राज्य सरकार, विवि की परिऩियमावली और कुलाधिपति के आदेशों की अवहेलना की जा रही है।

आरोप लगाया गया है कि पूर्णकालिक कुलपति की नियुक्ति की सर्च कमेटी के लिए सिद्दार्थ विश्वविद्यालय कपिलवस्तु के पूर्व कुलपति प्रो.सुरेन्द्र दुबे को नामित किया गया है, उनका प्रो.विनय पाठक की पहले से ही नजदीकी है। इसी तरह स्ववित्त योजना के तहत संचालित पाठ्यक्रमों के लिए वित्त समिति कार्य परिषद द्वारा सृजित शिक्षणेत्तर श्रेणी के पदों को संविदा के आधार पर नियुक्ति की गयी, जिसमें पूर्व से कार्य कर रहे कर्मचारियों को सेवा मुक्त कर दिया गया, जबकि उत्तर प्रदेश शासन के नियमों के मुताबिक सेवा प्रदाता कंपनी के जरिये कार्य रहे लोगों को बिना किसी ठोस कारण के सेवा से बाहर नहीं किया जा सकता है। प्रो.विनय पाठक की अध्यक्षता वाली कार्य परिषद ने परिसर में दीन दयाल शोध पीठ स्थापित करने का निर्णय कराया और उस पर लाखों रुपये खर्च कर दिय गये। अदालत से इस गंभीर विषय पर कार्रवाई करते हुए कार्य परिषद के सभी दस निर्णयों पर रोक लगाने की मांग की गयी है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रो.विनय पाठक को है रिश्तेदारों को कॉफी, नाश्ता कार्नर ठेका देने का शगल

 -जिस विश्वविद्यालय के कुलपति बने कैंटीन ठेकेदार भी बदले

-नये ठेकेदारों ने बिजली बिल, भवन किराया भी नहीं जमा किया

-ठेका बदलने पर छात्रों ने दुकानदार की उधारी लौटाने से मना किया

परवेज अहमद

लखनऊ । उत्तर प्रदेश की उच्च, तकनीकी शिक्षा के प्रभावशाली कुलपति प्रो.विनय पाठक की दिलचस्पी विश्वविद्यालयों, सबंद्ध सरकारी कालेजों की कैंटीन (चाय, नाश्ता, भोजन) के ठेकों में भी रहती है। जिस विश्वविद्यालय के वह कुलपति नियुक्त होते हैं, वहां संचालित कैंटीनों के पुराने ठेकेदारों को हटाकर पसंदीदा के ठेकेदार को ठेका आवंटित करते हैं। एकेटीयू, उसके घटक संस्थान आईईटी, ख्वाजा मोइनउद्दीन भाषा विवि, भीमराव आंबेडकर विवि और छत्रपति शाहू जी महाराज कानपुर विवि के कैंटीनों का पुराना ठेका रद कर नये लोगों को ठेका दे दिया। जिनमें से कई संचालकों ने भवन किराया, बिजली बिल तक जमा नहीं किया है।

डॉ.भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा के परीक्षा कार्यों के लिए डेढ़ करोड़ घूस लेने के एक प्रकरण में कानपुर विवि के कुलपति प्रो.विनय पाठक नामजद हैं। एसटीएफ जांच कर रही। जिसमें लगातार खुलासा हो रहा है कि उन्होंने यूपी के पांच विश्वविद्यालयों का कुलपति रहते हुये नियमों के विपरीत प्रोफेसरों, सहायक प्रोफेसर और सह प्रोफेसरों की नियुक्तियां की । यौन उत्पीड़न , गुंडागर्दी के आरोपियों को उच्च पदों पर नियुक्त किया। अधूरी शैक्षिक योग्यता वालों को शिक्षक बनाया। मुखौटा कंपनियों को परीक्षा, स्टेशनरी जैसे करोड़ों के कार्य दिये। उन पर अपने से जुड़े लोगों को कुलपति बनवाने का भी आरोप है। एसटीएफ की जांच में ढेरों वित्तीय, प्रशासनिक गड़बड़ियों के साथ भ्रष्टाचार के तत्थ सामने आये हैं। फिर भी अभी तक उन पर सरकार या कुलाधिपति कार्यालय से कोई कार्रवाई नहीं हुई।

अब ये भी खुलासा हो रहा है कि प्रो.विनय पाठक का बड़े मामलों के साथ छोटे-छोटे मामलों में भी सीधे हस्तक्षेप था। कैंटीन जैसे कार्य जिसका कस्टोडियन कुलसचिव होता है, उसमें भी उनके इन्वॉल्वमेंट का खुलासा हो रहा है। सूत्रों का कहना है कि अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त होने के बाद प्रो.विनय पाठक के नेतृत्व वाले प्रबंधन ने परिसर में 20 लाख रुपए खर्च कर कैंटीन बनवाई। उसका ठेका दूर के रिश्तेदार को दिया गया। विश्वविद्यालय के घटक संस्थान आईईटी में बरसों से चल रहे अमूल पार्लर को बंद कराकर ठेका करीबी को दिया गया। ख्वाजा मोईन उद्दीन चिश्ती विश्वविद्यालय का कुलपति बनने पर प्रो.विनय पाठक ने यहां के पुराने कैंटीन संचालक को हटाकर उसके स्थान पर करीबी मित्र के मित्र को ठेका आवंटित कराया। ठेका आवंटन के प्रस्ताव पर कार्य परिषद की मंजूरी की मुहर भी लगवाई गयी।
छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय का कुलपति बनने पर प्रो.विनय पाठक ने बरसों से परिसर में जीराक्स कॉपी ( फोटो कापी) की दुकान चलाने वाले व्यक्ति को तीन दिनों के अंदर हटा दिया। उसके स्थान पर एचबीटीयू की एक महिला प्रोफेसर के परिचित को यह कार्य दिया गया। दस साल पुरानी चाय-नाश्ता की दुकान बंद कराकर कानपुर की होटलचेन संस्था को ठेका दे दिया गया। सूत्रों का कहना है कि इस होटल चेन संचालक ने लंबे समय से विवि के बिजली का भुगतान नहीं किया। कैंटीन के रूप में इस्तेमाल स्थान का किराया भी नहीं दिया है। सूत्रों का कहना है कि तीन दिनो के नोटिस पर ही कानपुर विवि की कैन्टीन बंद कराने से संचालक को 20 लाख से अधिक की चपत लग गई। दरअसल, लंबे समय से कैन्टीन चलाने के चलते बड़ी संख्या में छात्र उसके यहां उधार चाय-काफी करते रहे हैं। अचानक कैन्टीन बंद होने से छात्रों ने उधार रकम देने से इंकार दिया है।  

 

हाईलाइटर

कैंटीन आवंटन की प्रक्रिया क्या है ? ये सवाल भाषा विवि, एकेटीयू और कानपुर विवि के रजिस्ट्रार से जानने का प्रयास किया गया, सब का एक ही जवाब था ये विवि का आंतरिक मामला है।

 

नियम क्या है ?

उत्तर प्रदेश सरकार के बिजनेस रूल और अधिकतर विश्वविद्यालयों की परिनियमावली में कैंटीन, छात्रावास मेस संचालन का ठेका टेंडर से दिये जाना आवश्यक है। प्रो.विनय पाठक ने इन कानूनों के शिंकजे से बचने की कार्य परिषद की मीटिंगों में टेंडर प्रक्रिया पूरी होने की प्रत्याशा में पसंदीदा लोगों को ठेका आवंटित कर दिया।

 

 

 

विरोधी स्वर घोंटने को प्रो. आलोक, प्रो.विनय ने ईसी सदस्य का चुनाव नहीं कराया

 यूपी राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम-1973 में चार सदस्यों का चुनाव होना चाहिए

परवेज़ अहमद

लखनऊ। छत्रपति शाहू जी महाराज कानपुर विवि के कुलपति प्रो.विनय पाठक और लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.आलोक राय ने विरोध के संभावित स्वर कुचलने के लिए कार्य परिषद में आवश्यक चार निर्वाचित सदस्यों का चुनाव ही नहीं कराया। निर्वाचित सदस्यों की गैरमौजूदगी में ढेरों ऐसे निर्णय हुये जिससे विश्वविद्यालयों को वित्तीय नुकसान हुआ और प्रशासनिक असंतुलन बढ़ गया। नियुक्ति और प्रोन्नतियों में भेदभाव किये गये, जिसकी शिकायत कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल और मुख्यमंत्री योगी आदित्य़नाथ से की गयी।   

यूपी राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम-1973 के मुताबिक सरकारी विश्वविद्यालय में नई नीतियां, प्रोफेसर, छात्र हितों के नाम पर कुलपति, रजिस्ट्रार, डीन, प्रॉक्टर के प्रशासनिक, वित्तीय फैसले तभी पूर्ण होते हैं जब कार्य परिषद की मंजूरी मिल जाती है। किसी सदस्य की आपत्ति पर बहुमत से अंतिम निर्णय होता है। आपत्ति के बिन्दु मिनट बुक्स में दर्ज कर दिये जाते हैं। नियमों के मुताबिक राज्य विश्वविद्यालयों में कुलपति अध्यक्ष, प्रतिकुलपति सदस्य, कुलसचिव पदेन सचिव होते हैं। वरिष्ठ प्रोफेसर, एससी और ओबीसी के दो-दो नुमाइंदे भी सदस्य होते हैं। चार सदस्य कुलाधिपति नामित करता है, जिनमें से एक हाईकोर्ट का प्रतिनिधि होता है। चार सदस्य कोर्ट सभा से निर्वाचित होते हैं। वर्ष 2014 के बाद का इतिहास है कि कुलपतियों की अनियमितता, सरकारी धन के दुरुपयोग, नियम विरुद्ध प्रोन्नतियों पर आपत्तियां निर्वाचित सदस्यों ने ही दाखिल की हैं। क्योंकि इन चार सदस्यों के अतिरिक्त सभी सदस्य शिक्षक होते हैं जो सीधे कुलपति के प्रशासनिक प्रेक्षण में कार्य करते हैं, लिहाजा आपत्ति से गुरेज करते हैं। सवाल उठाने पर ईसी से बाहर कर दिया जाने या उनके विरुद्ध किन्ही मामलों में जांच समितियां बना देने का इतिहास भी रहा है।

लिहाजा लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.आलोक राय, छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विनय पाठक व उनके करीबी कुलपतियों ने विरोध का स्वर घोंटने के लिए कार्य परिषद के सदस्यों का निर्वाचन नहीं कराया। निर्वाचित सदस्यों की कार्य परिषद में नुमाइंदही न होने के चलते कुलपतियों ने यदि  गलत फैसले किये तो भी त आवाज नहीं उठी। यही नहीं, दोनों कुलपतियों ने  मनमानी तरीके से इमरजेंट मीटिंग बुलाई। फैसलों पर सहमति की मुहर लगवा ली। लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आलोक राय कार्यकाल के अंतिम दिनों में ताबड़तोड़ प्रोन्नतियां कर रहे हैं, जिसमें नियमों की अनदेखी के आरोप लग रहे हैं। फिर भी इमरजेंट मीटिंग बुलाकर प्रोन्नतियों पर कार्य समिति की मंजूरी ली जा रही है। सूत्रों का कहना है कि प्रो.राय के कार्यकाल में दस से अधिक इमरजेंट मीटिंग हुईं, जिसमें कोई ऐसा प्रस्ताव पास नहीं हुआ,  जिसकी इमरजेंसी रही हो। इसी तरह छत्रपति शाहू जी महाराज, भीम राव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा, भाषा विश्वविद्यालय का कुलपति रहते प्रो.विनय पाठक ने निर्माण, नियुक्ति, सिक्योरिटी, कैन्टीन के ठेकों की मंजूरी के लिए कार्य परिषद की कई मीटिंग की परन्तु परिषद के चार सदस्यों का चुनाव नहीं कराया। सूत्रों का कहना है कि एक दूसरे की मदद से जिन शिक्षाविदों ने कुलपति पद हासिल किया है, उन्होंने भी कार्य परिषद के सदस्यों के लिए चुनाव नहीं कराया। चौधरी चरण सिंह विवि मेरठ, बरेली के विवि में कार्य परिषद के सदस्यों का चुनाव नहीं कराया गया है। इसे विरोध का स्वर कुचलने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

 

 

कैसे होता है चुनाव

 यूपी राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम-1973 की धारा 22, 23 और 24 में कोर्ट सभा का उल्लेख है। यह एक तरह का कोलेजियम है। जिसमें विश्वविद्यालय के आजीवन सदस्य, अध्यापकों के प्रतिनिधि, छात्र-छात्राओं के प्रतिनिधि, राज्य विधान मंडल के प्रतिनिधि सदस्य होते हैं। इनमें से ही चार सदस्यों को चुनाव के जरिये कार्य परिषद का सदस्य चुना जाता है। ये चुनाव कुलपति व कुलसचिव का आदेश पर ही होते हैं। निर्वाचित सदस्य विश्वविद्य़ालय के नियमित कर्मचारी नहीं होते हैं इसलिए वह धडल्ले से विरोध के स्वर बुलंद करते हैं। कुलपतियों ने इसी स्वर को गुम करने के लिए चुनाव न कराने की राह चुन लगी है।

 

नागरिकों को ‘ गिनी पिग ’ बनाने में प्रो.विनय पाठक ने नहीं छोड़ी कसर

 -प्रोफेसर, विभाग, न एक्सपर्ट पैनल फिर एमफार्मा, बी-फार्मा, पीएचडी करा रहे

-140 निजी कालेजों को बी-फार्मा, 50 को एम-फार्मा की मान्यता प्रदान की

-विदेशों में विशेषज्ञ डॉक्टरों से ज्यादा अहमियत रखते हैं फार्माकॉलाजिस्ट

-दवा बनाना, मानव शरीर पर दवा का असर जानना, बीमारी के कारण ढूंढना भी कार्य

परवेज़ अहमद

लखनऊ। घूसखोरी के आरोपी व छत्रपति शाहू जी महाराज कानपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.विनय पाठक ने करोड़ों नागरिकों को गिनी पिग ’ ( नई दवाओं के शोध में इस्तेमाल पशु-पक्षी) बनाने में कसर नहीं छोड़ी है। अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय (एकेटीयू) में फार्माकॉलॉजी विभाग व संवर्ग का प्रोफेसर न होने के बाद भी 140 निजी कालेजों को बी-फार्मा ( बेचलर ऑफ फार्मेसी) की मान्यता प्रदान कर दी। आश्चर्यजनक रूप  पीएचडी कोर्स शुरू कराया। दर्जनों छात्र-छात्राओं को फार्माकॉलॉजी में पीएचडी डिग्री अवार्ड भी हो रही है। सवाल ये कि आखिर मानव जीवन व स्वास्थ्य से जुड़ी शिक्षा से खिलवाड़ क्यों और जिम्मेदार कौन?

राजस्थान, उत्तराखंड के ओपन विश्वविद्यालयों के कुलपति रहने के बाद 2015 में उत्तर प्रदेश के अब्दुल कलाम प्राविधिक विवि का कुलपति बनने के बाद प्रो.विनय कुमार पाठक ने बेचलर ऑफ फार्मेसी ( बी-फार्मा), मास्टर ऑफ फार्मेसी (एम-फार्मा) कोर्स की निजी कालेजों को मान्यता देना शुरू दिया। एकेटीयू मुख्य रूप से इंजीनियरिंग विवि हैं। यहां न तो फार्माकॉलॉजी विभाग है न  फार्माकॉलॉजी के प्रोफेसर हैं। सवाल ये जब विवि के पास प्रोफेसर, विभाग, विशेषज्ञ ही नहीं हैं तो निजी कालेजों को मान्यता कैसे दी जा रही है ? फार्मेसी काउंसिंल के नियमों का पालन कैसे हो रहा ? फार्मेसी काउंसिल क्या कर रहा ?  सवाल ये भी है कि जिन छात्र, छात्राओ को एकेटीयू पीएचडी डिग्री अवार्ड कर रहा-उन छात्र, छात्राओं के गाइड कौन हैं ? बिना प्रोफेसरों का एकेटीयू पीएचडी छात्र, छात्राओं की डीआरसी (  डिपार्टमेन्टल रिसर्च कमेटी) कैसे करा रहा ? कौन से और कहां के प्रोफेसर इसमें शामिल होते हैं। रिसर्च वर्क की क्रास चेकिंग कौन कर रहा और लिट्रेचर रिव्यू की गुणवत्ता कौन परख रहा है ?  

कितने कालेजों को है मान्यता

अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय ने उत्तर प्रदेश के 140 कालेजों को बी-फार्मा की मान्यता प्रदान कर रखी है, जिसने जरिये प्रतिवर्ष 15 हजार छात्र, छात्राएं बी-फार्मा की डिग्री लेकर निकल रहे हैं। और कुछ इसी विवि से मान्यता लेने वाले 50 से अधिक कालेजों में मॉस्टर ऑफ फार्मेसी (एम.फार्मा) की डिग्री ले रहे हैं। एमफार्मा के छात्रों का डिजर्टेशन कौन करा रहा है और मेडिसिन बनाने कैंसर के कारक खोजने जैसे कार्य कौन करा रहा है।

प्रो.विनय पाठक पर आरोप

प्रो.विनय पाठक पर आरोप है कि उन्होंने आईईटी के वित्त अधिकारी बीरेन्द्र चौबे से मारपीट  और सरकारी दस्तावेज फाड़ने के आरोप में चार्जशीटेंड गार्ड से डिप्टी रजिस्ट्रार बने आरके सिंह के माध्यम से निजी कालेजों को मान्यता प्रदान करायी गयी। प्रो. विनय पाठक ने निजी कालेजों को कोर्स की मान्यता, कालेजों की सबंद्धता का सारा कार्य डिप्टी रजिस्ट्रार आरके सिंह को दे रखा था। उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति की शिकायत भी शासन में हुई है। सवाल ये है कि आखिर मान्यता और सबद्धता से पहले शुद्ध चिकित्सा विज्ञान के इस कोर्स के लिए आवश्यक उपरकणों, लैब, पशुशाला आदि का निरीक्षण किसने किया ?

 

एम.फार्मा, बी.फार्मा में पढ़ाई

एम-फार्मा, बी-फार्मा की डिग्रीधारी का मुख्य कार्य मानव हित में नई दवा पर शोध, उपलब्ध दवा की गुणवत्ता, मानव शरीर पर प्रभाव और विभिन्न बीमारियों के कारक खोजना मुख्य कार्य है। यही कारण हैं यूरोप और पश्चिमी देशों में चिकित्सकों (डॉक्टरों) से अधिक अहमियत फार्माकॉलॉजी के विशेषज्ञों की होती है। शोध के क्षेत्र में कार्य कर रहे भारतीय चिकित्सक भी फार्माकॉलॉजी के विशेषज्ञों के साथ मिलकर ही बीमारियों पर शोध कार्य करते हैं। पर, प्रो.विनय पाठक की एक अदूरदर्शी नीति के चलते हर साल 15 हजार छात्र, छात्राएं गुणवत्ता विहीन डिग्री लेकर फार्माकॉलॉजी के क्षेत्र में जा रहे हैं।

 

रिसर्च की प्रक्रिया क्या है ?

प्रवेश परीक्षा, साक्षात्कार के बाद कोई छात्र, छात्रा पीएचडी में इनरोल होती है। जिसके बाद वह गाइड के साथ मिलकर टापिक तय करता है और उस पर काम करता है। निय़म के मुताबिक किसी भी प्राइवेट कालेज का प्रोफेसर बिना सरकारी को-गाइड के शोध नहीं करा सकता है। इत्तिफाक से फार्माकॉलॉजी में पीएचडी के लिए एकेटीयू के पास एक भी प्रोफेसर नहीं हैं, तो फिर निजी कालेज शोध करा कैसे रहे हैं  ? और मेडिकल कालेजों, चिकित्सा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपने छात्रों को छोड़कर निजी कालेजों के फार्मा के छात्रों के को-गाइड बन कैसे रहे हैं  ? यही नहीं शोध कार्यों की प्रगति परखने के लिए न्यूनतम प्रत्येक तीन माह में डीआरसी ( डिपार्टमेन्ट ऑफ रिसर्च कमेटी) होनी जरूरी होती है। जिस विश्वविद्यालय ने कोर्स की मान्यता दी होती है, उसके प्रोफेसरों को इसमें शामिल होना अनिवार्य होता है। जब एकेटीयू के पास कोई प्रोफेसर ही नहीं है तो फिर डीआरसी किसके जरिये कराई जा रही है।