Tuesday, 3 January 2023

क्या ठंडा कर दी गयी प्रो.विनय पाठक के खिलाफ जांच

 परवेज़ अहमद

लखनऊ । यूपी विश्वविदयालयों में भ्रष्टाचार की परत दर परत खुलने और उसके केन्द्र बिन्दु छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.विनय पाठक भूमिका की पड़ताल सीबीआई से कराने की संस्तुति से कई सवाल उठ गये हैं। भ्रष्टाचार का दायरा  क्या इतना विस्तृत है कि यूपी एसटीएफ पड़ताल करने में सक्षम नहीं है या जांच के घेरे में ऐसी संस्थाएं हैं, जिन पर हाथ डालना इस एजेंसी के लिए संभव नहीं है ? या केन्द्रीय एजेंसी से जांच कराने की पीछे राजनीतिक कारण भी हैं। वैसे, अभी सीबीआई ने जांच अपने हाथ में नहीं ली है, परन्तु अगर उसने खुले हाथ से जांच की तो सांविधानिक पदों पर आसीन या इस पद पर रह चुकी हस्तियों का घिरना तय हैं। आधा दर्जन से अधिक आईएएस भी इसकी लपेट में आयेंगे।

अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री रहते हुये वर्ष 2015 में प्रो.विनय पाठक को अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय (एकेटीयू) का कुलपति नियुक्त किया गया था। तत्कालीन प्राविधिक शिक्षा मंत्री ने प्रो.विनय पाठक को कुलपति बनाने की पत्रावली तैयार कराई। उस समय प्राविधिक शिक्षा की प्रमुख सचिव मोनिका.एस.गर्ग ने ऐतराज हाजिर किया। आपत्ति को नजर अंदाज कर तत्कालीन कुलाधिपति रामनाईक ने प्रो.विनय पाठक के शोध गाइड व कानपुर आईईटी के पूर्व निदेशक प्रो.संजय मोहन धांडे को कुलपति सर्च कमेटी का चेयरमैन बनाया। जिन्होंने पाठक को कुलपति बनाने की संस्तुति की। 2015 में प्रो.विनय पाठक ने कुलपति के रूप में जब नियम विरुद्ध निर्णय शुरू किये तो शिकायतों का क्रम चल पड़ा। कुलाधिपति कार्यालय और प्रदेश सरकार ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की। हाईकोर्ट में तीन जनहित याचिका दाखिल हुई। पर उन्हें कुलपति का अतिरिक्त चार्ज मिलता रहा। आनंदीबेन पटेल के कुलाधिपति का कार्य संभालने के बाद प्रो.विनय पाठक की शक्ति में और इजाफा हो गया। उन्हें ख्वाजा मोईऩउद्दीन विवि, छत्रपति शाहू जी महाराज विवि और भीमराम आंबेडकर विवि का कुलपति बनाया गया।

29 अक्टूबर को लखनऊ के इंदिरानगर थाने में विश्वविद्यालयों में परीक्षा का कार्य करने वाली संस्था के निदेशक डेनिस मारियो ने प्रो.विनय पाठक पर डेढ़ करोड़ घूस मांगने और  राशि मुखौटा कंपनी के संचालक अजय मिश्र के जरिये राजस्थान की एक कंपनी को भेजने की एफआईआर हुई। एसटीएफ के एडीजी अमिताभ यश ने डिप्टी एसपी अवनीश्वर श्रीवास्तव व दीपक सिंह की दो टीमें बनाईं। जिसकी प्रारम्भिक जांच में नियुक्तियों, ठेके, सुरक्षा, कैन्टीन, परीक्षा, प्रोन्नतियों से लेकर शैक्षिक, गैरशैक्षिक कार्यों में भ्रष्टाचार साक्ष्य उपलब्ध होना शुरू हो गये। भ्रष्टाचार का दायरा भीम राव आंबेडकर विवि से निकलकर एचबीटीयू, ख्वाजा मोईनउद्दीन भाषा विवि, छत्रपति शाहू जी महाराज कानपुर विवि, एकेटीयू तक फैला दिखा। एसटीएफ ने इन विश्वविद्यालयों से ढेरों दस्तावेज कब्जे में लिये। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भ्रष्टाचार से जुड़े तथ्यों की जानकारी दी गयी। सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री ने जीरो टालरेंस के तहत भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कार्रवाई का आदेश दिया। जांच आगे बढ़ी तो राजभवन व वहां तैनात रहे अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गयी। दो माह की लंबी जांच में ये भी खुलासा हुआ कि प्रो.विनय पाठक कुलपतियों की नियुक्ति कराते थे। आधा दर्जन से अधिक विश्वविद्यालयों के कुलपतियों का अतीत सवालों के घेरे में है। वे शैक्षिक योग्यता के मानक पूरे नहीं करते। फिर भी उन्हें कुलपति बनाया गया। इन विश्वविद्यालयों में अजय मिश्र और उनकी सहयोगी कंपनी सैकड़ों करोड़ का ठेका लिये है। इस बीच एसटीएफ ने अजय जैन, संजय सिंह को गिरफ्तार किया। प्रो.विनय पाठक को नोटिस भेजे गये लेकिन वह नहीं गए। एफआईआर की धारा में इजाफा किया गया। यूपी एसटीएफ ढेरों लोगों की गिरफ्तारी की तैयारी कर रही थी। कई कुलपति, कुलसचिव, सहायक और उपकुलसचिव, इंजीनियर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे मिले।

शुक्रवार को अचानक राज्य सरकार ने प्रो.विनय पाठक प्रकरण की सीबीआई जांच की संस्तुति कर दी। सवाल ये है कि आखिर  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सीबीआई जांच कराने का निर्णय क्यों लिया  ? क्या भ्रष्टाचार का दायरा कई राज्यों में है इसलिए सीबीआई जांच की संस्तुति हुई ? या फिर शुरूआती जांच में ही मौजूदा कुलाधिपति और एक पूर्व कुलाधिपति की भूमिका सवालों के घेरे में आने पर ये जांच सीबीआई को  सौंपी गयी। सूत्रों का कहना है कि जिस अवधि में प्रो.विनय पाठक ने भ्रष्टाचार का संजाल फैलाया, उस अवधि के दौरान उत्तर प्रदेश के दोनों कुलाधिपति राजनीतिक रूप से बहुत शक्तिशाली हैं। सत्ता प्रतिष्ठान के बीच ठकराहट रोकने के लिए प्रो.विनय पाठक प्रकरण की जांच सीबीआई को सौंपी गयी। आने वाले दिनों में इस जांच के फैसले और सीबीआई की एफआईआर से ये साफ होगा कि जांच केनद्रीय एजेंसी को सौंपने के पीछे सरकार की मंशा क्या थी ? 

 

यूपी में प्रमुख सीबीआई जांच

-पालना घोटाला :

-शत्रु संपत्ति कब्जा :

-पीसीएस भर्ती घोटाला :

-अपर निजी सचिव भर्ती घोटाला :

-जवाहर बाग अपर पुलिस अधीक्षक हत्याकांड :

-खाद्यान्न घोटाला :

-ऊर्जा विभाग का पीएफ घोटाला-2018 : 

- लखनऊ का रिवर फ्रन्ट घोटाला :

-यूपी का खनन घोटाला :

- प्रयागराज के 51 मामलों की सीबीआई :

- चीनी मिल बिक्री घोटाला :

-जल निगम भर्ती घोटालाः

-यमुना एक्सप्रेसवे घोटाला :

-उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े मनरेगा घोटाला:

-एनएचएम घोटाले की जांच :

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