Tuesday, 20 December 2022

कुलपति भूमिगत, खडाऊं प्रति कुलपति ने संभाली, कानपुर विवि चला कौन रहा ?

-49 दिनों से कुलपति के भूमिगत होने पर क्यों नहीं हो रही इमरजेंट कार्य परिषद

-तबादला होने पर कार्यमुक्त करने का अहसान उतार रहे कुलसचिव डॉ.अनिल यादव

-ऑनलाइन लीव मैनेजमेंट सिस्टम में वीसी माह में सिर्फ ढाई दिन अवकाश ले सकता

 

परवेज़ अहमद

लखनऊ। छत्रपति शाहू जी महाराज कानपुर विश्वविद्यालय के कुलपति उन्नचास (49 दिन ) दिन से भूमिगत हैं ? ऑनलाइन लीव मैनेजमेंट पोर्टल पर भी प्रो.विनय पाठक ने अवकाश नहीं लिया। पांच माह पहले यूपी सरकार कुलसचिव डॉ.अनिल यादव को विवि का कार्य छोड़ने का आदेश दे चुकी है, फिर भी पद नहीं छोड़ा। सवाल ये है कि कानपुर विवि प्रशासन क्या निरंकुश है। इन परिस्थितियों में सेमेस्टर परीक्षा, एडमीशन, निर्माण और नीतिगत निर्णय कौन ले रहा ?  विश्वविद्यालय कार्य परिषद की इमरजेंट मीटिंग क्यों नहीं हो रही ? दस हजार से अधिक छात्रों का भविष्य उज्जवल बनाने की जिम्मेदारी उठा रहे विश्वविद्यालय को संचालित कौन रहा ? कुलाधिपति कार्यालय, उच्च शिक्षा विभाग आंख क्यों मूंदे है।

लखनऊ के इंदिरानगर कोतवाली में 29 अक्टूबर को छत्रपति शाहू जी महाराज कानपुर विवि के कुलपति प्रो.विनय पाठक के विरुद्ध डेढ़ करोड़ घूस लेने की एफआईआर हुई। वादी मुकदमा डेविड मारियो डेनिस ने कहा है कि प्रो.विनय पाठक कहते हैं कि उन्हें ऊपर तक पैसा देना होता है। ये ऊपर कौन है ? इसका जवाब  स्पेशल टॉस्क फोर्स ढूंढ रही है। पड़ताल बढ़ने के साथ ही प्रो.विनय पाठक पर भ्रष्टाचार के इल्जामों की श्रंखला भी लंबी होती जा रही। कुलपति प्रो. विनय पाठक भूमिगत हैं। जब कुलपति के अवकाश के लिए कुलाधिपति कार्यालय ने नियम निर्धारित कर रखे हैं। ऑन लाइन लीव मैनेजमेंट सिस्टम बनाया है, तब फिर प्रो. विनय पाठक के 49 दिन से भूमिगत होने की विवि प्रबंधन को अधिकृत सूचना नहीं तो कार्य परिषद (ईसी) की इमरजेंट मीटिंग क्यों नहीं हो रही ?  कुलपति साल में सिर्फ 30 दिन का अवकाश ले सकता है। कुलपति पदधारी अगर जीवन जोखिम वाली बीमारी की चपेट में आ जाता है और बिना सूचना अस्पताल में भर्ती होता है तो कार्य परिषद की इमरजेंट मीटिंग में चर्चा होनी चाहिए, ये ही नैतिकता है ? इस मीटिंग में विवि संचालित करने का जिम्मा किसी को सौंपकर सूचना कुलाधिपति कार्यालय को दी जानी चाहिए ? पर कानपुर विवि में अब तक में ऐसा नहीं हुआ। नियम कहता है कि बिना सूचना या निर्धारित अवधि से अधिक समय तक कुलपति के गैर हाजिर होने पर पर पदेन सचिव यानी कुलसचिव डॉ.अनिल यादव को ईसी की इमरजेंट मीटिंग बुलाकर उसकी सूचना देनी चाहिए। पर, उनका तो खुद का स्थानांतरण पांच माह पूर्व हो चुका है लेकिन प्रो.विनय पाठक के अति करीब के चलते शासन के आदेशों को दरकिनार कर दिया गया है। लिहाजा वह इमरजेंट ईसी  नहीं बुला रहे। यही नहीं, विश्वविद्यालय के वरिष्ठ शिक्षकों को नजर अंदाज कर प्रो.विनय पाठक ने अपने करीबी प्रो. सुधीर अवस्थी को प्रतिकुलपति नियुक्त किया था। वह भी वो  कर्ज उतारने में लगे हैं, भले इसका खामियाजा विश्वविद्यालय के ढेरों शिक्षक, कर्मचारी व उससे संबंद्ध कालेजों के दस हजार छात्र भुक्त रहे हैं। छात्रों की अंक तालिकाओं में गड़बड़ियां हैं। छात्र फेल किये गये हैं, विरोध में आंदोलित भी हैं पर प्रो.विनय पाठक के प्रतिनिधि प्रो.सुधीर अवस्थी व डॉ.अनिल यादव छात्र समस्या व नियमों को हवा में उड़ा रहे हैं। डॉ.अनिल यादव की एक खास दल से राजनीतिक प्रतिबद्धता जगजाहिर है, आरोप है कि विवि के असमंजस में वे उस दल का लाभ तलाश रहे हैं।

 

संविधान पीठ का फैसला भी बेअसर

केन्द्र सरकार ने भ्रष्टाचार के आरोपियों पर कड़ी कार्रवाई की पैरवी करते हुए सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि 2015 के एक फैसले पर पुर्नविचार का अवसर है। इसके बाद दो दिन पहले हुई सुनवाई में इसी प्रकरण में न्यायमूर्ति अब्दुल नजीर, न्यायमूर्ति बीआर गवई, न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना, न्यायमूर्ति रामा सुब्राम्णयम और न्यायमूर्ति नागरत्ना की संविधान पीठ ने कहा-शासन को प्रभावित करने में भ्रष्टाचार की बड़ी भूमिका होती है। इससे ईमानदार अधिकारियों, नागरिकों का मनोबल कम होता है। संविधान पीठ ने  कहा- प्रत्यक्ष सबूतों या फिर मौखिक या दस्तावेजी प्रकृति के सबूतों को आधार पर लोकसेवक को दोषी ठहराया जा सकता है। मगर कानपुर विश्वविद्यालय पर ये फैसला अभी बेअसर है। कुलपति प्रो.विनय पाठक के खिलाफ घूसखोरी की एफआईआर उनकी मुखौटा कंपनी को ऑनलाइन धन ट्रांसफर होने के साक्ष्य उपलब्ध होने और पांच अन्य विश्वविद्यालयों की खामियों का पुलिंदा बिखरा होने के बाद भी कुलाधिपति कार्यालय ने चुप्पी साध रखी है। कानपुर विवि की कार्य परिषद के सदस्य भी खामोश हैं।

 

कानपुर विवि के ईसी मेम्बर

छत्रपति शाहू जी महाराज कानपुर विवि की कार्य परिषद में 24 लोग हैं। इनमें से कई बड़े शिक्षाविद, उद्योगपति भी हैं लेकिन सबके सब खामोश हैं। सूत्रों के मुताबिक प्रो.विनय पाठक अध्यक्ष, डॉ. सुधीर अवस्थी, प्रतिकुलपति सदस्य, न्यायिक सदस्य न्यायमूर्ति श्रीकांत त्रिपाठी, डॉ.जेएऩ गुप्ता जागरण एजूकेशन फाउंडेशन, डॉ. महेन्द्र अग्रवाल आईआईटी, प्रो.आरसी मिश्र, डॉ.संजय काला, प्रो.मुकेश रंगा, डॉ.सुधांशु पांडिया, डॉ.अंशू यादव, डॉ.एसके श्रीवास्तव, डॉ.रिपुदमन सिंह, डॉ.जोसफ डेनियल, डॉ.एमएच सिद्दीकी, डॉ.राजेश कुमार त्रिपाठी, डॉ.राजेश कुमार, डॉ.प्रमोद कुमार यादव, डॉ.उमेश चन्द्र वाजपेयी, डॉ.सुधीर कुमार वर्मा, प्रेम शंकर चौधरी वित्त अधिकारी, डॉ.अंजनी कुमार मिश्र और कुलसचिव अनिल कुमार यादव शामिल हैं।

 

कुलपति के अवकाश का नियम

 

-    वर्तमान तिथि से आगामी 10 दिनों के लिए अवकाश का आवेदन नहीं कर सकेंगे। (अर्थातः 10 दिन का अवकाश लेने के लिए प्रॉयर सूचना देनी होगी)

-    अवकाश कैलेंडर में बतौर अवकाश चिन्हित तिथियों के लिए अवकाश नहीं ले सकेंगे । (अर्थातः होली, दीपावली, ईद, गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस का अवकाश नहीं ले सकेंगे)

-    शनिवार और रविवार के दिन कुलपति अवकाश नहीं ले सकता।

-    वर्तमान तिथि व पूर्व की तिथि (अर्थातः सोमवार को अवकाश लेना है तो सोमवार को ही आवेदन नहीं कर सकते, इसके लिए रविवार को ही आवेदन करना होगा और एडवांस में कोई छुट्टी नहीं ले सकते)

-    एक जनवरी से 31 दिसम्बर तक यानी एक साल में तीस दिन अवकाश ले सकता हैं। अर्थात माह में सिर्फ ढाई दिन की छुट्टी अनुमन्य है।

 

कोट

मैं, बहुत व्यस्त हूं। बहुत काम है। सब ठीक चल रहा है। कार्य परिषद और कुलपति जी के संबंध में सही जानकारी जनसंपर्क अधिकारी ही दे सकते हैं, ( ध्यान रहे जनसंपर्क अधिकारी संविदा कर्मचारी हैं। कुछ माह पहले प्रो.विनय पाठक ने उन्हें नियुक्त किया) उनसे बात कीजिए। हम जानकारी नहीं दे सकते। बात में बात करेंगे- प्रति कुलपति सुधीर अवस्थी

 

Friday, 2 December 2022

इंजीनियरिंग गुणवत्ता सुधार का धन दूसरे विश्वविद्यालयों को बांटा !

 राजस्थान, उत्तराखंड से साक्ष्य लेकर एसटीएफ के पास पहुंच रहे हैं लोग

परवेज़ अहमद

 लखनऊ। छत्रपति शाहूजी महाराज कानपुर विवि के कुलपति प्रो.विनय पाठक ने अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय का कुलपति रहते हुए सरकारी इंजीनियरिंग कालेजों की गुणवत्ता बेहतर करने, संसाधन बढ़ाने वाले करोड़ों रुपये दूसरे विश्वविद्यालयों को आवंटित कर दिये थे। एसटीएफ की जांच में यह खुलासा हो रहा है। सूत्रों का कहना है कि यूपी, उत्तराखंड और राजस्थान विवि में वित्तीय व प्रशासनिक अनियमितताओं से जुड़े दस्तावेज लोग स्वतः ही स्पेशल टॉस्क फोर्स (यूपीएसटीएफ) को उपलब्ध करा रहे हैं। इनमें से कुछ लोग एसटीएफ के गवाह बनने तक को तैयार हैं।

डेढ़ दशक से लंबे समय से लगातार किसी न किसी विश्वविद्यालय के कुलपति बनते आ रहे प्रो.विनय पाठक के खिलाफ उच्च शिक्षा से जुड़े लोगों की नाराजगी का आलम ये है कि वे उत्तराखंड व राजस्थान से दस्तावेज लेकर लखनऊ में एसटीएफ के अधिकारियों से संपर्क कर रहे हैं। सामन्यतः जब किसी प्रकरण की जांच करती है कि शिकायतकर्ता के अतिरिक्त कोई अन्य व्यक्ति साक्ष्य उपलब्ध कराने को पुलिस के सामने नहीं आता है। मगर, प्रो.विनय पाठक के मामले में यह उल्टा है। सूत्रों का कहना है कि प्रो.विनय पाठक ने दीनदयाल उपाध्याय क्वालिटी इमप्रूवमेंट प्रोग्राम (डीडीयूक्यूआईपी) मिले 300 करोड़ रुपये में भारी राशि बीआईटी झांसी, मदन मोहन मालवीय विवि गोरखपुर और एचबीटीआई को आवंटित कर दिया। यह राशि राज्य सरकार द्वारा इंजीनियिरंग कालेज में प्रवेश परीक्षा शुल्क के जरिये जुटाये गये थे, जिसे प्राविधिक शिक्षा विभाग ने एकेटीयू को सरकारी इंजीनियरिंग कालेजों को आवंटित करने के लिए आवंटित किया था। सूत्रों का कहना है कि बीआईटी को 15 करोड़, एचबीआईटी को 10 और मदन मोहन मालवीय विवि को दस-दस करोड़ रुपया आवंटित किया गया था। सूत्रों का कहना है कि इतना ही नहीं कुलपति प्रो.विनय पाठक के कार्यकाल में कम्प्यूटर लैब बनाने के नाम पर भी भारी वित्तीय गड़बड़ी की गयी है।

प्राविधिक शिक्षा के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि एचबीटीआई, बीआईटी और मदनमोहनल मालवीय खुद स्वायत्तशासी व स्वतंत्र संस्था हैं। ये संस्थाएं अपनी प्रवेश परीक्षाएं स्वतः कराती है। इन संस्थाओं को एकेटीयू ने आखिर किस आधार पर धन आवंटित किया। वित्तीय हैंडबुक के मुताबिक कोई विवि दूसरे विवि को योजनामद का धन आवंटित नहीं कर सकता है। इस प्रकरण की शिकायत हुई लेकिन उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। सूत्रों का कहना है कि इस मामले की शिकायत कुलाधिपति व राजभवन कार्यालय को भी की गयी थी, मगर उस पर कोई कार्रवाई नहीं की गयी।

   

राजभवन की खामोशी पर चर्चा !

लखनऊ। कानपुर विवि के कुलपति के खिलाफ घूसखोरी की एफआईआर, भ्रष्टाचार की नित्य नई परतें खुलने के बाद कुलाधिपति व राजभवन कार्यालय की चुप्पी पर सवाल उठने लगे हैं। कल छह पूर्व विधायकों के पत्र में कानपुर विवि के कुलपति के खिलाफ कार्रवाई न होन पर सवाल उठाया गया था। सूत्रों का कहना है कि प्रो.विनय पर लगे आरोपों की जांच कर रहे एसटीएफ के शीर्ष अधिकारियों ने भी राजभवन को बताया है कि जिन विवि का प्रो.विनय के पास चार्ज था, वहां से बड़े पैमाने पर दस्तावेजी शिकायतें मिल रही हैं। कल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी राजभवन जाकर राज्यपाल आनंदीबेन पटेल से मुलाकात की थी, जाहिरा तौर पर यह शिष्टाचार मुलाकात थी लेकिन सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री कानपुर विवि के कुलपति प्रो.विनय पाठक पर लगे आरोपों, जांच की दिशा पर भी चर्चा की है, हालांकि इसकी पुष्टि नहीं है। इस  संबंध में पक्ष जानने के लिए राज्यपाल की प्रमुख सचिव कल्पना अवस्थी से बात का कई बार प्रयास किया गया लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका।

 

 

बाजीगर कुलपति

 

ये तारीख थी-2 जून 1969। उत्तर प्रदेश के फैजाबाद ( अब अयोध्या) का तापमान 45 डिग्री छू रहा था। लू के थपेड़े थे। फिर भी लोग पसीने से तर-ब-तर थे। इसी दिन......के घर बालक का जन्म हुआ, बधाइयां बजीं। मिठाइयां बंटी।...नामकरण हुआ- विनय पाठक। पर, काल के कपाल पर लिखे को कौन मिटा सकता है ? कालांतर में ये बच्चा बड़ा हुआ तो उसके नाम के आगे डॉक्टर फिर प्रोफेसर लिखा गया-कल का यही बच्चा आज झूठ, फरेब, भ्रष्टाचार का पर्याय बन उच्च और तकनीकी शिक्षा व्यवस्था को मुंह चिढ़ा रहा है। हैरत है, इस बच्चे ने  अपने बायोडेटा ( शैक्षिक, व्यक्तिगत पहचान) से जैविक पिता, पैतृक शहर का नाम तक डिलीट कर दिया। राजनीतिक, शैक्षिक, नौकरशाही की तिकड़ी के बल पर राजस्थान, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के नये-नये विश्वविद्यालयों के कुलपति का ओहदा संभाल रहे प्रो.विनय पाठक ने ऊंची तालीम के मंदिरों को भ्रष्टाचार के ठिकानों में कुछ इस तरह से तब्दील किया कि शीतकालीन मौसम में भी छात्रों, शिक्षकों, प्रशासनिक अधिकारियों, नौकरशाहों, कुलाधिपति दफ्तर और जांच एजेंसी स्पेशल टॉस्क फोर्स तक के माथे पर पसीना छलक रहा है।

 

 

 

 

 

किस विवि में कैसा भ्रष्टाचार

 

  डॉ.भीम राव आंबेडकर विवि आगरा ( कार्यवाहक कुलपति, प्रो.विनय पाठक)

-5 मई 2022। असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर की भर्ती की गयी, जिसमें नियमों की अनदेखी। किसी का शोध सही नहीं, किसी की डिग्री सही नहीं। किसी की अंकतालिकाएं, एपीई के अंक सही नहीं।

-ललित कला संस्थान को तोड़कर 40 करोड़ रुपये निर्माण पर खर्च किये गये। कार्य दायी संस्था निर्धारित कर काम कराया गया। निर्माण अधूरा है, भुगतान पूरा।

-इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एण्ड टेक्नॉलाजी के सामने एक 20 करोड़ खर्च, अभी फर्नीचर तक नहीं आये।

-इंस्टीट्यूट ऑफ बेसिक साइंस में कम्प्यूटर लैब पर 70 लाख खर्च, इस भवन का न नक्शा पास था-न ही कोई एस्टीमेट तैयार किया गया।

- सेमेस्टर, आतंरिक परीक्षा के प्रश्न पत्र छापने का काम उसकी कंपनी को दिया, जिसे प्रोफेसर विनय पाठक की मुखौटा कंपनी कहा जाता है। अजय मिश्र की गिरफ्तारी के बाद काफी तक इसकी पुष्टि भी हो गयी है।

 

ख्वाजा मोइनउद्दीन भाषा विवि, लखनऊ ( कार्यवाहक कुलपति प्रो.विनय पाठक)

-    रूसा योजना का 25 करोड़ रुपया खुर्द-बुर्द किया गया, ये धन पीडब्ल्यूडी की ब्रांच राजकीय निर्माण निगम के जरिये किया गया। जबकि ये राशि के गोलमाल का प्रजेंटेशन राज्यपाल के तत्कालीन प्रमुख सचिव महेश गुप्ता के सामने किया गया।  

-    विश्वविद्यालय की परचेज कमेटी ने छात्रावासों में इस्तेमाल होने वाले जो तख्त 4 हजार रुपये का खरीदा था, वही तख्त 10 हजार रुपये प्रति नग के हिसाब से 2 हजार खरीदे।

-    छात्र-छात्राओं के इस्तेमाल की जो आलमारी चंद दिन पहले 15 हजार की खरीदी गयी थीं, उसे ही 35 हजार प्रति नग दिखाकर भुगतान निकाला गया। दो सौ आलमारी खरीदी गई। ( फाइनेंसियल हैंडबुक का पालन नहीं किया)

-    मात्र आठ साल पहले बने कुलपति आवास की मरम्मत पर एक करोड़ रुपये खर्च दिये। भुगतान मौजूदा कुलपति कर रहे हैं।

-    पांच साल पहने बने विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस की मरम्मत पर 35 लाख रुपये खर्च किये गये।

-    आउट सोर्सिंग और परीक्षा का काम अजय मिश्र (जेल में बंद) की कंपनी को दिया गया, इसके लिए टेंडर के स्थान पर कोटेशन का इस्तेमाल किया गया।

-    एआईसीटीई से अनुमोदित इंजीनियरिंग संकाय के पाठयक्रम के लिए एकत्रित धन को कुलसचिव, वित्त अधिकारी के जरिये दूसरे मद में खर्च करा दिया, संकाय सपना बन गया।

-    आरक्षण नियमों का उल्लंघन करके शिक्षकों का प्रमोशन किया। जो आरक्षण की जरिये भर्ती हुए थे, उन्हें जनरल कोटे में प्रमोशन देकर दोनों वर्गो का नुकसान किया।

-    नियमों की अनदेखी कर मसूद अहमद फलाही को डिप्टी रजिस्ट्रार नियुक्त किया गया, जिसकी शिकायत पर कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल के विशेष कार्यधिकारी डॉ.पंकज एल जानी ने जांच का आदेश दिया, पर जांच कहां गई, किसी को पता नहीं।

         हरकोर्ट बटलर प्रौद्योगिकी विवि कानपुर ( कार्यवाहक कुलपति, प्रो.विनय पाठक)

-    लंबे समय से कार्यरत आउट सोर्सिंग कंपनी को हटाकर कथित रूप से अपनी मुखौटा कंपनी को मैन पावर, सुरक्षा, सफाई, चपरासी जैसे कार्यों का जिम्मा दिया गया, जिसके लिए प्रतिसाल पांच करोड़ से अधिक का भुगतान करने का आरोप है।

-    निर्माण कार्यो , लैब, प्रोन्नतियों को मंजूरी दी गयी, जिसमें आरक्षण नियमों का पालन नहीं किया गया।

-    इस विश्वविद्यालय में इनकी गड़बडियों की पूर्व में हो चुकी शिकायत पर तत्कालीन प्रमुख सचिव कुमार कमलेश की अध्यक्षता में एक जांच समिति ने विस्तृत जांच की, जिसके दस्तावेज ही गायब हो गये हैं।

 

एकेटीयू, लखनऊ ( पूर्णकालिक कुलपति , प्रो. विनय पाठक –दो टर्म )

-    शिक्षकों की भर्ती से लेकर रजिस्ट्रार, डिप्टी रजिस्ट्रार, इंजीनियरिंग कालेजों के निदेशक नियुक्त करने में भारी भ्रष्टाचार है । पांच सौ से अधिक पत्रावलियों की एसटीएफ स्क्रीनिंग कर रही है।

-    इस विवि में भ्रष्टाचार कितना गहरा है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां के प्रोफेसर, प्रशासनिक अधिकारी ही एक दूसरे के खिलाफ ऑफ द रिकार्ड गड़बड़ियों के दस्तावेज एसटीएफ को सौंप रहे हैं।

-    एक दूसरे के खिलाफ कर्मचारियों, अधिकारियों से हासिल दस्तावेज पढ़कर एसटीएफ अधिकारी कुलसचिव और मौजूदा कुलपति से दस्तावेज मांग रहे हैं।

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कुलपति घर की रंगाई-पुताई पर 42, गेस्ट हाउस पर 38 लाख खर्च

 

ख्वाजा मोईऩ उद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय का हाल...

-छात्रों की फीस से एकतित्र रकम घर, गेस्ट हाउस पर हुई खर्च

-बाहुबली कुलपति प्रो विनय पाठक के साथ जांच घेरे में आये शिक्षक, इंजीनियर थे समिति के सदस्य

 परवेज़ अहमद

लखनऊ। जिस विश्वविद्यालय की स्थापना को सिर्फ दस साल हुये हों, जिसके आठ कुलपति रह चुके हों, वीसी आवास में कुछ न कुछ रिनोवेशन (नवीनीकरण) होता रहा हो...उस कुलपति आवास की मरम्मत पर कितना धन खर्च हो सकता है ?  पांच, दस, पन्द्रह,  बीस लाख ? जी नहीं-42 लाख 33 हजार रुपये। ये ही नहीं, गेस्ट हाउस मरम्मत पर 38 लाख रुपया खर्च हो गये। यह दूरदराज नहीं बल्कि कुलाधिपति कार्यालय से बमुश्किल 20 किलोमीटर दूर ख्वाजा मोईन उद्दीन चिश्ती भाषा विवि का प्रकरण हैं। इस खर्च की राशि छात्रों की फीस से जुटाई गयी। जिसकी मंजूरी उस भवन समिति ने प्रदान की, जिसके दो सदस्यों लाभ देने के लिए छत्रपति शाहूजी महाराज विवि के कुलपति प्रो.विनय पाठक ने नियम शिथिल किये थे।

तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने 2009 में लखनऊ में मान्यवर कांशीराम स्मारक भाषा विश्वविद्यालय की स्थापना की थी, इस विश्वविद्यालय ने जब आकार लिया, उस समय राज्य में समाजवादी पार्टी की सरकार थी, जिसने नाम बदलकर ख्वाजा मुईऩ उद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय कर दिया । बहुचर्चित सेवानिवृत आईएएस अनीस अंसारी को पहला कुलपति नियुक्त किया गया। जिन्होंने कुलपति आवास सजाने-संवारने में कसर नहीं रखी। उनका टर्म पूरा होने पर एक बाद एक कुलपति बदले। आखिर अब्दुल कलाम विश्वविद्यालय (एकेटीयू) के घटक संस्थान आईईटी की सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर एनबी सिंह 27 अप्रैल 2022 को ख्वाजा मोईऩउद्दीन विवि के आठवें कुलपति नियुक्त हुये। इस समय एकेटीयू के कुलपति प्रो.विनय पाठक थे जो ख्वाजा मोइन उद्दीन विवि के कार्यवाहक कुलपति रह चुके थे।

सूत्रों का कहना है कि कार्यभार संभालने के कुछ अरसे बाद प्रो.एनबी सिंह ने पहले भवन समिति का गठन किया, जिसमें एकेटीयू में सहकर्मी रहे दो सदस्यों को शामिल किया। समित ने कुलपति आवास की मरम्मत पर 42 लाख 33 हजार प्रस्ताव पारित किया।  गेस्ट हाउस मरम्मत पर 38 लाख खर्च की मंजूरी मिली। इस धन को खर्च भी कर दिया गया। ध ये राशि किसी सरकारी अनुदान या योजना की नहीं बल्कि छात्रों की फीस से अर्जित धनराशि थी। आवास, गेस्ट हाउस पर धन खर्च होने के बाद कुलपति एनबी सिंह अध्यक्षता में 21 जून 2022 को कार्य समिति व भवन समिति की मीटिंग में इस खर्च को जायज ठहराते हुए अनुमोदित कर दिया। गेस्ट हाउस 2015-16 में बनकर तैयार हुआ है। आश्चर्यजनक बात ये है कि कुलपति आवास, गेस्ट हाउस पर 80 लाख से अधिक खर्च करने वाली समिति ने शैक्षिक कार्यों, छात्रों के इस्तेमाल के लिए जरूरी लिफ्ट शुरू कराने के लिए जरूरी धन का प्रस्ताव शासन भेज दिया। विवि प्रबंधन ने लड़कियों व लड़कों के छात्रावास की मरम्मत पर पर भी दो करोड़ रुपये खर्च कर डाले।    

 

भवन समिति में कौन-कौन

प्रो.एनबी सिंह कुलपति अध्यक्ष, प्रवीण त्रिपाठी वित्त अधिकारी, मसऊद आलम संकायाध्यक्ष कला एवं मानविकी संकाय, डॉ. तत्हीर फातिमा संकायाध्यक्ष-विज्ञान संकाय, कौशलेश कुमार शाह सहायक आचार्य (सिविल) सदस्य थे। अधिसाशी अभियंता लोक निर्माण निर्माणखंड-1 सत्यपाल सिंह, पीडी आरएनएन संदीप सिंह, प्रो.वीरेन्द्र पाठक सीईडी, आईईटी (एकेटीयू घटक संस्थान) और आशीष मिश्र एकेटीयू को विशेष सदस्य नामित किया गया था। इन सभी ने मीटिंग में हिस्सा लिया। प्रो.वीरेन्द्र पाठक पर ये आरोप है कि जिन सालों में वे विदेश में रहे, उन सालों को जोड़की प्रो. विनय पाठक ने उन्हें प्रोफेसर बनाया गया। इंजीनियर आशीष मिश्र पर एकेटीयू में करोड़ों के कार्य में अनियमितता समेत ढेरों आरोप हैं।

 

कहां कितना खर्च

-महिला छात्रावास रंगाई-पुताई ( पार्ट ए-बी) : 114.58 लाख

-बालीवाल व टेनिस कोर्ट व अन्य मरम्मत : 8705.65 लाख

- नौ सौ क्षमता के आडिटोरियम निर्माण: 1949.81 लाख

- शैक्षणिक भवन, लाइब्रेरी में चैनल निर्माण: 03.55 लाख

- महिला, पुरुष छात्रावास की खिड़की, दरवाजे मरम्मत: 03,94,458 लाख

- महिला एव पुरुष छात्रावास की सिनेटरी फिटिंग पर : 11,32,487

 

 

कुलपति प्रो.एनबी सिंह बोले-

कुलपति आवास की बाउंड्री बनीं थी, छात्र कई बार धरना-प्रदर्शन कर चुके हैं, सुरक्षा की दृष्टि से आवास की बाउंड्री बनवाई गयी है। कई सालों से रंगाई-पुताई का कार्य नहीं हुआ था, इसलिए इस पर धनराशि खर्च की गयी। कोरोना काल में तत्कालीन कुलपति ने गेस्ट हाउस को कोरनटाइन सेंटर बना दिया था, इसके बाद कुछ समय इस गेस्ट हाउस में पीएसी की टुकड़ी रही, जिससे गेस्ट हाउस रहने लायक नहीं बचा था। कुछ दिनों में राष्ट्रीय सेमिनार होने वाले हैं, इसलिए 38 लाख रुपये खर्च करके गेस्ट हाउस का रिनीवेशन कराया गया है।

 

कुलपति की ये भी सफाई

मेरे कार्यभार संभालने के बाद विवि के दो शिक्षकों में मारपीट हुई थी, जिन शिक्षक की ज्यादती समझ में  आ रही थी, उन्होंने ही जांच कराने की मांग की थी। जिस पर एक कमेटी बना दी गयी है। इस कमेटी बनने पर शिक्षकों ने एक समझौता ज्ञापन दिया, जिसे जांच कमेटी को भेज दिया गया है। ये लोग इस ज्ञापन के आधार पर जांच खत्म करने का दबाव बना रहे थे। जिसे मानने से इनकार करने पर कई तरह के आरोप लगा रहे हैं।

 

 

 

लविवि में अब निकला टीम-52 का जिन !


-एनथ्रोपॉलाजी की शिक्षिका प्रो.किया पांडेय को प्रोफेसर पद पर प्रोन्नति देने की तैयारी

-कुलपति का कार्यकाल 29 दिन बचे होने पर भी ताबड़तोड़ प्रोन्नति, नियुक्ति जारी

परवेज़ अहमद

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के गरिमापूर्ण विश्वविद्यालयों में शुमार लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आलोक राय पर कार्यकाल के अंतिम दिनों में करीबियों को उपकृत करने की कोशिशों का आरोप लग रहा है। उनके कार्यकाल में सिर्फ 29 दिन शेष हैं। एनथ्रोपॉलाजी (मानव शास्त्र) की शिक्षिका प्रो.किया पांडेय को प्रोफेसर पद पर प्रमोशन की तिथि घोषित करने से चालीस साल पुराना टीम-52 का जिन फिर बाहर आ गया है। उधर, हाल के दिनों में जिन शिक्षकों को प्रोन्नति देने का निर्णय लिया गया, उस पर मंजूरी के लिए कार्य परिषद की इमरजेंट मीटिंग की जा रही है। इससे नाराज शिक्षक कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल की ओर से हाईकोर्ट को दिये शपथ पत्र, जिसमें तीन माह का कार्यकाल शेष रहते नीतिगत निर्णय नहीं लिये जाने की बात कही गयी है।

 वर्ष 1997-98 में लविवि के तत्कालीन कुलपति ने शिक्षण की गुणवत्ता बेहतर करने की मंशा से 52 अंशकालिक शिक्षक नियुक्त कर उन्हें अध्यापन दायित्व दे दिया, बदले में इन्हें मानदेय मिलता था। मगर इनको नियुक्ति पत्र जारी नहीं किया गया था। छह सालों से अधिक की सेवा पर इन शिक्षकों को रेग्युलर करने का दबाव बनाया। 10 जून 2004 की लखनऊ विवि की कार्य परिषद ने उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय अधिनियिम की धारा-31-3 (सी) के तहत तीन कैटेगरी के आधार पर रिक्त पद , अर्हता , योग्यता , उसी वर्ग की रिक्तता पर शिक्षकों को लेक्चरर के पद पर सेवायोजित करने का फैसला लिया। इसकी तीन श्रेणी भी बना दी। पहली श्रेणी में 26 शिक्षक थे, जिनमें सबसे अधिक फिजिक्स विभाग में थे। बी श्रेणी में भी पद और उसी वर्ग की रिक्तता के आधार पर नियुक्त करने का निर्णय था। तीनों श्रेणी के शिक्षकों को पद रिक्तता के आधार समायोजित करने की प्रक्रिया चलती रही।

इस अंतराल में टीम-52 की एक सदस्य ने 2012 में हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर समायोजन प्रोन्नति की गुहार लगायी, अदालत ने अर्हता व उसी वर्ग का पद रिक्त होने पर  समायोजित करने का आदेश दिया। सूत्रों का कहना है कि लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति का पद संभालने के बाद प्रो.आलोक राय ने टीम-52 की सदस्य डॉ.किया पांडेय को न सिर्फ विवि के कोर ग्रुप में शामिल किया बल्कि गर्ल्स छात्रावास की जिम्मेदारी सौंप दी। यहां उन पर 13 लाख से अधिक की वित्तीय गड़बड़ी का आरोप लगा। उच्च शिक्षा विभाग के अधिकारियों व राजभवन से शिकायत हुई। इतना ही नहीं, कार्यकाल के 29 दिन शेष होने के बावजूद कुलपति आलोक राय ने प्रोन्नति कमेटी की ताबड़तोड़ निर्धारित कर दीं। आश्चर्यजनक बात ये है कि अंतिम दिनों के फैसलों पर कार्य परिषद की इमरजेंट मीटिंगें बुलाकर उस पर सहमित की मुहर लगवाई जा रही है। आरोप है कि इस क्रम में अब डॉ.किया पाण्डेय को 2014 से प्रोफेसर पद पर प्रोन्नति के लिए प्रोन्नति कमेटी की मीटिंग बुलाई गयी है जबकि इन वर्षो में पद रिक्त नहीं था। इस पद पर पहले से ही शिक्षक कार्यरत थे। सवाल ये है कि क्या एक पदों पर दो लोगों को वेतन दिया जाएगा ?   

 

 

विवि में बहुत से शिक्षकों का प्रमोशन रुका था, मैने अपने कार्यकाल में बहुत से शिक्षकों का प्रमोशन किया है, उसी क्रम में ये प्रमोशन भी है। हाईकोर्ट ने अंतिम दिन तक कुलपति को फैसला लेने की बात कही है। आपत्तियों पर दृष्टि बनी हुई है।–प्रो.आलोक राय, कुलपति लखनऊ विवि

 

रेप, गुन्डागर्दी और भ्रष्टाचार के मुजरिमों को सौंपा छात्रों का भविष्य !

-दुष्कर्म के आरोप में फरारी के दौरान लाइफ साइंस में असिस्टेंट प्रोफसर बने

-वित्त नियंत्रक को मारने पर नामजद एफआईआर के बाद हुये डिप्टी रजिस्ट्रार

-परीक्षा नियंत्रक पर हमले के आरोप में निलंबित रहते बने एसोसिएट प्रोफेसर

 

परवेज़ अहमद

लखनऊ। छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.विनय पाठक घूसखोरी, भ्रष्टाचार, नियमों का मखौल उड़ाने के इल्जामों से ही घिरे नहीं है बल्कि दुराचार आरोपी को असिस्टेंट प्रोफेसर, गुंडागर्दी करने में चार्जशीटेड को डिप्टी रजिस्ट्रार बनाने और बीआईटी ( बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी) के परीक्षा नियंत्रक पर जानलेवा हमला के आरोप में निलंबित को एसोसिएट प्रोफेसर नियुक्त कराने के भी आरोपों से घिरे हैं। इनमें से दो प्रकरण एकेटीयू और कानपुर विवि, एमएमएमटीयू गोरखपुर, झांसी इंजीनियरिंग कालेज का एक-एक प्रकरण हैं।

छत्रपति शाहू जी महाराज कानपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.विनय पाठक पर शिक्षक भर्ती में गड़बड़ी करने आरोप हैं ही, उन्होंने स्कूल ऑफ लाइफ साइंस एण्ड बॉयोटेक्नालाजी  में फैशन डिजाइनिंग की छात्रा से बलात्कार के आरोपी डॉ.चन्द्रेश शर्मा को असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त दिया। जिन्होंने कार्यभार ग्रहण किया। छात्र-छात्राओं को पढ़ाने लगे। अचानक दिल्ली पुलिस ने विवि परिसर में छापा मारकर डॉ.चन्द्रेश शर्मा को गिरफ्तार कर लिया। उन पर साउथ ईस्ट दिल्ली के कालकाजी थाने में आईपीसी की धारा-376 ( बलात्कार), 328 (अपराध के लिए किसी को क्षति पहुंचाना) और 506 ( जान-माल की धमकी) की धारा में जून 2021 से एफआईआर हुई थी। जिसमें वह फरार थे, इसी दौरान असिस्टेंट प्रोफेसर भी हो गये। डॉ. चन्द्रेश की गिरफ्तारी के बाद भी उन्हें निलंबित नहीं किया गया। अलबत्ता कुलपति प्रो.विनय पाठक के नेतृत्व वाली कार्य परिषद ने प्रस्ताव संख्या-2022-2.10 में नवनियुक्त शिक्षक डॉ.चन्द्रेश के प्रार्थना पत्र पर विचार के लिए अधिवक्ता से आख्या लेने का अधिकार भी अध्यक्ष ( प्रो. विनय पाठक) को सौंप दिया।

यह प्रो.विनय पाठक की नई शैली नहीं है, इससे पहले अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय (एकेटीयू) में गार्ड व समूह ग के कर्मचारी आरके सिंह ( राजीव कुमार सिंह) को डिप्टी रजिस्ट्रार नियुक्त करने के लिये दस्तावेजों में कई बार फेरबदल किया गया। तत्कालीन रजिस्ट्रार एके दमेले और कुलपति दुर्ग सिंह चौहान ने एक प्रमाण पत्र में इन्हें कर्मचारी बताया। इन्ही अधिकारियों ने फिर सहायक रजिस्ट्रार का प्रमाण पत्र भी दे दिया। जब ये दस्तावेज उस समय आरके सिंह नियम विरुद्ध वित्तीय फाइल पास करने से इंकार करने पर राज्य वित्त सेवा के अधिकारी एवं एकेटीयू के वित्त नियंत्रक वीरेन्द्र चौबे के साथ  मारपीट कर चुके थे। सरकारी पत्रावलियां फाड़ दी थी, लखनऊ के जानकीपुरम थाने में आईपीसी की धारा-143, 506, 553 में इसकी रिपोर्ट दर्ज हुई थी। विवेचना के बाद जानकीपुरम पुलिस ने आरके सिंह को दोषी मानते हुए 30 अप्रैल 2015 को चार्जशीट दाखिल की थी। यह मुकदमा ट्रायल की स्टेज पर है। बावजूद इसके कुलपति प्रो.विनय पाठक ने उन्हें डिप्टी रजिस्ट्रार नियुक्त करने के लिये तत्कालीन सचिव प्राविधिक शिक्षा सचिव भुवनेश कुमार से डिप्टी रजिस्ट्रार पद की स्नातक प्रथम श्रेणी वाली अर्हता को दितीय श्रेणी कराया। कई और नियम शिथिल कर डिप्टी रजिस्ट्रार नियुक्त ही कर दिया। मौजूद समय में आरके सिंह के खिलाफ विश्वविद्यालय और शासन से जांच कराई जा रही है। कर्मचारी की पहुंच का आलम ये है कि बार-बार नोटिस भी वह जांच अधिकारी को जवाब नहीं दे रहा। और एकेटीयू के दीक्षांत समारोह में प्राविधिक शिक्षा मंत्री आशीष पटेल का स्वागत करने वालों में भी अग्रणी था। ऐसे अधिकारी के पास छात्रों के भविष्य से जुड़े महत्वपूर्ण कार्य हैं।

तीसरा मामला, मदन मोहन मालवीय टेक्नालॉजी विश्वविद्याल (एमएमएमटीयू) के कुलसचिव रहे डॉ.जिऊत सिंह का है। मेकैनिकल इंजीनियरिंग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ.जिऊत सिंह पर कर्मचारियों, शिक्षकों से मारपीट का आदी होने का आरोप है। बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी (बीआईटी) रांची में सहायक प्रोफेसर रहते हुए परीक्षा नियंत्रक व कर्मचारियों पर  हमला किया। पुलिस कम्पलेन्ड, एफआईआर हुई। वरिष्ठ प्रोफेसरों के जांच दल ने उन्हें दोषी पाया। बीआईटी प्रबंधन ने निलंबित कर दिया। निलम्बन के दौरान प्रो.विनय पाठक के प्रभाव वाली एमएमएमटीयू सर्च कमेटी ने इन्हें एसोसिएट प्रोफेसर पद पर नियुक्त कर लिया। जानकारी होने पर बीआईटी कर्मचारियों ने सामूहिक रूप से यूपी के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति राम नाईक को ज्ञापन भेजा। उनके तत्कालीन विशेष कार्याधिकारी (पदेन) चन्द्र प्रकाश ने बीआईटी विस्तृत रिपोर्ट मांगी। बीआईटी के रजिस्ट्रार एसएन चौधरी ने कुलाधिपति सचिवालय और एमएमएमटीयू के कुलपति को 21 मार्च 2017 को भेजी रिपोर्ट में लिखा- डॉ.जिऊत सिंह मारपीट, उपद्रव में संलिप्त रहने के आदी हैं। यह रिपोर्ट होने के बाद भी एमएमएमटीयू प्रशासन ने उन्हें कुलसचिव जैसा सबसे ताकतवर ओहदा दे दिया। अब रविवार की रात गोरखपुर के खोराबार थाने में जूनियर वर्कशाप मैनेजर वीरेन्द्र चौधरी को आत्महत्या के लिए मजबूर करने की धाराओं में उनके विरुद्ध एफआईआर हुई है। डॉ.जिऊत के साथ प्रो.हरिश्चन्द्रा, और लेखा विभाग के मनोज बालोनी भी नामजद हुये हैं। कुलपति जेपी पांडेय का कहना है कि आंतिरक कमेटी बना दी गयी है। डॉ.जिऊत सिंह की नियुक्ति का प्रकरण मेरे पहले का है। हमने उन्हें कुलसचिव पद से हटा दिया है।

चौथा मामला एकेटीयू के घटक संस्थान आईईटी का है, जहां कम्प्यूटर खरीद, भवन निर्माण, सेवा प्रदाता कंपनी को लाभ देने जैसे आरोपों की जांच इंस्टीट्यूट के प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ चल रही। जिसका निष्कर्ष सामने नहीं आया, जबकि यह गंभीर वित्तीय अनियमितिता का मामला है। केन्द्र सरकार ने कम्प्यूटरों की खरीद व अन्य कार्यों का भुगतान रोक रखा है। फिर जांच ठंडे बस्ते में हैं। पांचवां मामला इंजीनियरिंग कालेज झांसी के निदेशक का है, उन्हें शोध छात्रा से छेड़छाड़ का दोषी ठहराया जा चुका है, पर, वह निदेशक पद पर तैनात हैं। प्रकरणों की फेहरिशत बहुत लंबी है।

 

कोट-एक

एकेटीयू के डिप्टी रजिस्ट्रार की नियुक्ति, उनके दस्तावेजों में कूटरचना, शासनादेश की शिथिलता की जांच शासन ने सौंपी है। आरके सिंह को दो बार नोटिस दिया जा चुका, मगर  अब तक उन्होंने पक्ष प्रस्तुत नहीं किया। 15 दिनों के समय के साथ अंतिम मौका दिया गया है, इसके बाद अपने अभिमत के साथ रिपोर्ट शासन को भेज दूंगा।– प्रो.जेपी पांडेय, कुलपति, एमएमएमटीयू गोरखपुर

 

कोट-2

एकेटीयू के घटक आईईटी में खरीद-फरोख्त में गड़बड़ी और भ्रष्टाचार की जांच का आदेश मिला था, जिन बिन्दुओं पर जांच के लिए कहा गया, उसे पूरा कर रिपोर्ट शासन भेज दी है।  गोपनीयता को चलते रिपोर्ट के अंश शेयर नहीं कर सकता, हमारी संस्तुतियों पर शासन को निर्णय लेना है।– प्रो.शमशेर सिंह, कुलपति, एचबीटीयू कानपुर

कोट-3

रेप के आरोपी शिक्षक को कानपुर विवि प्रबंधन ने शिक्षक कैसे नियुक्त किया, इस बारे में बोर्ड, कुलपति बता सकते हैं, मुझे जानकारी नहीं है-

डॉ.अनिल यादव, कुलसचिव छत्रपति शाहू जी कानपुर विवि

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  दूसरी खबर इंसेट डीसी में।

 

लविवि में प्रोन्नतियों, नियुक्तियों की राज्यपाल से शिकायत

शिया धर्म गुरू कल्बे जवाद ने भी कुलाधिपति को लिखा पत्र

विशेष प्रतिनिधि

लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में कार्यकाल का सिर्फ एक माह शेष होने के बाद भी तेजी से की जा रही प्रोन्नतियों, नियुक्तियों को नियम विरुद्ध ठहराते हुए कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल को एक ज्ञापन सौंपा गया है। दूसरी ओर, शिया धर्म गुरु कल्बे जवाद ने भी कुलाधिपति को पत्र लिखकर अरबी-फारसी विभाग के शिक्षक का उत्पीड़न, भेदभाव रोकने के साथ प्रकरण की जांच कराने की मांग की है।

मंगलवार को कुलाधिपति व राज्यपाल आऩंदीबेन पटेल के सचिवालय को सौंपे गये ज्ञापन में कहा गया है कि लविवि के कुलपति प्रो. आलोक राय अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में 46 लोगों की नियुक्ति और प्रोन्नति कर चुके हैं। जबकि कुलाधिपति की ओर से हाईकोर्ट में दाखिल काउटंर शपथ पत्र में कहा गया है कि तीन माह शेष बचने पर कुलपति नीतिगत निर्णय नहीं ले सकता। राज्यपाल को ज्ञापन देने वाले अरबी, फारसी विभाग के प्रो.सैयद अरशद अली जाफरी ने नियमों, कानूनों का हवाला देते हुये प्रोन्नित रोकने और उत्पीड़ित करने वालों पर कार्रवाई की मांग की है। दूसरी ओर शिया धर्म गुरु कल्बे जवाद ने कुलाधिपति को लिखे विस्तृत पत्र में  प्रो.अरशद अली के साथ उत्पीड़नात्मक कार्रवाई का उल्लेख करते हुए न्याय की मांग की है। पत्र में कानून का हवाला दिया है। यह भी कहा गया है कि उच्च शिक्षा में दो अलग व्यक्तियों के लिए दो अलग कानून लागू नहीं किया जा सकता है। विश्वविद्यालय का कानून सभी के लिए समान होना चाहिए। उन्होंने लविवि में भेदभाव पूर्ण कार्रवाई पर दुख जाहिर करते हुए पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच कराये जाने की मांग की है।

 

 

 

कानपुर विवि परिसर के महादेव मंदिर का स्ट्रक्चर तोड़ने पर नाराजगी

( फोटो है)

वि.प्र

लखनऊ। छत्रपति शाहू जी महाराज कानपुर विश्वविद्यालय परिसर के अंदर बने श्रीविशेश्वर महादेव मंदिर का ऐतिहासिक स्वरूप तोड़ने को लेकर शिक्षकों, कर्मचारियों और छात्रों के एक वर्ग में खासी नाराजगी है। आरोप है कि ये मंदिर विवि की स्थापना के समय का है जिसमें लाखों लोगों की आस्था है। परिसर के बाहर के श्रद्धालु भी प्रत्येक सोमवार को यहां दर्शन करने आते हैं। कुलपति प्रो.विनय पाठक ने इस परिसर का ऐतिहासिक स्ट्रक्चर तुड़वाना शुरू कर दिया है, जिससे मंदिर का मूल स्वरूप नष्ट हो रहा है। आरोप है कि इसे मंदिरा का सुंदरीकरण कार्य बताया जा  रहा है, जिसकी आड़ में विवि का धन खुर्द-बुर्द करने की तैयारी है। कई लोगों ने इसे आस्था से खिलवाड़ बताया है। कुलसचिव अनिल यादव ने इस मुद्दे पर कुछ भी बोलने से इंकार कर दिया है।

 

इंसेट

ठेंगे पर है शासन का आदेश

लखनऊ। छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.विनय पाठक उत्तर प्रदेश सरकार और उच्च शिक्षा विभाग के आदेशों को ठेंगे पर रखते हैं। प्रदेश सरकार ने 30 जून 2022 को कुलसचिव अनिल कुमार यादव का स्थानांतरण लखनऊ विश्वविद्यालय के लिए कर दिया था । विशेष सचिव श्रवण कुमार सिंह की ओर से उच्च शिक्षा अनुभाग-एक जारी आदेश में कहा गया था कि अनिल यादव प्रतिस्थानी की प्रतीक्षा किये बगैर वर्तमान पर से कार्यमुक्त होकर लविवि में कार्य ग्रहण करें, मगर प्रो.विनय पाठक का प्रभाव का ये असर है कि कुलसचिव ने शासन के आदेश पर अमल ही नहीं किया और शासन ने भी इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं की। इसी तरह सहायक कुलसचिव ज्ञानेन्द्र कुमार को स्थानांतरित करते हुए  जननायक चन्द्रशेखर विश्वविद्यालय बलिया भेजा गया था, मगर उन्होंने भी कार्यभार नहीं छोड़ा। अब विवि में सवाल उठ रहा है कि क्या प्रो.विनय पाठक सरकार, शासन से भी ऊपर हैं।