Wednesday, 1 May 2024

क्या किसी नई राजनीति के दिशा में कदम बढ़ा रहे अखिलेश यादव

 कन्नौज के सपा अध्यक्ष ने कहा-अखिलेश यादव कन्नौज से लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे

-अगर वह जीते तो सांसद या नेता प्रतिपक्ष में से एक पद छोड़ना होगा

-वह कौन सा पद छोड़ेंगे, इस सवाल का सही जवाब 4 जून के बाद ही मिलेगा

-2022 में अखिलेश यादव ने कन्नौज संसदीय सीट छोड़कर करहल से लड़ा था विधानसभा का चुनाव

लखनऊ । यूपी के चुनावी अखाड़े में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी, महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा के उतरने की संभावना क्षीण होने के साथ यह सवाल रहस्यमय था कि क्या उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष व समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव लोकसभा के चुनावी समर में उतरेंगे या नहीं ? रमजान के दौरान उन्होंने कन्नौज में कहा था-नवरात्रि आ रही है, अच्छे दिन आने दीजिए, पता चल जाएगा। कार्यकर्ता जिसें कहेंगे, वही चुनाव लड़ेगा। नवरात्रि गुजर गयी। सपा में खामोशी रही। गुरुवार को कन्नौज के सपा जिलाध्यक्ष की ओर से घोषणा हुई- अखिलेश यादव कन्नौज से चुनाव लड़ेंगे। माना जा रहा है दलीय अध्यक्ष के आदेश पर ही यह ऐलान किया गया है। हालांकि पार्टी ने अभी नाम घोषित नहीं किया है।

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव कन्नौज संसदीय सीट से निर्वाचित हो गये तो उन्हें विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद या कन्नौज के सांसद पद से इस्तीफा देना होगा। कोई व्यक्ति एक ही संसदीय पद रख सकता है। अब सवाल यह है कि क्या अखिलेश यादव ने नेता प्रतिपक्ष पद छोड़ने का मन बना लिया ? क्योंकि सांसद की तुलना में नेता प्रतिपक्ष का पद न सिर्फ अधिकारों से लैस है बल्कि उस प्रदेश की राजनीति में उसका सीधा दखल होता है। नेता प्रतिपक्ष ही वह पद है जिसके जरिये सरकार पर अंकुश रखा जाता है। उसकी जिम्मेदारी है कि सरकार को दिशाहीन होने से रोके। इसीलिये संसदीय व्यवस्था में नेता प्रतिपक्ष को बहुत अधिकार दिये गये हैं। दूसरा सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश में जनाधार वाली सपा के मुखिया क्या प्रदेश की राजनीतिक कमान दूसरे नेता को सौंपने की रणनीति पर काम कर रहे हैं ?  यदि वह सांसद निर्वाचित होते हैं और सांसद बने रहना चाहेंगे तो सिर्फ कन्नौज की विकास योजनाओं के सदस्य होंगे। अलबत्ता पूर्व मुख्यमंत्री वाला प्रोटोकाल जरूर मिलेगा। लेकिन राज्य सरकार के सांविधानिक पदों पर होने वाली नियुक्तियों में उनका सीधा अधिकार नहीं होगा। हाल के दिनों में राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में नेता प्रतिपक्ष के रूप में उन्होंने अपने करीबियों का चयन कराया था। वैसे यह सामान्य प्रैक्टिस है सरकारें नेता प्रतिपक्ष के सुझाये गये नाम पर सहमति प्रदान करती हैं। तो क्या सपा अध्यक्ष नेता प्रतिपक्ष के अधिकार किसी विधायक को देने पर विचार कर रहे हैं ? और वह सांसद के रूप में दिल्ली में किस तरह की राजनीति करने की तैयारी कर रहे हैं। क्योंकि एक सांसद के रूप में उन्होंने लोकसभा में कोई अधिकार नहीं होगा। अगर 2024 में लोकसभा में उनके सदस्यों की संख्या 10 से कम रहती है तो उन्हें दलीय प्राथमिकता का दर्जा भी नहीं होगा। ऐसे में संसद में वह अधिकतम सपा सांसदों के दलीय नेता हो सकते हैं। तो क्या अखिलेश यादव अब राज्य की राजनीति से बाहर निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में रहना चाहते हैं ? वैसे अखिलेश यादव 2022 में आजमगढ़ लोकसभा से इस्तीफा देकर करहल विधानसभा चुनाव लड़े थे। तब यह माना गया था कि यूपी की राजनीति में पकड़ मजबूत रखने के लिए उन्होंने यह फैसला किया है। उस समय उन्हें मुख्यमंत्री पद का दावेदार भी माना गया था लेकिन 2024 में लोकसभा का चुनाव लड़ने की संभावना से अखिलेश यादव की नई राजनीति को मर्म खोजने का प्रयास किया जा रहा है। वैसे इन सवालों का सही जवाब 4 जून को ही मिलेगा। जब चुनाव परिणाम सामने आयेंगे। तभी यह भी साफ होगा कि अखिलेश यादव कौन सा पद अपने पास रखना चाहते हैं।

 

 

नेता प्रतिपक्ष को वित्तीय सुविधा

-मंत्री का दर्जा

-मंत्री स्तर का सरकारी आवास

-सत्कार भत्ता

-निर्वाचन भत्ता

-टेलीफोन भत्ता

-विधान भवन के अंदर कार्यालय

-पीएस व स्टाफ

-यूपी और उसके बाहर की यात्रा के दौरान विपक्ष के नेता के प्रोटोकाल की सुविधा

 

नेता प्रतिपक्ष को अधिकार

-लोकायुक्त, उप लोकायुक्त चयन समिति के सदस्य

-यूपी के मुख्य सूचना आयुक्त व आयुक्तों की चयन समिति के सदस्य

-राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष, सदस्यों की नियुक्ति की चयन समिति में सदस्य

-विधानसभा की कार्यवाही के दौरान सरकार किसी भी विषय पर मत व्यक्त करने का अधिकार

-विधान भवन में बात रखने के लिये असीमित समय

-विधानसभा के उपाधयक्ष के निर्वाचन में की भूमिका

-सामान्य तौर पर परम्परा है कि विपक्ष से ही विधानसभा का उपाध्यक्ष होता है, ऐसे में उनकी सहमति

-किसी भी प्रकरण में गिरफ्तारी के पूर्व संसदीय विशेषाधिकार प्रक्रिया का पालन किया जाना अनिवार्य

-विधानसभा के अंदर कही गई किसी भी बात पर न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं हो सकती है।

 

सामान्य सांसद के अधिकार

-संसद को सदन और उसकी समितियों में स्वतंत्र विचार की छूट। संसद सदस्य द्वारा संसद में कही गई बात, मत पर उसके विरूद्ध न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं हो सकती।

-सरकार द्वारा प्रस्तावित राजस्व और व्यय की मंजूरी में वोट देना और उनकी निगरानी करना।

-संसदीय क्षेत्र की जिला योजना, विकास योजना का सदस्य

-संसदीय क्षेत्र के दौरे या सरकारी कार्यक्रम के दौरान वाहन की सुविधा

-अपने संसदीय क्षेत्र में सांसद निधि के आवंटन का अधिकार

- दस से ऊपर सदस्यों वालों दल का सांसद होने पर संसद के अंदर दलीय मुखिया बनने की संभावना, उसी के अनुरूप संसद में सीट आवंटित होती है ( यह पार्टी अध्यक्ष पर निर्भर करता है)

- सांसद की गिरफ्तारी पर लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय को तत्काल सूचना देना व अनापत्ति लेना जरूरी होता है। 

-सरकार की विभिन्न संसदीय समितियों का सदस्य अथवा अध्यक्ष बनाये जाने की सुविधा

 

 

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