Monday, 24 December 2018

आईएएस बनाम आईएएस

मंत्री की अपने प्रमुख सचिव/ निदेशक से ही नहीं बन रही। मंत्री की प्रमुख सचिव/ सचिव सुनते ही नहीं है-उसको ऊपर का संरक्षण है? ये बातें और दर्द हर सरकार में सुना जाता है। मौजूदा वित्त मंत्री राजेश अग्रवाल व उनके महकमे के अपर मुख्य सचिव संजीव मित्तल के बीच अनबन की चर्चा आम है। अतीत में झांके तो बसपा सरकार थोड़ी अपवाद रही। ऐसा नहीं कि सिर्फ मंत्री-अधिकारी में ही ठनती है।आईएएस बनाम आईएएस। आईपीएस बनाम आईपीएस भी खूब है। सीबीआई का झगड़ा अदालत की चौखट पर है। दरअसल, सचाई यह है कि नौकरशाहों के 'घराने-खेमे' हंै। कूटनीति दांव वहां भी खूब चले जाते हैं। कुछ समय तक ये सब पर्दे की ओट में था। अब सावर्जनिक होने का क्रम शुरू हुआ है। जाहिर है, इस पर विश्लेषण होंगे। नौकरशाही के हक हकूक से वाकिफ विशेषज्ञ संवर्ग में संघर्ष की तीन वजह मानते हैं। एक, ' छदम ईमानदारी।' दो, ' अति महत्वाकांक्षा। ' तीन, 'वैचारिक प्रतिबद्धता।' ये जरूरी नहीं स•ाी कारण सच हों, मगर दिखते सच के करीब हैं। अब बात फिर यूपी की। कुछ माह पहले महिला कल्याण की तत्कालीन प्रमुख सचिव रेणुका कुमार व उनके ही निदेशक व आईएएस भवानी सिंह के बीच रार ठनी। वजह बना गोमतीनगर क्षेत्र के खास हिस्से का आवंटन व एक स्वयंसेवी संस्था को लाखों की ग्रांट। लेटर वार हुआ। गलत कौन था ? यह तय नहीं हुआ, मगर जूनियर आईएएस भवानी सिंह का तबादला हो गया। इस प्रकरण केकुछ दिन बाद ही नगर विकास विभाग के प्रमुख सचिव व स्वच्छता अ•िायान के निदेशक के बीच ठन गयी। यहां भी एक स्वयंसेवी संस्था के सदस्यों को लाखों के हवाई टिकट का भुगतान से जुड़ा मामला था। महंगी गाड़ियां किराये पर लेने की अनुमति और एनजीओ को अघोषित रूप से सचिवालय में एक कक्ष देने का मसला भी था। यहां भी हारा जूनियर अधिकारी। मेरठ कमिश्नर के पद तैनाती के दौरान एक आईएएस की जूनियर से ठनी, यहां 'मसला उपकार' से जुड़ा था। एक प्रमुख सचिव से जूनियर आईएएस परेशान हैं। यह मसला सरकार के गलियारों में चर्चा का विषय है। ताजा प्रकरण वरिष्ठ आईएएस हिमांशु कुमार और आईएएस मिनिस्ती एस का है। दोनों के बीच लेटर वार चल रहा है। मिनिस्ती एस को फील्ड में लोकप्रिय अधिकारी माना जाता है। बाराबंकी में तैनाती के दौरान गांव-गलियारे के विकास में बेहतर काम किया। उनके इनोवेशन को केन्द्र सरकार की नरेन्द्र मोदी सरकार ने सराहा था। हिमांशु कुमार ईमानदार कहे जाते हैं, मगर आईएएस बिरादरी में उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता की चर्चा भी होती है। मंत्री की बैठक में न पहुंचने के एक प्रकरण में हिमांश ने मिनिस्ती को स्पष्टीकरण रूपी पत्र लिखा। जिसमें लैंड लाइन से किया गया फोन न उठाने की बात थी, जवाब में मिनिस्ती ने भी पत्र लिख दिया था, जिसमें नियमों को आधार बनाया गया था। यही नहीं राजस्व परिषद के एक वाट्सएप ग्रुप में जुड़ने के लिए कई आईएएस तैयार ही नही ंहै। जबकि राजस्व परिषद के अध्यक्ष सबसे सीनियर अधिकारी हैं। दरअसल उत्तर प्रदेश की नौकरशाही पर यह इल्जाम है कि वह पॉलिटिकल मास्टर के इशारे पर काम करती है। जिसकी व्यावहारिक नजीरें ढेरों हैं, मगर कागज आधारित तथ्य नहीं है। यही नहीं, आईपीएस और आईएफएस में इस तरह के ढेरों वाद सामने हैं। इस रार की कई जांचें हुई मगर न कोई कार्यवाही हुयी और न ही इस पर अंकुश के प्रयास दिखे। मौजूदा समय में यूपी पुलिस के अधिकारियों के अपने-अपने घराने होने की चर्चा आम हैं, जिसे जानते सब हैं, मगर हर कोई खामोश है। फारेस्ट सर्विस में भी कमोवेश यही हाल है। राजनीति व नौकरशाही पर नजर रखने वाले विशेषज्ञ कहते हैं कि रिटायर होने के बाद कम से कम पांच साल तक लाभ के पद पर नियुक्ति का नियम नहीं बनेगा, तब तक कतिपय नौकरशाहों की महत्वाकांक्षा कम नहीं होगी। और अगर महत्वाकांक्षा बलवती रहेगी तो टकराव, वरिष्ठ-कनिष्ठ के बीच अवहेलना का सिलसिला बना ही रहेगा। क्या कोई इस दिशा में कदम उठायेगा और अधिकारियों के बीच अधिकारों की लड़ाई के कारणों की कोई पड़ताल करेगा? यह सवाल अभी लाख ठके है।

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