-ईवीएम को लेकर चल रहे विवाद पर फिलहाल विराम
-शहरी व ग्रामीण मतदाताओं के मुद्दे मुख्तलिफ
-धार्मिक ध्रुवीकरण का प्रभाव कम हो गया है
-भाजपा से मुकाबले के राहुल के अंदाज को तवज्जो
लखनऊ। हिन्दी भाषी राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश विधानसभा के परिणाम कुछ महीनों बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में कितने कारगर होंगे, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी, मगर इतना तय है कि ईवीएम (इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन) की निष्पक्षता, धार्मिक ध्रुवीकरण और कांग्रेस मुक्त भारत का नारा अब प्रभावशाली नहीं रहेगा। यही नहीं, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के भाजपा की नीतियों से सीधे मोर्चो लेने के अंदाज को इन राज्यों में स्वीकारोक्ति मिल गयी है। परिणामों की रोशनी में उठे इन सवाल व उनके जवाबों की गहराई में झांके तो साफ है कि भाजपा को अब 80 लोकसभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश की रणनीति में बदलाव करना होगा। परिणामों के साथ उत्तर प्रदेश के दोनों बड़े प्लेयर समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी के सुप्रीमों ने साफ कर दिया है कि वे भाजपा के साथ नहीं जायेंगे। यानी महागठबंधन की जिस संभावना पर गर्द पड़ रही थी, वह बुनियाद की ओर बढ़ गयी है। जाहिर है इससे सत्तारूढ़ दल भाजपा की चुनौती बढ़नी ही है।
लोकसभा-2014 के चुनाव में भाजपा व उसके सहयोगी दल 34 फीसद वोट शेयर लेकर 73 सीटें जीतने में कामयाब हो गये थे। यह वह समय था जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जादू जनता के सिर चढ़कर बोल रहा था। मगर कुछ महीनों बाद लोकसभा की तीन व विधानसभा की एक सीट का उपचुनाव हुआ तो विपक्षी दलों ने अघोषित समझौता किया। जिसमें भाजपा सभी सीटें हार गयी थी। पराजय के बाद योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली प्रदेश सरकार ने आक्रामक रुख अख्तियार किया। विकास की गति बढ़ाने का प्रयास किया। हिन्दुत्ववादी थॉट को रफ्तार देने का प्रयास किया। इलाहाबाद का नाम प्रयागराज और फैजाबाद का नाम अयोध्या किया। राम मंदिर की राह पकड़ी। मंगलवार को राजस्थान, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ के चुनावी परिणाम आये तो भाजपा को सत्ता से बेदखल होना पड़ा। मध्य प्रदेश में 15 सालों से भाजपा काबिज थी। उसके मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की पिछड़े वर्ग के मतदाताओं में खासी पकड़ थी। यही हाल छत्तीसगढ में हुआ जहां, सभी वर्गो में लोकप्रिय रमन सिंह ने पहली बार चुनावों हिन्दुत्व का दांव आजमाया, जो कारगर नहीं रहा। जिससे यह संदेश तो साफ हो ही गया है कि लोकसभा के चुनाव से पहले अब महागठबंधन बनने की संभावनाएं ज्यादा बढ़ गयी हैं। और अगर ऐसा हुआ तो भाजपा के सामने 2014 के करिश्में तक पहुंचने के लिए उस समय मिले वोटों के प्रतिशत बढाना होगा। महागठबंधन बना तो यह भी तय है कि प्रदेश का 19 फीसद से अधिक मतदाता एक ही झोली में ही जाएगा। और तीन हिन्दी भाषी राज्यों के अलावा तेलांगाना, मणिपुर के परिणाम को भी शामिल करें तो साफ है कि युवा वर्ग रोजगार, कारोबार की कीमत पर धार्मिक ध्रुवीकरण के लिए तैयार नहीं है। दूसरी बात जो उत्तर प्रदेश के संदर्भ में महत्वपूर्ण होने जा रही है, वह गांव, किसान और मजदूर है। किसानों व शहरों की समस्याएं और वहां के वोटरों के सोंचने का नजरिया भी मुख्तलिफ होगा। और अब राहुल गांधी को घेरने के लिए सिर्फ शब्दों की बाजीगरी पर्याप्त नहीं होगी। वह नया राजनीति में स्वीकारता का नया चेहरा बनकर उभर गये हैं। हां, इतना जरूर हुआ है कि अब ईवीएम का मुद्दा थोड़े समय के लिए नेपथ्य में जरूर चला जाएगा। देश के सबसे बड़े राज्य की 80 सीटों की लड़ाई दिलचस्प हो जाएगी। अब भाजपा को जातीय, धार्मिक मुद्दों के स्थान पर सबका साथ, सबका विकास के मूल नारे की ओर लौटना ही होगा। यह भी तय है कि आने वाले कुछ महीनों में उत्तर प्रदेश का सियासी घमासान और तेज होगा।
No comments:
Post a Comment