उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों के दांव, पेंच। रणनीति। पांसों को पक्ष में रखने की दिशा में भाजपा आगे है। शायद ही इस पर किसी को संदेह हो! वजह, यूपी के प्रमुख प्लेयर सपा व बसपा सीमित राजनीतिक हथियारों के साथ मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस-भाजपा पर हमला करने में जुटी हैं। दोनों के सेनापति उत्तर प्रदेश छोड़कर दूसरे राज्यों में भाजपा की अपेक्षा कांग्रेस पर अधिक आक्रामक हैं। दिल्ली में दो दिन चली किसानों की लड़ाई में इन दलों के सेनापतियों ने जोशीली भागीदारी नहीं दिखायी। ये परिस्थितियां ही भाजपा से मुकाबले के लोकसभा के संभावित महागठबंधन को धूमिल कर रही हैं। बावजूद इसके राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों, राजनीतिक कार्यकर्ताओँ और सत्तारूढ़ भाजपा को 11 दिसंबर का इंतजार है। यही वह तारीख है, जब ईवीएम ऑन होने होते ही देश व उत्तर प्रदेश की राजनीतिक में करवट शुरू होगी। तब अखाड़ेबाज मैदान में आने को मजबूर होंगे। प्रदेश की राजनीति के कथित चाणक्य संभावनाएं टटोलना शुरू करेंगे। अगर इन राज्यों में सत्तारूढ़ भाजपा का ग्राफ गिरा और कांग्रेस सूबाई सत्ता की सीढ़ी चढ़ी तब बसपा, सपा पर दबाव बढ़ेगा। ये दबाव मुख्तलिफ अंदाज का होगा। इसमें एक दबाव भाजपा की ओर से होगा। दूसरा, कांग्रेस की ओर से होगा। सोशल मीडिया का दौर है, लिहाजा राज्य के प्लेयरों को अपने कूटनीतिक दांव पर्दे के पीछे छिपाये रखना मुश्किल होगा। तीन राज्यों में ताकत में इजाफा होने की दशा में कांग्रेस मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में ' हाथ को साथ देने के हाथी' के इंकार करने वालों को बड़ा छटका दे सकती है। सपा के साथ भी के सामने भी कमोवेश इसी तरह की चुनौती होगी। सपा की मुश्किल ये भी है कि कभी उत्तर प्रदेश में सबसे ताकतवर होने के बाद बदले निजाम वह एक साल से अपना संगठन ही नहीं बना पायी है। मुख्य संगठन की कौन कहे ? युवजन सभा, छात्र सभा, अल्पसंख्यक सभा, लोहियावाहिनी, मुलायम सिंह यूथ ब्रिगेड की कमेटी घोषित नहीं कर पायी है। वह सिर्फ गठबंधन की आस में है। ऊपर से बसपा के साथ गठजोड़ की उम्मीद में तीन राज्यों में कांग्रेस को आंखे तरेर आयी है। उसकी दुश्वारी यह भी है कि सपा संगठन को मजबूत करने के स्तंभ रहे शिवपाल यादव सीधे सपा के खिलाफ ही खम ठोंक रहे हैं। दल बनाने के बाद के अब तक उन्होंने सिर्फ सपा के मोहरों को तोड़कर अपने पाले में किया है। जब गैर भाजपाई दल अपनी समस्याओं में उलझे हैं तब सत्तारूढ़ भाजपा के साथ उसके अनुसांगिक संगठन मैदान में हैं। वैचारिक कुंभ से लेकर राम मंदिर आंदोलन को धार दी जा रही है। जिलों के नामों में बदलाव के सहारे भाजपा की विचारधारा को सरकार परवान चढ़ा रही है। ऊपर से रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया ने राजनैतिक दल बनाकर खुद को सियासी समर में उतारने का एलान कया है। उन्होंने एसससी एसटी एक्ट, आरक्षण का जो मुद्दा उछाला है, उससे साफ है कि राजा भैया सीधे तौर पर भाजपा से लड़ाई न लड़कर उससे नाराज सवर्ण मतदाताओं को पाले में लामबंद करने में चुपचाप लगे हैं। जिसका सीधा फायदा भाजपा को ही मिलेगा। प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य को इन हालातों में विश्लेषित करें तो साफ है कि 11 दिसंबर को पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आने के बाद परिस्थितियों में तेजी से बदलाव आयेगा। अगर परिणाम में कांग्रेस का अपर हैंड हुआ तो यूपी में बिना उसके गठबंधन की संभावनाएं परवान चढ़नी मुश्किल होंगी। अगर भाजपा ने सत्ता में वापसी कर ली तो सपा, बसपा के सामने कांग्रेस को गठबंधन से अलग कर लोकसभा के बड़े मैदान में उतरना खासा जोखिम भरा होगा। यानी 11 दिसबंर के बाद राजनीतिक दबाव सपा और बसपा पर ही होने वाला है। क्योंकि तब नया दल बनाने वाले शिवपाल यादव लखनऊ में भीड़ की ताकत दिखा चुके होंगे। उनके समर्थक जितना दावा कर रहे हैं, उतनी भीड़ जुटा ली तो फिर राज्य के दर्जनभर छोटे दलों के लिए वह एक प्लेटफार्म बनकर खड़े होंगे। कांग्रेस के सामने ज्यादा विकल्प भी होंगे। रालोद पहले ही कांग्रेस के साथ है। इन हालातों के परिणाम का अंदाजा लगा रहे राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि 11 दिसबंर को आने वाले रिजल्ट प्रदेश की 80 सीटों के लिए गैरभाजपा दलों के नये समीकरण गढ़ेंगे। जिसको लेकर सबसे ज्यादा चौकन्ना भाजपा है। क्योंकि फैसला इसी के बाद होगा। उससे सीधे प्रभावित भाजपा और उसके समर्थक ही होंगे।

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