स्ट्रेटजी फॉर न्यू इंडिया @75 ! यानी युवतर भारत की रणनीति। यह एक सोच है। जिसमें सिविल सर्विसेज (आईएएस से लेकर 50 तरह की सेवा) कम्पटीशन के लिये सामान्य वर्ग की अपर एज लिमिट 27 साल, पिछड़े वर्ग की 30 साल करने का प्रस्ताव है। दो साल के अंदर इसे लागू करने का सुझाव है। यह बात ऐसे समय में उठी है, जब लोकसभा का चुनाव सामने है। हंगामा होना था, हुआ भी। दबाव बढ़ा। कार्मिक राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने ट्वीट किया-'सिविल सेवा परीक्षा की आयु में बदलाव पर सरकार ने कदम नहीं उठाया है।' यहीं से नया सवाल उठता है कि नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफर्मिंग इंडिया (नीति आयोग) ने आखिर ऐसा सुझाव क्यों दिया? फिर सरकार ने कदम न उठाने की अचानक घोषणा की क्यों? ये प्रशासनिक सुधार की पहल से ज्यादा राजनीतिक लाभ-हानि से जुड़ा मसला है। उम्र न घटाने का ऐलान कर सरकार रोजगार के लिए सिर धुन रहे नौजवानों की सहानुभूति चाहती है? सामाजिक व्यवस्था की निगाह से परखें तो यह तल्ख सचाई है कि नौकरियों, प्रतियोगी परीक्षाओं में त्रिस्तरीय आरक्षण ने सवर्ण नौजवानों के अवसर कम किये हैं। यह भी हकीकत है कि उत्तर भारत के सुदूर गांवों में नौजवान सिविल सर्विसेज एक्जाम को आईएएस का एक्जाम कहते व समझते हैं? ऐसी शैक्षिक पृष्ठभूमि का छात्र जब शहरों, बड़े कस्बों की कोचिंग या शिक्षकों से आईएएस और सिविल सर्विसेज एक्जाम का अंतर समझता है, तब तक उम्र का 25वां पड़ाव पार कर चुका होता है। ऐसे में सवर्णों के लिये 27 साल वाली सीमा उनके ख्वाब को बालू की रेत की तरह बिखेरेगी। चुनावी साल के चलते सरकार ने नीति आयोग के उम्र सीमा वाले सुझाव को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाले रखा है। मगर व्यवस्था यही रही तो देर सबेर सुझाव पर अमल होगा ही। तब दुश्वारियां भी की बढ़ेंगी मगर सीधी जद में सवर्ण अभ्यर्थी ही आयेंगे।
इतिहास में झांकिए। पहले भारतीय प्रशासनिक सेवा में उम्र सीमा 21 से 24 साल थी। ग्रामीण क्षेत्रों के शैक्षिक स्तर, पृष्ठभूमि, आरक्षण की रोशनी में हालात पर हंगामा होने पर सरकार ने 1970 के दशक में सामान्य वर्ग की आयु सीमा 26 वर्ष की। जिसे 1980 में 28 साल और 1990 में 30 साल किया गया। असल में आयु सीमा संबंधी निर्णय तकनीकी से ज्यादा सामाजिक व राजनीतिक रहे हंै। कई साल अपर एज लिमिट सामान्य श्रेणी के लिए 30 वर्ष, ओबीसी के लिए 33, एससी और एसटी लिए 35 वर्ष थी। सीएसएटी को लेकर हंगामे के बाद 2014 में यूपीए सरकार द्वारा अतिरिक्त प्रयासों के साथ इसे बढ़ाकर क्रमश: 32, 35 और 37 साल कर दिया गया। इसी साल 3 अगस्त को केंद्र की भाजपा सरकार ने राज्यसभा को सूचित किया कि 1 अगस्त, 2018 तक सामान्य वर्ग के उम्म्मीदवारों की अधिकतम आयु 32 साल कर दी गयी है। आरक्षित वर्ग को आयु में तय नियम के अनुसार छूट रहेगी। मगर अब अचानक नीति आयोग का सुझाव आया, जिसमें सामान्य वर्ग की एज लिमिट 27 साल करने की बात है। जिसे 2022 तक लागू होना है। सिफारिश पर अगर अमल हुआ तो सिविल सर्विसेज एक्जाम के लिए आरक्षित श्रेणी में ओबीसी की अधिकतम आयु 30 और एससी-एसटी की 37 से घटकर 32 वर्ष हो जाएगी। यह व्यवस्था ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्रों के मौके कम कर देगी। दरअसल, नीति आयोग ने जिन अध्ययनों को उम्र कम करने का आधार बनाया है, वह अमूमन देश की ऊंची और संपन्न जातियों के सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि व व्यवहार पर आधारित है। बताया गया है कि नीति आयोग ने शिकागो विश्वविद्यालय, यूसी बर्कले और लंदन स्कूल आॅफ इकोनॉमिक्स के स्कॉलरों के अध्ययन के आधार पर उम्र घटाने का प्रस्ताव तैयार किया है। केंद्र सरकार ने इसे फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है, मगर संकेत यह हैं कि इस पर अमल होगा। सेंट्रल टैलेंट पूल भी बनाया जाएगा। जिसमें कैंडिडेट्स को क्षमता के अनुसार विभिन्न सेवाओं में लगाया जा सकता है। यह सकारात्मक बात हो सकती है, मगर गौर कीजिये इस समय केंद्र और राज्य स्तर पर 60 से ज्यादा सिविल सर्विसेज हैं, जिनके लिए अलग-अलग परीक्षाएं होती हैं। अगर अधितम उम्र सीमा घटी तो फिर गांव-गलियारे के स्कूलों में पढ़कर मुस्तकबिल बनाने का सपना देखने वाले नौजवानों को क्या प्रतिभा दिखाने का पूरा मौका मिल सकेगा। यह भी याद रखें कि भारत की एक-तिहाई से ज्यादा आबादी की उम्र 35 साल से कम है।
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