Thursday, 24 November 2022

दो बार कुलपति बनाने का नियम, राजभवन ने विनय को तीसरा टर्म दिया

 -छोटे आरोपों में चार कुलपति हटाये, घूसखोरी में नामजद पाठक पर मेहरबानी बरकरार

 

परवेज़ अहमद

लखनऊ। उत्तर प्रदेश विश्वविद्यालय अधिनियम में किसी व्यक्ति को दो बार कुलपति बनाने का नियम है। बावजूद इसके अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय (एकेटीयू) के कुलपति का दो टर्म पूरा करने वाले प्रो.विनय पाठक को तीसरी बार छत्रपति शाहू जी महाराज कानपुर विश्वविद्यालय का कुलपति कैसे, किसने नियुक्त किया ?  कुलपति पद के दावेदारों के पैनल  के लिए गठित सर्च कमेटी और नियोक्ता अधिकारी कुलाधिपति ने क्या नियम का विश्लेषण  सुविधा अनुसार किया ? दूसरा अहम सवाल ये कि छोटे इल्जामों पर 4 विश्वविद्यालयों के कुलपतियों से इस्तीफा या उन्हें पदमुक्त करने वाली कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल भ्रष्टाचार की एफआईआर, हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत की याचिका खारिज होने के बाद भी कानपुर विवि के कुलपति के मामले में चुप्पी क्यों साधे हैं ?

ये सवाल विश्वविद्यालयों में चल रहे छात्र, शिक्षक आंदोलन में उठ रहे हैं। कानपुर नगर के छह पूर्व विधायकों ने पहले ही पत्र लिखकर ये सवाल उठाया है। विशेषज्ञ सवाल कर रहे हैं कि कानपुर विश्वविद्यालय के कुलपति को आखिर किसका संरक्षण है ? जिससे कार्रवाई में कुलाधिपति कार्यालय हिचक रहा । एक दशक में पहली बार ये परिस्थितियां हैं जब भ्रष्टाचार में नामजद कुलपति पर कार्रवाई को लेकर राजभवन की चुप्पी पर सवाल उठ रहे हैं।

वैसे, उत्तर प्रदेश विश्वविद्यालय अधिनियम-1973 (संशोधित) के पेज संख्या-18 पैरा संख्या-आठ व नौ में एक व्यक्ति को दो टर्म कुलपति नियुक्त करने का उल्लेख है। तीसरे टर्म का जिक्र नहीं है। विधिक जानकारों का कहना है कि अधिनियम में जिस नियम का उल्लेख नहीं हो, उस पर निर्णय नहीं लिया जा सकता। प्रो.विनय पाठक उत्तर प्रदेश के एकेटीयू में दो टर्म कुलपति रह चुके, तीसरे टर्म में नियुक्ति नियमों के विपरीत प्रतीत हो रही है। कुछ विधि विशेषज्ञों का कहना है कि अधिनियम मौन है तो कोई निर्णय से पहले राज्य के विधि विभाग, महाधिवक्ता, लॉ विशेषज्ञों का मत आवश्यक है। सूत्रों का कहना है कि कुलाधिपति कार्यालय ने प्रो.विनय पाठक को तीसरी बार कुलपति बनाने में इस प्रक्रिया संभवतः पालन नहीं किया। विधि के जानकारों का कहना है कि इतनी जहमत उन्ही परिस्थतियों में होती है, जब संबंधित का विकल्प उपलब्ध न हो। सवाल ये है कि क्या देश में प्रो.विनय पाठक का विकल्प नहीं था ? यही कारण है कि कुलाधिपति कार्यालय की कार्यशैली पर सवाल उठ रहा है।

गौरतलब ये है कि छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.विनय पाठक प्रदेश के इकलौत कुलपति हैं, जिन पर कुलपति रहते हुए भ्रष्टाचार की एफआईआर हुई, यही नहीं, उनके साथ घूसखोरी में संलिप्त दो लोग गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुके हैं। घूस की राशि ट्रांसफर होने के इलेक्ट्रानिक साक्ष्य है। यही कारण है कि आरोपी कुलपति प्रो.विनय पाठक की ओर से एफआईआर रद करने और अग्रिम जमानत की याचिका पर सभी पक्षों को सुनने, हलफनामा, पूरक हलफनामा पर बहस के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ  ने मेरिट पर खारिज कर दी। सवालों की श्रंखला इसलिए भी है कि कुलाधिपति कार्यालय ने छोटी शिकायतों का त्वरित परीक्षण करते हुए भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय लखनऊ, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी, अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद (अयोध्या), डॉ.भीमराव आंबेडकर विवि आगरा के कुलपति से कार्यकाल पूरा होने से पहले इस्तीफा मांग लिया या फिर उन्हें पद से सीधे बर्खास्त कर दिया। जबकि इनमें से किसी के खिलाफ भ्रष्टाचार की एफआईआर नहीं हुई। लेकिन छत्रपति शाहू जी महाराज विवि कानपुर के कुलपति प्रो.विनय पाठक पर एफआईआर, उनके खिलाफ आधा दर्जन से अधिक लोगों द्वारा भ्रष्टाचार के दस्तावेज कुलाधिपति कार्यालय को सौंपे जाने, हाईकोर्ट में दो याचिका होने के बाद कार्रवाई क्यों नहीं ? ये सवाल उच्च शिक्षा के गलियारों में गूंज रहा है।

  

 

अब तक ये कुलपति हटे !

भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय लखनऊ,  काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी, अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद (अयोध्या), चन्द्रशेखर आजाद कृषि विवि, डॉ.भीमराव आंबेडकर विवि आगरा के कुलपति से कार्यकाल पूरा होने से पहले इस्तीफा मांगा गया। या उन्हें पद से बर्खास्त कर दिया।

 

क्या कहता है एक्ट...

उत्तर प्रदेश विश्वविद्यालय अधिनियम, 1973 के चैप्टर चार आफीसर्स ऑफ द यूनिवर्सटीज के प्वाइंट संख्या-12 में कुलपति की नियुक्ति व शर्तो का उल्लेख है। इसके प्वाइंट 12 के अन्तर्गत प्वाइंट आठ व नौ में कुलपति के दो टर्म और 65 तक की उम्र का उल्लेख किया गया है। तीसरे टर्म का उल्लेख नहीं है। यानी, तीसरी बार कुलपति नहीं बनाया जा सकता है।

 

मौन का इंटरपेटेशन...

उच्च शिक्षा के नियम, कानून के जानकारों का कहना है कि अगर मौन का इंटरपेटेशन किया जाना आवश्यक है तो फिर उसके लिए राज्य के विधि विभाग, महाधिवक्ता अथवा संविधान विशेषज्ञ से विधिक राय लेनी चाहिए। और यह भी तब जब किसी व्यक्ति की नियुक्ति अपरिहार्य हो।

 

 

 

 

कुलपति के भ्रष्टाचार की ‘थाह’ नहीं ले पा रही एसटीएफ

 एक संशोधित शासनादेश की आड़ में एपीआई की अनदेखी कर भर्ती किये प्रोफेसर

परवेज़ अहमद

लखनऊ । छत्रपति शाहूजी महराज कानपुर विवि के कुलपति प्रो.विनय पाठक के नियमों के विरुद्ध निर्णयों की एसटीएफ  थाह को नहीं मिल पा रही। वह जितनी ही गहराई में जा रही है, भ्रष्टाचार की उतनी परते खुलती जा रही हैं। अब आउटसोर्सिग में गड़बड़ी का जिन्न भी सामने आ गया है। जांच में निर्माण, भर्ती, कम्प्यूटर खरीद, धन आवंटन से जुड़े 45 अधिकारी जांच अधिकारियों के रडॉर पर हैं। जिनसे पूछताछ के लिए एसटीएफ नई एफआईआर दर्ज करने की तैयारी में हैं।

सूत्रों का कहना है कि प्रो.विनय पाठक के जमाने में निर्माण कार्यों के साथ सबसे अधिक गड़बड़ियां भर्ती में हुई हैं। प्रोफेसरों, सहायक प्रोफेसरों असिस्टेंट प्रोफेसर इंडेक्ट ( एपीआई ) की स्क्रीनिंग की आड़ में बढे पैमाने में योग्य दावेदारों को बाहर कर पंसदीदा अभ्यर्थियों को नौकरियों पर रखा गया है। ये कार्य अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय (एकेटीयू), डॉ.भीमराव आंबेडकर विवि आगरा, ख्वाजा मोइन उद्दीन भाषा विवि लखनऊ और छात्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय में इसी तरह की गड़बड़ियां की गयी हैं। कानपुर विवि और एकेटीयू के कई अभ्यर्थियों ने न्याय के लिए कोर्ट में गुहार लगा रही है। दरअसल, किसी भी व्यक्ति को सहायक प्रोफेसर, एसोशिएट प्रोफेसर बनाने के लिए 100 नम्बर की मार्किंग होती है। इसमें 80 नम्बर एपीआई के होते। जिसमें अभ्यर्थी का अकादमिक (शैक्षिक) आकलन किया जाता है। यानी उसके उसकी डिग्री, नेट, पीचएडी के अतिरिक्त रिसर्च पेपर, टीचिंग एक्सपीरिंयस आदि आदि होता है और 20 नम्बर का साक्षात्कार होता है। जिस भी अभ्यर्थी को 50 फीसद से ऊपर के अंक मिल जाते हैं, वह भर्ती के योग्य मान लिया जाता है। परन्तु एक नियम में संशोधन करके अब एपीआई को स्कीनिगं अंकों में तबदील कर दिया गया। जिसकी आड़ में बड़े पैमाने पर एसे अभ्यर्थियों को सहायक. एसोसिएट और प्रोफेसर बनाया जा रहा है जो योग्य नहीं हैं। प्रो.विनय पाठक की अगुवाई वाली साक्षात्कार समिति ने एपीआई इंडेक्स में अंतिम पायदान वाले व्यक्ति को सहायक प्रोफेसर बना दिया गया। जबिक उनसे ऊपर नौ और लोग थे।

सूत्रों का कहना है कि एकेटीयू के कुलपति रहते हुए प्रो.विनय पाठक ने इसी आदेश की आड़ में दर्जन भर अधिक लोगों को न सिर्फ प्रोन्नतियां प्रदान कर दी बल्कि अपने मुखालिफों को डिमोट भी कर दिया। वे जहां जहां कुलपति रहे, वहां-वहां उन्होंने इसी नियम की आड़ में व्यापक भर्तियां की। कई एसे लोगों को प्रोफेसर, एसोशिएट प्रोफेसर नियुक्त किया गया तो अर्हता के मानकों को पूरा नहीं करते हैं। ये सारे दस्तावेज एसटीएफ को उपलब्ध कराये गये हैं।

 

 

नई एफआईआर की तैयारी !

एसटीएफ सूत्रों का कहना है कि लकनऊ के इंदिरानगर थाने में दर्ज जिस एफआईआर के सहारे वह जांच कर रहे हैं, कानूनों के हिसाब से उसका दायरा बहुत छोटा है। दूसरे विश्वविद्यालयों के दस्तावेजों को कब्जे में लेने के लिए उन्हें पहली एफआईआर की विवेचना में सामने आये गवाहों के बयान लेने होंगे और बयान उस केस से सीधा जुड़ेगा  तभी जांच आगे बढ़  सकती है। सूत्रों का कहना है कि एसटीएफ को अभी इस तरह के गवाह नहीं मिले हैं, जिनके बयानों से सारी कड़ियां एक दूसरे से जुटे हैं। पर, चारों विश्वविद्यालय में फैले साक्ष्य जरूर व्यापाक भ्रष्टाचार के संकेत कर रहे हैं। सूत्रों कहना है कि इन्हीं तकनीकी दिक्कतों को दूर करने के लिए एसटीएफ अधिकारी अब एक नई एफआईआर कराने की तैयारी कर रहे हैं। इसके लिए विविध परीक्षण का कार्य चल रहा है।

 

कुलपति का चार्ज लेने से  अफसर ने इंकार किया !

छत्रपति शाहूजी महाराज विवि कानपुर के कुलपति प्रो.विनय पाठक के खिलाफ भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियममितता और गड़बड़ियों के ढेरों साक्ष्य मिलने के बाद आखिर कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल ने भी उन्हें हटाकर उनका कार्यभार किसी अन्य को देने पर मंथन शुरू कर दिया है। सूत्रों का कहना है कि कानपुर में तैनात एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी को कार्यवाहक कुलपति का चार्ज देने तैयारी थी, उनसे ओपेनियन मांगी गयी तो अधिकारी ने चार्ज लेने में असमर्थता जाहिर कर दी है। अब राजभवन ने विवि के कुलसचिव डॉ.अनिल यादव से विवि के तीन वरिष्ठ प्रोफेसरों का पैनल मांगा है। इनमें से ही किसी को कार्यवाहक कुलपति का चार्ज दिया जाएगा।

 

कुलपति के समर्थक भी सक्रिय !

कानपुर विवि के कुलपति पर जैसे जैसे कानून का शिकंजा कस रहा है, वैसे-वैसे समर्थक सक्रिय हो गये हैं। शिकायतकर्ता से लगातार संपर्क कर प्रकरण को शांत कराने का दबाव बनाया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि आरोपी कुलपति के कार्यशैली के विरोधियों की संख्या इतनी अधिक है कि एक को शांत कराते हुए दूसरे उठ खड़ा होता है। बताया गया है कि कुलपति के कार्यों से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी खासा नाराज है। जल्द ही उनकी ओर से भी सरकार को कार्रवाई तेज करने के संकेत दिये जा सकते हैं।

  

 

   

दो टर्म एकेटीयू कुलपति फिर ईसी सदस्य बने प्रो.विनय

 

लगातार दो बार कुलपति के बाद कार्य परिषद में नामित होने का यूपी में अनोखा मामला

-19 सितम्बर 2022 की ईसी में बतौर सदस्य विनय पाठक ने हिस्सा लिया, अपने कार्यकाल के कार्यों का समर्थन किया

परवेज़ अहमद

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की उच्च शिक्षा और उसके सिस्टम में छत्रपति शाहूजी महराज विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.विनय पाठक की पैठ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस अब्दुल कलाम प्राविधिक विवि (एकेटीयू) के वह दो टर्म कुलपति रहे उसी विश्वविद्यालय की कार्य परिषद (ईसी) का उन्हें सदस्य नियुक्त कर दिया गया। कार्य परिषद विश्वविद्यालय की सर्वोच्च नीति निर्धारक समिति होती है। वित्त, प्रशासनिक निर्णयों की वैद्धता तभी होती है जब कार्य परिषद उसे मंजूरी प्रदान दे। और कुलपति का दूसरा टर्म पूरा होते ही किसी भी व्यक्ति को उसी विवि की कार्य परिषद नियुक्त कर देने का ये अनोखा मामला है आखिर ये सब किस मंशा से और कैसे हुआ ? उच्च शिक्षा की दुनिया में चर्चा का विषय है। विधानसभा में सपा विधायक दल के सचेतक मनोज पांडेय का कहना है कि मुख्यमंत्री की आंख के नीचे उच्च शिक्षा में भ्रष्टाचार की बेल परवान चढ़ी, जब भी विधानसभा का सत्र होगा, इस मुद्दे को पुरजोर तरीके से उठाया जाएगा।

अखिलेश यादव की सरकार के दौरान तत्कालीन राज्यपाल राम नाईक ने 2015 में प्रो.विनय पाठक को अब्दुल कलाम प्राविधिक विवि का कुलपति नियुक्त किया था। 2018 में राम नाईक ने ही इन्हें दूसरा टर्म देते हुए कुलपति नियुक्त किया। जिस दिन इन्हें दूसरी बार एकेटीयू का कुलपति नियुक्त किया गया, उके दिन पहले कुलपतियों के शोध में गड़बड़ी को लेकर पूछे गये सवाल के जवाब में 2 अगस्त 2018 को राज्यसभा में लिखित उत्तर में स्वीकारा गया था कि प्रो.विनय पाठक के शोध व पीएचडी में गड़बड़ी है। पर, उन्होंने सिर्फ दूसरा टर्म पूरा किया बल्कि टर्म के बाद भी पद पर बने रहे। इस बीच कुलाधिपति व राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने उन्हें छत्रपति शाहूजी महाराज कानपुर विवि का कुलपति नियुक्त कर दिया। प्रो.विनय पाठक ने एकेटीयू के कुलपति का तब चार्ज छोड़ा तो विवि के घटक कालेज आईईटी के निदेशक डॉ.विनीत कुमार कंसल को चार्ज सौंप दिया, जबकि निदेशक पद ही उनकी नियुक्ति को लेकर सवाल उठ रहे थे। प्रो. विनय पाठक की अध्यक्षता वाले  बोर्ड ने ही विनीत कंसल को आईईटी का निदेशक नियुक्त किया था।

सूत्रों का कहना है कि बाद में कार्यवाहक कुलपति डॉ.विनीत कंसल ने छत्रपति शाहू जी महाराज विवि के कुलपति नियुक्त प्रो.विनय पाठक को एकेटीयू की कार्य परिषद का सदस्य नामित करने का प्रस्ताव पास कराया। अनुमोदन किया और उन्हें कार्य परिषद का सदस्य नियुक्त करने का प्रस्ताव शासन भेज दिया। प्राविधिक शिक्षा विभाग से होता हुआ ये प्रस्ताव कुलाधिपति कार्यालय पहुंचा जहां से प्रो.विनय पाठक को एकेटीयू कार्य परिषद का सदस्य नियुक्त कर दिया गया, जबकि कुलपति पद से हटने के निर्धारित कूलिंग पीरीयड का भी ध्यान नहीं रखा गया। सूत्रों का कहना है कि उत्तर प्रदेश की उच्च शिक्षा का यह अनोखा फैसला है, जब लगातार दो टर्म कुलपति रहने वाले व्यक्ति को दूसरा टर्म खत्म होते ही सीधे कार्य परिषद का सदस्य नामित किया गया हो।

सूत्रों का कहना है कि 19 सितम्बर 2022 को एकेटीयू कार्य परिषद की बैठक में बतौर कार्य परिषद सदस्य विनय पाठक ने हिस्सा भी लिया। अब तक जो व्यक्ति कार्य परिषद का चेयरमैन होता था, वह सदस्य के रूप में न सिर्फ मौजूद रहा बल्कि अपने कार्यकाल में कार्यों को जायज ठहराने, प्रस्ताव को मंजूर करने के पक्ष में सहमति भी प्रदान की। सूत्रों संदेह जाहिर करते हुए कहते हैं कि सभवतः प्रो.पाठक कार्य परिषद के सदस्य नियुक्त ही इसलिए हुए ताकि विवि की सर्वोच्य प्रशासनिक, वित्तीय समिति में आने वाले विषय, एजेंडे को अपने कार्यकाल के निर्णयों की दृष्टि से परख सकें।

सवाल ये है कि किसी विवि का लगातार दो बार कुलपति रहे व्यक्ति जिसके  कार्यकाल के कार्यो को लेकर शिकायतों का अंबार हो, उसे ईसी का सदस्य कैसे नामित किया गया। अब ये सवाल भाजपा के अंदर से भी उठ रहा है। समाजवादी पार्टी के विधायक दल के मुख्य सचेक मनोज पांडेय का कहना है कि उत्तर प्रदेश की उच्च शिक्षा में व्यापक भ्रष्टाचार व्याप्त है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ईमानदार व्यक्ति हैं लेकिन उनकी आंख के सामने ही भ्रष्टाचार सिरसा की तरह पांव फैलाता चला रहा है। विधानसभा का जब भी सत्र आहूत होगा, उनकी पार्टी के विधायक उच्च शिक्षा के इस गोरखधंधे को पुरजोर ढंग से उठायेंगे।  

 

11 सदस्य और छह विशेष आमंत्रित सदस्य हैं

एकेटीयू की कार्य परिषद में 11 सदस्य और छह विशेष आमंत्रित सदस्य हैं। विवि के कुलपति पदेन अध्यक्ष होते हैं और कुलसचिव पदेन सचिव होते हैं। कार्य परिषद वित्तीय, प्रशासनिक, अनुशासनात्मक निर्णयों पर सहमति, असहमित व्यक्त करती है। नई कार्ययोजनाओं को अंतिम रूप देती है। कार्य परिषद की मंजूरी के बगैर कोई भी नीतिगत निर्णय नहीं हो  सकता है।

 

 

 

कुलपति प्रो.पाठक जहां गये, मैनेजरों की टोली साथ लेकर गये

 

परवेज अहमद

लखनऊ। भ्रष्टाचार, रिसर्च पेपर चोरी, नियमों की अनदेखी कर लाखों बच्चों का भविष्य नाकाबिल शिक्षकों के हाथों में सौंपने जैसे गंभीर आरोपों से घिरे छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर के कुलपति प्रो.विनय पाठक की एक और अनूठी कार्यशैली रही है। जिसमें वह जिस विश्वविद्यालय कुलपति बनते हैं, वहां अपने साथ तकनीकी सिस्टम मैनेजर, डिप्टी रजिस्ट्रार और सेवा प्रदाता कंपनी के जरिये सेवा देने वाले कुछ कार्मिकों को भी साथ लेकर जाते हैं। कोटा से लेकर कानपुर विवि तक उनकी इस कार्यशैली का उदाहरण मौजूद हैं। इस शैली को पुलिस गैंग सिस्टम कहती है, पर यहां ये शब्द लागू नहीं होता।

कानपुर के हरकोर्ट बटलर प्रौद्योगिकी विवि के कम्प्यूटर साइंस विभाग के प्रोफेसर विनय पाठक जब पहली बार उत्तराखंड में कुलपति बने तो इन लोगों में से कई लोगों को अपने साथ भाजपा नेता के जनसंपर्क अधिकारी व सुरक्षा कर्मी के बेटे से समेत कई लोगों को न सिर्फ नौकरी पर रखा और फिर उनको अपने कोर ग्रुप में शामिल कर लिया। यहां का टर्म पूरा करने के बाद राजस्थान के कोटा में कुलपति बनने पर उत्तराखंड के आधा दर्जन कर्मचारियों को अपने साथ वहां ले गये। इनमें से अधिकतर कर्मचारी अपने साथ ले गये। अखिलेश यादव सरकार में तत्कालीन प्राविधिक शिक्षा मोनिका एस गर्ग के विरोध के बावजूद जब तत्कालीन राज्यपाल राम नाईक ने इन्हें अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया वह अभिषेक नागर और आयुष श्रीवास्तव को अपने साथ लेकर आये। इनमें से अभिषेक नागर सिस्टम मैनेजर नियुक्त कर दिया। जिसके जरिये वित्तीय, परीक्षा व्यवस्था पर नजर रखी जाती है। उत्तर प्रदेश की उच्च शिक्षा का शक्तिशाली व्यक्तियों में शुमार होने के बाद प्रो.विनय पाठक उत्तराखंड, राजस्थान के विश्वविद्यालय से बड़ी संख्या तदर्थ पद, दैनिक वेतन अथवा संविदा पर काम कर रहे शिक्षक, प्रशासक, और कर्मचारियों को उत्तर प्रदेश लाते गये। जहां-जहां कुलपति का चार्ज मिलता गया, वहां उनमें से कुछ को पूर्णकालिक नियुक्त करते गये। इस एडजेस्टमेन्ट के जरिये वह शिक्षा व्यवस्था पर कब्जा अप्रत्यक्ष रूप से काबिज हो गये।

सूत्रों का कहना है कि अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय में दो बार कुलपति का कार्यकाल पूरा करने के बाद जब वह छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त हुए तो यहां पर सेवा प्रदाता के जरिये काम कर रहे आधा दर्जन कार्मियों को अपने साथ कानपुर विवि ले गये। इन सभी को वित्त, तकनीकी दायित्व वाले अधिकारियों के साथ तैनात कर दिया है। निष्पक्ष दिव्य संदेश के पास एसे सभी कर्मचारियों की सूची मौजूद है जिन्हें प्रो.विनय पाठक उत्तराखंड, राजस्थान होते हुए उत्तर प्रदेश लाये और इन्हें इंजीनियरिंग विश्वविद्यालयों के साथ ही आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा, ख्वाजा मुईऩ उद्दीन भाषा विश्वविद्यालय लखनऊ, अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय और छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय में नियुक्त किया है। कांग्रेस के प्रवक्ता अमरनाथ अग्रवाल कहते हैं कि प्रो.विनय पाठक की ये शैली व्यवस्था के साथ गंभीर दुरभि संधि की ओर इशारा करती है। राज्यपाल सचिवालय को उच्च शिक्षा के इस खेल का पर्दाफाश करने के लिए श्वेत पत्र जारी करना चाहिए। मुख्यमंत्री को इस पूरे मामले की जांच सीबीआई को सौंप देनी चाहिए।

 

वाह प्रो. विनय पाठक ! झूठ के बल गढ़ा कुलपति बनने का रिकार्ड

 -वीसी बनने के पहले दावे में 36 शोध पत्र, चौथे दावे में सिर्फ 20 बचे

-3 बार कुलपति रहने के बाद चौथे में शैक्षिक उपलब्धियां घटने का अजूबा

परवेज अहमद

लखनऊ। तीन विश्वविद्यालयों का कुलपति रहने के बाद किसी शिक्षाविद की शैक्षिक, शोध उपलब्धियां कम होती हैं ? इस प्रश्न के उत्तर में  शैक्षिक दुनिया की गहराइयों से अनभिज्ञ व्यक्ति भी कहेगा-नहीं, यह नहीं हो सकता। उपलब्धियां तो बढ़ेंगी। पर, छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.विनय पाठक का वैयक्तिक ब्योरा ( बायोडेटा) इसे झुठलाता है। राजस्थान, उत्तराखंड और अब्दुल कलाम विश्वविद्यालय (एकेटीयू) का कुलपति रहने के बाद चौथी बार कुलपति बनने के लिए उन्होंने जो बायोडेटा कुलाधिपति को भेजा, उसमें उनके शोध, रिसर्च पेपर, प्रजेंटेशन घट गये थे। आश्चर्यजनक रूप से मूल शोधों की संख्या-11 से घटकर शून्य हो गयी। इसके बावजूद राजभवन के अधिकारियों व सर्च कमेटी ने पूर्व के वैयक्तिक ब्योरे का अध्ययन किये बगैर ही उन्हें चौथी बार कुलपति नियुक्त कर दिया।

अगर दस्तावेजों की दृष्टि से देखें तो यह प्रतीत होता है कि प्रो.विनय पाठक ने झूठ और फरेबी दस्तावेज के बल पर कुलपति बनने की शुरूआत की। पहली बार जब कुलपति बने तो उन्होंने एचबीटीआई (अब विवि) में डीन व दस साल का अनुभव होने का दावा किया था, जबकि उस समय सिर्फ डीन का एक पद सृजित था, जिस पर कोई दूसरा प्रोफेसर नियुक्त था और पाठक को प्रोफेसर हुए दस साल भी नहीं हुए थे। कुलपति बनने के लिए उनकी ओर  से कुलाधिपति कार्यालय भेजे गये बायोडेटा में स्पेन, पोलैंड, यूएसए, पुर्तगाल, हंगरी, कोरिया, चीन, सिंगापुर, इजिप्ट जैसे देशों के साहित्यिक, इंजीनियरिंग के जनरलों में 36 रिसर्च पेपर प्रकाशित होने व बड़ी संख्या में पेपर प्रजेंट करने का दावा किया। इनमें 11 शोधपत्रों के सोल प्रापर्टी (मूल शोध) होने का दावा है। इसी के बल पर तीन पर कुलपति नियुक्त होने व कार्यकाल पूरा करने के बाद जब चौथी बार एकेटीयू का कुलपति बनने के लिए वैयक्तिक ब्योरा राजभवन को भेजा तो आश्चर्यजनक ढंगे से उनके शोधों की संख्या व शैक्षिक उपलब्धियां कम हो गईं, यह शैक्षिक दुनिया का नया अजूबा था। जन सूचना अधिकार के जरिये हासिल प्रो.विनय पाठक के दूसरे बायोटेडा में पहली की उपलब्धियों को घटाते हुए दावा किया गया है कि उनके सिर्फ 20 शोध पत्र इंटरनेशनल जनरल में प्रकाशित हुए हैं। पहले के बायोडेटा में 36 थे यानी 16 पेपर घट गये। सिर्फ ये नहीं सोल आर्थर ( मूल शोधकर्ता) के रूप में लिखे पेपर शून्य हो गये। जबकि पहले बायोडेटा में 11 पेपर घोषित थे। यानी तीन बार कुलपति रहने के बाद उनके शैक्षिक योग्य़ता, उपलब्धि घट गई। जिससे उनका झूठ तो सामने आ ही रहा है पर उनको नाम शार्ट करके आगे बढ़ाने वाली चयन समिति भी सवालों से बच नहीं सकती है। कांग्रेस के प्रवक्ता अमरनाथ अग्रवाल कहते हैं कि दुनिया में हमने पहली बार ये जादू देखा है जिसमें नौ साल तक कुलपति जैसा दायित्व संभालने वाले शिक्षाविद की उपलब्धि घट जाए। कांग्रेस के ही बृजेन्द्र सिंह कहते हैं जिस पर लाखों छात्रों का भविष्य संवारने की जिम्मेदारी होती है, वह ही अगर तथ्यों पर फरेब का मुल्लमा चढ़ा रहा है तो ये आपराधिक कृत्य है। प्रो.विनय पाठक के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच से पहले बायोडेटा में धोखाधड़ी की एफआईआर होनी चाहिए। वह उदाहरण देते हुए कहते हैं कि दो जन्मतिथि प्रमाण पत्र होने पर सपा विधायक अब्दुला आजम की सदस्यता रद हो सकती है तो जिस पर लाखों-लाख छात्रों के अभिभावक होने का दायित्व है, उस पर तो पहले मुकदमा दर्ज कर गिरफ्तार करना चाहिए।

 

इंसेट-एक

दो जन्म प्रमाण पत्र पर सपा विधायक अब्दुला आजम की सदस्यता रद हुई, मुकदमा दर्ज हुआ तो जिस पर लाखों छात्रों के अभिभावक होने का दायित्व उसके फरेब पर अब तक मुकदमा क्यों दर्ज नहीं हुआ- बृजेन्द्र सिंह, प्रदेश प्रवक्ता कांग्रेस

इंसेट-दो

हमने पहली बार ये जादू देखा है जिसमें नौ साल तक कुलपति का दायित्व संभालने वाले शिक्षाविद की उपलब्धि घट जाए- अमरनाथ अग्रवाल, यूपी कांग्रेस प्रवक्ता

 

Sunday, 13 November 2022

एसटीएफ के हाथ लगीं नियुक्तियों में प्रो.विनय के ‘खेल’ फाइलें !

 

 

एसटीएफ के हाथ लगीं नियुक्तियों में प्रो.विनय के खेल फाइलें !

-एचबीटीआई, कानपुर, आंबेडकर विवि, भाषा विवि से नियुक्तियों की पत्रावली मांगी

-आरोपी प्रोफेसरों, अधिकारियो की व्यक्तिगत फाइलें उपलब्ध कराने को भेजा पत्र

- प्राविधिक शिक्षा की तत्कालीन प्रमुख सचिव मोनिका एस.गर्ग की टिप्पणी वाली फाइल की भी तलाश, जिसमे गर्ग ने पाठक कुलपति बनाने से पहले उत्तराखंड, राजस्थान विवि से जांच को कहा था

 

परवेज़ अहमद

लखनऊ। छत्रपति शाहू जी महाराज कानपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.विनय पाठक के भ्रष्टाचार का अतीत खंगाल रही स्पेशल टॉस्क फोर्स ने राज्य विश्वविद्यालयों में उनके कुलपति रहने के दौरान की नियुक्तियों, प्रशासनिक पद बांटने की पत्रावलियां कब्जे में लेनी शुरू कर दी हैं। अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय ( एकेटीयू) से 11 लोगों की व्यक्तिगत पत्रावलियां मांगी गयी हैं। कुछ को कब्जे में ले लिया है। एचबीटीआई और भीमराव आंबेडकर विवि आगरा की 50 से अधिक नियुक्तियों की मूल पत्रावली मांगी गयी है। सूत्रों का कहना है कि जिस तरह से इस केस का दायरा विस्तृत हो रहा है, उससे जांच सीबीआई को सौंपने पर शीर्ष स्तर पर मंथन हो रहा है। अभी, 15 नवम्बर को प्रो.विनय पाठक की अग्रिम जमानत याचिका पर हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के निर्णय की प्रतीक्षा है।

सूत्रों का कहना है कि एसटीएफ के अधिकारी प्रो. विनय पाठक के उत्तर प्रदेश में पहली बार एकेटीयू का कुलपति बनने की प्रक्रिया से अब तक का ब्योरा खंगाल रहे हैं। समाजवादी पार्टी की सत्ता के दौरान पहली बार प्रो.विनय पाठक को एकेटीयू का कुलपति बनाने की जब प्रक्रिया शुरू हुई उसी समय उत्तराखंड व राजस्थान में उनके कुलपति रहने के दौरान की गड़बड़ियों की शिकायतों का पुलिंदा प्राविधिक शिक्षा की तत्कालीन प्रमुख सचिव मोनिका.ए.गर्ग को भेजा गया था। सुश्री गर्ग ने प्रो.पाठक के विरुद्ध शिकायतों का हवाला देकर राज्य में कुलपति न बनाने पर विचार की टिप्पणी उस शिकायत पर लिखी थी, जिसे अनदेखा कर प्रो.पाठक को एकेटीयू का कुलपति नियुक्त कर दिया गया। अब एसटीएफ को  उस पत्रावली की तलाश है। दूसरी ओर से अनजान लोग एसटीएफ अधिकारियों को एचबीटीआई, ख्वाजा मोईनउद्दीन चिश्ती भाषा विवि, कानपुर विवि और एकेटीयू में सहायक प्रोफेसरों, एसोसिएट प्रोफेसरों की भर्ती में अनियमितता से जुड़े दस्तावेजों के पुलिंदे भेज रहे हैं। जिसमें आरोप है कि अगर कोई अभ्यर्थी नियमों के मुताबिक स्क्रीनिंग में योग्य नहीं मिला या तो उसके लिए नियम शिथिल किये गये। अन्ततः उसे नियुक्त कर दिया गया। इसमें कई महिला शिक्षक भी हैं।

इतनी बड़ी संख्या में दस्तावेज मिलने से हतप्रभ एसटीएफ के अधिकारियों ने जांच दल में न सिर्फ सदस्यों की संख्या में इजाफा किया है बल्कि अब उन विवि प्रबंधन से नियुक्तियों, निर्माण से जुड़ी पत्रावलियां भी मांगी है, जिनमें गड़बड़ियों की संभावना है। सूत्रों का कहना है एकेटीयू में प्रशासनिक पदों पर तैनात अधिकारियों प्रोफेसरों की पत्रावलियां मांगी गयी हैं और कुछ पत्रावलियां कब्जे में भी लेनी शुरू कर दी है। भर्ती की स्क्रीनिंग कमेटी के प्रोफेसरों, अध्यक्ष व विज्ञापनों का ब्योरा भी मांगा गया है। सूत्रों का कहना है कि यह भी पूछा जा रहा है कि क्या किसी कमेटी में एसा प्रोफेसर शामिल रहा हो जिसके परिवार, रिश्तेदारी का कोई व्यक्ति अभ्यर्थी रहा हो और उसका अंतिम चयन हो गया हो। सूत्रों का कहना है कि इस पूरे खेल में  सब कुछ साफ नहीं है, नियमों-कानूनों का इस तरह से तोड़ा-मरोड़ा गया है कि जांच अधिकारियों को अब विशेषज्ञों की मदद की जरूरत पड़ने लगी है।

 

एकेटीयू से इनकी पत्रावलियां मांगी

1-डॉ.विनीत कुमार कंसल, निदेशक आईईटी व प्रतिकुलपति एकेटीयू

2-डॉ.अनुराग त्रिपाठी, परीक्षा नियंत्रक, एकेटीयू

3-डॉ. अरुण कुमार तिवारी, इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा के समन्वयक

4-डॉ.सीता लक्ष्मी, पीएचडी प्रवेश व पीएचडी अवार्ड समन्वयक

5-डॉ.मलय कुमार दत्ता, सीएएस, एकेटीयू निदेशक

6-डॉ.योगेश कुमार, केएऩआईटी सुल्तानपुर में प्रोफेसर

7-डॉ. प्रगति शुक्ला, आईईटी लखनऊ, सहायक प्रोफेसर इंग्लिश

8-प्रदीप कुमार वाजपेयी, रजिस्ट्रार, आईईटी लखनऊ

9-आरके सिंह ( राजीव कुमार सिंह), डिप्टी रजिस्ट्रार एकेटीयू

10-राजीव मिश्र, डिप्टी रजिस्ट्रार, आईईटी लखनऊ 

11-आशीष मिश्र को दिये काम का विवरण

 

 

इंजीनियरिंग कालेजों में रोटेशन सिस्टम तक लागू नहीं !

फर्नीचर खरीद में भी टेंडर के नियमों की अनदेखी  

विशेष प्रतिनिधि

लखनऊ। उच्च शिक्षा में कुलपति बनने का इतिहास गढ़ने वाले और छत्रपति शाहूजी महाराज कानपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.विनय पाठक ने एकेटीयू का कुलपति रहते हुए इस विवि में वित्तीय, शैक्षिक नियमों की अनदेखी नहीं की बल्कि उनके कार्यकाल में सरकारी इंजीनियरिंग कालेजों के निदेशक भी मनमाने ढंग से फैसले लेते रहे हैं। इनमें इंजीनियरिंग कालेज अतर्रा, इंजीनियरिंग कालेज आंबेडकरनगर, आईईटी लखनऊ भी शामलि हैं। अतर्रा कालेज में विभागाध्यक्ष नियुक्त करने में रोटेशन भी लागू नहीं किया। नियमों अनदेखी कर लाखों रुपय़े का फर्नीचर, कम्प्यूटर खरीदे गये।

उच्च, तकनीकी शिक्षा विभाग और एआईसीटीयू के नियमों के मुताबिक किसी भी इंजीनियरिंग कालेज में प्रत्येक तीन सालों में रोटेशन के आधार पर विभागध्यक्ष पर शिक्षकों का बदलाव किया जाना चाहिए। ये नियम केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में भी लागू है लेकिन अब्दुल कलाम प्राविधिक विवि (एकेटीयू) के आधीन अधिकतर सरकारी इंजीनियरिंग कालेजों में रोटेशन नियम ही लागू नहीं किया गया। अतर्रा इंजीनियरिंग कालेज में 10 सालों से ये नियम लागू नहीं किया गया। इतना ही नहीं फर्नीचरों की खरीद-फऱोख्त में टेंडर से बचने के लिए लाखों रुपये की कुर्सी. कार्यालय टेबल, कम्प्यूटर वर्क आर्डर पर खरीदे गये। सूत्रों का कहना है कि बांदा फर्नीचर गैलरी नाम की एक दुकान से 22 अप्रैल 2019 को तकरीबन 10 लाख रुपये की रिवाल्विंग चेयर खरीदी गयी। उसी दिन यहीं एक लाख 56 हजार की एक आफिस मीटिंग टेबल खरीद ली गयी। यही नहीं, दीनदयाल योजना के फन्ड से 50 से अधिक कम्प्यूटर खरीद लिये गये, जिनका अब तक उपयोग ही नहीं हुआ है।

सूत्रों कहना है कि राजकीय इंजीनियरिंग कालेज अतर्रा बांदा के अतिरिक्त राजकीय इंजीनियरिंग कालेज आंबेडकरनगर समेत सात कालेजों में खरीद-फरोख्त में नियमों के शिथिलकरण का लाभ लेते हुए करोड़ों रुपये की खरीद-फऱोख्त हुई है। सबसे आश्चर्यजनक बाद ये है कि इन कालेजों में सीनियर फेक्लटी तक नहीं हैं। सिर्फ असिस्टेंट प्रोफेसरों के जरिये इंजीनियरिंग कालेज चलाया जा रहा है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई की गुणवत्ता बढ़ाने ने नाम पर मनपसंद वस्तुएं खरीदी गयी हैं। सूत्रों का कहना तो यहां तक कहना है कि अधिकांश कालेजों के निदेशक कुलपति प्रो.विनय पाठक की संस्तुति पर बनाये गये हैं, लिहाजा इन्होंने लोगों ने बिना सामान खरीदे ही बड़ी संख्या में कंपनियों को भुगतान किया और जीएसटी का धन उन्हें देकर बाकी ब्लैकमनी के रूप में वापस ले लिया। ये सारा धन कहां और किसके खाते में गया ? यह जांच का विषय है। समाजवादी पार्टी के विधायक व विधानसभा में सपा विधायकों के मुख्य सचेतक मनोज पांडेय का कहना है कि तकनीकी व प्राविधिक शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार चरम पर है। इसमें नीचे से लेकर ऊपर तक सभी की मिलीभगत है। इस भ्रष्टाचार की जांच के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को न्यायिक जांच आयोग का गठन करना चाहिए।    

 

 इंजीनियरिंग कालेजों में ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार है। मुख्यमंत्री को इस भ्रष्टाचार की जांच के लिए न्यायिक आयोग का गठन करना चाहिए। वह भ्रष्टाचार पर श्वेत पत्र जारी करने की मांग करते हैं।

–मनोज पांडेय, पूर्व मंत्री व विधानसभा में सपा विधायक दल के मुख्य सचेतक

 

राजकीय इंजीनियिरंग कालेज अतर्रा में सिर्फ एक प्रोफेसर है, सभी विभाग असिस्टेंट प्रोफेसरों के जरिये संचालित किया जा रहा। सीनियर को कार्यवाहक विभागाध्यक्ष का जिम्मा दिया गया। प्रोफेसर व एसोसिएट न होने के चलते रोटेशन सिस्टम लागू नहीं हो सका। नियमों को लागू करने के लिए एकेटीयू से पत्राचार किया गया है।–

एसपी शुक्ला, निदेशक राजकीय इंजीनियरिंग कालेज अतर्रा

   

Friday, 11 November 2022

जांच का दायरा बढ़ा, एसटीएफ की एकेटीयू में सर्च

 -दो दर्जन कर्मचारियों से हुई पूछताछ, अखिलेश यादव सरकार में नियुक्त, निर्माण से जुड़े दस्तावेज मांगे

-पहले और दूसरे कार्यकाल में बिना शासन की अनुमति के दौ सौ करोड़ के निर्माण कार्य हुये

कानपुर विवि के कुलपति प्रो. विनय पाठक पर कसता शिकंजा

परवेज़ अहमद

लखनऊ। छत्रपति शाहू जी महराज कानपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.विनय पाठक की घूसखोरी की जांच कर रही स्पेशल टॉस्क फोर्स (एसटीएफ) के एक दल ने अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय (एकेटीयू) में सर्च शुरू कर दी है। बुधवार को विवि के दो दर्जन से अधिक अधिकारियों, कर्मचारियों से पूछताछ की गयी। जांच अधिकारियों ने कुलसचिव सचिन कुमार से अखिलेश यादव सरकार के पहले कार्यकाल में नियुक्तियों और दूसरे कार्यकाल के दौरान वित्तीय लेन-देन निर्माण कार्य, सामानों की सप्लाई करने वाली कंपनियों को हुये भुगतान की पत्रावली तलब की हैं। विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक अधिकारियों पर परचेज कमेटियों के प्रभारी अधिकारी व प्रोफेसरों में बेचैनी है, जहां-जहां प्रो.विनय पाठक के पास कुलपति का कार्यभार रहा है।

एसटीएफ के अपर पुलिस अधीक्षक स्तर के अधिकारियों के नेतृत्व में एसटीएफ का दल अचानक एकेटीयू पहुंचा और सबसे पहले विवि के प्रशासनिक अधिकारियों से पूछताछ की। इसमें भवन, स्टेडियम निर्माण कार्य, कम्प्यूटर, सर्वर और परीक्षा के साफ्टवेयर की खरीद से जुड़े दस्तावेजों की मांग की। एक  कार्य के लिए बार-बार कमेटियों के बदलाव के कारणों की पूछताछ की अधिकारियों को कुछ घंटों के अंदर दस्तावेज उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। सूत्रों का कहना एसटीएफ अधिकारियों ने विवि प्रशासन से न्यायमूर्ति प्रमोद श्रीवास्तव की जांच रिपोर्ट की मूल प्रति मांगी है, इस रिपोर्ट में ऩिर्माण कार्यो में व्यापक अनियमितता होने की बात कही गयी है। विवि के सूत्रों के मुताबिक प्रो.विनय पाठक को लगातार दो बार कुलपति नियुक्त किया गया, छह साल के कार्यकाल में उन्होंने तकरीबन दो सौ करोड़ रूपये का निर्माण कार्य कराया गया , इन कार्यों के लिए शासन से अनुमोदन ही नहीं लिया गया।

सूत्रों का कहना है कि एकेटीयू के कई कर्मचारियों ने जांच अधिकारियों को बताया है कि तत्कालीन कुलपति अपनी संपत्तियां, धन अपने करीबी कंपनियों व रिश्तेदारों की गई है। विवि के अधिकारी के नाम पर भी उन्होंने अपनी संपत्तियां कर रखी हैं। प्रारंभिक जांच में इस तरह के बयानों से जांच अधिकारी खासे बेचैन हैं।

सूत्रों का कहना है कि प्रो.विनय पाठक का पहले कार्यकाल के दौरान तकरीबन 236 शिक्षकों की सेन्ट्रलाइज्ड नियुक्ति की थी, जिसके विरोध में शिक्षकों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। विवि के सूत्र बताते हैं कि एकेटीयू में भी तकरीबन 22 प्रोफेसरों के पद के विपरीत 28 सामान्य शिक्षकों की नियुक्ति कर दी थी, जो आज भी कार्यरत हैं। इसके खिलाफ कई कर्मचारियों ने केन्द्रीय अनुसूचित जाति आयोग में शिकायत दर्ज करायी थी, जिस पर आयोग के सहायक निदेशक तरूण खन्ना ने तल्ख टिप्पणी के साथ कार्रवाई करने की हिदायत दी थी लेकिन विवि प्रबंधन ने इसकी भी अनदेखी कर दी है। एसटीएफ अधिकारियों का कहना है कि कुलपति के खिलाफ प्रशासनिक व वित्तीय गड़बड़ियों के ढेरों साक्ष्य मिले हैं, जांच चल रही है।

 

 

इंसर्ट

दलित कर्मचारी को बार बार बर्खास्त किया

लखनऊ। अनुसूचित जाति के मनीष कुमार कम्प्यूटर आपरेटर के पद पर कार्यरत थे, जिन्होंने विनियमतीकरण की गड़बड़ियों का विरोध करने पर सेवा से बर्खास्त कर दिया जबकि वह 22 साल की सेवा कर चुके थे। इस कार्रवाई के विरोध में मनीष कुमार ने राज्यपाल के यहां शिकायत की, जांच के बाद राज्यपाल ने मनीष को पूर्व की भांति सेवा में बहाल करने का आदेश जारी कर दिया, इस आदेश के अनुपालन में उन्हे सेवा दी गयी और कुछ दिनों के अंदर ही मनीष को फिर बर्खास्त कर दिया गया। अब मनीष ने केन्द्रीय अनुसूचित जाति आयोग में न्याय की गुहार लगायी, आयोग ने तत्कालीन कुलपति पर तल्ख टिप्पणी करते हुए मनीष को सेवा में लेने आदेश दिया है और उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई का आदेश दिया है।

 

--------------------

कोट

मैं, कल दिल्ली में था, आज ही लौटा हूं। मुझे जानकारी मिली है कि एसटीएफ के अधिकारी पूछताछ करने आये थे, कुछ डायुमेन्ट मांगें है। कुछ लोगों से पूछताछ की है। जांच में अधिकारियों का पूरा सहयोग किया जाएगा, वह जो दस्तावेज चाहेंगे, वह दिये जाएंगे।– प्रो. प्रदीप कुमार मिश्र,

कुलपति, अब्दुल कलाम प्राविधिक विवि   

 

अंतरिम जमानत पर हाईकोर्ट का निर्णय आज

लखनऊ। आगरा विवि में एक भुगतान के लिए घूसखोरी के आरोपित प्रो.विनय पाठक को अंतरिम जमानत के लिए आज हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। आरोपित की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एलपी मिश्र व उऩके टीम के वरिष्ठ वकीलों ने बचाव पक्ष में दलीलें दी और राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता विनोद शाही और जयदीप माथुर ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टालरेंस की नीति पर काम कर रही है। ये भ्रष्टाचार का सीधा मामला है, लिहाजा जमानत न दी जाए। अदालत ने आदेश सुरक्षित रख लिया और गुरुवार को फैसला सुनायेगा।