Friday, 30 October 2015

आठ मंत्री बर्खास्त, नौ के विभाग छिने

29.10.2015 ka faisla
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बड़ी सर्जरी में चली अखिलेश की
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-सरकार की छवि सुधारने के साथ मिशन-2017 की कमान युवा हाथों में सौंपने की कवायद
-विवादित मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई न होने से सवाल भी
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परवेज अहमद, लखनऊ :
मंत्रिमंडल की 'मेजर सर्जरीÓ सरकार की छवि सुधारने का प्रयास है या मिशन-2017 की पूरी कमान युवा हाथों में सौंपने की रणनीति? इस निर्णय को इन्ही सवालों के इर्द-गिर्द परिभाषित किया जा रहा है। इस आपरेशन में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की छाप महसूस की जा रही है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या सर्जरी से रोग का निदान हो पाया है।
आठ मंत्रियों की बर्खास्तगी ने यह तो साफ कर दिया कि खुद को सत्ता के करीबी समझने वाले ये मंत्री हकीकत में मुख्यमंत्री की कसौटी पर खरे नहीं थे। विकास की माडर्न नीति-रीति में भी युवा मुख्यमंत्री के साथ कदम ताल में वे पिछड़ रहे थे। ऊपर से तोहमतें भी कम नहीं थी। इनमें से कुछ की दलीय निष्ठाएं भी सवालों के सलीब पर थीं। ये लोग 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी में शामिल हुए थे। हालांकि ये लोग सपा मुखिया मुलायम सिंह के करीबियों में शुमार थे, मगर मुख्यमंत्री की मंशा को भांपकर पार्टी नेतृत्व ने 'वीटोÓ के जरिए इनकी विदाई रोकने का प्रयास नहीं किया। इससे पार्टी में भी अब 'युवा युगÓ का आगाज हो जाने का संदेश निकल रहा है। माना जा रहा है कि मंत्रिमंडल में भारी उलटफेर में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की मंशा पूरी तरह से प्रभावी रही वरना कम से कम तीन मंत्रियों का विभाग वापस नहीं लिए जाते।
उधर पार्टी के अंदर यह चर्चा भी आम है कि जब छवि सुधारने के अलावा विकास की रफ्तार तेज करने की मंशा से फेरबदल हुआ तो भ्रष्टाचार, दबंगई के जरिये सरकार की सबसे ज्यादा किरकिरी कराने वाले मंत्री किसके 'वीटोÓ पर कार्रवाई की जद से बच गए? अवध क्षेत्र के एक मंत्री पर अक्सर दबंगई का इल्जाम लगता है तो तराई क्षेत्र के एक मंत्री पत्रकार को जलाने के मामले में फंसे जिससे सरकार की खासी किरकिरी हुई थी। एक अन्य मंत्री पर भ्रष्टाचार का आरोपों का शोर है, बावजूद इनकी ओर आंच नहीं जाने को लेकर सवाल उठ रहा है।
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-मंत्रियों से हटाए गए विभाग अब मुख्यमंत्री के पास
-रिक्त पदों पर नए मंत्रियों को राज्यपाल 31 को दिलाएंगे शपथ
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 लखनऊ : आखिरकार सरकार सख्त हुई। इमेज सुधार की कोशिशों, गैर वफादारी और 2017 के चुनाव के दबाव में गुरुवार को किये गए एक बड़े फैसले में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आठ मंत्रियों को बर्खास्त करने के साथ ही नौ मंत्रियों के विभाग छीन लिए।  बर्खास्त होने वालों में पांच कैबिनेट, स्वतंत्र प्रभार के एक और दो राज्यमंत्री हैं। रिक्त पदों पर नए मंत्रियों को 31 अक्टूबर की सुबह 10.30 बजे राज्यपाल शपथ दिलाएंगे। मुख्यमंत्री के पास अब रिकार्ड 89 विभाग हो गए हैं।
साढ़े तीन साल पुरानी सरकार में यूं तो मंत्री पहले भी बर्खास्त हुए पर पहली बार इतना कड़ा कदम उठाया गया। मुख्यमंत्री ने बुधवार को एक साथ आठ मंत्रियों को बर्खास्त करने और नौ के विभाग हटाने की सिफारिश राज्यपाल से की थी। गुरुवार सुबह उस पर मुहर लगाते हुए राज्यपाल ने आदेश जारी कर दिए। 31 अक्टूबर को नए मंत्रियों को शपथ दिलाने के लिए तैयारियां शुरू हो गई हैं। सूत्रों का कहना है रिक्त पदों पर युवा चेहरों को मौका मिलने की संभावना अधिक है। जिन मंत्रियों से विभाग छीने गए हैं, उन्हें नए मंत्रियों के शपथ ग्र्रहण के बाद दूसरे विभागों में समायोजित किया जाएगा। इनमें कुछ का कद बढ़ेगा लेकिन कुछ का घटेगा भी। 14 जून को हुए फेरबदल में जिन मंत्रियों के साथ नाइंसाफी की चर्चा ने जोर पकड़ा था, उन्हें पहले की तुलना में बेहतर विभाग दिए जा सकते हैं।
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पहले भी बर्खास्त हुए मंत्री
अखिलेश यादव पहले भी अपने कई मंत्रियों को बर्खास्त कर चुके हैं। शुरुआत अप्रैल 2013 में तत्कालीन खादी एवं ग्र्रामोद्योग मंत्री (अब स्वर्गीय) राजाराम पाण्डेय की बर्खास्तगी से हुई थी, जिन पर एक महिला आइएएस अधिकारी पर अशोभनीय टिप्पणी करने का इल्जाम लगा था। मार्च 2014 में मंत्री मनोज पारस और कृषि मंत्री आनंद सिंह बर्खास्त हुए। सिंह पर पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का इल्जाम था। लोकसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री ने मनोरंजन कर राज्यमंत्री पवन पाण्डेय को बर्खास्त किया। पाण्डेय पर फैजाबाद में अवैध खनन रोकने गए एक आइपीएस अधिकारी के साथ अभद्रता का इल्जाम लगा था।
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बर्खास्त मंत्री
-राजा महेन्द्र अरिदमन सिंह-मंत्री, स्टाम्प तथा न्याय शुल्क पंजीयन व नागरिक सुरक्षा
- अंबिका चौधरी-मंत्री, पिछड़ा वर्ग कल्याण एवं विकलांग कल्याण
-शिव कुमार बेरिया-मंत्री, वस्त्र उद्योग एवं रेशम उद्योग
- नारद राय-मंत्री, खादी एवं ग्रामोद्योग
- शिवाकान्त ओझा- मंत्री, प्राविधिक शिक्षा
- आलोक कुमार शाक्य-राज्यमंत्री, प्राविधिक शिक्षा
- योगेश प्रताप- राज्यमंत्री, बेसिक शिक्षा
-भगवत शरण गंगवार-राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार), सूक्ष्म, लघु मध्यम उद्यम एवं निर्यात प्रोत्साहन
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मंत्री जिनके छिने विभाग
-अहमद हसन, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य परिवार कल्याण मातृ एवं शिशु कल्याण
-अवधेश प्रसाद, समाज कल्याण अनुसूचित जाति एवं जनजाति कल्याण सैनिक कल्याण
-पारस नाथ यादव, उद्यान व खाद्य प्रसंस्करण,
- राम गोविंद चौधरी, बेसिक शिक्षा
- दुर्गा प्रसाद यादव, परिवहन
- ब्रह्मïा शंकर त्रिपाठी, होमगाड्र्स प्रांतीय रक्षक दल
- रघुराज प्रताप सिंह, खाद्य एवं रसद
- इकलाब महमूद, मत्स्य, सार्वजनिक उद्यम
-महबूब अली, माध्यमिक शिक्षा
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निपटाते समय न देखी निकटता
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-बर्खास्तगी की जद में अगड़े, पिछड़े व दलित
-केवल मुस्लिमों पर मुख्यमंत्री रहे मेहरबान
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लखनऊ
बात जब निपटाने की आई तो कोई निकटता काम न आई। निकटता पुरानी थी, इलाकाई थी या फिर सजातीय, नतीजा एक ही रहा। बर्खास्तगी में संतुलन रखा गया और इसमें अगड़े, पिछड़े व दलित सभी शामिल थे। अलबत्ता मुस्लिमों पर मेहरबानी कायम रही और किसी को भी बर्खास्त नहीं होना पड़ा।
सबसे पहले बात बलिया के अंबिका चौधरी की जिन्हें 2012 के विधान सभा चुनाव में पराजित होने के बावजूद विधान परिषद भेजा गया और पहले राजस्व मंत्री और फिर विभाग बदलकर पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री बनाया गया। लोकदल का बंटवारा हुआ तो कुछ दिन चौधरी अजित सिंह के साथ रहने के बाद अंबिका चौधरी अपने सजातीय मुलायम सिंह यादव के साथ आ गए और धीरे-धीरे पायदान चढ़ते गए। सपा विपक्ष में थी तो विधान मंडल दल के मुख्य सचेतक रहे लेकिन बर्खास्तगी को लेकर उन्हें कोई सचेत नहीं कर सका।
अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखने वाले कानपुर देहात की रसूलाबाद सीट के विधायक शिव कुमार बेरिया भी सपा के पुराने सिपहसालार थे और पांच बार विधायक बनने के बाद पहली बार मंत्री बने थे। वह अखिलेश मंत्रिमंडल के अनुसूचित जाति के दो कैबिनेट मंत्रियों में थे लेकिन सरकार के पूरे कार्यकाल तक मंत्री नहीं बने रह सके।
बलिया के ही नारद राय छोटे लोहिया जनेश्वर मिश्रा की अंगुली पकड़ कर राजनीति में आए थे और मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री रहे। इस बार कद बढ़ा तो कैबिनेट मंत्री बने लेकिन बर्खास्तगी का अनुमान नहीं लगा सके। भाजपा से तीन बार विधायक व मंत्री रहने के बद शिवाकांत ओझा ने समाजवादी चोला पहन कर प्रतापगढ़ की रानीगंज सीट से चुनाव जीता व लगभग एक साल पहले 'टेक्निकल एजुकेशनÓ मंत्री बने लेकिन मंत्री की कुर्सी बचाने की 'टेक्निकÓ नहीं सीख सके।
सपा प्रमुख के प्रभाव क्षेत्र मैनपुरी की भोगांव सीट के विधायक आलोक शाक्य के पिता राम औतार शाक्य भी मुलायम सिंह यादव के सहयोगी थे और विधायक भी रहे। जातीय संतुलन साधने के लिहाज से सपा प्रमुख शाक्य बिरादरी का समायोजन करते रहे थे लेकिन ये फैक्टर भी उन्हें बचा नहीं सके। बसपा से विधायक बन सपा में आए व राज्य मंत्री बने गोंडा की करनैलगंज सीट के विधायक योगेश प्रताप सिंह सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव व वरिष्ठ मंत्री शिवपाल सिंह यादव से सटने का कोई मौका नहीं चूकते थे लेकिन पता नहीं कौन सी चूक हुई कि कुर्सी चली गई।
बरेली की नवाबगंज सीट से पांचवी बार विधायक बने स्वतंत्र प्रभार के राज्य मंत्री भगवत शरण गंगवार मुलायम सिंह सरकार में भी राज्य मंत्री रहे चुके थे। यह देखना होगा कि सुर्खियों से दूर रहने वाले गंगवार को मंत्री पद गंवाने के बाद किसकी शरण में जाना पड़ता है।
...और आखिर में बात राजा भदावर के नाम से जाने वाले राजा महेन्द्र अरिदमन सिंह की जो छठी बार आगरा की बाह सीट से विधायक हैं। मुलायम सिंह के साथ जनता दल में भी रहे। उनके पिता रिपुदमन सिंह भी कई बार विधायक व मंत्री रहे। कल्याण सिंह, राम प्रकाश गुप्ता, राजनाथ सिंह व मायावती सरकार में मंत्री रहे अरिदमन सिंह पहली बार समाजवादी सरकार में मंत्री बने थे लेकिन उनके साथ वह हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ। उन्हें बर्खास्त होना पड़ा।
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-अब मंत्री बनने को लामबंदी तेज
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-खुद को दावेदार मान रहे विधायक, विधान परिषद सदस्य लाबिंग में जुटे
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लखनऊ : अखिलेश यादव के छवि सुधार अभियान के अगले चरण में अब सबकी निगाह मंत्रिमंडल में रिक्त 13 स्थानों पर लगी है। इनमें से कितने पर नए चेहरे शामिल होंगे, किसे तरक्की मिलेगी? यह कयास दिनभर लगते रहे और खुद को दावेदार मान रहे विधायक, विधान परिषद सदस्य अपने पक्ष में लाबिंग करने में भी जुटे रहे।
मिशन 2017 के मद्देनजर अपनी नई टीम तैयार कर रहे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के लिए क्षेत्रीय व जातिगत संतुलन साधने की असल चुनौती होगी। जाहिर है युवाओं व महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दे कर अखिलेश वर्ष 2012 के इतिहास को दोहराना चाहेंगे। महिला कोटे में रश्मि आर्य, शादाब फातिमा, गजाला लारी के साथ डॉ.मधु गुप्ता के नाम मंत्रिमंडल में शामिल किये जाने वालों बताया जा रहा है। सुलतानपुर सदर के अरुण वर्मा को मंत्री बनाकर नेतृत्व जिले में मिले अभूतपूर्व समर्थन की संतुष्टि के साथ कुर्मी कोटा भी पूरा कर सकता है। पिछड़ों को साधे रखने के लिए सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के करीब रहे शारदानंद अंचल के पुत्र जयप्रकाश को मौका मिलने की आस भी जतायी जा रही है, वहीं वरिष्ठ नेता अशोक वाजपेयी को भी मंत्रिमंडल में जगह देकर सदन के भीतर व बाहर का समीकरण बनाने का दांव भी चला जा सकता है। एमएलसी राम जतन राजभर, गढ़मुक्तेश्वर से मदन चौहान, जौनपुर ललई यादव, उन्नाव जिले के उदय राज को भी मंत्री पद मिलने की समर्थक उम्मीद लगाए हैं।
पश्चिम में गुर्जर कोटे से रामसकल गुर्जर की प्रोन्नत करने की चर्चा है तो वीरेंद्र सिंह जैसे बड़े नाम की अनदेखी करना भी आसान न होगा। एमएलसी आशु मलिक की पार्टी के लिए बढ़ती उपयोगिता को देखते हुए उनका दावा मजबूत बनता है तो बागपत में रालोद की काट के लिए सिवालखास क्षेत्र से गुलाम मोहम्मद को लाभ मिल सकता है। पार्टी महासचिव व ग्राम्य विकास राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अरविंद सिंह गोप को प्रोन्नत कर कैबिनेट मंत्री जाने की पूरी संभावना है। सपा सूत्रों का कहना है कि मंत्री पद हासिल करने के लिए लाबिंग कर रहे विधायक गुरुवार की देर रात बड़े-बड़े बंगलों के चक्कर काटते रहे। इसके अलावा मनोज पारस और पवन पाण्डेय को फिर से मंत्री बनाया जा सकता है।
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...और मुलायम कार्यकर्ताओं से मिलते रहे
आठ मंत्रियों की बर्खास्तगी, कई मंत्रियों से विभाग छीने जाने की हलचल के बीच सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने गुरुवार को कार्यकर्ताओं, विधायकों और बिना विभाग के एक मंत्री से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने कार्यकर्ताओं को अभी विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुट जाने का आह्वïान किया और कहा कि युवाओं की मेहनत से फिर सरकार बनेगी। मंत्रिमंडल में फेरबदल की सूची राज्यपाल को भेजने के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव उड़ीसा के लिए रवाना हो गए और दूसरे प्रभावशाली मंत्री शिवपाल यादव ने दिल्ली की उड़ान भर ली। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव पार्टी के प्रदेश कार्यालय पहुंचे जहां वह दिनभर कार्यकर्ताओं विधायकों से मिलते रहे। दोपहर बाद माध्यमिक शिक्षा विभाग वापस लिये जाने से बिना विभाग के मंत्री बने महबूब अली सपा मुखिया से मिलने पहुंचे, थोड़ी देर बाद वापस आ गए। पार्टी सूत्रों का कहना है मुलायम ने मुलाकात करने वाले कार्यकर्ताओं को अभी चुनाव की तैयारी में जुटने को कहा है। उन्होंने कहा कि पार्टी युवा वर्ग को पूरा महत्व दे रही है। उनकी मेहनत से ही फिर सरकार बनेगी। कुछ लोगों से उन्होंने लोकसभा चुनाव में हार दर्द भी बयान किया।
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Tuesday, 27 October 2015

आधा दर्जन मंत्रियों के विभागों में फेरबदल किया

17.09.2015 को हुआ था फेरबदल

लोकसभा चुनावों में हार के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जून में एक राज्यमंत्री को बर्खास्त करते हुए आधा दर्जन मंत्रियों के विभागों में फेरबदल किया था मगर क्षेत्रीय व जातीय समीकरण दुरुस्त नहीं हो पाया था, लिहाजा कुछ दिन बाद ही नए सिरे मंत्रिमंडल में बदलाव की सुगबुगाहट शुरू हुई। समाजवादी परिवार के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, मंत्री शिवपाल यादव, प्रो.राम गोपाल यादव के साथ मंत्रिमंडल में फेरबदल पर चर्चा की और खराब कामकाज वाले मंत्रियों के हटाने के संकेत भी दिए। कई बार मिले इन संकेतों का कोई नतीजा सामने नहीं आया।
अब सोमवार को फिर विक्रमादित्य मार्ग स्थित आवास पर मुलायम सिंह यादव, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, प्रो.राम गोपाल यादव के बीच बैठक हुई। थोड़ी ही देर चली इस बैठक में राज्यपाल के बयानों से सरकार की किरकिरी, कानून व्यवस्था की हालत, मंत्रिमंडल में फेरबदल, नामित कोटे की पांच एमएलसी सीटों के लिए राजभवन से नये सिरे से मांगे गए नामों पर चर्चा के अलावा जनवरी में रिक्त होने वाली निकाय कोटे की 36 सीटों के प्रत्याशियों को लेकर भी चर्चा हुई। तय किया गया कि जल्द से जल्द प्रत्याशी घोषित कर दिये जाएं। इस बैठक  के तुरंत बाद मुलायम सिंह यादव दिल्ली रवाना हो गए और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री आवास चले गए। प्रो.राम गोपाल ने जरूर इतना कहा कि 'वह व्यक्तिगत रूप से मंत्रिमंडल में नये चेहरे देखना चाहते हैं मगर इस पर फैसला लेने का अधिकार मुख्यमंत्री का है। वही इस पर कोई निर्णय लेंगे।Ó प्रो.राम गोपाल यादव ने यह भी कहा मंत्रिमंडल में बदलाव हो सकता है, नहीं भी हो सकता है। कयासों को हवा देने वाले इसबयान से संकेत तो मिल ही रहा है कि मंत्रिमंडल में फेरबदल को लेकर समाजवादी परिवार 'एक रायÓ नहीं बना पायी है लेकिन मिशन-2017 की दिशा में कदम बढ़ाने से पहले मंत्रिमंडल विस्तार व बदलाव होगा ही।
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सियासी गलियारों में चर्चा थी कि इस बैठक के बाद मंत्रियों के सामूहिक इस्तीफे लिए जा सकते हैं। साथ ही अखिलेश यादव अपने मंत्रिमंडल में फेरबदल भी कर सकते हैं। हालांकि ऐसा कोई ठोस फैसले नहीं किया जा सका। प्रदेश सरकार के सभी  कैबिनेट मंत्री , स्वतंत्र प्रभार राÓयमंत्री भी बैठक में मौजूद रहे।
 चनावी हार की वजह से उठाया कदम
लोकसभा चुनावों में शिकस्त के बाद प्रदेश की सत्तारूढ़ सपा सरकार में बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे थे। उम्मीद की जा रही थी यह बदलाव न केवल मंत्रिमंडल में होंगे बल्कि संगठनात्मक ढांचे में भी फेरबदल कि?ए जाएंगे। शुक्रवार को सीएम अखि?लेश की यूपी के गवर्नर से मुलाकात और शनिवार को सपा सुप्रीमो के निवास पर हुई बैठक के बाद यह तय माना जा रहा था। सपा सुप्रीमो के निवास पर शनि?वार को हुई बैठक में सीएम अखिलेश और शिवपाल यादव सहित सरकार के कुछ विश्वासपात्र अधिकारी भी शामिल थे। माना जा रहा है इस बैठक में मंत्रिमंडल में परिवर्तन और विस्तार को लेकर चर्चा हुई। अब इसे रवि?वार को अमलीजामा पहनाया जा सकता है।
 बीते तीन हफ्तों से यूपी के सीएम अखि?लेश लोकसभा चुनावों में हुई हार के बाद डैमेज कंट्रोल में लगे हैं। अभी तक जो भी फेरबदल हुए हैं वे ब्यूरोक्रेसी तक सीमित थे। इस बड़े फेरबदल में 150 से अधिक आईएएस, आईपीएस, पीसीएस और पीपीएस अधिकारी शामिल थे। इसके बाद अब मंत्रिमंडल में फेरबदल की तैयारी है। इस फेरबदल में कई मंत्रियों की छुट्टी हो सकती है। इसी के साथ चुनावों के ठीक पहले हटाए गए मनोज पारस और आनंद सिंह को दोबारा मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है।
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अखिलेश यादव भले ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हों लेकिन नेताजी जिस अंदाज मे अखिलेश सरकार की ओवर हालिंग कराने के लिये लगातार बोल रहे है उससे ऐसा लगने लगा है कि नेता जी ने सरकार की कमान अपने हाथ मे ले रखी है। पिछले करीब 2 माह से वे लगातार अफसरों और मंत्रियों की लगाम टाइट करने की ताकीद देते देते मुलायम सिंह यादव लगता है अब थक चुके है इसलिए अब उन्होंने अखिलेश सरकार को दुरुस्त करने का खाका तैयार कर लिया है। बुधवार को उनके रुख से उत्तर प्रदेश के राजनीतिक और प्रशासनिक अमले मे हड़कंप मच गया है।
अब मुलायम सिंह यादव सिर्फ अफसरों तक ही सीमित नही रहे, उन्होने अखिलेश के मंत्रियो को भी बुरी तरह से आड़े हाथों लिया है और सपा के पुख्ता सूत्रों का दावा है कि मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश यादव से कम से कम दस मंत्रियो को पद मुक्त करने का फरमान जारी किया है।
उत्तर प्रदेश में दो जिलों के एसएसपी और डीएम को छोड करके पूरे प्रदेश के पुलिस प्रमुख और जिला प्रमुख सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के पैमाने पर खरे नही उतर रहे है इसलिये उन्होने अपने मुख्यमंत्री बेटे अखिलेश यादव से सभी को हटाने के लिये संकेतिक तौर पर कह दिया है। मुलायम सिंह यादव के इस बयान को लेकर कई मायने लगाये जा रहे है कहा जा रहा है कि मुलायम सिंह यादव काफी दिनो से अखिलेश सरकार के मंत्रियो और अफसरो से खासे नाखुस है पहले अफसरो और उसके बाद मंत्रियो की आयेगी बारी ऐसा माना जा रहा है।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री मुलायम सिंह यादव ने आज यहां कहा कि प्रदेश के विकास की गाड़ी पिछले पांच साल में पटरी से उतर गई थी। बसपा राज में प्रदेश में जबरर्दस्त लूट हुई। विकास के काम ठप्प रहे। बिजली की एक यूनिट नहीं लगी। ऐसी मुख्यमंत्री थी जो मंत्री-विधायकों तक से नहीं मिलती थी, आम आदमी की तो बात ही बेकार है। समाजवादी पार्टी सरकार हालात बदल रही है। पांच साल के कई वायदे 10 माह के अन्दर पूरे हो गए हैं।
सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव पार्टी उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ मे समाजवादी पार्टी मुख्यालय पर एकजुट सपा कार्यकर्ताओं को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होने कहा कि अब आम आदमी को अस्पतालों में मुफ्त इलाज मिल रहा है। किसानों का 50 हजार तक का कर्ज माफ है। सरकारी ट्यूबवेल और नहरों से सिंचाई का मुफ्त पानी दिया जा रहा है। कन्या विद्याधन और बेकारी भत्ता दिया गया है। लोकतंत्र रक्षक सेनानियों को पेंशन मिलेगी। मुस्लिम लड़कियो को, जो हाईस्कूल पास हैं, &0 हजार रूपए आगे की पढ़ाई और शादी के लिए दिए जा रहे हैं। उर्दू को रोजी रोटी से जोड़कर मुस्लिमों को नौकरियों में अवसर दिए जा रहे हैं। इन सबकी नकल अब दूसरे प्रदेशों की सरकारें कर रही हैं।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि समाजवादी पार्टी के शासनकाल में 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का शासनादेश सन् 2005 में जारी किया गया था। वर्ष 2007 में बसपा की सरकार बनने पर इन जातियों को मिल रही तमाम सुविधाओं से वंचित कर दिया गया। अब 16 फरवरी,201& को इन जातियों का सम्मेलन बुलाया गया हैं। उन्होने कहा कि दलितों की छोटी जातियों की कहीं पूछ नहीं होती थी। समाजवादी पार्टी ने उनकी पहचान बनाई। छोटी जाति के नेताओं को विधायक तथा दूसरे पद देकर सम्मानित किया गया।
यादव ने माना कि पिछली बसपा संस्कृति के प्रदूषण से बहुत से अफसर बेलगाम हो गए थे। उनकी आदतें बिगड़ी हुई थी। धीरे-धीरे अब इनमे बदलाव भी हो रहा है। भ्रष्टाचार पर रोक लगी हैं। अधिकारी डरने लगे हैं। मुख्यमंत्री के लिए सुझाव है कि वे कुछ बड़े अधिकारियों के दोषी पाए जाने पर कड़ी कार्यवाही करें। साथ ही उन्होने कार्यकर्ताओं और पार्टी नेताओं को भी ताकीद दी कि वे अफसरों की ट्रांसफर पोस्टिंग में रूचि न लें। उन्होने कहा उत्तर प्रदेश एक बड़ा प्रदेश है। इसलिए एक बार ब्यूरोक्रेसी की ओवर हालिंग होनी चाहिए। कार्यकर्ता अधिकारियों की चापलूसी करने से बचें। श्री यादव ने सलाह दी कि पार्टी कार्यकर्ताओं को सरकार की उपलब्धियों की ठीक से जानकारी लेकर जनता के बीच उनको प्रचारित प्रसारित करना चाहिए। कार्यकर्ताओं को अपने सभी लोकसभा प्रत्याशियों को जिताना चाहिए ताकि सन् 2014 में दिल्ली में समाजवादी पार्टी के निर्णायक हस्तक्षेप की स्थिति बन सके।

Wednesday, 21 October 2015

राजभवन भेजे गए नौ नाम

लखनऊ. यूपी के गवर्नर राम नाइक ने राज्य सरकार द्वारा भेजे गए एमएलसी के नौ नामों की लिस्ट में से चार नामों पर अपनी सहमति दे दी है। वहीं, पांच अन्य नामों को वापस लौटा दिया है। गवर्नर ने एसआरएस यादव, लीलावती कुशवाहा, रामवृक्ष यादव और जीतेंद्र यादव एमएलसी के लिए नामित किया है। 
 
बता दें कि जितेंद्र यादव, राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के संबंधी हैं। विधान परिषद में बीते 25 मई से एमएलसी की नौ सीटें खाली हैं। इन सीटों के लिए राज्य सरकार की ओर से राजभवन भेजे गए नौ नामों पर राज्यपाल आपत्ति जता चुके थे। गुरुवार को राजभवन के बुलावे पर सीएम अखि‍लेश यादव ने राज्‍यपाल राम नाइक से मिलने पहुंचे थे।
 
पांच नामों से राज्यपाल हैं असहमत
राज्‍यपाल ने सीएम अखिलेश को बताया कि सूची में शामि‍ल पांच नाम रोक लि‍ए गए हैं। इ‍नमें डॉ. कमलेश कुमार पाठक, संजय सेठ, रणविजय सिंह, अब्दुल सरफराज खां और डॉ. राजपाल कश्यप का नाम शामि‍ल है। इन लोगों की ओर से अपने पक्ष में शपथ पत्र भी राजभवन को सीएम के जरि‍ए उपलब्‍ध कराया गया था, लेकि‍न राजभवन को मि‍ली शि‍कायतों के आधार पर सभी के नाम रोक लि‍ए गए। मुलाकात के दौरान राज्‍यपाल ने रोके गए नामों को लेकर प्राप्‍त शि‍कायतों की जांच कराकर सीएम से आख्‍या भेजने को कहा है।

राजभवन ने राज्य सरकार से पूछे तीन सवाल
साहि‍त्‍य, कला, संस्‍कृति के जरि‍ए पहचान बनाने वाले लोगों की बजाए सरकार की तरफ से नौ सदस्‍यों की भेजी गई सूची में सभी नाम राजनीति‍क पृष्‍ठभूमि से हैं। ऐसे में नि‍यमावली के मुताबिक, राजभवन की तरफ से इन सभी नामों का परीक्षण कराया जा चुका है। पत्रावली के परीक्षण के बाद राजभवन ने सरकार से तीन बिंदुओं पर जवाब मांगा था। राजभवन से पूछे गए सवाल में सबसे पहले यह जानकारी मांगी गई है कि जो नाम मनोनयन को लेकर भेजे गए हैं, उनमें कि‍तने नाम लेखन, साहि‍त्‍य, कला, संस्‍कृति की पृष्‍ठभूमि से ताल्‍लुक रखते हैं। 
 
दूसरे सवाल में कि‍तने ऐसे नाम हैं, जि‍न पर मुकदमे या आपराधि‍क केस चल रहे हैं? कहीं इनमें से कि‍सी को पूर्व में कोर्ट से सजा तो नहीं हुई है। तीसरे सवाल में सूची में कि‍तने ऐसे नाम है, जि‍न्‍होंने बैंक से लोन लि‍या है? क्या उनको डि‍फॉल्‍टर घोषि‍त कर दि‍या गया है? राजभवन के इस तरह के सवाल पूछने के बाद फ्रांस दौरे से लौटकर सीएम अखि‍लेश यादव ने शपथपत्र के साथ सूची दी थी।

Sunday, 18 October 2015

पुरस्कार लौटाने वाले साहित्यकार


लेखक का नामकिस भाषा के साहित्यकार
मुनव्वर राणाउर्दू
काशीनाथ सिंहहिंदी
उदय प्रकाशहिंदी
नयनतारा सहगलअंग्रेजी
अशोक वाजपेयीहिंदी
साराह जोसेफमलयालम
गुलाम नबी ख्यालकश्मीरी
रहमान अब्बासउर्दू
वरयाम संधूपंजाबी
गुरबचन सिंह भुल्लरपंजाबी
अजमेर सिंह औलखपंजाबी
जी.एन. रंगनाथ रावकन्नड़
मंगलेश डबरालहिंदी
राजेश जोशीहिंदी
गणेश देवीगुजराती
श्रीनाथ डी.एन.कन्नड़
के. वीरभद्रप्पाकन्नड़
रहमत तारीकेरीकन्नड़
बल्देव सिंहपंजाबी
जसविंदरपंजाबी
दर्शन भट्टरपंजाबी
सुरजीत पाटरपंजाबी
चमन लालपंजाबी
होमेन बोरगोहेनअसमिया
मंदाक्रांत सेनबांग्ला
के.एन. दारूवालाअंग्रेजी
नंद भारद्वाजराजस्थानी
के. नीलाकन्नड़
काशीनाथ अंबाल्गीकन्नड़
किन लेखकों ने दिया साहित्य अकादमी से इस्तीफा
साहित्यकार का नामभाषा
शशि देशपांडेकन्नड़
के. सदचिदानंदनमलयालम
पी.के. पाराकाड्डवमलयालम
अरविंद मालागट्टीकन्नड़

Saturday, 17 October 2015

आजम हैं कि बोलते ही जाते...

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-आजम हैं कि बोलते ही जाते...
-लगातार विवादित बयानों से किरकिरी, सपा ने पल्ला झाड़ा
-हलाल गोश्त के बयान से मुसलमानों में भी नाराजगी
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पहले दो बयान-
हम भगवा भारत के पीडि़त हैं।
16 अक्टूबर, लखनऊ में
-'मोदी सियासत छोड़ दें और मंदिर में जाकर घंटा बजाएं।
-14 अक्टूबर, कानपुर में
दोनों बयान सपा सरकार में नंबर दो की हैसियत वाले मंत्री आजम खां के हैं। वह ऐसा ही तीखा बोलते हैं, फिर चाहे उससे विवाद हो, उनकी पार्टी के लिए असहज स्थिति हो या उनके बोलने के बाद चारों तरफ से शुरू होने वाला बयान युद्ध हो।
आजम खां नगर विकास मंत्री हैं। यह ऐसा विभाग है जिसका काम और विफलता सबसे पहले दिखती है लेकिन, तीन साल में यह विभाग अपने काम की बदौलत कम, अपने मंत्री के कारण अधिक जाना गया। यही आजम हैं जिन्होंने बीते लोकसभा चुनाव के दौरान गाजियाबाद में कहा था कि, 1999 के कारगिल युद्ध में मुस्लिम सैनिकों ने भारत को फतह दिलाई। आजम के मुताबिक जब कारगिल मोर्चा जीता गया तो वहां कोई हिंदू सैनिक नहीं था। दो दिन पहले यह कहकर उन्होंने मुसलमानों को भी नाराज कर दिया कि, निर्यात किया जा रहा गोश्त हलाल का नहीं झटके का है और हज, उमरा पर जाने वाले वहां गोश्त न खाएं।Ó
समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में एक आजम की पहचान सोशलिस्ट नेता की रही। वर्ष 2012 में समाजवादी सरकार बनने के बाद उनके  जुमलों ने पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी कीं। कारगिल की लड़ाई पर उनके बयान को चुनाव आयोग ने भी 'सद्भाव बिगाडऩेÓ वाला माना था। अपनी ही सरकार के डीजीपी को लिखे उनके खत, प्रधानमंत्री से लेकर अन्य नेताओं के लिए इस्तेमाल उनके जुमले और फैसलों विवादों में रहे। उनके अपर निजी सचिवों ने तो उनके साथ काम करने से ही इंकार कर दिया। दादरी के बिसाहड़ा कांड को यूएन ले जाने का एलान कर आजम ने अपनी ही सरकार को सकते में ला दिया। यही कारण था कि दूसरे ही दिन एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस बयान को यह कहते हुए खारिज किया कि घर के मसले घर में सुलझाये जाने चाहिए।
मुलायम परिवार में आजम पर एकराय नहीं है। गुरुवार को मेरठ में समाजवादी पार्टी के महासचिव शिवपाल यादव ने कह ही दिया कि आजम का यूएन वाला बयान उनकी निजी राय थी। इसके विपरीत इस दौरान मुलायम सिंह दो बार सार्वजनिक मंच पर आए मगर इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रहे। सपा प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी ने भी कुछ कहने से साफ इंकार कर दिया। यह सवाल अब आम है कि क्या समाजवादी पार्टी को आजम के बयानों से सियासी नुकसान का खतरा सताने लगा है।
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आजम को अतिरिक्त आजादी : माथुर
आजम खां के बयानों से विवाद की स्थिति बनने पर कांग्रेस विधानमंडल दलनेता प्रदीप माथुर का कहना है कि अखिलेश सरकार में आजम खां को अतिरिक्त आजादी मिली है इसीलिए वह कुछ भी बयान दे सकते है और देते भी रहे है। इसबाबत इससे अधिक कुछ कहना मुनासिब न होगा।
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आजम के बोल
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-'गूगल में पर टॉप 10 क्रिमिनल सर्च करने पर नरेंद्र मोदी का नाम आता है।Ó
 -'बच्चे पैदा करने के लिए मर्दानगी की जरूरत होती है, पुरस्कार बांटने से बच्चे पैदा नहीं होते।Ó
-'मुसलमान खौफजदा है, उन्हें कुर्बानी से रोका जा रहा है, उनकी धार्मिक भावनाएं आहत की जा रही हैं।Ó

अखिलेश ने सहारा दिया अमर सिंह को...


-मेदांता अवध अस्पताल के शिलान्यास पर साथ दिखे मुलायम, अमर और अखिलेश
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लखनऊ : रिश्ता निभाने की अदा हो या दूर की सियासी कौड़ी, मगर यह साफ है कि समाजवादी परिवार में अमर सिंह की स्वीकार्यता बढ़ गयी है। जाहिर है, इससे उनकी 'घर वापसीÓ की संभावनाओं को और बल मिला है।
वर्ष 2009 में सपा से निकाले जाने के बाद पांच अक्टूबर, 2014 को हुए पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में अमर सिंह मंच पर दिखे थे। गुरुवार को वह फिर सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ सार्वजनिक मंच पर दिखे। एक अंतर जरूर है। अक्टबूर, 2014 में अमर सिंह मंच पर गुमसुम से थे और अग्रिम पंक्ति के नेताओं ने उनसे मुलाकात में गुरेज किया था पर एक साल बाद का दृश्य ठीक उल्टा था। मुलायम के साथ उनका अंदाज-ए-गुफ्तगू भी जल्द 'घर वापसीÓ का संकेत दे रहा था। गुरुवार को मेदांता अवध अस्पताल के शिलान्यास मंच पर अमर सिंह चढ़े तो मुलायम सिंह ने उनका हाथ थामा हुआ था। उन्होंने अमर सिंह को अपने बगल की कुर्सी दी और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को दूसरी ओर बैठने का इशारा किया। कार्यक्रम के दौरान मुलायम, अमर और डा. नरेश त्रेहन में गुफ्तगू होती रही। अमर सिंह ने कागज पर कुछ लिखा और मुख्यमंत्री की ओर इशारा किया, तो उन्होंने लपककर कागज पकड़ा। पढ़ा और फिर हंस पड़े। कागज का वह टुकड़ा मुख्यमंत्री ने जेब में रख लिया। कार्यक्रम खत्म होने के बाद मुख्यमंत्री ने सीढिय़ां उतरने तक अमर सिंह को सहारा दिये रखा।
एक घंटे का कार्यक्रम अमर सिंह की सपा में वापसी की पटकथा तैयार हो जाने का संकेत दे रहा था। यह और बात है कि अमर सिंह इसे पारिवारिक रिश्ते की मिठास के रूप में रेखांकित करते हैं।
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रामगोपाल, आजम पक्ष में नहीं
सपा के राष्ट्रीय अधिवेशन के बाद से अब अमर सिंह और सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के बीच हुई मुलाकातों में से छह सार्वजनिक हो चुकी हैं। वह जब-तब अखिलेश से भी मिलते रहे हैं। मुलायम भी अमर को अपना करीबी बता चुके हैं। ऐसे में उनकी वापसी की राह खुल जाने की चर्चा होती है लेकिन सूत्रों का कहना है कि सपा महासचिव प्रो.राम गोपाल यादव और मोहम्मद आजम खां अमर की घर वापसी के पक्षधर नहीं हैं।
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हलाल गोश्त पर आजम ने छेड़ा नया विवाद


-निर्यात किए जाने वाले गोश्त पर दिया बयान
लखनऊ : 'व्यंग्य बाणोंÓ से विवादित रहने वाले मंत्री आजम खां ने निर्यात किए जाने वाला हलाल का गोश्त न होने की बात कह कर नया विवाद शुरू कर दिया है। इस विवादित मसले को लेकर मुस्लिमों के एक वर्ग में आक्रोश है।
मंत्री आजम खां जब-तब ऐसे जुमले उछालते रहे हैं, जो सरकार को मुश्किल में फंसता रहते है। कभी करगिल की लड़ाई को लेकर, कभी डीजीपी को खत लिखकर मुसलमानों के खौफ में जीने की बात, कभी बकरीद पर कुर्बानी से रोके जाने का बयान समाजवादी सरकार के लिए मुश्किलें पैदा करता रहा है। दादरी के बिसाहड़ा में इकलाख की हत्या का मसला यूएन ले जाने के उनके बयान ने भी सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी थीं, अब आजम खां ने निर्यात होने वाला गोश्त हलाल नहीं होने का बयान देकर नई बहस खड़ी कर रही है।
बुधवार को उन्होंने कानपुर में कहा कि स्लाटर हाउस में जिस तरह झटका दे कर जानवरों का गोश्त निकाला जाता है, वह इस्लामी तौर-तरीके के खिलाफ है। यह पूरी तरह हराम है। यही गोश्त बाहर निर्यात होता है।
स्लाटर हाउस में जानवरों के कत्ल का वीडियो दिखाते हुए नगर विकास मंत्री आजम ने कहा था कि यह दृश्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नजर नहीं आ रहा है। यह तस्वीर तो प्रोजेक्टर लगाकर लोगों को दिखानी चाहिए ताकि वह भी जान सकें कि स्लाटर हाउस में किस तरह से जानवरों का कत्ल हो रहा है? आजम ने मुसलमानों को गोश्त खाना छोडऩे की सलाह भी दी, उनके बयान का सबब कुछ भी रहा हो लेकिन इससे नई बहस जरूर शुरू हो गई है।
दरअसल भारत गोश्त का सबसे बड़ा निर्यातक है। कई सौ टन मांस प्रतिदिन निर्यात किया जाता है। ऐसे में आजम खां के इस बयान से नई बहस शुरू हो गई है। कई स्लाटर हाउस के संचालकों का कहना है कि इस तरह के बयान व्यापार बंद कराने की साजिश है।
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आजम के बयान को बताया सियासी
कानपुर : मांस व्यवसायी सुलेमान ने आजम के इस बयान को पूरी तरह सियासी मसला बताया। उन्होंने कहा कि देश के कई स्लाटर हाउस में जानवरों से गोश्त निकालने की प्रक्रिया पूरी तरह इस्लामी है। आजम इसे सियासी चोला पहनाकर राजनीति गरमाना चाहते हैं। उद्यमियों को चाहिए कि ऐसे बयानों पर ध्यान न दें और अपना काम करें।
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वकीलों ने जताई नाराजगी
कानपुर : वकीलों ने गुरुवार को नगर विकास मंत्री आजम खां को कचहरी स्थित शताब्दी गेट पर प्रतीकात्मक अदालत लगाकर दोषी करार देते हुए सजा सुना दी। वकीलों ने बुधवार को आजम खां द्वारा दिए गए बयान पर यह नाराजगी जताई है। वकीलों ने आजम पर देश में हिंदु-मुस्लिम के बीच वैमनस्यता फैलाने और भारत के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) जाकर देश का बंटवारा करने का आरोप लगाया।