Tuesday, 31 January 2017

Samajwadi party-2016 30 dec_ सपा से निकाले गए मुख्यमंत्री

पुन: अपडेट : सपा पैकेज - ब्यूरो: बेबस, हताश, भावुक मुलायम !
ध्यानार्थ: खबर में कुछ तथ्य जोड़े गये हैं, इसी का प्रयोग अपेक्षित।
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- बेटे को सपा से निष्कासित करने का फैसला सुनाते हुए नम हुईं आखें
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : सियासत में रिश्तों का रंग भी घुला हो तो आंखें डबडबाती हैं और फैसले कठोर हो जाते हैं। शुक्रवार को जब बेटे पर कार्रवाई का फैसला सुनाने मुलायम सिंह यादव मीडिया के सामने आए तो उनके चेहरे पर बेबसी, हताशा तो नजर आ ही रही थी, लेकिन बेटे को सपा से निष्कासित करने का फैसला सुनाते हुए आंखें नम भी हुईं।
शुक्रवार सुबह बड़े नेताओं में बेनी वर्मा सबसे पहले मुलायम सिंह से मिलने उनके घर पहुंचे। कुछ देर बाद आशु मलिक विक्रमादित्य मार्ग पहुंचे। मुलायम के घर से निकले बेनी सीधे शिवपाल के यहां पहुंच गए। दोनों के बीच चर्चा हुई। फिर बेनी के साथ शिवपाल और अंबिका भी मुलायम के घर पहुंचे।
शाम साढ़े छह बजे मुलायम सामने आये। उस समय उनके चेहरे पर बेबसी, हताशा झलक रही थी। वह कुछ देर चुप रहे। फिर पूछा कि क्या ये लाइव है? हां में जवाब मिलते ही कहा- चलो अच्छा हुआ। ये लाइव जा रहा है। फिर जब रामगोपाल पर कार्रवाई की घोषणा कर मुलायम शिवपाल की ओर घूमे तो उन्होंने कान में कुछ कहा। ऐसा प्रतीत हुआ कि शिवपाल ने मुलायम से कहा-'अखिलेश वाला कर दीजिएÓ। मुलायम ने फिर पूछा, क्या? इस पर शिवपाल ने कहा-टाइप हो रहा है। मुलायम फिर बोले- बोल दें? शिवपाल ने कहा- हां, इस पर मुलायम ने अखिलेश को भी 6 साल के लिए बाहर कर दिया। हालांकि, अखिलेश को निकालने का एलान किया, उस समय उनकी जुबान लडख़ड़ाई। आंखें नम हुई...और जब यह पूछा गया कि अखिलेश के माफी मांगने पर माफ कर देंगे? तब मुलायम का चेहरा थोड़ा सामान्य हुआ। संभले और कहा वह कहां ऐसा करेगा, पता नहीं पिता मानता भी है कि नहीं? फिर बोले, माफी मांगेगा तो विचार कर लेंगे। यही वह पंक्तियां है, जिन्हें बोलते ही कठोर इरादों वाले मुलायम का चेहरा पुत्र के प्रति कार्रवाई की पीड़ा में डूबता नजर आया। लंबे राजनीतिक जीवन में पत्रकार वार्ता खत्म करने के बाद बहुत-बहुत धन्यवाद कहने वाले मुलायम ने इस बार यह भी नहीं कहा।
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प्रवक्ता जूही सिंह व नावेद सिद्दीकी समेत दर्जनों ने पद छोड़े
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राब्यू, लखनऊ: करीब छह माह से समाजवादी पार्टी में जारी कलह अब टूट में बदलती जा रही है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव व रामगोपाल यादव को सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव द्वारा छह वर्ष के लिए निष्कासित करने के बाद से इस्तीफों का दौर आरंभ हो गया है। प्रवक्ता जूही सिंह और नावेद सिद्दीकी के अलावा बड़ी संख्या में त्यागपत्र देने की घोषणा करके माहौल को और गर्मा दिया है। इसके अलावा जिलों में भी धरना प्रदर्शन व त्यागपत्र देने का क्रम जारी है।
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अपडेट-सपा पैकेज :  ब्यूरो : जो किया मुलायम ने, दोहरा रहे अखिलेश
नोट- कुछ नए तथ्य जोड़े गए हैं।
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- उछल रहा जैसी करनी-वैसी भरनी का जुमला
- लोहिया, चरण सिंह, वीपी और चंद्रशेखर को दिया था झटका
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के बारे में यह कहावत है कि सियासत में उनसे अधिक कोई रिश्तों का निर्वाह नहीं कर सकता, लेकिन, विरोधी यह कहने से भी नहीं चूकते कि मुलायम ने सत्ता हासिल करने के लिए लगातार अपने आकाओं को झटका दिया है। सपा प्रमुख अपने राजनीतिक जीवन में सबसे बडे संकट से गुजर रहें है, जब खुद उनके पुत्र अखिलेश यादव ने ही बगावती रुख अख्तियार किया है। यहां यह भी कहा जा रहा है कि मुलायम ने जो किया वह सूद समेत वापस मिल रहा है।
बोफोर्स कांड के बाद जब 1989 में वीपी सिंह की अगुआई में देश और उत्तर प्रदेश में गैर कांग्रेसी सरकार बनी, तब वीपी सिंह चौधरी अजित सिंह को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे लेकिन मुलायम ने ऐसा चरखा दांव चला कि वीपी सिंह भी उनके हिमायती हो गए। मुलायम को उप्र की सत्ता मिली पर वीपी सिंह की सत्ता डगमगाने के बाद मुलायम ने जनता दल छोड़कर चंद्रशेखर से मजबूत संबंध बनाए लेकिन कुछ महीनों तक ही उन्हें निभा सके। उन्होंने चंद्रशेखर की समाजवादी जनता पार्टी से अलग होकर समाजवादी पार्टी बना ली। मुलायम की राजनीति में यह कोई नई बात नहीं थी। वह शुरुआती दौर में भी लोहिया को छोड़कर चौधरी चरण सिंह के साथ हुए थे। चंद्रशेखर से अलग होने के बाद बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन से ही मुलायम ने 1993 में दोबारा सत्ता हासिल की लेकिन जून 1995 तक यह रिश्ता भी चल नहीं पाया। जिस बसपा के बूते मुलायम ने सत्ता हासिल की, उसी बसपा की प्रमुख नेता मायावती के साथ गेस्ट हाऊस कांड आज भी लोग नहीं भूले हैं।
डॉ. लोहिया के अनुयायी होने के बावजूद मुलायम सिंह यादव ने समाजवाद के नाम पर जिस तरह परिवार को आगे किया, वही परिवार अब उनके लिए मुसीबत का सबब बन गया है। मुलायम के कुनबे में खांचों में बंटे भाई-बंधु अखिलेश के कंधे पर बंदूक रखकर मुलायम पर निशाना साध रहे हैं। कभी लड़खड़ाते हुए मुलायम को एक आज्ञाकारी आदर्श पुत्र की तरह संभालने वाले अखिलेश अब आक्रामक हो गये हैं। नेताजी के फैसलों के खिलाफ वह एक्शन ले रहे हैं और अपनों को लामबंद कर रहे हैं। जाहिर है, वक्त अपने को दोहरा रहा है और कहने वाले यही कह रहे हैं, जैसी करनी-वैसी भरनी।
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मुलायम सिंह यादव : जीवन वृत्त
 जन्म : 22 नवंबर, 1939
 जन्म स्थान : सैफई, इटावा
राजनीतिक करियर : 1967 में पहली बार विधायक। तीन बार उप्र के मुख्यमंत्री। 1996 में केन्द्र में रक्षा मंत्री। समाजवादी पार्टी के संस्थापक। संप्रति आजमगढ़ से सांसद। सात बार विधायक और छह बार सांसद बने।
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कांग्रेस की मदद से बचेगी अखिलेश की कुर्सी
 कांग्रेस के 29 विधायकों की जगह 28 विधायक किया गया है।
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-शक्ति प्रदर्शन में रालोद का भी मिल सकता है साथ
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लखनऊ : समाजवादी पार्टी से निष्कासित होने के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की कुर्सी कांग्रेस की मदद से ही बचना संभव है। शक्ति प्रदर्शन की स्थिति में अखिलेश को रालोद का साथ भी मिल सकता है।
 मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा गुरुवार को जारी 235 प्रत्याशियों की सूची में 171 सपा विधायक भी शामिल थे। माना जा रहा है कि  इसमें से अधिकतर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को बचाने के लिए आगे आ जाएंगे। मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाए रखने के लिए  202 विधायकों के समर्थन का आंकड़ा पूरा करना जरूरी है। ऐसी स्थिति आने पर अखिलेश को कांग्रेस और रालोद से मदद की दरकार होगी। बता दे कि कांग्रेस के 28 विधायकों में से दल बदल व इस्तीफे के बाद 19 विधायक ही पार्टी में बने हैं। दलबदल करने वालों में दो समाजवादी पार्टी में पहले ही शामिल हो चुके हैं। कांग्रेस से मदद की उम्मीद अखिलेश के बयानों से भी नजर आती है। अखिलेश लगातार कांग्रेस से गठबंधन होने पर तीन सौ सीट आने का दावा करते रहे हैं। वहीं कांग्रेस भी प्रदेश सरकार को लेकर नरम रुख अपनाए हुए है और केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले है। कांग्रेस के चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर की दो माह से सपा से गठजोड़ की कोशिश को भी इससे जोड़ कर देखा जा रहा है। इस मुद्दे पर कांग्रेस विधानमंडल दलनेता प्रदीप माथुर किसी भी टिप्पणी से इन्कार करते है। उनका कहना है कि राष्ट्रीय नेतृत्व ही इस पर कोई फैसला लेगा।
वहीं, रालोद के कुल आठ विधायकों में से पूरन प्रकाश भाजपा में शामिल हो चुके हैं। ऐसे में अन्य सात विधायकों का साथ भी अखिलेश को मिल सकता है। रालोद का रवैया भी अखिलेश यादव को लेकर कांग्रेस जैसा ही है। रालोद के महासचिव जयंत चौधरी और मुख्यमंत्री अखिलेश की नजदीकियां भी किससे छिपी नहीं हैं। गत राज्यसभा व विधानपरिषद चुनाव में रालोद का समर्थन सपा को मिल भी चुका है।

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...तो विस भंग करने की सिफारिश कर सकते हैं अखिलेश
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- मुलायम से पहले ही विधायकों को लामबंद करेंगे मुख्यमंत्री
- दोनों खेमों ने आज बुलाई विधायकों की बैठक
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लखनऊ : समाजवादी कुनबे के बवाल के बाद अब निगाहें मुलायम और अखिलेश के अगले कदम पर टिक गयी हैं। सपा से मुख्यमंत्री को निकाले जाने के बाद विधायकों को लामबंद करने की कवायद शुरू हो गयी है। अखिलेश विधायकों के साथ ही समर्थकों को भी सहेज रहे हैं। अखिलेश अगर संख्या बल में कमजोर पड़े तो विधानसभा भंग करने की सिफारिश भी कर सकते हैं।
अखिलेश ने शनिवार सुबह साढ़े नौ बजे विधायकों को पांच कालिदास स्थित अपने सरकारी आवास पर बुलाया है। उधर, मुलायम सिंह ने पार्टी मुख्यालय में विधायकों को 11 बजे तलब किया है। उन्हें अपने-अपने पाले में करने की होड़ शुरू हो गयी है। दोनों खेमों के क्षत्रप विधायकों को सहेजने में लग गये हैं और हालात वही हो गए हैं जो 1990 और 2003 में मुलायम द्वारा सरकार बचाने और बनाने के लिए बने थे। अखिलेश ने गुरुवार को 225 उम्मीदवारों की जो सूची जारी की थी उसमें 171 विधायक हैं। इनमें करीब सवा सौ विधायक ऐसे हैं जिनका नाम मुलायम की सूची में भी है। दोनों खेमे इन विधायकों पर अपना हक जता रहे हैं लेकिन ये विधायक किसके पाले में हैं, यह शनिवार को साफ होगा। ऐसे में अखिलेश और मुलायम को अपनी-अपनी ताकत का अंदाजा हो जाएगा। अगर अखिलेश के पास 171 विधायकों का संख्या बल उपलब्ध होता है तो वह कांग्रेस और अन्य छोटे दलों के सहयोग से अपनी सत्ता बचा सकते हैं। संकेत मिल रहे हैं कि अगर विधायकों की पर्याप्त संख्या उनके पाले में नहीं आयी तो वह राजभवन जाकर विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर सकते हैं।
दूसरी तरफ मुलायम की बैठक में पार्टी के कुल 229 विधायकों में से ज्यादातर के पहुंचने पर अखिलेश को विधायक दल के नेता पद से हटाने का प्रस्ताव पारित कर विधायक दल का नया नेता चुना जा सकता है। बैठक में नया नेता चुने जाने के संकेत मुलायम ने शुक्रवार को प्रेस कांफ्रेंस में भी दिए। पार्टी के विधायक मौजूदा परिस्थिति में मुलायम पर ही कमान संभालने का दबाव बना सकते हैं। ऐसे में मुलायम, राजभवन जाकर अखिलेश के पास बहुमत न होने की बात कह सकते हैं। ऐसी स्थिति में राज्यपाल राम नाईक, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से सदन में बहुमत साबित करने के लिए कह सकते हैं।
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रामगोपाल को बना सकते राष्ट्रीय अध्यक्ष
प्रोफेसर राम गोपाल यादव ने रविवार को राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुलाई है। समाजवादी खेमे में इस बात की भी सुगबुगाहट है कि इस बैठक में प्रोफेसर रामगोपाल यादव को सपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जा सकता है। अखिलेश यादव इस बार पूरी तैयारी से जवाब देना चाहते हैं। उधर, संभावना यह भी जताई जा रही है कि अगर चुनाव चिन्ह को लेकर बात फंसी तो कभी समाजवादियों का निशान रहे बरगद चुनाव चिन्ह को लेने की पहल होगी। बताया जा रहा है कि इस बारे में दिल्ली में प्रोफेसर रामगोपाल एक प्रमुख राजनीतिक शख्सियत से मुलाकत कर चुके हैं।
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फर्रुखाबाद से लगी लखनऊ में आग
-रामगोपाल के लखनऊ पहुंचते ही शुरू हुआ हंगामा
लखनऊ : पिछली बार जो काम प्रो.रामगोपाल के अल सुबह जारी पत्र ने कर दिया था, ठीक वैसा ही हंगामा अबकी रामगोपाल के बयान ने कर दिखाया। दिन शुरू होने के कुछ घंटों के भीतर ही रामगोपाल ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा जारी 235 प्रत्याशियों की सूची को सही और सपा की असल लिस्ट ठहरा दिया तो इस बयान के पीछे छिपी चुनौती ने कुछ देर में लखनऊ की राजनीतिक हवा में गर्मी घोल दी। फर्रुखाबाद में यह बयान देकर रामगोपाल दोपहर बाद जब तक लखनऊ पहुंचते, यहां सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह आगबबूला हो चुके थे।
रामगोपाल दोपहर करीब साढ़े तीन बजे लखनऊ पहुंचकर जब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मुलाकात के लिए उनके नगराम से लौटने का इंतजार कर रहे थे, तब भी शायद उन्हें पूरी तरह अंदाजा नहीं था कि पार्टी अध्यक्ष ने उनके साथ मुख्यमंत्री पर कार्रवाई की क्या तैयारी कर रखी है। चार बजे वह मुख्यमंत्री से मिले और दो घंटे के भीतर ही मुलायम ने वह बम फोड़ कर तूफान खड़ा कर दिया, जिसका अंदेशा सुबह से मुख्यमंत्री के आवास के बाहर खड़े समर्थकों को भी नहीं था। शाम करीब छह बजे जैसे ही मुख्यमंत्री को पार्टी से निकाले जाने की खबर कालीदास मार्ग की सर्द हवा में फैली तो बाहर जमा कार्यकर्ताओं और नेताओं में चेन रिएक्शन शुरू हो गया।
कुछ लोग शिवपाल के सरकारी आवास की ओर दौड़ पड़े और गेट के बगल में लगी उनकी नेमप्लेट तोड़ दी। जिनके हाथ में शिवपाल के पोस्टर आए, उन्होंने पोस्टर को चिंदी-चिंदी कर जैसे बदला ले लिया। कुछ इतने क्षुब्ध थे कि अपने ही शरीर में आग लगाने पर आमादा हो गए। जो सबसे पहले इसके लिए भागा, उसे तो पुलिस और मीडिया छायाकारों ने किसी तरह रोक लिया, लेकिन कुछ ही पल बाद गोमतीनगर निवासी राहुल ने खुद को आग लगा ली। वह झुलस गया। इस आग ने माहौल में तनाव और गर्मी को और बढ़ा दिया। इस बीच यासिर शाह सहित अखिलेश के कई समर्थक नेता मुख्यमंत्री से मिलने पहुंचे। बाहर जमा युवा समर्थक जानने को उत्सुक थे कि भीतर क्या हुआ, लेकिन भीतर से निकल रहे नेताओं के उतरे चेहरे बिना बोले ही उनकी दशा बयान कर रहे थे। रात गहराने के साथ ही जैसे लोगों को अंदाजा हुआ कि मुख्यमंत्री अपने सरकारी आवास से बाहर आ रहे हैैं तो उनके समर्थक गेट के और नजदीक आ गए। हालत यह हुई कि जैसे समर्थकों ने मुख्यमंत्री को उनके आवास पर ही बंधक बना लिया हो। खैर कुछ देर में मुख्यमंत्री को जाने देने की अपील माइक से की गई और कमांडो ने भी घेरेबंदी कस दी। इसके बाद मुख्यमंत्री अपने विक्रमादित्य मार्ग स्थित आवास पहुंचे तो समर्थक पीछे-पीछे वहां भी पहुंच गए। देर रात तक कोहरे के बीच युवा समर्थक डटे थे, जबकि मुलायम और शिवपाल के आवासों के बाहर का सन्नाटा अगले दिन की पटकथा तैयार कर रहा था।
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सपा में जंग को मुफीद मान रही बसपा-भाजपा
लखनऊ : बिखराव के मुहाने पर पहुंची समाजवादी पार्टी में आंतरिक जंग को भाजपा व बसपा खुद के लिए मुफीद मान रही हैं और पूरे घटनाक्रम पर निगाह लगाए हैं।
बसपा प्रमुख मायावती शुक्रवार को लखनऊ में ही थी और सपा में मचे घमासान की पल-पल जानकारी लेती रहीं। सूत्रों का कहना है कि घरेलू कलह से समाजवादी पार्टी का कमजोर हो जाना बसपा अपने हित में मानती है। नेतृत्व का मानना है कि सपा दो फाड़ होती है तो मुस्लिम भाजपा को हारने के लिए बसपा के पक्ष में लामंबद हो सकते हैं। इसी फार्मूले पर बसपा लगातार दलित-मुस्लिम गठजोड़ पर जोर देने पर लगी है। बहुमत की सरकार नहीं चलाने की तोहमत सपा पर मढ़ते हुए बसपा का प्रचार अभियान चलेगा और इसका चुनावी लाभ मिलने की संभावना बढ़ेगी।
उधर, भाजपा नेतृत्व को भरोसा है कि समाजवादी पार्टी की बढ़ी अंतरकलह से मुस्लिम वोट भ्रमित होगा और इसका पूरा चुनावी फायदा भाजपा के खाते में जाएगा। इसके अलावा प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगने की उत्पन्न होती है तो प्रशासन को मनमुताबिक लगाने का मौका मिलेगा।
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 अब क्या होगा
1. अखिलेश कुर्सी बचाने का हरसंभव करेंगे प्रयास। विधायकों की बैठक में अपेक्षित संख्या बल न आया तो विधानसभा भंग करने की कर सकते हैं सिफारिश। विधायकों से पार्टी का विशेष समर्थन बैठक बुलाने का भी ले सकते हैं प्रस्ताव।
2 . मुलायम दल नेता बदलने का प्रस्ताव पास कराकर भेज सकते हैं राजभवन।
3. रविवार को राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में सपा पर कब्जे की अखिलेश बनाएंगे रणनीति।
4. सपा पर काबिज न होने की स्थिति में बरगद चुनाव चिन्ह हासिल करने के प्रयास के साथ रामगोपाल नई पार्टी का कर सकते हैं एलान।
5. ... यह सब कुछ नहीं होगा अगर मुलायम के कहे अनुसार अखिलेश ने मांग ली माफी।

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सपा पैकेज : ब्यूरो : विधायकों की दलीय स्थिति
समाजवादी पार्टी - 229
बहुजन समाज पार्टी - 80
भारतीय जनता पार्टी - 41
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस -28
राष्ट्रीय लोकदल - 08
पीस पार्टी - 04
कौमी एकता दल - 02
अपना दल - 01
नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी - 01
इत्तेहाद मिल्लत कौंसिल - 01
निर्दलीय - 06
रिक्त - 02 (पडऱौना, लखनऊ कैंट)
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अखिलेश ने दो प्रत्याशी बदले, दो नए घोषित
- प्रत्याशियों की संख्या 237 हुई
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लखनऊ: मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने शुक्रवार को 235 प्रत्याशियों की पहली सूची जारी करने के 24 घंटे के भीतर दो प्रत्याशी बदल दिए और दो नए प्रत्याशी घोषित कर दिया। अब उनके प्रत्याशियों की संख्या 237 हो गई है। कासगंज विधानसभा क्षेत्र से पहले मानपाल सिंह वर्मा को प्रत्याशी बनाया गया था, अब उनके स्थान पर इशरत उल्ला शेरवानी को टिकट दिया गया है। मैनपुरी के करहल विधानसभा से घोषित प्रत्याशी सोवरन सिंह यादव के स्थान मुख्यमंत्री ने अपने परिवार के सदस्य अभिषेक उर्फ अंशुल यादव को प्रत्याशी बनाया है। एटा से जोगेंद्र सिंह यादव और कासगंज से किरन यादव को प्रत्याशी बनाया गया है।
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सुरक्षा को लेकर बढ़ी चुनौती, अलर्ट
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-प्रमुख सचिव गृह और डीजीपी ने लिया जायजा
-एडीजी एलओ ने एसपी-एसएसपी को दी हिदायत
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लखनऊ : समाजवादी कुनबे के बवाल ने सुरक्षा को लेकर शासन की चुनौती बढ़ा दी है। शुक्रवार को प्रमुख सचिव गृह देबाशीष पंडा और डीजीपी जावीद अहमद ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पांच कालिदास मार्ग और सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के पांच विक्रमादित्य स्थित सरकारी आवास पर जाकर सुरक्षा का जायजा लिया। इधर, अपर पुलिस महानिदेशक कानून-व्यवस्था दलजीत सिंह चौधरी ने जिलों के एसपी-एसएसपी को अलर्ट कर दिया है।
समाजवादी कुनबे के बवाल के बाद दोनों गुटों के समर्थकों के उग्र तेवर को देखते हुए शासन ने सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त किए हैं। पंडा और जावीद अहमद ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आइजी जोन लखनऊ ए. सतीश गणेश, आइजी एटीएस असीम अरुण और आइजी एसटीएफ रामकुमार को आवश्यक निर्देश दिए हैं। एटीएस कमांडो से लेकर एसटीएफ के जवान भी पांच कालिदास मार्ग से लेकर पांच विक्रमादित्य तक मुस्तैद रहेंगे। असलहा लेकर घूमने वालों पर पुलिस की नजर रहेगी। भारी फोर्स के इंतजाम किए गये हैं। पीएसी, आरएएफ समेत तेज तर्रार पुलिस अफसरों को भी मुस्तैद किए जा रहे हैं। शुक्रवार की शाम को ही बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात कर दिया गया है। एडीजी एलओ ने डीएम और एसपी से अपेक्षा की है कि जिलों में शांति-व्यवस्था बनाये रखने के लिए वह बेहतर इंतजाम करें। अगर कहीं भी कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती उत्पन्न हो तो उसे तत्काल नियंत्रित करने की पहल करें।
अफवाहबाजों पर होगी सख्त कार्रवाई
इस बीच सोशल मीडिया पर फैल रही अफवाहों पर भी कंट्रोल के लिए कार्ययोजना बनी है। एसटीएफ के सर्विलांस और विशेष सेल को सक्रिय कर दिया गया है। अगर कहीं किसी ने अफवाह फैलाने की कोशिश की तो उसे चिन्हित कर कड़ी कार्रवाई होगी। इसके लिए सर्विलांस विशेषज्ञ दो अपर पुलिस अधीक्षकों को विशेष जिम्मेदारी दी गयी है।

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-अखिलेश मांगे माफी तो कर सकता हूं विचार : मुलायम
-अखिलेश बोले, समाजवादी पार्टी मेरी
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रामगोपाल द्वारा राष्ट्रीय प्रतिनिधि सम्मेलन बुलाया गया है। यह पार्टी संविधान के खिलाफ है। ऐसे तथाकथित सम्मेलन में कार्यकर्ता हिस्सा न लें
-शिवपाल यादव, प्रदेश अध्यक्ष सपा (ट्विटर पर)
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-रविवार 11 बजे पार्टी का विशेष अधिवेशन बुलाया गया है।
-रामगोपाल यादव
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लखनऊ : सब कुछ अभूतपूर्व और अप्रत्याशित। माफी न मांगी गई तो समझौते की गुंजायश बिल्कुल खत्म। शुक्रवार का दिन उत्तर प्रदेश की सियासत में इतिहास लिख गया जबकि, मुलायम सिंह यादव ने आंखों में आंसू और भरे गले से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को छह साल के लिए समाजवादी पार्टी से निकाल दिया। उनके साथ ही पिछले चार महीने से विवाद के केंद्र में रहे प्रो.राम गोपाल को भी छह साल के लिए निकाल दिया गया। शनिवार का दिन दोनों खेमों के लिए बेहद अहम होगा क्योंकि मुलायम और अखिलेश दोनों ने ही विधायकों और अपने-अपने प्रत्याशियों की बैठक बुलाई है। बैठक में मुलायम सिंह नए मुख्यमंत्री का नाम घोषित कर सकते हैं जबकि अखिलेश अपनी सरकार बचाने का हर जतन करेंगे। दूसरी ओर रामगोपाल ने एक जनवरी को विशेष अधिवेशन बुलाया है, जिसमें मुलायम के प्रति अविश्वास प्रस्ताव पास कराकर उन्हें हटाने का प्रयास होगा। रात को मिलने पहुंचे कुछ लोगों से अखिलेश ने कहा-समाजवादी पार्टी मेरी है।
इधर, निष्कासन की कार्रवाई होते ही आत्महत्या का प्रयास हुआ और धरना-प्रदर्शन भी शुरू हो गए।
 सपाई परिवार का झगड़ा अब ऐसे मोड़ पर है जहां से वापसी के रास्ते लगभग बंद हैं। शुक्रवार सुबह मुलायम सिंह और शिवपाल में कई बार चर्चा हुई और दोपहर होते-होते मुलायम सिंह यादव ने सपा अध्यक्ष की हैसियत से मुख्यमंत्री अखिलेश, प्रो.राम गोपाल को कारण बताओ नोटिस जारी किया, जिसमें उन पर क्रमश: पार्टी से इतर प्रत्याशियों घोषित करने व अनुशासनहीनता जैसे कई गंभीर इल्जाम थे। यह नोटिस जब जारी हुआ, उस समय अखिलेश व रामगोपाल पांच कालिदास मार्ग पर अपनी रणनीति बना रहे थे। कुछ देर बाद मुख्यमंत्री के घर से निकले रामगोपाल यादव ने कहा कि ऐसे नोटिस जारी होते रहते हैं। वह मीडिया के सवालों पर भी भड़क गए। कुछ देर बाद ही उनकी ओर से एक जनवरी 2017 को डॉ.राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट में समाजवादी पार्टी का विशेष अधिवेशन बुलाने का पत्र जारी किया गया। इसमें कहा गया था कि चुनावी समय में पार्टी की गतिविधियों को देखते हुए हजारों कार्यकर्ता ने उन्हें पत्र लिखकर विशेष अधिवेशन बुलाने की मांग की।
विशेष अधिवेशन का पत्र जारी होने की त्वरित प्रतिक्रिया हुई। मुलायम सिंह नाराज हो गए और शाम साढ़े छह बजे पत्रकारों को बुलाकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और रामगोपाल को निष्कासित करने का निर्णय सुनाया। कहा कि राम गोपाल पार्टी के साथ अखिलेश का भविष्य बर्बाद कर रहे हैं। यह बात अखिलेश को समझ में नहीं आ रही है। कहा कि पार्टी को बचाने के लिए वह कोई भी फैसला लेने से नहीं हिचकेंगे। कहा कि  शनिवार को विधायकों व पार्टी के घोषित प्रत्याशियों की बैठक बुलाई है, जिसमें आगे का फैसला लिया जाएगा।
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मुलायम बोले
-राष्ट्रीय प्रतिनिधि सम्मेलन बुलाने का अधिकार राष्ट्रीय अध्यक्ष या 40 फीसद प्रतिनिधियों को है
-कुछ लोगों से पत्र पर दस्तखत करा लिए होंगे मगर यह असंवैधानिक
-विधायकों, प्रतिनिधियों से अपील कि इस सम्मेलन में हिस्सा नहीं लें
-मैं खुद सम्मेलन बुला देता, मुझसे पूछ तो लिया होता, स्वत: फैसला मनमानी है, अनुशासनहीनता है
-देश में किसी पिता ने अपने बेटे को मुख्यमंत्री नहीं बनाया होगा, मैने तब बनाया जब सब विरोध कर रहे थे
-बात हद से निकल गई थी, कड़ी कार्रवाई जरूरी हो गई  थी, पार्टी बचाना ही है
-रामगोपाल ने पहले भी अनुशासनहीनता के ढेरों काम किये, पार्टी से निकाला तो दिल्ली आकर माफी मांगी
-अखिलेश का भविष्य बर्बाद कर रहे हैं रामगोपाल, मुझसे ज्यादा सगे नहीं हो सकते हैं उसके
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पांच, छह लोगों व 25-30 सीटों के प्रत्याशियों पर ही मतभेद है। सब ठीक होगा। पार्टी क्यों छोडूंगा या तोडूंगा मैं तो काम कर रहा हूं। जो काम नहीं कर रहे हैं, वे बाहर जाएं। जो गड़बड़ कर रहे हैं कि उन्हें बाहर निकाला जाएगा
-अखिलेश यादव, मुख्यमंत्री (पार्टी से निकाले जाने से पहले शुक्रवार को करीब तीन बजे नगराम रोड स्थित एक पत्रकार के फार्म हाउस पर)
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कोई पार्टी हमेशा उन लोगों को टिकट देती है, जो जीतने के योग्य होता है। मैं मुलायम सिंह यादव के साथ हूं
-बेनी प्रसाद वर्मा, राज्यसभा सदस्य
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16 साल के सफर में तीन बार सांसद
- अखिलेश यादव पर पहली बार चली अनुशासन की तलवार
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लखनऊ : महज 26 साल की उम्र में सांसद बनने वाले अखिलेश यादव पर पहली बार पार्टी में अनुशासन की तलवार चली है। वह पहली बार वर्ष 2000 में कन्नौज लोकसभा सीट से सपा उम्मीदवार के रूप में ही उपचुनाव जीते थे। इस दौरान खाद्य, नागरिक आपूर्ति और सार्वजनिक वितरण से संबंधित समिति के सदस्य भी रहे।
2004 में हुए आम चुनाव में वह दूसरी बार लोकसभा के लिए चुने गए। इस दौरान वह शहरी विकास समिति, विभिन्न विभागों के लिए कंप्यूटर के प्रावधान पर एक कमेटी, विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर समिति और पर्यावरण एवं वन संबंधी समिति के सदस्य रहे। सांसद के रूप में हैट्रिक लगाते हुए 2009 में हुए आम चुनाव में उन्होंने एक बार फिर जीत दर्ज की। इस बार वह पर्यावरण एवं वन संबंधी समिति, विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर एक समिति और 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर बनी जेपीसी के भी सदस्य रहे। उनके सियासी जीवन में मोड़ तब आया जब 2012 में उन्हें उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का नेता चुना गया। इसी साल प्रदेश विधानसभा चुनाव में पार्टी को जबरदस्त सफलता मिली और इसका श्रेय अखिलेश को गया। 15 मार्च, 2012 को अखिलेश ने सिर्फ 38 साल की उम्र में राज्य के 20वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। तीन मई, 2012 को उन्होंने कन्नौज लोकसभा सीट से इस्तीफा दे दिया। पांच मई, 2012 को वह उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य बने।
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परदे के पीछे के खिलाड़ी भी दे रहे हवा
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-अखिलेश समर्थकों के निशाने पर अमर सिंह और साधना गुप्ता
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लखनऊ : समाजवादी कुनबे में लगी आग को हवा देने के लिए कई प्रमुख लोग जिम्मेदार ठहराए गये हैं। जहां मुलायम और शिवपाल के लोग प्रोफेसर रामगोपाल पर ठीकरा फोड़ रहे हैं वहीं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के समर्थक अमर सिंह को लेकर खफा हैं। इन सबके बीच मुलायम सिंह की पत्नी साधना गुप्ता पर भी अंगुलियां उठ रही हैं। आग को हवा देने में उनकी भूमिका भी मानी जा रही है।
 परिवार में छिड़े सत्ता संग्राम में एक सामान्य घटनाक्रम पर गौर करना जरूरी है। मुलायम की लिस्ट के बाद बगावती हुए अखिलेश ने 235 उम्मीदवारों की जो सूची जारी की, उसमें लखनऊ कैंट से अपर्णा यादव का नाम नदारद था। अखिलेश के सौतेले भाई प्रतीक यादव की पत्नी और साधना की पुत्रवधू अपर्णा हाल के दो वर्षों में राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों में बहुत तेजी से उभरी हैं। उन्हें बहुत पहले ही उम्मीदवार घोषित किया गया था और वह सक्रिय भी खूब रहीं। अखिलेश की सूची में अपर्णा का नाम न होना निसंदेह साधना गुप्ता के लिए पीड़ादायक था। यद्यपि अखिलेश ने कैंट में किसी को उम्मीदवार घोषित नहीं किया, लेकिन पहली सूची में बहू का नाम न देखकर उनकी नाराजगी बढऩी स्वाभाविक था। इन दिनों सोशल मीडिया पर अखिलेश समर्थक उनकी मां के साथ की तस्वीरें लगातार वायरल कर भावुक अपील कर रहे हैं। पहले भी एमएलसी उदयवीर सिंह ने एक चि_ी जारी कर साधना गुप्ता पर आरोप लगाए थे और इस बार भी अखिलेश समर्थक मुलायम के एक्शन के पीछे उनका दिमाग मान रहे हैं। अखिलेश समर्थकों का एक बड़ा तबका साधना के साथ ही सपा महासचिव अमर सिंह को भी जिम्मेदार ठहरा रहा है। मंत्री अरविन्द सिंह गोप, पवन पांडेय समेत कई प्रमुख लोग अमर सिंह पर निशाना साधने लगे हैं। अमर सिंह भी अखिलेश से नाराज हैं और उन्हें जब भी मौका मिला तंज कसने से नहीं चूके। अमर और साधना के अलावा इस लड़ाई में मुलायम परिवार के और भी कई रिश्तेदार और संबंधी हैं जो संदेह पैदा करने और भड़काऊ भूमिका में सक्रिय हुए हैं।
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सपा की कलह से बर्बादी के मुहाने पर प्रदेश : आजम
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 - बोले-रिश्ते कलंकित होने पर एक दूसरे से उठ रहा है भरोसा
रामपुर : समाजवादी पार्टी में टिकट बंटवारे को लेकर चल रहे घमासान से कैबिनेट मंत्री आजम खां खफा हैं। उन्होंने कहा है कि सपा की कलह से प्रदेश बर्बादी के मुहाने पर पहुंच गया है। रिश्तों के बिगाड़ ने प्रदेश का मुकद्दर बिगाड़ दिया। मीडिया से बातचीत में कहा कि अब रिश्तों पर अंगुली उठ रही है। बेटा-बाप पर, चाचा-भतीजे पर और मामा-भांजे पर भरोसा नहीं करेंगे। अब जो हो रहा है, वह इतिहास में बुरे लफ्जों में लिखा जाएगा।
नगर विकास मंत्री आजम खां शुक्रवार को सपा कार्यालय पहुंचे तो तमाम कार्यकर्ता जमा हो गए। कई नेताओं ने लोगों को सपा में शामिल कराया। यहां भी सपा में मचे घमासान की चर्चा होने लगी। इस दौरान मंत्री ने कहा कि कार्यकर्ता मायूस न हों, संयम बरतें। उम्मीद है कि विवाद का हल निकलेगा। विवाद से पार्टी के बड़े नेता नहीं, आम कार्यकर्ता परेशान हैं। हम से ज्यादा बड़े नेताओं की जिम्मेदारी है कि विवाद का हल निकालें। सूबे के सबसे बड़े राज्य में राजनीति करने वाले इतने हल्के साबित होंगे, यह हम सबके लिए बड़े शर्म की बात है। कहा कि कुछ लोग पार्टी को बर्बाद करना चाहते हैं। कहा कि एक मछली ने पूरे तालाब को गंदा कर दिया। उनका निशाना अमर ङ्क्षसह की ओर था। बोले कि सपा की कलह से फासिस्ट ताकतों को मजबूती मिल रही है। समाजवादी लोग मायूस हैं और भाजपा जश्न मना रही है।
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दो दिन-आज और कल
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-आज मुलायम, कल अखिलेश ने बुलाए प्रतिनिधि सम्मेलन
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लखनऊ : रामगोपाल यादव और अखिलेश यादव को समाजवादी पार्टी से निकाले जाने के बाद अब अगले दो दिन शक्ति प्रदर्शन के होंगे। वैसे कहा जा रहा है कि विधानसभा चुनाव-2017 में  मुलायम सिंह यादव ही फिर समाजवादी पार्टी की चेहरा होंगे और दोबारा अपनी ताकत दिखायेंगे मगर इससे पहले 31 दिसंबर को मुलायम सिंह की बैठक और एक जनवरी को अखिलेश के प्रतिनिधि सम्मेलन की जनशक्ति से ही साफ हो जाएगा कि सपा समर्थकों का वाहक कौन होगा?
कभी अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने के लिए स्वयं कुर्सी से दूर रहने का फैसला लेने वाले मुलायम इतने कठोर होंगे कि बेटे को सपा से निकालने की निर्णय करेंगे, यह राजनीतिक विश्लेषकों तक को उम्मीद नहीं थी। परिवार के संग्र्राम में संधि और रामगोपाल की सपा में वापसी के बाद लग रहा था कि मुलायम स्थितियों को संभाल लेंगे, मगर हुआ उलटा। मुलायम के करीबी सूत्र कहते हैं कि अब वह इस चुनाव में भी खुद पार्टी का चेहरा बनने का फैसला कर सकते हैं। इसके पीछे का तर्क है कि मुलायम सिंह के मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित होने के बाद न सिर्फ पुराने समाजवादी सक्रिय होंगे, बल्कि तमाम ऐसे लोग भी मुलायम-शिवपाल खेमे में बने रहेंगे, जो शिवपाल या किसी अन्य को मुख्यमंत्री बनाए जाने की स्थिति में अखिलेश के साथ जा सकते थे।
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दो दिनों में फैसला
समाजवादी पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए नया साल तमाम नए संदेश लेकर सामने आएगा। 2016 के आखिरी दिन यानी, 31 दिसंबर को मुलायम सिंह यादव ने सभी प्रत्याशियों की बैठक बुलाई है, इसमें देखा जाएगा कि घोषित प्रत्याशियों में से कितने मुलायम सिंह के साथ हैं। इसके बाद एक जनवरी को अखिलेश समर्थकों ने राष्ट्रीय प्रतिनिधि सम्मेलन बुलाया है। दोनों दिनों में समर्थकों की भीड़ से तय होगा कि कितने लोग अखिलेश व कितने मुलायम के साथ हैं। यहीं से नए साल में अलग-अलग राहों पर चल कर दोनों खेमे विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटेंगे।
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लड़ाई अब पिता पुत्र में
अखिलेश बनाम शिवपाल से शुरू हुई यह लड़ाई अब बाप-बेटे के बीच संघर्ष में बदल गयी है। यही कारण है कि शिवपाल समर्थक भी मुलायम को ही मुख्यमंत्री बनाने की बात कहकर चुनाव मैदान में जाने को तैयार हैं। जनता के बीच अखिलेश की सकारात्मक छवि व अन्य दलों के साथ जोड़-तोड़ की संभावनाओं के चलते अखिलेश विरोधी खेमे को भी लगता है कि मुलायम ही उनकेखेमे के सर्वश्रेष्ठ दावेदार हो सकते हैं। ऐसे में चुनाव मैदान में अखिलेश बनाम मुलायम होने से पूरी लड़ाई बाप-बेटे के बीच सिमट जाएगी। दूसरे, मुलायम के साथ मुस्लिम भी एकजुट होकर सपा से जुड़ सकते हैं, यह तर्क भी रखा जा रहा है।
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बवाल की धुरी बने रामगोपाल
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-पहले चरण की रार में ही लगा था विलेन का ठप्पा
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लखनऊ : बढ़ते बवाल के बाद अंतत : समाजवादी परिवार में शुक्रवार को दीवार खड़ी हो गयी। प्रोफेसर रामगोपाल यादव इस बवाल की धुरी बनकर उभरे। पहले चरण की लड़ाई में सपा प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव ने उन पर विलेन होने का ठप्पा लगाया और इस बार मुलायम सिंह ने न केवल उन पर सपा को बर्बाद करने बल्कि अखिलेश का भविष्य चौपट करने का भी आरोप मढ़ दिया।
दूसरे चरण की लड़ाई छिडऩे के बाद भी प्रोफेसर राम गोपाल ने आग में घी डालने का काम किया। उन्होंने संतुलन बनाने की बजाय फर्रुखाबाद में समझौते की गुंजायश खत्म होने का बयान देकर माहौल गर्मा दिया। उन्होंने अखिलेश के प्रत्याशियों का समर्थन करने की बात कही। लखनऊ आते ही वह वीवीआइपी गेस्ट हाउस आए और फिर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से उनके आवास पर मिले। इस बीच सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने उनके खिलाफ अनुशासनहीनता की नोटिस जारी कर दी। जब रामगोपाल को इसकी जानकारी दी गयी तो वह बड़े तेवर में बोले कि ऐसी नोटिस मिलती रहती है। फिर वह सक्रिय हो गये और एक जनवरी को राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट में पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन बुला लिया। मुलायम सिंह को यह बात खल गयी। उनकी टिप्पणी थी कि राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाने का अधिकार अध्यक्ष का है, लेकिन उन्होंने बार-बार अनुशासनहीनता की है। मुलायम की नाराजगी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रामगोपाल के साथ ही उन्होंने अखिलेश को भी छह वर्ष के लिए पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया।
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पहले भी रामगोपाल ने भड़कायी आग
पिछली बार जब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को अध्यक्ष पद से हटाकर शिवपाल को यह जिम्मेदारी सौंपी गयी तब यह चि_ी प्रोफेसर रामगोपाल ने ही जारी की थी, लेकिन जब वह लखनऊ आए तो मुलायम के इस फैसले पर आपत्ति कर दी। उन्होंने मुलायम के खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की थी। रामगोपाल शुरू में ही विवाद हल करने की पहल करते तो नतीजा कुछ और हो सकता था। रामगोपाल ने बार-बार यही दोहराया कि अखिलेश यादव के बिना समाजवादी पार्टी की परिकल्पना नहीं की जा सकती है।
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सीबीआइ जांच की तलवार
घोटालों के आरोपी यादव सिंह के संबंधों को लेकर रामगोपाल आरोपों के घेरे में आए और शिवपाल सिंह यादव ने ही उन्हें कठघरे में खड़ा किया। शिवपाल ने रामगोपाल पर भाजपा से मिलने का आरोप तक लगा दिया और कहा कि उनका परिवार यादव सिंह घोटाले में शामिल है।
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  शिवपाल और अखिलेश में बढ़ाई दूरी
मुलायम जब अखिलेश को राजनीति में स्थापित करने में लगे थे तब उन्होंने अमर सिंह को यह जिम्मेदारी सौंपी थी। उन दिनों शिवपाल और रामगोपाल एक हुआ करते थे। वर्ष 2012 में जब अखिलेश ने सत्ता की कमान संभाली तो रामगोपाल ने शिवपाल से दूरी बनाकर अखिलेश को पकड़ लिया। सरकार में उनका दबदबा कायम हुआ और वह सब पर भारी दिखने लगे। कहते हैं कि शिवपाल और अखिलेश के बीच दूरी बढ़ाने में भी उन्होंने ही अहम भूमिका निभाई।
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पहले भी छह वर्ष के लिए बर्खास्त
पहले चरण की रार में सपा मुखिया मुलायम सिंह ने प्रोफेसर रामगोपाल को छह वर्ष के लिए निष्कासित किये गये थे, लेकिन रामगोपाल के गलती मान लेने के बाद उनकी वापसी हुई थी।
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प्रो. राम गोपाल :
राम गोपाल यादव
जन्म तिथि - 29 जून 1946
जन्म स्थान - सैफई, इटावा। 1969 से 1974 तक शिक्षक।
राजनीतिक सफर : 1988 में ब्लाक प्रमुख, 1989-92 अध्यक्ष, जिला परिषद इटावा। 1992 में राज्यसभा सदस्य। 1998 में दोबारा राज्यसभा सदस्य। 2004 में संभल से लोकसभा सदस्य। लोकसभा कार्यकाल समाप्त होने के बाद फिर लगातार राज्यसभा में।
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 राष्ट्रीय सम्मेलन असंवैधानिक : मुलायम
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-विधायकों व पार्र्टी नेताओं से सम्मेलन में शामिल न होने की अपील
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लखनऊ : समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने एक जनवरी को आहूत राष्ट्रीय प्रतिनिधि सम्मेलन को असंवैधानिक करार देते हुए विधायकों और पदाधिकारियों से सम्मेलन में शामिल नहीं होने की अपील की है।
पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को छह वर्ष के लिए पार्टी से निष्कासित करने का एलान करने के बाद मुलायम ने बताया कि रामगोपाल द्वारा बुलाया गया प्रतिनिधि सम्मेलन पार्टी संविधान की धारा-14 एवं धारा-32 के विपरीत है। सपा मुखिया ने पार्टी को बचाने की दुहाई देते हुए विधायकों व प्रतिनिधियों से सम्मेलन मेें न आने की अपील भी की। उनका कहना था कि पार्टी को बचाना और अनुशासन बनाए रखना प्राथमिकता है। कोई भी समाजवादी पार्टी को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेगा तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी।
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क्या कहती है धारा-14
राष्ट्रीय सम्मेलन
1-निम्नलिखित प्रतिनिधि होंगे-
क-राष्ट्रीय सम्मेलन में प्रत्येक राज्य से चयनित प्रतिनिधि।
ख-सभी संसद सदस्य, विधायक, पूर्व सांसद व जिला पंचायत अध्यक्ष।
ग-सभी प्रदेश अध्यक्ष, संबद्ध संगठनों के राज्य व राष्ट्रीय अध्यक्ष।
घ-राष्ट्रीय कार्यकारिणी के पदाधिकारी व सदस्य।
ड-सपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, यदि वह सक्रिय सदस्य हो।
च-इस धारा की उप धारा 1(क) से (ड) के प्रतिनिधियों की कुल संख्या के दस प्रतिशत प्रतिनिधि राष्ट्रीय सम्मेलन के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा मनोनीत किए जाएंगे।
2- राष्ट्रीय कार्यकारिणी के प्रस्ताव पर अथवा राष्ट्रीय सम्मेलन के 40 प्रतिशत सदस्यों की मांग पर राष्ट्रीय सम्मेलन का विशेष अधिवेशन राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा कभी भी बुलाया जा सकता है।
3-तीन वर्ष के भीतर कम से कम एक बार राष्ट्रीय कार्यकारिणी द्वारा निर्धारित तिथि एवं स्थान पर सम्मेलन की बैठक अवश्य होगी।
4-राष्ट्रीय सम्मेलन के प्रतिनिधियों के चयन को लेकर यदि कोई आपत्ति है तो वह राष्ट्रीय अध्यक्ष के समक्ष लिखित रूप में की जा सकती है। राष्ट्रीय अध्यक्ष का निर्णय अंतिम व बाध्यकारी होगा। राष्ट्रीय अध्यक्ष के निर्णय को किसी भी न्यायालय में चुनौती नही दी जा सकती है।
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धारा-32
राष्ट्रीय अध्यक्ष यदि इस बात से संतुष्ट हो तो कोई संबद्ध संगठन समाजवादी पार्टी के हितों के अनुकूल कार्य नहीं कर रहा है तो ऐसे संबद्ध संगठन को राष्ट्रीय अध्यक्ष कभी भी भंग करता है या उसके किसी भी पदाधिकारी को पद से हटा सकता है।
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सपा से मनोरंजन कर लिया जाना चाहिए
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-सोशल साइट्स पर छाया सपा का 'दंगल पार्ट-टूÓ
-ट्विटर पर मजे लिए जा रहे तो गंभीर टिप्पणियां भी
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लखनऊ : सपा की अंदरूनी कलह एक बार फिर सोशल साइट्स पर सुर्खियों में है। ट्विटर हैंडिल पर देखते ही देखते यह टॉप टेन में ट्रेंड करती नजर आई तो फेसबुक पर भी कमेंट की भरमार लग गई। इंस्टाग्र्राम और वाट्सएप आदि सोशल नेटवर्किंग पर भी सैकड़ों कमेंट भरे पड़े हैं। सबसे अधिक वायरल दंगल का गाना 'बाबू सेहत के लिए तू तो हानिकारक हैÓ हुआ है। इसके साथ ही दंगल के पोस्टर में मुलायम के साथ ही अखिलेश को दर्शाया गया है।
सपा की पहली कलह पर भी सोशल मीडिया में तरह-तरह की चुटकियों की भरमार थी और इस बार भी कम मजे नहीं लिए जा रहे। किसी ने सवाल उठाया है-'क्या समाजवादी पार्टी से मनोरंजन कर लिया जाना चाहिए।Ó वाट्सएप पर यह सवाल सबसे अधिक चला और अधिकांश का कहना था कि जरूर लिया जाना चाहिए। प्रमोद शुक्ल ने लिखा-'संभलने के बजाए लडख़ड़ाती जा रही साइकिल...करमगति टारे नहीं टरी। एसके यादव ने फेसबुक पर बेबाकी से लिखा-'दागियों पर मुलायम की या दागियों पर कठोर की...देखिए इस जंग में किसकी जीत होती है। नौकरशाह सूर्य प्रताप सिंह ने कहा कि चंबल की घाटी में रिश्तों का भले कोई मोल हो, लेकिन लखनऊ के दंगल में इसका कोई मोल नहीं। पूरे घटनाक्रम पर समाजसेवी अरुण अग्र्रवाल ने चुटकी ली-'सपा का नया एलान....एक विधानसभा क्षेत्र से दो उम्मीदवार उतारे जाएंगे।Ó
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कुछ नजीरें
-मुलायम को यूनेस्को से बेस्ट फादर अवार्ड मिलना चाहिए : गीतिका
-क्या मुलायम पूरी फेमिली को पालिटिक्स में लाने की कीमत चुका रहे हैं। क्या यह चाचा-भतीजा का लास्ट राउंड है : पीयूष गौतम
-मुलायम ने अखिलेश को रबर स्टांप सीएम बना दिया है : अमित मालवीय
-अखिलेश का लंबा कॅरियर है, मुलायम इतिहास हैं। अखिलेश को इलेक्शन अपने दम पर लडऩा चाहिए...चाहे जीतें या हारें : पराग भंडारी
-अखिलेश सही थे, अमर सिंह ने सपा को बर्बाद कर दिया : इनविन्सबिल
-मुलायम सिंह के लिए अपने बड़े परिवार में संतुलन बनाना मुश्किल हो रहा है। इसका एक हल है कि प्रदेश को चार हिस्सों में विभाजित कर दिया जाए : स्मिता मिश्र
-उत्तर प्रदेश में असली समाजवाद तो अब आया है। सबके पास टिकट है। किसी के पास मुलायम का, किसी के पास अखिलेश का और किसी के पास शिवपाल का : अरुण अग्र्रवाल
-हे शिवपाल तुम क्यों व्यर्थ शोक करते हो...तुम क्या लाए थे जो तुम्हें मिला नहीं। जो आज अखिलेश का है वो कल मुलायम का था और कल अर्जुन का होगा : शरद शिवहरे
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अखिलेश की सूची ही सही : रामगोपाल
-बोले-बात बहुत आगे बढ़ गई है, कान भरने वालों की हैसियत 10 वोट की नहीं
फर्रुखाबाद : विधानसभा चुनाव में प्रत्याशियों की सूची को लेकर सपा में चल रही रार के बीच पार्टी महासचिव प्रो. रामगोपाल यादव ने शुक्रवार को सुबह यहां पत्रकारों से बातचीत में कहा कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा घोषित प्रत्याशियों की सूची ही सही है। वही मेरे प्रत्याशी हैं। उन्हीं के समर्थन में चुनाव प्रचार करूंगा।
सदर विधायक विजय ङ्क्षसह के पिता की तेरहवीं संस्कार में रामगोपाल ने कहा कि तीन-चार दिन पहले उनकी मुलायम ङ्क्षसह यादव से भेंट हुई थी। नेताजी ने उन्हें एक जनवरी को आने के लिए कहा था, लेकिन इससे पहले ही उन्होंने प्रत्याशियों की सूची जारी कर दी। एक व्यक्ति के कहने पर नेताजी ने अखिलेश यादव को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया था। वह उस व्यक्ति का नाम नहीं लेना चाहते, उसे सब जानते हैं। उस व्यक्ति की हैसियत किसी विधानसभा क्षेत्र में 10 वोट पार्टी के पक्ष में डलवाने की नहीं है। जनता ने अखिलेश यादव को फिर मुख्यमंत्री बनाने का मन बना लिया है। अखिलेश विरोधी विधानसभा का मुंह नहीं देख पाएंगे।
अखिलेश के प्रत्याशी सपा के निशान पर लड़ेंगे या मुलायम के घोषित प्रत्याशी पर उन्होंने कहा कि यह फैसला निर्वाचन आयोग को करना है। उन्होंने दोहराया कि वह पहले ही मुंबई से पत्र लिखकर कह चुके हैं कि पार्टी में रहें अथवा न रहें, अखिलेश का समर्थन करेंगे। उन्होंने कहा कि विधानसभा चुनाव के बाद सपा नए स्वरूप में नजर आएगी और स्थितियां बदलेंगी और एक बार फिर से सब कुछ ठीक होगा।
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मुख्तार व रघुराज के लिए सपा ने छोड़ी सीट!
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-प्रमोद तिवारी की बेटी की सीट पर भी नहीं उतारा है प्रत्याशी
-मुलायम ने 'दोस्तों का दोस्तÓ होने की रवायत रखी बरकरार
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लखनऊ : समाजवादी परिवार के संग्राम, उससे निपटने केप्रयासों के बीच मुलायम सिंह यादव ने प्रत्याशियों की जो सूची जारी की है, उसमें रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया, मुख्तार अंसारी और कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी की बेटी आराधना की सीट पर प्रत्याशी न उतारकर 'दोस्तों का दोस्तÓ रहने की अपनी रवायत बरकरार रखी है।
समाजवादी पार्टी की ओर से चार टुकड़ों में जारी प्रत्याशियों की सूची में 395 उतारने की बात कही गई है। वास्तव में उनमें प्रत्याशियों की संख्या 392 है। दो प्रत्याशियों का नाम दो स्थानों पर है, यह त्रुटि हो सकती है। खास यह है कि मुलायम सिंह ने कौएद के सपा में विलय के समय हुए समझौते को निभाते हुए मुख्तार अंसारी के लिए मऊ सीट पर प्रत्याशी नहीं उतारा। अंसारी यहीं से विधायक हैं। रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया की परंपरागत सीट कुंडा से भी प्रत्याशी नहीं उतारा गया है। यूं रघुराज निर्दल लड़ते हैं, मगर मायावती सरकार में उन पर पोटा लगने पर मुलायम खुलकर रघुराज के साथ खड़े हो गये थे। तब से रघुराज भी मुलायम के साथ हैं। वर्ष 2012 में सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के एक्शन की आंच रघुराज की ओर बढ़ी, मुलायम ने उस पर पानी डालने का काम किया। रघुराज के करीबी व बाबागंज सुरक्षित से विधायक विनोद सरोज की सीट को भी छोड़ दिया गया है।सपा की सूची में कांग्र्रेस सांसद प्रमोद तिवारी की बेटी व रामपुर खास की विधायक आराधना मिश्र उर्फ मोना के विरुद्ध भी किसी को टिकट नहीं दिया गया है। तिवारी का सपा करीबी रिश्ता जगजाहिर है, प्रमोद को राज्यसभा भेजने में मुलायम ने ही अहम भूमिका निभाई थी। मंत्री विनोद सिंह उर्फ पंडित सिंह को उनकी सीट गोंडा के स्थान पर तरबगंज से प्रत्याशी बनाया गया है, मगर उनका उत्तराधिकारी तय नहीं किया गया। मथुरा की गोवर्धन व बल्देव सुरक्षित पर प्रत्याशी घोषित नहीं हैं। माना जा रहा है कि गोवर्धन से ठाकुर किशोर सिंह का टिकट तय है मगर बल्देव सुरक्षित से सपा के पास अभी जिताऊ प्रत्याशी नहीं है, वर्ष 2012 में यह सीट रालोद के हिस्से में गई और यहां से जीते पूरन प्रकाश भाजपा के करीब हो गए हैं।
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इन सीटों पर प्रत्याशी घोषित नहीं
1-गोवर्धन, बल्देव (सु) (मथुरा), आर्यनगर (कानपुर), रामपुर खास, बाबागंज (सु) और कुंडा (प्रतापगढ़), गोंडा, नौतनवा (महाराजगंज), सलेमपुर (सु), मऊ और बेलथरा रोड (सु)।







































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