Tuesday, 12 January 2016

by elections

लखनऊ. प्रदेश में तीन खाली विधानसभा सीटों पर उपचुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी ने गुरुवार को प्रत्‍याशी घोषि‍त कर दि‍ए हैं। इन सीटों पर पार्टी के पूर्व में वि‍धायक और मंत्री रह चुके सदस्‍यों के दि‍वंगत होने के बाद उनके परि‍वार के सदस्‍यों को मैदान में उतारा गया है।

पार्टी के राष्‍ट्रीय महासचि‍व प्रो. रामगोपाल यादव ने प्रत्‍याशियों के नामों की घोषणा की। मुजफ्फरनगर से गौरव स्‍वरूप पुत्र चि‍तरंजन स्‍वरूप, देवबंद से मीना सि‍ंह पत्‍नी राजेंद्र सिंह राणा और फैजाबाद की बीकापुर सीट से आनंदसेन यादव पुत्र मि‍त्रसेन यादव को टिक दिया गया है। गौरव स्‍वरूप पूर्व नगर वि‍कास राज्‍यमंत्री चि‍तरंजन स्‍वरूप के बेटे हैं। मीना सि‍ंह पूर्व ग्रामीण अभि‍यांत्रि‍की राज्‍यमंत्री राजेंद्र सि‍ंह राणा की पत्‍नी हैं।

देवबंद सीट से दूसरी बार विधायक थे राजेंद्र सिंह राणा
लंबे अरसे से कैंसर से जूझ रहे प्रदेश के ग्रामीण अभि‍यांत्रि‍की राज्‍यमंत्री राजेंद्र सिंह राणा का नि‍धन 27 अक्‍टूबर को हुआ था। राणा देवबंद, सहारनपुर से वि‍धायक थे। वह पहली बार 2002 और फिर दूसरी बार 2012 में वि‍धायक बने थे। नि‍धन के वक्‍त राणा यूपी तलवारबाजी संघ के अध्‍यक्ष और भारतीय तलवारबाजी संघ के महासचि‍व भी थे। उनके निधन के बाद से यह सीट खाली चल रही थी।

तीन बार विधायक रहे चि‍तरंजन स्‍वरूप
उत्तर प्रदेश के पूर्व संसदीय कार्य राज्यमंत्री चितरंजन स्वरूप का लंबी बीमारी के बाद 15 अगस्‍त 2015 को नि‍धन हो गया था। स्वरूप (69) मुजफ्फरनगर से तीन बार विधायक रह चुके हैं। पहली बार विधायक 1974 में कांग्रेस के टिकट पर चुने गए थे। फिर 2002 और 2012 में सपा के टिकट पर चुने गए। प्रदेश की मौजूदा सरकार में उनके पास वक्फ, शहरी विकास, जलापूर्ति, शहरी रोजगार और गरीबी उन्मूलन, संपूर्ण शहरी विकास और अल्पसंख्यक कल्याण एवं हज विभाग का प्रभार था।

पांच बार विधायक और तीन बार सांसद रहे मि‍त्रसेन यादव
समाजवादी पार्टी के बुजुर्ग विधायक मित्रसेन यादव का निधन 7 सि‍तंबर2015 को हुआ था। नि‍धन के वक्‍त वह 81 वर्ष के थे। वह फैजाबाद की बीकापुर सीट से सपा के विधायक थे। मित्रसेन वर्ष 1977 में पहली बार विधायक चुने गये ए। वह पांच बार विधायक और तीन बार सांसद भी रह चुके थे।

Monday, 11 January 2016

15 feb इनका कार्यकाल पूरा होगा


 15 feb 2016 इनका कार्यकाल पूरा हुआ।
अब्दुल हन्नान, अनिल कुमार अवाना,  अरविन्द त्रिपाठी उर्फ 'गुड्डू त्रिपाठीÓ, अन्नपूर्णा सिंह उर्फ 'पूनमÓ, अशोक सिंह, अशोक कटियार, आरएस कुशवाहा, कुंवर जयेश प्रसाद, केसर सिंह, कैलाश यादव, जितेन्द्र यादव, गणेश शंकर पांडेय, परमेश्वर लाल सैनी, मनीष जायसवाल, मनोज अग्रवाल, मनोज सिंह, मुकुल उपाध्याय, मो.इकबाल, राकेश सिंह, राजदेव सिंह, रविशंकर सिंह, लेखराज सिंह, श्याम नारायण उर्फ 'विनीत सिंहÓ, डा.स्वदेश उर्फ 'बीरू सुमनÓ, डा.संतराम निरंजन, संजीव द्विवेदी उर्फ 'रामू द्विवेदीÓ, सविता सिंह, चन्द्र प्रताप सिंह यादव उर्फ 'चन्दू भइयाÓ, सूरजभान करवरिया, प्रशान्त चौधरी, हुस्ना सिद्दीकी (सभी बसपा) , अरूणवीर सिंह, अक्षय प्रताप सिंह (दोनों सपा) दिनेश प्रताप सिंह (कांग्रेस)
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इंसर्ट
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अब तक के कार्यकारी सभापति
निजामुददीन-(छह मई 1958 से 19 जुलाई, 1958 तक),वीरेन्द्र स्वरूप-दो मार्च 1969 से 14 मार्च 1969 तक, देवेन्द्र प्रताप सिंह,-(छह मई, 1974 से 10 जून, 1974 तक), शिव प्रसाद गुप्ता-(छह मई, 1982 से दो मार्च 1983 तक), नित्यानन्द स्वामी- (सात जुलाई, 1992 से नौ मई, 1996 तक)
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बजट सत्र १२ फरवरी २०१६ को एेसी थी  तस्वीर
-समाजवादी पार्टी: 27
-बहुजन समाज पार्टी: 14
-भारतीय जनता पार्टी: सात
-कांग्रेस: एक
-रालोद: एक
शिक्षक दल (गैरराजनीतिक): पांच
निर्दल सदस्य: चार
नोट: यदि 29 जनवरी से शुरू होने वाले विधानमंडल के शीतकालीन सत्र से पहले रिक्त चल रही नामित कोटे की पांच सीटों पर नामांकन हो गया तब सपा के सदस्यों की संख्या-32 हो जाएगा।

Saturday, 12 December 2015

वे गली-गली धूल फांकते हैं, ताने-तिशने सुनते

२०.१२.२०१३
परवेज अहमद लखनऊ:...वे गली-गली धूल फांकते हैं, ताने-तिशने सुनते हैं। जोड़-तोड़ से जनसेवा तक में कसर नहीं छोड़ते, तब कहीं जाकर जनप्रतिनिधि (विधायक) का खिताब पाते हैं, फिर भी 'सरकार प्रतिनिधियोंÓ के जलवे-जलाल के आगे वह बिलकुल फीके रहते हैं।
प्रदेश की समाजवादी सरकार अब तक 84 लोगों को निगमों का चेयरमैन, सलाहकार और अध्यक्ष बनाकर कैबिनेट, राज्य और उपमंत्री का दर्जा दे चुकी है। जिनमें से कई दर्जाधारी दफ्तर और अधिकार पाने के लिए विभागीय मंत्री के साथ 'संघर्षÓ कर रहे हैं, मगर  लालबत्ती वाली कार, पिस्तौलधारी शैडो, कार्बाइनधारी गनर और आठ-आठ घण्टे की ड्यूटी में रायफल धारी सिपाही जरूर मुस्तैद हैं, ये जवान दर्जाधारी के मूल जिले की नागरिक पुलिस से लेकर दिये गये हैं।
सूत्रों का कहना है कि सूबे के प्रत्येक जिले में एक और कई जिलों में दो से तीन तक दर्जाधारी राज्यमंत्री हैं। एक विधायक का कहना है कि दर्जा प्राप्त लोगों की जनता के बीच कोई जवाबदेही होती नहीं है। अधिकारी भी उन्हें सत्ताशीर्ष का करीबी मानते हैं, लिहाजा वह उन्हें विधायकों से ऊपर का मानते हैं। ऐसे में हर समय जनता के बीच रहने वाले विधायकों को कई बार मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। अधिकारी भी विधायकों के कार्य के स्थान पर दर्जाधारी की सिफारिश को ज्यादा तवज्जो देते हैं।
सत्तारूढ़ दल के ही एक दूसरे विधायक का कहना है कि हाइकोर्ट ने लालबत्ती हटाने का आदेश देकर अच्छा कार्य किया है, इससे क्षेत्र में कम से कम विधायक की गरिमा तो बनी ही रहेंगी।
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विधायकों को सुविधा
-महंगाई और अन्य भत्तों को मिलाकर तकरबीन 65 हजार रुपए मासिक वेतन
-डेढ़ लाख रुपए के ट्रेन और वायुयान कूपन, इस धनराशि में क्षेत्रीय भत्ता भी शामिल है।
-आवास और मुफ्त बिजली की सुविधा
-टेलीफोन, मोबाइल खर्च के लिए छह हजार रुपए मासिक अधिकतम
-एक गनर की सुविधा, दूसरे गनर के लिए जवान के वेतन की 10 फीसद धनराशि जमा करनी होती है। (हालांकि सरकार ज्यादातर विधायकों को दूसरा गनर भी सरकारी खर्च पर भी उपलब्ध करा देती है)
-सचिवालय अथवा किसी भी सरकार भवन में कार्यालय की सुविधा नहीं
-कोई पीए, पीएस की सुविधा नहीं
-गाड़ी की भी सुविधा नहीं
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दर्जा प्राप्त को सुविधा
- राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त व्यक्ति को 40,000 उपमंत्री का दर्जा प्राप्त व्यक्ति को 35 हजार रुपए मासिक वेतन।
-दर्जा प्राप्त को लालबत्ती लगी सरकारी कार, ड्राइवर और उसमें खर्च होने वाला पेट्रोल राज्य सम्पत्ति विभाग की ओर से उपलब्ध कराया जाता है।
-दर्जा प्राप्त को सचिवालय के भवनों में से किसी एक में कार्यालय, निजी सचिव, वैयक्तिक सहायक और दो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी उपलब्ध होते हैं।
-राज्य सम्पत्ति की ओर से सरकारी आवास उपलब्ध कराया जाएगा, अगर राज्यमंत्री स्तर का व्यक्ति सरकारी आवास नहीं लेता है, उसे हर माह 10 हजार रुपए और उपमंत्री स्तर के व्यक्ति को आठ हजार मासिक आवास भत्ता।
-पदीय कर्तव्य के लिए यात्रा करने पर रेल गाड़ी के उच्चतम श्रेणी के कूपे अथवा वायुयान में एक सीट अनुमन्य है। जिसका भुगतान सरकारी कोष से होता है।
- यात्रा भत्ता, चिकित्सा प्रतिपूर्ति, टेलीफोन, मोबाइल और आवश्यकतानुसार पर्सनल स्टाफ और कुछ मानदेय भी संबंधित महकमे की ओर से किया जाता है।
- राज्यमंत्री स्तर के व्यक्ति को प्रतिमाह 10 हजार और उपमंत्री स्तर के व्यक्ति को प्रतिमाह साढ़े सात हजार रुपए प्रतिमाह जलपान भत्ता
-निरीक्षण भवनों में मुफ्त ठहरने की सुविधा
- पदीय कर्तव्य के लिए सूबे के अन्दर यात्रा पर राज्यमंत्री स्तर के महानुभाव को 600 रुपए प्रतिदिन और सूबे के बाहर की यात्रा पर 750 प्रतिदिन यात्रा भत्ता।
-जिन निगमों, संस्था, परिषद की आर्थिक स्थिति खराब है और वह दर्जा प्राप्त महानुभाव पर आने वाला खर्च वहन करने में सक्षम नहीं है, ऐसी संस्थाओं के प्रशासकीय विभाग वित्त विभाग की सहमति से अपने बजट में सुसंगत मदों में यथोचित धनराशि की व्यवस्था करें।
-एक शैडो, एक गनर और आठ घण्टे की ड्यूटी पर तीन पुलिस कर्मियों की सुरक्षा
-दर्जा प्राप्त के यात्रा वाले महानुभाव सत्तारूढ दल के रौब में एक थाने से दूसरे थाने तक पुलिस एस्कोर्ट तक चलवाते हैं हालांकि यह उन्हें अनुमन्य नहीं है। 
२१.१२.२०१३
लखनऊ: प्रदेश सरकार दंगा पीडि़तों को दोजून की रोटी पर तीन करोड़। टेंट, कपड़े, बर्तन व मिट्टी के तेल पर एक करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है। देश की मुख्तलिफ तंजीमें (संस्थाएं) करोड़ों की इमदाद भेज रही हैं। ऐसे में सवाल ये है कि तब बच्चों की मौतें क्यों हो रही हैं। कैम्प के लोग बेहाल क्यों हैं? सूत्रों का कहना है कि इमदाद में घोटालेबाजी हो रही है। पीडि़तों को जरूरत की खाद्य सामग्र्री नहीं मिल रही है।
27 अगस्त को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर, शामली और बागपत में सांप्रदायिक उपद्रव की शुरूआत और फिर  दंगा भड़कने के बाद बड़ी संख्या में लोगों ने गांव छोड़कर राहत शिविरों में शरण लेनी शुरू की थी। स्थानीय लोगों के अलावा सरकार ने भी पीडि़तों के लिए खाद्य सामग्र्री के इंतजाम का दावा शुरू किया। सूत्रों का कहना है कि कुछ दिनों के अन्दर ही सरकारी मदद से कई गुना अधिक इमदाद दिल्ली, यूपी के मुख्तलिफ हिस्सों, उत्तराखण्ड़, पश्चिम बंगाल और क्षेत्रीय लोगों ने कैम्पों में भेजनी शुरू कर दी थी। बावजूद इसके कैम्पों का हाल-बदहाल है।
ठंड बढऩे के साथ ही बच्चों की मौतों का सिलसिला शुरू हो गया है। गैरसरकारी आंकड़ों के मुताबिक अब तक 50 बच्चों की मौत हो चुकी है। स्थानीय लोगों और स्वास्थ्य अधिकारियों ने दबी जुबान स्वीकार किया कि कई बच्चे निमोनिया जैसी बीमारियों के शिकार हो गए थे। यानी उन्हें सर्दी से बचाने और खाने के लिए पर्याप्त भोजन नहीं मिल पा रहा है। सवाल ये है कि आखिर सरकारी और गैर सरकारी इमदाद जा कहां रही है? क्या इसमें भी घोटाला हो रहा है। सूत्रों पर भरोसा करें तो दंगा पीडि़तों के लिए जुटाई जा रही इमदाद की रकम में भी खासा घोटाला हो रहा है।
सरकार ने इमदाद का पूरा ब्योरा तैयार करने की अधिकारियों को हिदायत दी थी लेकिन कुछ खास की नाराजगी के डर  और कुछ कर्मचारियों की मिलीभगत के चलते वह ब्योरा भी तैयार नहीं हो रहा है। कैम्प चलाने वाले लोग यह तो स्वीकारते हैं कि राहत शिविरों को लिए इमदाद मिल रही है लेकिन कहां से क्या आया? इसका कोई ठोस ब्योरा किसी के पास उपलब्ध नहीं है। अलबत्ता यूपी के मुख्य सचिव जावेद उस्मानी ने शुक्रवार को शाम आनन-फानन में बुलायी गयी पत्रकार वार्ता में कहा था कि राहत शिविरों में सब कुछ ठीक है। मीडिया लोगों को गुमराह कर रहा है। हालांकि बच्चों की मौतों पर उन्होंने जुबान बंद रखी। उन्होने कहा कि मेरठ का कमिश्नर बच्चों की मौत के कारणों की जांच कर रहे हैं, रिपोर्ट आने पर ही कुछ कह पाएंगे।


दंगा शिविर
-58 हजार लोगों ने दंगा राहत शिविर में शरण लिया (मुजफ्फरनगर में 41, शामली में 17 शिविर)
सरकारी भोजन सामग्र्री: राहत शिविर में रहने वालों के लिए खाद्य सामग्र्री आटा, दाल, चावल, नमक, खाद्य तेल, आलू, चीनी, साबुन, दूध और मसाला पर तीन करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। सरकार स्वीकारती है कि जन सामान्य के सहयोग से इन वस्तुओं से बना बनाया खाना भी कैम्पों में लगातार उपलब्ध करायी जा चुकी है।
निवास व अन्य: सरकार का दावा है कि स्टील के खाने के बर्तन, ग्लास, तौलिया, महिलाओं, बच्चों के कपड़े, पाउडर दूध, माचिस, टेंट, गैस सिलेण्डर पर आदि पर एक करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। लकड़ी वन विभाग उपलब्ध करा रहा है।
यूपी, दिल्ली और उत्तराखण्ड की निजी संस्थाओं की मदद: आटा, दाल चावल, लकड़ी, कपड़े, टेन्ट, रोटियां, साबुन, तेल, कंबल, गद्दे, नकद राशि, स्टील की प्लेट, मिट्टी का तेल, बिस्किट के पैकेट, मिल्क पैकेट

तब बच्चों की मौत क्यों: इतनी बड़ी मात्रा में सरकारी और गैर सरकारी इमदाद के बावजूद आखिर कैम्पों में रह रहे बच्चों की असमय मौतें क्यों हो रही हैं। क्या दंगा पीडि़तों के लिए पहुंच रही सामग्र्री और धनराशि में भी घोटाला शुरू हो गया है।

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सरकारी आंकड़े
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-मेरठ, बागपत, सहारनपुर और शामली में सांप्रदायिक ंिहंसा में 65 व्यक्तियों की जान गयी और 85 लोग जख्मी हुए।
-मारे गए परिवार के आश्रितों को 10-10 लाख रुपए की आर्थिक सहायता पर 6 करोड़ 35 लाख रुपए खर्च हुए।
- मृतकों के आश्रितों में 58 व्यक्तियों को सरकारी नौकरी दी गयी।
-प्रधानमंत्री सहायता कोष से मारे गए व्यक्तियों के परिवार को दो-दो लाख रुपए की मदद
-मारे गए पत्रकार के परिवार को 10 लाख की मदद
-गंभीर घायलों को 50-50 हजार की आर्थिक मदद
-साधारण रुप से घायल 51 व्यक्तियों को 20-20 हजार
-ंिहसक घटनाओं के 74 घायलों को रानी लक्ष्मी बाई पेंशन
-चल, अचल संपत्तियों का 50 हजार नुकसान पर 50 हजार और एक लाख के नुकसान पर एक लाख की मदद
-इससे एक लाख से ऊपर के नुकसान पर वास्तिवक आगणन के आधार पर सहायता 

बदहवासी, बेचैनी और बेबसी

२४.१२.२०१३
लखनऊ:...बदहवासी, बेचैनी और बेबसी...समाजवादी पार्टी पूरे साल इन्ही हालात से मुकाबिल रही। उसके लिए तसल्लीबख्स कुछ रहा तो सिर्फ रैलियों में जुट गयी भीड़। जिससे वह मूल जनाधार (वोट बैंक) साथ होने की आस लगाकर  कठिन दिख रहे 'लक्ष्य-2014Ó को साधने में जुटी है।
यूं तो समाजवादी पार्टी वर्ष 2013 को याद नहीं रखना चाहेगी, क्योंकि इस साल उसके हिस्से में उपलब्धियों के नाम पर कुछ नहीं आया। अलबत्ता सत्तारूढ़ दल की खामियों के कई दाग उसके हिस्से में आ गए। पहले राज्य की सत्ता के चार केन्द्र होने के संदेश से गर्वेन्स प्रभावित हुआ फिर राज्य व कैबिनेट मंत्रियों के बीच अधिकारों की लड़ाई ने समाजवादी पार्टी का चैन छीना। पार्टी के लिए बेचैनी का सबब यहीं नहीं थमा।सीएमओ को अगवा करने, जानवर तस्करी के स्टिंग में राज्यमंत्री की भूमिका ने भी समाजवादी पार्टी को इस साल असहज किया। डिप्टीएसपी जिया उल हक की साजिश में मंत्री का नाम, नाच-गाना का शौक में विधायक की गिरफ्तारी, जमीनों पर कब्जे, पार्टी नेताओं की गुंडई,प्रतापगढ़, फैजाबाद, अंबेडकरनगर में सांप्रदायिक उपद्रव और फिर बागपत, शामली, मेरठ और मुजफ्फरनगर के दंगों ने पार्टी को इस साल की बार बदहवासी की स्थिति तक पहुंचाया। शायद इन्ही परिस्थितियों में पार्टी ने अपराधियों से दूरी बना लेने की छवि पर अतीक अहमद की अगवानी का 'दागÓ फिर से थोप लिया।
इससे उपजी सियासी परिस्थितियों को बारीकी से समझ रहे राजनीति के 'सुजानÓ मुलायम ंिसह यादव सावर्जनिक मच से गुबार निकाल चुके हैं, यह उनकी बेबसी है कि पार्टी का मूल जनाधार हाथ से बालू की तरह खिसक रहा है। दंगों से मुसलमान नाराज हैं। पूरी हिस्सेदारी नहीं मिलने से ब्राह्रïमण बिफरा हुआ है। जिन्हें समेटना चुनौती से कम नहीं है, इसीलिए वह यह कहने लगे हैं कि युवाओं को सत्ता तक पहुंचाया लेकिन क्या वे उन्हें सत्ता तक ले जाएंगे। यानी सपा के लिए अगर इस साल कुछ भी तसल्लीबख्श रहा तो सिर्फ इतना कि आजमगढ़, मैनपुरी, बरेली और बदायूं की उसकी रैलियों में खासी भीड़ जुटी। जिसके आधार पर ही वह मूल वोट बैंक साथ होने की आस में है।





दंगा राहत शिविर बंद कराने का प्रयास

२४,१२.२०१३

जागरण ब्यूरो, लखनऊ: चुनावी मुद्दा बनते जा रहे दंगा राहत शिविर बंद कराने का प्रयास शुरू हो गया है। पूरा खाका तैयार हो है। पीडि़तों अगर घर वापस लौटने को राजी नहीं हुए तो उन्हें दूसरे सुरक्षित ठिकाने पर भेजने की योजना है। वैकल्पिक स्थान की तलाश भी हो रही है।
दंगा राहत शिविरों के इंतजामों और कुछ शिविर संचालकों पर अमानत में खयानत, इमदाद में गड़बड़ी के आरोपों को लेकर सरकार को घेरने की सियासत तेज हो चली है। कांग्र्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के राहत शिविरों का दौरा दिया फिर मंगलवार को माकपा महासचिव प्रकाश करात ने मुख्यमंत्री से मिलकर राहत कैम्पों का हाल बयान किया। भाजपा पहले ही सरकार की कार्य प्रणाली पर हमलावर है, सरकार इस सबको चुनावी साजिश के रूप में देख रही है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी आरोप लगाया कि कुछ षणयंत्रकारी पीडि़तों को भड़काने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने पीडि़तों से गांव वापस लौटने की अपील की है। सूत्रों का कहना है कि इस बीच शासन ने मुजफ्फरनगर, शामली के जिला प्रशासन को मौजूदा राहत शिविरों को जल्द से जल्द बंद कराने  व पीडि़तों को वापस गांव भेजने का अभियान चलाने का संदेश दिया है। सूत्रों का कहना है कि प्रशासन से कहा गया है कि पीडि़त अगर वापस गांव लौटने को तैयार नहीं होते तो उन्हें प्रशासन की देख रेख में सुरक्षित व पक्के भवनों में ले जाकर ठहराया जाए, मगर राहत शिविर बंद कराये जाएं।
इसके पीछे चुनावी समय में विरोधी दलों खासकर कांग्र्रेस और भाजपा के सियासी वार को नाकाम करने की कोशिश माना जा रहा है, गौरतलब है कि सपा प्रमुख मुलायम ंिसह य ादव ने सोमवार को कहा था कि भाजपा व कांग्र्रेस षणयंत्र कर रहे हैं, जिन्हे रोकने के लिए सतर्क रहने की जरूरत है।


प्रशासन का दावा-सब कुछ ठीक:
मुजफ्फरनगर के ग्राम लोई में चल रहे राहत शिविर में सफाई. खाने-पीने, दवा-इलाज के साथ ठंड से बचाव के व्यापक इंतजाम हैं। हर ब्लाक में दो-दो सफाई कर्मी तैनात हैं। जिला पंचायत राज अधिकारी को नोडल अधिकारी बनाये गये हैं।  ये दावा सरकारी प्रवक्ता ने मुजफ्फरनगर के डीएम कौशलराज शर्मा के हवाले से दी। उन्होंने बताया कि लोई शिविर में स्वच्छ पेयजल के लिए 10 इण्डिया मार्क-।। हैंडपम्प लगाये गये हैं। जल निकासी के लिए सोकपिट बने हैं। गर्भवती महिलाओं, माता और 7 माह से तीन साल के बच्चों की विशेष देखभाल हो रही है। नियमित पोषाहार बंट रहा है। बच्चों कोपरिषदीय विद्यालयों, मान्यता प्राप्त विद्यालयों  प्रवेश दिलाकर शिक्षा के भी इंतजाम किये गये हैं।
शिविर वासियों को अब तक 132 क्विंटल आटा, 116 क्विंटल चावल, 28 क्विंटल दाल, 525 ली0 तेल, 38 क्विंटल आलू 24.50 क्विंटल चीनी, 5.6 क्विंटल नमक, 300 क्विंटल मसाला के साथ-साथ प्रत्येक परिवार को दैनिक उपयोग की वस्तुओं टूथ पेस्ट, दरी, तौलिया, बाल्टी, मग, थाली, गिलास, चादरें, साबुन भी वितरित किया गया है।   

तलाशी पर बखेड़ा

२७.१२.२०१३
1-आजम खां (अल्पसंख्यक कल्याण, नगर विकास, संसदीय कार्य मंत्री): आगरा में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी से गैरहाजिर, हावर्ड विश्वविद्यालय अमेरिका के दौरे के दौरान तलाशी पर बखेड़ा, विरोध स्वरूप मुख्यमंत्री को कार्यक्रम का बहिष्कार करना पड़ा। प्रमुख सचिव प्रवीर कुमार पर अल्पसंख्यक विरोधी होने का आरोप मढ़ा। साल खत्म होते-होते मंत्री के निजी स्टाफ ने उनके खिलाफ बगावत का बिगुल बजाया, उसके बाद से उनके कार्यालय में तैनात कर्मचारियों में से ज्यादातर गैर सचिवालय कर्मी हैं।
2-राम आसरे कुशवाहा: (रिमोट सेंसिंग के अध्यक्ष पद से बर्खास्त): वह पहले ऐसे दर्जा प्राप्त नेता हैं,  जिन्हें पार्टी लाइन से इतर बयानबाजी करने पर सरकारी पद से बर्खास्त किया गया। नोएडा की एक डील में कथित रूप से उनका नाम आने पर सरकार और पार्टी नेता असहज हुए।
3-कमाल फारूकी: (पूर्व राष्ट्रीय सचिव और दिल्ली की मीडिया में सपा चेहरा) आतंकवाद के आरोपी यासीन भटकल की गिरप्तारी पर उन्होंने कहा कि सिर्फ मुस्लिम होने के नाते उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। इस बयान ने विरोधी दलों ने सपा पर हमले का मौका दिया।  बेचैन सपा ने उन्हें पद और पार्टी से विदा कर दिया।
4-रघुराज प्रताप ंिसह उर्फ राजा भैया: (खाद्य एवं रसद मंत्री) हाइकोर्ट की निगरानी में चल रहे खाद्यान्न घोटाले की सीबीआइ जांच में उनकी भूमिका को लेकर सवाल। कुंडा के डिप्टी एसपी जिया उल हक की हत्या की साजिश में उनकी नामजदगी, मंत्री पद से इस्तीफा। सीबीआइ जांच में क्लीन चिट, फिर से मंत्री पद की शपथ, खाद्य एवं रसद विभाग को लेकर दबाव। आखिर महकमा मिला लेकिन मुख्य भवन में कार्यालय को लेकर अब भी रार जारी।
5-विनोद कुमार ंिसह उर्फ पंडित ंिसह: (माध्यमिक शिक्षा, राज्यमंत्री) गोंडा में एनआरएचएम की भर्ती को लेकर जिले के लोगों की दावेदारी को खारिज कर बाहर के लोगों को नियुक्त किये जाने से विरोध में गोंडा के सीएमओ को ही अगवा कर लिया। मुख्यमंत्री ने मंत्री पद से इस्तीफा लिया और कुछ दिनों बाद ही दोबारा मंत्री बना दिया।
7-नरेश अग्रवाल,( राज्यसभा सदस्य) भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी को चायवाला का विवादित तमगा दिया। महिला उत्पीडऩ की बढ़़ती शिकायतों के बीच कहा था अब कोई महिला पीएस नहीं रखना चाहता।
8-अतीक अहमद पूर्व सांसद,(सुल्तानपुर से सपा के प्रत्याशी) मुकदमों की लंबी फेहरिश्त वाले पूर्व सांसद ने समाजवादी पार्टी में शामिल होने और सुल्तानपुर से प्रत्याशी बनते ही दिखाया बाहुबल, असलहों की नुमाइंश और गाडिय़ों का जलवा। मुख्यमंत्री के आदेश पर हुई जांच में भी प्रशासन ने उन्हे दिया क्लीन चिट
9-अवधेश प्रसाद, (समाज कल्याण मंत्री): खांटी समाजवादी नेता के लैपटाप वितरण कार्यक्रम से लौटी लड़की के साथ दुराचार के बाद वह सवालों के घेरे में आए। देर शाम लैपटाप वितरण को लेकर पार्टी के अन्दर और बाहर से न सिर्फ उनकी घेरेबंदी हुई बल्कि समाजवादी पार्टी को भी किरकिरी का सामना करना पड़ा।
10-अंबिका चौधरी, (विकलांग कल्याण, पिछड़ा वर्ग मंत्री) विधानसभा चुनाव हारने के बाद सरकार ने उन्हे राजस्व जैसे अतिमहत्वपूर्ण महकमे का मंत्री बनाया लेकिन कुछ अरसे में ही पूर्वांचल के कई विवादों में घिरने और पार्टी के नेताओं से छत्तीस के आंकड़े के बाद सरकार ने उनका कद कम किये जाना चर्चा का विषय रहा। फिलहाल वह विकलांग कल्याण और पिछड़ा वर्ग महकमे के मंत्री हैं।
11-नरेन्द्र ंिसह भाटी: (मंत्री का दर्जा प्राप्त और नोएडा से सपा के प्रत्याशी) नोएडा में निर्माणाधीन मस्जिद की दीवार गिरवाने के आरोप में प्रशिक्षु आइएएस दुर्गा नागपाल के निलंबन को लेकर उनके विवादित बयान ने सरकार के सामने मुश्किल खड़ी की, उन्होंने सार्वजनिक सभा में यहां तक कह डाला कि मैंने चंद मिनटों में ही दुर्गा को हटवा दिया। बाद में उन पर आरोप लगा कि अवैध खनन के चलते दुर्गा को हटवाया।
12-मनोज पारस: ( स्टाम्प एवं न्यायालय शुल्क, पंजीयन शुल्क राज्यमंत्री): बलात्कार की पुरानी घटना के मामले में अदालत से समन जारी होने और फिर लोकायुक्त के यहां पहुंची शिकायत को लेकर सरकार के लिए परेशानी की वजह बने।
13-ब्राह्रïमाशंकर त्रिपाठी: (होमगाडर््स एवं प्रांतीय रक्षक दल मंत्री) समाजवादी सरकार के पहले मंत्री जिनके खिलाफ पहुंची जांच में लोकायुक्त ने विह्रिवत जांच शुरू की। होमगार्डो की ड्यूटी लगाने को लेकर विवादों में आए, जिसमें मुख्यमंत्री ने दखल दिया और होमगार्डो की ड्यूटी कम्प्यूटराइज करायी।