Thursday, 1 March 2018

मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला

मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला
1984 बैच के IPS कृष्ण  स्वरूप द्विवेदी, जिन्हें  Bihar का DGP(राज्य पुलिस प्रमुख) नियुक्त करने पर  खूब 'हाय-तौबा' है ! कहा जा रहा है-1998 में भागलपुर में सांप्रदायिक  उपद्रव के समय वह भागलपुर के SP थे। इस दंगे में बड़ी संख्या मुसलमान मारे गए। वहां की तत्कालीन सरकार ने जस्टिस प्रसाद कमीशन गठित किया। जिसकी रिपोर्ट में एसपी की ओर इशारा कर कहा- "His communal bias was fully demonstrated, not (only) by the manner of arresting the Muslimsbut also by not extending adequatehelp to protect them."(यह भी दावा है कि बाद के कमीशनों की रिपोर्ट इससे इतर थी)। अब द्विवेदी की बिहार के DGP पद पर ताजपोशी के बाद यह रिपोर्ट फिर सामने है। कहा जा रहा है कि 'इस नियुक्ति से मुसलमान भयभीत है।' विरोध पर सवाल उठाने की मंशा नहीं है। अलबत्ता हम उनके समर्थक हैं। मगर सवाल यह है कि भाजपा, उसके समर्थन से चलने वाली सरकार जब एेसे अधिकारी पोस्ट करती है, तब ही हंगामा क्यों ?? कथित सेकुलर सरकार में कमोवेश एेसे इल्जामों से घिरे अधिकारियों की अहम पदों पर पोस्टिंग होती है, तब खामोशी क्यों रहती है ??  क्या इस शोर के पीछे मानवीय संवेदना, बेगुनाहों के खून की हौलनाक मंजर की सिहरन नहीं, पसंदीदा विचारों वाले दल को सत्ता दिलाने की मंशा पर्दे के पीछे छिपी है। अब आप पूछना चाहेंगे कि सेकुलर सरकारों में कब-कहां  एेसी पोस्टिंग हुई ?? जवाब ढूंढने के लिए सुदूर पूर्वोत्तर की ओर निगाह दौड़ाने की जरूरत नहीं। नजीरें, उत्तर प्रदेश में ही है। 22 मई 1987 को हाशिमपुरा नरसंहार हुआ। तब मेरठ के एसएसपी रहे IPS (नाम इसलिए नहीं लिखना चाहता क्योंकि अधिकतर सेवा में नहीं हैं।

को कौन सा महत्वपूर्ण पद नहीं मिला ?? उस समय के प्रमुख, आईजीपी (ZONE),डीआइजी बाद में महत्वपूर्ण पदों पर रहे। मलियाना कांड के दौरान के डीएम, एसएसपी को क्या "सेकुलर सरकारों" ने महत्वपूर्ण ओहदे नहीं दिये ? अच्छा छोड़िए!! ये हादसा तीन दशक पुराना हो चला। मगर वर्ष-2013 में "कथित रूप से मुसलमानों" की हमदर्द सरकार थी। उस दौर में इंसानी दिल-दिमाग दहलाने वाला मुजफ्फरनगर दंगा हुआ। मरने वालों में हिन्दू-मुसलमान दोनों थे। एक दर्जन मुस्लिम युवक गायब हैं। उस समय मुजफ्फरनगर में तैनात रहे अधिकारियों में से अधिकतर (डीएम, एसएसपी भी) क्या एेसी तैनाती नहीं दी गई, जो समाज को प्रभावित करती है। तर्क हो सकता है कि "ये लोग तो कहीं दोषी नहीं थे।" मगर जहां 60 से ज्यादा बेगुनाह मार दिये जाएं, वह किसी अधिकारी को जिम्मेदारी से कैसे मुक्त किया जा सकता है। और अगर उस समय भाजपा की सरकार होती तो....??? और हां, जिस एक अधिकारी की शिथिलता से 60 से अधिक लोगों के मुजफ्फरनगर में असमय मारे जाने की बुनियाद पढ़ी। वह 2013 से अब तक शानदार कही जाने वाली तैनातियों पर हैं। कई अधिकारी तो इतने महत्वपूर्ण पद पर तैनात हुए/ हैं जिसका सपना IPS/IAS/PCS/PPS देखता है।
कहना यह है कि समाज व समरता की फिक्र करने वालों ने सेकुलर सरकारों में हुए इन अधिकारियों की तैनाती पर सवाल क्यों नहीं उठाया-मेरा सवाल सिर्फ इतना सा है। इसके पीछे क्या निहितार्थ नहीं छिपे होते ??

इन दिनों वायरल इतिहासकार राम पुनियानी के वीडियो व उनके तर्कों से इतिहास को देखें तो छत्रपति शिवाजी के मुख्य सेनापति हकीम खां थे। और अकबर के सेनापति-राजा मान सिंह। हल्दीघाटी की लड़ाई में इन्हीं दोनों सेनापतियों ने अपने राजाओं की कमान संभाली। परिणाम पर जाने की जरूरत नहीं है, मगर यह तय है कि "लड़ाई सत्ता" की थी। यह हिन्दू और इस्लाम धर्म की लड़ाई नहीं थी। एेसे ही अधिकारियों की तैनातियों के पीछे भी सत्ता हासिल करने का ही लक्ष्य होता है। बौद्धिक समाज सभी पक्षों की खामियों का सवाल उठाने के साथ समाधान सुझाए तब ही हालात बदलेंगे। याद करिए-एक बार पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई पर "राइटि्स्ट" होने का इल्जाम लगा तो उन्होने कहा- 'आइ विलीब इन डूइंग थिंग्स राइट।' (I believe in doing things right)  यह जिक्र इस आशय से कि खुद को 'राइटिस्ट' (जिसे वह राष्ट्रवादी कहते हैं)  कहने वाले इस शब्द को  मुरारजी भाई की परिभाषा में अपनाएं तो शायद बदलाव आए।

...और एजेंडा-2019
हां, यह जरूर हो सकता है कि भाजपा के समर्थन से बिहार में सरकार चल रहे नीतीश कुमार ने के.एस द्विवेदी (कृष्ण  स्वरूप द्विवेदी) को डीजीपी बनाकर 2019 में यूपी साधने की मंशा बना रखी हो। दरअसल, द्विवेदी यूपी के जालौन जिले के निवासी हैं। उनका यहां से सीधा जुड़ाव है। कानपुर में ढेरों में रिश्तेदारियां हैं। जाहिर है कि  बुंदेलखंड की राजनीति में इसका सीधा प्रभाव है। भाजपा को इसका अप्रत्यक्ष, प्रत्यक्ष रूप से लाभ मिल सकता है ??? यूपी में नीतीश का न संगठन है और न जनाधार। एेसे में उनके समर्थक यूपी के कुर्मी मतदाता भी भाजपा के पक्ष में गोलबंद सकते हैं। एेसे हो यह जरूरी भी नहीं है, लेकिन राजनीति तो संकेतों से होती है। यही नहीं याद कीजिए, जिस न्यायिक अधिकारी ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले में सजा सुनाई, वह भी जालौन के ही रहने वाले हैं। और न्यायिक अधिकारी की ओर से यूपी कुछ अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठाया गया तो योगी सरकार ने आनन-फानन में जांच करा दी थी।
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...विपक्ष का इल्जाम
राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनोज झा कहते हैं -"केएस द्विवेदी का डीजीपी नियुक्त होना अपने आप में इस बात की दोबारा पुष्टि करता है कि सरकार के नीतिगत और प्रशासनिक निर्णयों में नीतीश कुमार या जदयू की भूमिका नहीं रही।" "उन्हें वह करना पड़ रहा है जो संघ मुख्यालय की इच्छा होती है। तत्कालीन एसपी के रूप में 1989 के बर्बर भागलपुर दंगों के दौरान द्विवेदी की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। उस समय की मीडिया रिपोर्ट्स देखें तो स्पष्ट होता है तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी को उन्हें वहां से हटाने का निर्णय लेना पड़ा था।" दक्षिणपंथी विचारधारा से उनकी निकटता जाहिर है। इससे हाशिए के लोगों और अल्पसंख्यक समाज में डर और ख़ौफ़ की भावना जन्म लेगी ।"
अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आयेगा कोई जायेगा 
तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया, उसे भूलने की दुआ करो 


Tuesday, 27 February 2018

जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां रूई की तरह उड़ जायेंगें

...जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां  रूई की तरह उड़ जायेंगें

कहते हैं-'सरकार के हाथ बहुत लम्बे, कान बहुत बड़े होते हैं।' यह सच है ? तब ये बात उस तक कैसे नहीं पहुंच रही कि जो तबका 2014 फिर 2017 में सुबह से शाम तक गांव-गलियारे। खेत-खलिहान। पंचायत घर। चाय-पान की दुकान। यहां तक कि अपने घरों के अंदर सरकार वाले दल (BJP) का पैरोकार था। वही कुछ महीनों के अंदर बेचैन है। बेचैनी भी सामान्य नहीं, समर्थक दल के प्रति उमड़ी भावनाओं को कुचल डालने की हद तक है !! यह स्थिति चंद नौकरशाहों के चलते बन रही है।


बात औरैया की घटना से। गांव में प्रदर्शन हो रहा था, एक पत्रकार मौके पर पहुंचा। गांव के ही रहने वाले थे, ग्रामीणों की मनुहार पर पुलिस को फोन कर दिया। चेताया दिया कि " न्याय करो वरनो दिक्कत होगी।" पत्रकारों की यह सामान्य भाषा है। मगर पुलिस ने उन्हीं को मुजरिमा बना दिया। मानिंद लोगों में शुमार प्रेस क्लब अध्यक्ष सुरेश मिश्र ने नाराजगी जाहिर की तो एक शेरेपुश्त से उनके विरुद्ध डकैती का मुकदमा लिखा दिया। हंगामा होना था, हुआ। ढेरों लोग IG कानपुर की ड्योढ़ी पहुंचे, जो गए थे उनके "दिल में सरकार बसती" थी। IG ने दूसरे जिले के ईमानदार अधिकारी को जांच सौंपी। आईओ मौके पर गया-हर पक्ष खंगाला। लिखा-"एफआईआर झूठी है।" अब जिले में डाल-डाल, पांत-पांत का खेल चल रहा है। 

बात छिबरामऊ कीः
...बात छिसोमवार को यहां के व्यक्ति ने एक भूखंड की खुदाई शुरू की, इसमें मंदिर के गुंबद जैसा अवशेष नजर आया। भीड़ जुटी। विरोध हंगामे में तब्दील होने लगा। पत्रकार कोतवाली पहुंचे...माहौल संभालने के उपाय पूछे तो पुलिस अपने पर उतर आई। पुलिस जब अपने पर उतरती है तो "लत्ते (सड़ा हुआ कपड़ा) को सांप" बना देती है। उसने वही किया भी। हुक्म जारी हो गया कि ये पत्रकार कोतवाली फटक न पाएं। ये पत्रकार सरकार से भाव विह्वल रहे हैं।
...अब लखीमपुर। 
जहां दुघर्टना के बाद पुलिस की कारगुजारी बताने पर कुछ एेसा हुआ-जिसे लिखना उचित नहीं। सहारनपुर, सीतापुर, बांदा, बाराबंकी, उन्नाव समेत कई जिलों के ढेरों किस्से हैं। 
....कहने का आशय यह है कि गांव-गलियारे के पत्रकारों को सिर्फ "सूचना प्रेषक" न समझें। जब माननीय सांसद, विधायक, मंत्री, कलेक्टर, एसपी तक पीड़ित नहीं पहुंच पाता तब वह उसी ग्रामीण पत्रकार के पास जाता है। वो यथासामर्थ फोन करता है। उनकी बात लिखता है। जाहिर, धीरे-धीरे उसका अपना जनाधार बनता है, जो जाति, धर्म, संप्रदाय से ऊपर होता है।... और हां, इतिहास गवाह है कि देश-दुनिया में हाहाकार मचाने वाली खबरों में से 90 फीसद ग्रामीण पत्रकारों ने ही ब्रेक की हैं। एेसे जनाधार वाले पत्रकारों के दिल में 2014 से उमड़ी भावनाएं कुचल डालने की मंशा परवान चढ़ गई तो "साइनिंग यूपी", "वाइब्रेंट यूपी", "उत्तम यूपी" " विकास की ओर अग्रसर यूपी" के नारे सिर्फ लखनऊ की सुर्खियां बनकर रह जाएंगे... !!!! 
सरकार आपके हाथ लंबे हैं, कान बड़े हैं तो गांव-गलियारों की आबोहवा का आकलन कर लें। हां, मेरी बात पर भरोसा न हो तो यूपी में एक "घुमन्तू बाबा" हैं। उनको बुलाकर सच्चाई जान लें। यह बता दूं ये घुमन्तू बाबा 56-58 की उम्र में भी रोडवेज की खटारा बसों से घूम-घूमकर जनता की भावनाएं/ नब्ज परख रहे हैं। कभी-कभार लिख भी देते हैं। ये बाबा सूबे और केन्द्र वाली सरकार के दल को 25 सालों से जान समझ रहे हैं। सुझाव न मानिए तो अपनी इंटेलीजेंस की लंबी-चौड़ी फौज से सच पता कराइए। सच कहता हूं "घुमन्तू बाबा" राजनीतिक झूठ नहीं बोलते हैं।.....


Saturday, 24 February 2018

यूपी से दसवां सदस्य कौन !!!

यूपी से दसवां सदस्य कौन !!! 
UP से दसवां राज्यसभा सदस्य कौन होगा ? खांटी राजनीतिज्ञ या पूंजीपति ! ये जिज्ञासा विधानसभा के सदस्यों की संख्या के चलते हैं। 403 (निर्वाचित) सदस्यों वाले सदन में भाजपा के सदस्यों की संख्या 311 है। 13 घोषित समर्थक और  तीन से 5 दूसरे विधायक भी भाजपा के साथ हैं। एक व्यक्ति को राज्यसभा का सदस्य बनाने को तकरीबन 37 वोटों की जरूरत होगी। इस लिहाज से भाजपा जिन आठ लोगों को टिकट देगी, उनकी जीत तय है। सपा के पास 47 सदस्य हैं यानी वह जिस एक व्यक्ति को टिकट देगी, उसकी जीत तय है। यानी दस में से नौ सीट का परिणाम तय है। अब बची एक सीट जिसके लिए किसी एक विपक्षी दल के पास पर्याप्त वोट नहीं है। एक सदस्य को निर्वाचित कराने के बाद सपा के पास 10 वोट बचेंगे। कांग्रेस के पास 07 वोट हैं। बसपा के पास 19 सदस्य हैं। यानी ये दल अपने बूते दसवें सदस्य को जिता नहीं सकते। सपा, बसपा और कांग्रेस का गठबंधन दसवें सदस्य को राज्यसभा भेज सकता है। तीनों दल एक जुट होंगे ?? यह यक्ष प्रश्न है, जिसका उत्तर 12 मार्च को ही मिलेगा। अगर तीनों का गठजोड़ बना तो प्रभाव "2019" के चुनाव पर नजर आएगा। अगर गठबंधन नहीं बना। दलों ने अपने विधायकों को "आत्मा की आवाज" पर वोट डालने का संकेत दे दिया। तब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भाजपा 9वां प्रत्याशी मैदान में उतारती है।अथवा किसी पूंजीपति-खांटी राजनीतिज्ञ को भाग्या आजमाने देने के लिए मैदान खुला छोड़ देती है।....राजनीति में हमेशा कयास, गोटें बिछाने का दांव चला जाता और संभावना, आशंका के आधार पर लेखन होता है। बावजूद इसके राज्यसभा के इस चुनाव में  दसवां सदस्य कौतूहल का विषय होगा।
संभावित फार्मूला
-भाजपा सीधे नौ सदस्यों

का नामांकन कराए और विपक्षी फूट का लाभ उठाकर सभी को जिता ले। क्योंकि अगर द्वितीय वरीयता के मतों की गिनती की नौबत आई तो भाजपा के दसवें सदस्यो को 325 से अधिक वोट सीधे मिलेंगे।
-विपक्षी दल आपसी सहमित से दसवें सदस्य को मैदान में उतार दे और भाजपा नैतिकता के आधार यह मानकर की सदस्यों की संख्या के आधार पर दो सीटें विपक्ष को जाती हैं, मतदान की नौबत ही न आने दे।
-विपक्षी दल खासकर बसपा (जिसके सदस्यों की संख्या 19 है) कोई हैवीवेट प्रत्याशी उतारे और बाकी के दल भविष्य की संभावनाओं के मद्देनजर उसे समर्थन कर दे।
-सपा अपना दूसरा प्रत्याशी उतारे और बसपा अपने विधायकों को अंर्तात्मा की आवाज पर वोट डालने के लिए आजाद कर दे।
-कांग्रेस अपना एक प्रत्याशी मैदान में उतारे और यूपी के "लड़कों की दोस्ती वाला" फार्मूला फिर अमल में आता दिखे और बसपा मौन रह जाए।
-या फिर तीनों दल किसी बड़े औद्योगिक घराने को प्रत्याशी उतारने दे और भविष्य की संभावनाएं उसमें टटोलने का फैसला करे। (जैसा हरियाणा में भाजपा कर चुकी है।)
राज्यसभा चुनाव का कार्यक्रम
-नाम निर्देशन की अधिसूचना की तिथि : 05 मार्च 
-नाम दाखिल करने की अंतिम तिथि : 12 मार्च 
-नामांकन की जांच : 13 मार्च 2018
-नाम वापसी : 15 मार्च 
-मतदानः 23 मार्च (सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे)
-मतगणनाः 23 मार्च (शाम पांच बजे से परिणाम तक)
रिक्त सीटेंः दस
एक सीट के लिए आवश्यक वोटों की संख्या-37.5
मौजूदा समय में दलीय संख्या
0-भाजपा-311सपा- 47 बसपा- 19 अपना दल (सोनेलाल)-09 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस-07 सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी-04 राष्ट्रीय लोकदल-एक निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल-एकनिर्दलः तीन (अमन मणि त्रिपाठी, रघुराज प्रताप सिंह, विनोद सरोज)नामितः एक (डॉ.डेनजिल जे गोडिन) एक सीट रिक्त है।
भाजपा गठबंधन के सदस्य
- भाजपा (311) + अपना दल-09 + सुलेहदेव भारतीय समाज पार्टी-04 = 324
-राष्ट्रपति चुनाव के इतिहास पर नजर डालें- निर्दल (03) + सपा के 03 सदस्यों ने भाजपा प्रत्याशी को वोट दिया।
- इनमें से एक सपा सदस्य ने निजी संबंधों की दुहाई देकर, दो ने क्रास वोटिंग की।
-यदि राज्यसभा चुनाव में पुनरावृत्ति हुई तो भाजपा गठबंधन के सदस्यों की संख्या-330 हो जाएगी।
-कुछ अरसे से निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल के सदस्य की भाजपा से नजदीकी दिख रही है। 
-UP कोटे की राज्यसभा में सीटों की संख्या-31 (मायावती के इस्तीफे के बाद से एक रिक्त)
राज्यसभा में UP की स्थिति  
SP:18 (किरनमय नंदा, नरेश अग्रवाल, जावेद खां, तजीन फातिमा, आलोक तिवारी, सुरेन्द्र नागर, विशम्भर निषाद, जया बच्चन, चन्द्रपाल सिंह, दर्शन सिंह, रामगोपाल यादव, मुनव्वर सलीम, सुखराम चौधरी, बेनी वर्मा, रवि प्रकाश वर्मा, नीरज शेखर, संजय सेठ, रेवती रमण सिंह)-अमर सिंह सपा के टिकट पर राज्यसभा गए ,  सपा ने उन्हें  निकाल दिया। जिस पर उन्हें राज्यसभा में  निर्दल  की मान्यता है।
-BJP:03(विनय कटियार, हरदीप सिंह और शिवप्रताप)
-congress:03 (पीएल पुनिया, कपिल सिब्बल, प्रमोद तिवारी)
-BSP:05(वीर सिंह, सतीश मिश्र, राजाराज, मुनकाद अली, अशोक सिद्धार्थ)   
इनका कार्यकाल हो रहा पूरा
-नरेश अग्रवाल , दर्शन सिंह यादव, नरेश चन्द्र अग्रवाल, जया बच्चन, चौधरी मुनव्वर सलीम और आलोक तिवारी: (SP), -विनय कटियार ; (BJP)-प्रमोद तिवारी: (CONGRESS)



Friday, 23 February 2018

यही वह शहर जो अब मेरी जुबान देखता है।"






रेल मंत्री पीयूष गोयल लखनऊ में थे। कहते हैं- यूपी के विकास के लिए उन्होंने धन का पिटारा खोल दिया !!! शुक्रिया। उनका भी शुक्रिया जिन्होंने पिटारा खुलता महसूस कराया। कहना यह है कि ' पिटारा' खोले बिना UP में विकास की रेल सरपट दौड़ सकती है। भगवान श्रीराम के प्रति आस्था और परवान चढ़ सकती है। महर्षि बाल्मीकि का दर्शन मानने वाले भी भाजपा सरकार के मुरीद हो सकते हैं।

 पूछिए कौन सी छड़ी है?? जवाब- "मानिकपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन।" है। इस स्टेशन परिसर में 5 हजार कर्मचारियों के आवास खाली हैं। डीजल लोको शेड का शानदार स्ट्रैक्चर वीरान है। शंटिंग का सिस्टम है। आइआरएस (इंडियन रेलवे सर्विस) अधिकारियों के भव्य बंगले खाली हैं। रेलवे अस्पताल भी है। रेल मंत्री का शैलून यार्ड भी है। रेलवे के पार्क हैं। सैकड़ों एकड़ जमीन है। यहां से इलाहाबाद की दूरी सिर्फ 80 किमी है। सतना 65 किमी। हर 20 मिनट पर इस स्टेशन से एक ट्रेन गुजरती है, जो दोनों शहरों को जोड़ती है। कर्वी (जिला मुख्यालय) 20 किमी है। श्रीराम ने जिन स्थलों पर 14 साल तपस्या, संघर्ष में गुजारे वह पूरा क्षेत्र यहां से 15 से 25 किमी में सिमट जाता है। महान तुलसीदास ने जिस स्थान पर रामायण लिखी, वह 38 किमी है। महर्षि बाल्मीकि आश्रम 28 किमी पर है। सड़कें हैं।....बस खाली स्ट्रक्चरों को आबाद कराना था। आस्था-विकास की रेल सरपट दौड़ने लगेगी। बीमारू बुंदेलखंड का ठोस इलाज शुरू हो जाएगा। 

भाजपा का राजनैतिक एजेंडा भी उड़ान भरने लगेगा। हां, पिटारा खोलने की जरूरत नहीं।...भगवान श्रीराम के भक्तों (आशय प्रभु के विचारों के प्रति आस्था रखने वालों से है।) से अाग्रह है- राम राज्य का ख्वाब दिखाने वाली भाजपा सरकार का इस ओर ध्यान खींचिए प्लीज !!!!!! सियासी मुश्किल भी नहीं है, बुंदलेखंड की 19 में से 19 विधानसभा सीटों से भाजपा के विधायक हैं। झांसी-ललितपुर, जालौन, हमीरपुर, बांदा, सतना, रीवां, इलाहाबाद, फतेहपुर संसदीय सीट पर भाजपा के सांसद हैं। आखिर में थोड़ा तल्ख शब्द-फतेहपुर को छोड़ दें तो इन सभी सीटों पर अल्पसंख्यकों की आबादी भी दाल में नमक जैसी है। अब विकास नहीं तो फिर कब ???
और यह सब इसलिए कि...............
"यही वह शहर जो मेरे लबों से बोलता था.
यही वह शहर जो अब मेरी जुबान देखता है।"

Monday, 19 February 2018

आंकड़ों के बोल, इतिहास की चाल पर फूलपुर, गोरखपुर पर नजर

फूलपुर। गोरखपुर। संसदीय उपचुनाव-11 मार्च को वोट पड़ेंगे। योद्धा मैदान में हैं। कुछ लोगों के जेहन में परिणाम को लेकर जिज्ञासा होगी ?? मगर इस मुद्दे पर जिज्ञासा का स्थान "न..न..न" के बराबर है। हां, यह उत्सुकता जरूर हो  सकती है कि अनुसूचित जाति (दलित) के वोटरों का रुख क्या होगा ?? दोनों क्षेत्र में इस वर्ग के वोटरों की तादाद 25 फीसद के ऊपर है। जिनका कथित दावेदार अखाड़े में नहीं है।...अन्य पिछड़ा, पिछड़ा, सवर्ण कब किसके साथ रहा-यह साफ है। रही बात माइनटरी की तो 2014-लोकसभा के बाद का चुनाव इतिहास गवाह है कि UP में इस वर्ग की राजनीतिक हैसियत बची नहीं है !!! इसीलिए भविष्य के चुनावों में "बाहें तो फैलाईं होती", "मुस्लिम मतदाताओं पर नजर"। "मुस्लिम वोटर एकजुट"। " मुसलमानों का रुख तय करेगा हार-जीत "। " मुसलमानों की चुप्पी से राजनीतिक दलों में बेचैनी " जैसी हेडिंग वाली खबरें अब शायद ही सुर्खियां बने। कहीं-कभी बनीं तो उसके खास सियासी निहितार्थ होंगे। एेसे में उपचुनावों के परिणाम पर मगजमारी की ज्यादा गुंजाइश तो नहीं दिखती। समीकरण भी एेसे नहीं जिससे अजूबा हो जाए।  हां, कई राजनीतिक टीकाकारों की आंखें नम्बर-2 पर जरूर रहेंगी।
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जातीय समीकरण देखिए-फूलपुर

पटेल 18%, एससी 21%, मुस्लिम 15%, ब्राह्मण 9%, कायस्थ 6%, वैश्य 7%, यादव 6%, ठाकुर 4%, अन्य पिछड़ा 11% और अन्य 4% हैं।

विधानसभा सीटें और 2014 के परिणाम                            2017 विधानसभा का परिणाम
सीट                नम्बर-1                   नम्बर-2                   नम्बर-1                नम्बर-2
1-फाफामऊः  BJP: 92918 ///  BSP-42421              BJP-83239///     57254-SP
2-सोरांवः        BJP: 98311///  SP-45934                 BJP- 77814///   60079-BSP
3-फूलपुर:       BJP: 103681///  SP-54026               BJP- 93912///    67299 SP
4-इलाहाबाद पश्चिम-BJP: 99710///  SP-36979          BJP-85518///    60182 SP
5-इलाहाबाद उत्तर: BJP: 108391/// INC-20531        BJP-89191///   54166  INC
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लोकसभा में हार-जीत का अतरः 308308 (केशव मौर्य जीते, धर्मराज पटेल-2 रहे) 2017 विधानसभा में सभी सीटें भाजपा जीती।
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साफ है कि कुर्मी मतदाताओं का अधिकतर वोट भाजपा के साथ गया था। वरना फूलपुर संसदीय क्षेत्र की फूलपुर विधानसभा जहां कुर्मी (पटेल) मतदाता सबसे अधिक वहां सपा का पटेल प्रत्याशी भाजपा के मौर्य प्रत्याशी से 54026 मतों से पीछे नहीं होता। इसी तरह इलाहाबाद उत्तर जहां कायस्थ मतदाताओं की संख्या खासी अधिक है वहां भाजपा प्रत्याशी को 108391 वोट मिले थे जबकि इस विधानसभा क्षेत्र में दूसरे नम्बर रहे कांग्रेस के मोहम्मद कैफ को सिर्फ 20531 वोट मिले थे। सपा व बसपा के प्रत्याशी तीसरे चौथे नम्बर पर रहा।

नोटः इस बार तो भाजपा का प्रत्याशी भी पटेल जाति का ही है।
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 जातीय समीकरण देखिएः गोरखपुर

निषाद-15%, ब्राह्मण-9%,मुस्लिम-10 %,यादव- 9%, कायस्थ-4%, एससी/एसटी/ओबीसी-19% हैं। (यह आंकड़ा राजनीतिक दलों से चर्चा के आधर पर है)

गोरखपुर संसदीय सीट-2014 का परिणाम व सीटें           2017 विधानसभा का परिणाम
     सीट             नम्बर-1               नम्बर-2               नम्बर-1                       नम्बर-2 
1-कैम्पियरगंजः  BJP- 94508 ///  SP-52462        BJP-91636///           58782- BSP
2-पिपराइचः  BJP-125316 ///  SP-47837          BJP-82739///            69930- BSP
3-गोरखपुर शहरः BJP-133892 /// SP-31055     BJP-122221///          61491-INC
4-गोरखपुर ग्रामीणः BJP-97482 /// SP-53810     BJP-83686///           79276-SP
5-शहजनवांः  BJP-87406 /// BSP-43450           BJP-72213///            56836 SP

हारजीत का अंतर-312783 (योगी आदित्यनाथ जीते, राजमित निषाद नम्बर-2 रहीं)

सपा ने इस चुनाव में भी निषाद पर दांव लगाया है मगर उसके प्रत्याशी को लेकर पार्टी के ही एक निषाद नेता का विरोध झेलना पड़ रहा है जबकि राजमति निषाद के पति पूर्वांचल में अति पिछड़ों के प्रभावशाली नेता थे। ऊपर से इस बार कांग्रेस ने मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारा है। इसी गोरखपुर के करीबी क्षेत्र के प्रभावशाली नेता आरपीएन सिंह को सीडब्ल्यूसी का सदस्य बना दिया है। सीडब्ल्यूसी कांग्रेस की सर्वोच्च बाडी होती है।  ऊपर से इस बार योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री के ओहदे पर हैं। केन्द्र व राज्य दोनों स्थानों पर भाजपा की सरकार है और लोकसभा के आम चुनाव में एक साल से थोड़ा अधिक का ही समय है।

नोटः इस बार भाजपा ने ब्राह्रण प्रत्याशी पर दांव लगाया है। दशकों बाद भाजपा ने गोरक्षपीठ से बाहर का और ब्राह्मण प्रत्याशी मैदान दिया है। इससे बने समीकरण का खुद अंदाजा लगाइए।

Saturday, 1 July 2017

POLICE_KILLING @ 2017

30/1 july
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 बिजनौर में दारोगा की गला काटकर हत्या, पिस्टल लूटी
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-यूपी-उत्तराखंड सीमा की बालावाली चौकी पर तैनात थे
-मंडावर थाने से बालावाली चौकी पर जाते समय बदमाशों ने की हत्या
चंदक (बिजनौर) : बेखौफ बदमाशों ने बालावाली चौकी इंचार्ज सहजोर सिंह की गला काटकर हत्या कर दी और सर्विस पिस्टल लूट ली। बदमाश शव सड़क किनारे खेत में फेंक गए।
यूपी-उत्तराखंड सीमा पर गंगा किनारे मंडावर थाने की बालावाली पुलिस चौकी पर करीब एक साल से दारोगा सहजोर सिंह मलिक प्रभारी थे। शुक्रवार रात आठ बजे वह बाइक से मंडावर थाने से 20 किमी दूरी स्थित बालावाली पुलिस चौकी जा रहे थे। गोपालपुर गांव से कुछ दूर बंद पड़ी कांच की फैक्ट्री के समीप बदमाशों ने उनकी हत्या कर दी। रास्ते से जा रहे एक युवक ने मार्ग पर बाइक खड़ी होने की सूचना गोपालपुर में दी तो ग्रामीणों ने पुलिस को बताया। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक शव सड़क किनारे खेत में पड़ा था। गर्दन व अंगुली कटी हुई थी। शरीर पर चोट के कई निशान थे और सरकारी पिस्टल गायब थी। अंदेशा है कि मौत से पहले दारोगा से मारपीट व हाथापाई हुई। डीएम जगतराज, एसपी अतुल शर्मा कई थानों की फोर्स के साथ मौके पर पहुंचे। सहजोर सिंह मलिक चौकी पर बने आवास में ही रहते थे। उनका परिवार मेरठ के कंकडखेड़ा में बाईपास पर रहता है। सहजोर सिंह मूल रूप से शामली के लिसाढ़ गांव के रहने वाले थे। उनका परिवार मेरठ के कंकरखेड़ा में रहता है। उनके भाई अन्य परिजनों के साथ बिजनौर रवाना हो गए। एसपी अतुल शर्मा ने बताया कि दरोगा की हत्या और पिस्टल गायब होने की जांच की जा रही है।
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CBI, VIGILANCE @ INVESTIGATION-2017

2 june
 बीबीएयू के प्रोफेसर घूस लेते गिरफ्तार
संविदा शिक्षक की शिकायत पर सीबीआइ ने की कार्रवाई
 लखनऊ : सीबीआइ ने शिक्षकों की संविदा बढ़ाने के बदले घूस लेने के आरोप में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर केन्द्रीय विश्वविद्यालय को प्रोफेसर  विपिन सक्सेना व उनके विभाग में कार्यरत सहायक विजय द्विवेदी को गिरफ्तार कर लिया है। उनके पास मिले दस्तावेजसील कर दिये गये हैैं।
 भीमराव अंबेडकर केन्द्रीय विश्वविद्यालय के एक संविदा शिक्षक ने सीबीआइ की लखनऊ ब्रांच में संविदा अवधि बढ़ाने के बदले कमेटी के प्रमुख द्वारा घूस की मांग की जा रही है। एसपी प्रणव कुमार ने घूस के रूप में मांगी गई 50 हजार की राशि के साथ शिकायतकर्ता को प्रो.विपिन सक्सेना के पास भेजा। उनके साथ सीबीआइ अधिकारियों की एक टीम भी भेजी गयी। जिसने प्रो.विपिन को घूस लेते हुए गिरफ्तार कर लिया। उनके पास से घूस की रकम भी बरामद हुयी है। सीबीआइ अधिकारियों ने बताया कि प्रो.विपिन सक्सेना पर 27 संविदा शिक्षकों से घूस मांगने का आरोप है। इसकी जांच पड़ताल की जा रही है। प्रो.विपिन के कार्यालय के दस्तावेज जब्त करने लिये गये और छानबीन की जा रही है।
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2 june  रिवर फ्रंट घोटाले
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 जांच समिति ने आलोक रंजन व दीपक  सिंघल से मांगा जवाब
 रिवर फ्रंट घोटाले के दोषियों पर कार्रवाई निर्धारित करने को गठित समिति की पहली बैठक का फैसला
- मंत्री सुरेश खन्ना, आइएएस अधिकारी प्रवीर कुमार, अनूप पांडेय, प्रमुख सचिव न्याय रंगनाथ की समिति कर रही है जांच
 लखनऊ : रिवर फ्रंट के निर्माण में गड़बड़ी के लिए चिह्नित दोषियों पर कार्रवाई की संस्तुति से पहले मंत्री सुरेश खन्ना की जांच समिति ने तत्कालीन मुख्य सचिव आलोक रंजन, प्रमुख सचिव सिंचाई दीपक सिंघल का पक्ष सुनने का निर्णय किया है। दोनों अधिकारियों को लिखित जवाब के लिए तीन दिन की मोहलत दी जाएगी।  समाजवादी सरकार की गोमती चैनलाइजेशन योजना में करोड़ों का घोटाला व नियमों की अनदेखी का न्यायमूर्ति आलोक सिंह की जांच रिपोर्ट में खुलासा होने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आरोपितों पर कार्रवाई निर्धारित करने के लिए मंंत्री सुरेश खन्ना की अध्यक्षता में एक समिति गठित की है। जिसमें राजस्व परिषद के अध्यक्ष प्रवीर कुमार, अपर मुख्य सचिव वित्त अनूप पांडेय, प्रमुख सचिव न्याय रंगनाथ पांडेय को सदस्य नियुक्त किया गया है। शुक्रवार को समिति की पहली बैठक हुई, जिसमें न्यायमूर्ति आलोक समिति की संस्तुतियों व जांच रिपोर्ट का अध्ययन किया। सूत्रों का कहना है कि समिति ने पाया कि जांच के दौरान तत्कालीन मुख्यसचिव आलोक रंजन व प्रमुख सचिव सिंचाई दीपक सिंघल का पक्ष नहीं लिया गया। खन्ना समिति ने दोनों का पक्ष जांच में शामिल कराने का निर्णय लिया है। सूत्रों का कहना है कि इन दोनों को लिखित बयान देने के लिए तीन दिन का समय देने का निर्णय लिया गया है।
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वर्ष 2014-15 में शुरू हुई थी योजना
वर्ष 2014-15 में गोमती नदी चैनलाइजेशन परियोजना के लिए 656 करोड़ रुपये की धनराशि आवंटित की थी जो बढ़कर 1,513 करोड़ हो गई थी। इस राशि का 95 प्रतिशत हिस्सा खर्च होने के बावजूद परियोजना का 60 प्रतिशत कार्य पूरा हुआ। मुख्यमंत्री बनने के बाद आदित्यनाथ ने गोमती रिवर फ्रंट का निरीक्षण किया और सेवानिवृत न्यायमूर्ति आलोक सिंह की अध्यक्षता में समिति गठित कर 45 दिन में रिपोर्ट मांगी थी। उन्होंने पिछले सप्ताह मुख्यमंत्री को रिपोर्ट सौंपी थी।
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विलंब के लिए भी जिम्मेदार
परियोजना को पूरा करने में विलंब के लिए अभियंताओं को प्रथम दृष्टतया दोषी ठहराया गया है। तत्कालीन प्रमुख सचिव सिंचाई, तत्कालीन प्रमुख अभियंता समेत विभागाध्यक्ष सिंचाई के शामिल थे। दो वर्ष में 23 बैठक करने के बावजूद समय से कार्य पूरा नहीं हुआ, जिसके लिए अनुश्रवण समिति के अध्यक्ष भी जिम्मेदार ठहराया गया है।
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5 june
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 विजिलेंस ने यूपीएसआइडीसी घोटाले की जांच पर मांगा निर्देश
-यूपीएसआइडीसी के घोटाले पर सतर्कता अधिष्ठान से जांच आख्या मांगने का मामला
- नियमों का हवाला देकर सतर्कता अधिष्ठान ने शासन से पूछा कैसे करें जांच?
 लखनऊ : उप्र राज्य औद्योगिक विकास निगम (यूपीएसआइडीसी) के कथित टेंडर घोटाले जांच करने की मुख्यमंत्री कार्यालय की 'अपेक्षाÓ पर नियमों का पेंच फंस गया है। विजिलेंस निदेशालय ने मुख्यमंत्री कार्यालय के आदेश को सतर्कता विभाग को वापस करते हुये इस पर कार्रवाई के लिए दिशा निर्देश मांगा है। नियमों के मुताबिक किसी महकमें, अधिकारी की विजिलेंस जांच का आदेश सतर्कता विभाग के अधिकारी ही कर सकते हैैं।
मनी लांड्रिंग, धोखाधड़ी जैसे गंभीर इल्जामों से घिरे यूपीएसआइडीसी के मुख्य अभियंता अरुण मिश्रा ने पूर्व एमडी व आइएएस अधिकारी अमित घोष पर 300 करोड़ का घोटाला करने की जांच कराये जाने काप्रार्थना पत्र दिया था। 29 मई को इस प्रार्थना पत्र पर ही मुख्यमंत्री के विशेष सचिव डॉ.आदर्श सिंह ने महानिदेशक सतर्कता को लिखा कि-'प्रकरण की गंभीरता के दृष्टिगत 15 दिनों में आख्या प्रस्तुत करना सुनिश्चित किये जाने की अपेक्षा की गई है।Ó आदेश की प्रति हाथों-हाथ महानिदेशक  सतर्कता के यहां पहुंची। मुख्यमंत्री कार्यालय के आदेश पर अमल करते हुए सतर्कता अधिष्ठान के अधिकारियों ने कानपुर इकाई को आख्या जुटाने का मौखिक आदेश दिया। इस बीच शिकायतकर्ता के खुद मनी लांडिं्रग, भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे होने को लेकर बखेड़ा खड़ा हो गया। सवाल यह भी उठाया कि आखिर ढेरों से इल्जामों से घिरा इंजीनियर मुख्यमंत्री के यहां तक कैसे पहुंचा? रविवार को अचानक मुख्यमंत्री के निजी सचिव दीपक श्रीवास्तव व अपर निजी सचिव काशीनाथ तिवारी को उनके पदों से हटा गिया गया। इस कार्रवाई को यपूएसआइडीसी प्रकरण से जुड़ा माना गया था।
सोमवार को महानिदेशक सतर्कता भूपेन्द्र सिंह ने मुख्यमंत्री के विशेष सचिव के आदेश की प्रति प्रमुख सचिव सतर्कता को वापस लौटते हुए इस संदर्भ में शासन का दिशा निर्देश मांगा है। विजिलेंस के सूत्रों का कहना है कि शासन के निर्देश के बाद भी इस दिशा में कोई कार्रवाई की जाएगी।
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सतर्कता जांच का नियम
किसी भी व्यक्ति, संस्था के विरुद्ध सतर्कता जांच के लिए प्रमुख सचिव या सचिव सतर्कता की ओर से आदेश अथवा अधिसूचना जारी होनी जरूरी होती है। इस प्रक्रिया के बिना सतर्कता जांच नहीं हो सकती। मुख्यमंत्री सतर्कता विभाग के मंत्री भी हैैं। ऐसे में उनके विशेष सचिव सतर्कता जांच कराने या आख्यमा मांगने का सीधे आदेश दे सकते हैैं, मगर आदेश सतर्कता विभाग को भेजना चाहिए था, जहां सेअधिसूचना या आख्या मांगने का आदेश सतर्कता अधिष्ठान (विजिलेंस निदेशालय) भे्जा जाता।
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मामला क्या है?
यूपीएसआइडीसी के दागी अभियंता अरुण मिश्र ने मुख्यमंत्री कार्यालय को दिये प्रार्थना पत्र में तत्कालीन एमडी अमित घोष पर दो अगस्त 2016 से 14 अप्रैल 2017 के बीच 1100 करोड़ रुपये के ठेकों के आवंटन में गड़बड़ी का आरोप था। इल्जाम यह भी था कि टेंडरों में कमीशनखोरी के जरिये घोष ने 200 से 300 करोड़ रुपए का आर्थिक लाभ लिया। ट्रांस गंगा सिटी और सरस्वती हाइटेक सिटी परियोजनाओं में सीमेंट-कंक्रीट रोड के लिए आवंटित 600 करोड़ रुपये के टेंडर में गड़बड़ी का भी शिकायती पत्र में उल्लेख था। अरुण मिश्रा ने यह आरोप भी लगाया है कि 2016-17 की कार्ययोजना में 1668 एकड़ जमीन  विकसित करने के लिए 970 करोड़ रुपये का खर्च प्रस्तावित था। उक्त वित्तीय वर्ष में 100 एकड भी जमीन विकसित नहीं हो पायी। इसी शिकायत पर विशेष सचिव मुख्यमंत्री डॉ.आदर्श सिंह ने महानिदेशक सतर्कता से जांच आख्या मांगी थी।
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कोट:
विजिलेंस से कोई दिशा निर्देश मांगे जाने की अभी जानकारी नहीं है। मुख्यमंत्री कार्यालय ने अगर कोई आदेश किया है तो उसका पालन कराया जाएगा-अरविंद कुमार, प्रमुख सचिव गृह, सतर्कता
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5 june
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 सीबीआइ जांच की आंच में तपेंगे पूर्व मुख्यमंत्री के सचिव
तत्कालीन मुख्यमंत्री के सचिव आलोक कुमार ने 13 पट्टा आवंटन का प्रस्ताव मंजूर किया था
लखनऊ : अदालत की रोक बावजूद खनन पट्टा आवंटित करने, बाधित अवधि का परमिट करने की सीबीआइ जांच की आंच में पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के सचिव रहे आइएएस अधिकारी आलोक कुमार भी तपेंगे। सीबीआइ उनसे जल्द ही पूछताछ करेगी।
अदालत के आदेश पर सीबीआइ बांदा, कौशांबी, हमीरपुर, शामली जिलों में अवैध खनन, नियमों की अनदेखी कर पट्टे आवंटित करने की जांच कर रही है। सीबीआइ अधिकारी अब तक चार आइएएस अधिकारियों, पट्टाधारकों व खान अधिकारियों से पूछताछ कर चुकी है। इस छानबीन में ही   सीबीआइ के हाथ फरवरी 2013 में हमीरपुर में जारी 13 पट्टों की पत्रावली लगी है। जिसमें चंद दिनों के अंदर डीएम से लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय तक की मंजूरी मिल जाने का साक्ष्य हैैं। सीबीआइ अधिकारियों का कहना है कि बमुश्किल एक हफ्ते के अंदर पट्टा आवंटन की प्रक्रिया पूरी होना सवाल खड़े कर रहा है।   हमीरपुर के तत्कालीन डीएम ने फरवरी 2013 में दो माह के अंदर स्वच्छता प्रमाण पत्र हासिल करने का हवाला देते हुए ठेकेदारों को 13 पट्टे जारी करने का प्रस्ताव भूतत्व एवं खनिकर्म विभाग को भेजा था।
15 फरवरी 2013 को भूतत्व एवं खनिकर्म विभाग के अनुसचिव सुरेन्द्र कुमार ने डीएम की संस्तुतियों पर सहमति जताते हुए पत्रावली विशेष सचिव विवेक वाष्र्णेय को भेजी। जन्होंने इसी तिथि में हाईकोर्ट के एक मुकदमे का हवाला देते हुये पट्टे आवंटन की संस्तुति तत्कालीन प्रमुख सचिव भूतत्व एवं खनिकर्म जीवेश नंदन को भेजी। उन्होंने पत्रावली पर कुछ लिखे बगैर ही उसे तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के सचिव आलोक कुमार के पास भेज दिया।
सीबीआइ सूत्रों के मुताबिक तत्कालीन मुख्यमंत्री के सचिव आलोक कुमार ने पत्रावली पर लिखा-'मा.मुख्यमंत्री जी ने अनुमोदित किया।Ó उस पर अपने हस्ताक्षर भी किये मगर तिथि नहीं डाली। उनकी मंजूरी के आधार पर 17 फरवरी को विशेष सचिव विवेक वाष्र्णेय ने पट्टा आवंटन की मंजूरी का आदेश डीएम हमीरपुर को भेज दिया। सीबीआइ इस सवाल का जवाब तलाश रही है कि मुख्यमंत्री के तत्कालीन सचिव ने फाइल पर तिथि क्यों नहीं डाली? पूरे हस्ताक्षर क्यों नहीं किये। पत्रावली इतनी तेजी से कैसे बढ़ी? यह बिन्दु जांच का विषय है। सीबीआइ सूत्रों का कहना है वह लिहाजा आलोक कुमार से जल्द पूछताछ  की तैयारी है। आलोक कुमार केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली में तैनात है। इस प्रकरण की जांच सीबीआइ की दिल्ली इकाई कर रही है, ऐसे में उनसे वहीं पूछताछ संभव है।
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जांच के घेरे में हैैं आधा दर्जन आइएएस
अवैध खनन की जांच के घेरे में उत्तर प्रदेश कैडर के आधा दर्जन अधिकारी हैैं। इनमें से दो केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली में कार्यरत हैैं। एक जिलाधिकारी का ओहदा संभाल रहे हैैं और तीन विशेष सचिव के पद पर कार्यरत हैैं। एक प्रतीक्षारत हैैं।
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6 june  स्मारक घोटाला
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ब्नियम विरुद्ध थे पत्थर आपूर्ति करने वाले समूह

- विजिलेंस ने स्मारक घोटाले की जांच का एक हिस्सा पूरा किया
- दोषियों के विरुद्ध एफआइआर की शासन से अनुमति मांगने की तैयारी
 लखनऊ : बसपा सरकार में लखनऊ व नोएडा में बने स्मारकों में इस्तेमाल पत्थरों की आपूर्ति के लिये गठित कंसोर्टियम (समूह) नियम विरुद्ध थे। इनके जरिये पत्थर खरीदने से सरकार को करोड़ों रुपये की चपत लगी। जांच में यह खुलासा होने के बाद अब विजिलेंस अधिकारी खनन विभाग के दो पूर्व निदेशक, तीन भूवैज्ञानिकों, कंसोर्टियम संचालकों विरुद्ध एफआइआर की शासन से अनुमति मांगने की तैयारी में है।
वर्ष 2007-2012 की बसपा सरकार के दौरान लखनऊ व नोएडा (गौतमबुद्धनगर) में बने स्मारकों के निर्माण में 500 करोड़ का घोटाला होने का खुलासा तत्कालीन लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा ने अपनी जांच में किया था। न्यायमूर्तिमेहरोत्रा ने घोटाले की सीबीआइ अथवा विशेषज्ञ एजेंसी से जांच कराने की तत्कालीन मुख्यमंत्री से संस्तुति की थी। जिस पर तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लोकायुक्त की संस्तुतियों की विवेचना का जिम्मा जांच सतर्कता अधिष्ठान को सौंपा था।
सतर्कता अधिष्ठान स्मारक घोटाले को कई हिस्सों में बांटकर जांच कर रहा है। पत्थर आपूर्ति के लिए कंसोर्टियम गठित करने की जांच पूरी हो गयी है। सूत्रों का कहना है कि निदेशक भानु प्रताप सिंह की अगुवाई वाले जांच दल ने अपनी विवेचना में कंसोर्टियम के गठन को नियम विरुद्ध पाया है। पत्थर आपूर्ति, पत्थर तराशी के नाम पर करोड़ों का गोलमाल होने के साक्ष्य जुटाये हैैं। जांच अधिकारियों ने यह भी पाया है कि पत्थर लखनऊ व मीरजापुर में तराशे गये जबकि ठेकेदारों को भुगतान राजस्थान की दरों से किया गया।
 विजिलेंस निदेशालय के सूत्रों का कहना है कि कंसोर्टियम गठन व पत्थर आपूर्ति की जांच पूरी हो गई है। इसके लिए  तत्कालीन खनन निदेशक राम बोध मौर्य, सलाहकार सुहैल फारूकी, भूवैज्ञानिक नवीन दास, सतीश कुमार सिंह, अनिल शर्मा और निर्माण निगम के कुछ प्रोजेक्ट इंजीनियरों को जिम्मेदार माना गया है। जिनके विरुद्ध एफआइआर कराने की शासन से जल्द इजाजत मांगी जाने की तैयारी है।
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शासन के बगैर कुछ नहीं कर सकती विजिलेंस
सतर्कता अधिष्ठान के नियम ऐसे हैैं कि वह जांच में दोषी व्यक्ति पर तभी कार्रवाई कर सकता है जब शासन उसकी अनुमति प्रदान करे। अगर शासन अनुमति नहीं देता है तो कार्रवाई नहीं हो सकती है। नियय है कि सतर्कता अधिष्ठान जांच रिपोर्ट प्रमुख सचिव सतर्कता के जरिये विभागीय मंत्री को भेजा था, जिस पर आगे की कार्रवाई की इजाजत पर निर्णय होता है।
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19 लोगों के नाम थे कंसोर्टियम
राजेश कुमार, पीयूष श्रीवास्तव, मंगला द्विवेदी, मु्न्नीदेवी, बच्चू सिंह, अंकुर अ्रग्रवाल, अशोक कुमार द्वितीय, किशोरी लाल, विनोद श्रीवास्तव, अशोक श्रीवास्तव, रमेश कुमार, अंजना दुबे, पन्नालाल, लाल बहादुर सिंह के नाम कंसोर्टियम थे। इनके आधीन 60 फर्मो ने स्मारकों के लिए पत्थर आपूर्ति का कार्य किया था।
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6 june-गोमती रिवर फ्रन्ट घोटाला
 आलोक रंजन व दीपक सिंघल ने कहा वे निर्दोष
 लखनऊ : पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन और पूर्व प्रमुख सचिव सिंचाई दीपक सिंघल ने गोमती रिवर फ्रन्ट परियोजना में गड़बड़ी के दोषियों की सजा तय करने को गठित समिति को मंगलवार को अपना जवाब सौंप दिया है। जवाब में दोनों ने नियमों का हवाला देते हुए खुद को पूरी तरह से निर्दोष बताया है। न्यायमूर्ति आलोक सिंह की जांच रिपोर्ट में परियोजना में भ्रष्टाचार के लिए सिंचाई विभाग के कई इंजीनियरों के साथ इन दोनों अधिकारियों की ओर भी अंगुली उठाई गई थी।
मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद योगी आदित्यनाथ ने गोमती चैनलाइजेशन परियोजना का निरीक्षण किया था और उसमें भ्रष्टाचार होने की शिकायत पर न्यायमूर्ति आलोक सिंह की अध्यक्षता में जांच समिति गठित कर 45 दिन में रिपोर्ट मांगी थी। न्यायमूर्ति सिंह ने गत दिनों मुख्यमंत्री को सौंपी रिपोर्ट में परियोजना भ्रष्टाचार होने, परियोजना की लागत बढ़ाने, टेंडरों में गड़बड़ी के लिए सिंचाई विभाग के आधा दर्जन से अधिक इंजीनियरों को दोषी ठहराते हुए तत्कालीन मुख्य सचिव आलोक रंजन व प्रमुख सचिव सिंचाई दीपक सिंघल की ओर अंगुली उठाई थी। इस रिपोर्ट पर कार्यवाही के मुख्यमंत्री ने संसदीय कार्यमंत्री सुरेश खन्ना की अध्यक्षता में एक और समिति गठित की है। समिति ने दोनों अधिकारियों से उनका पक्ष पूछा था। सूत्रों का कहना है कि मंगलवार को आलोक रंजन व दीपक सिंघल ने जांच समिति को अलग-अलग जवाब भेज दिया है। रंजन ने जवाब में कहा है कि बतौर मुख्य सचिव वह अनुश्रवण समिति के अध्यक्ष थे और 16 बैठकें की थी। जिसमें अन्तर विभागीय समन्वय बनाया गया। उन्होंने कोई वित्तीय स्वीकृति नहीं प्रदान की थी। इसके अलावा भी रंजन ने जांच के कई बिन्दुओं पर उत्तर दिया है। दीपक सिंघल ने सिंचाई से जुड़े कानूनों का हवाला देते हुए कहा है कि उनके कार्यकाल में सिर्फ 600 करोड़ के कार्य कराये गये। परियोजना की लागत बढ़ाने का फैसला व्यय वित्त समिति ने लिया, जिसमें 11 विभागों के प्रतिनिधि होते हैैं। सूत्रों का कहना है कि दीपक ने यह भी कहा है कि टेंडर करने का दायित्व इंजीनियरों का होता है जिसमें उनकी कोई भूमिका नहीं थी।
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समिति की 10-11 को फिर हो सकती है बैठक : गोमती रिवर फ्रन्ट घोटाले के दोषियों पर कार्रवाई तय करने के लिए गठित नगर विकास व संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना की अध्यक्षता वाली जांच समिति 10 या 11 जून को बैठक कर सकती है। समिति में राजस्व परिषद के अध्यक्ष प्रवीर कुमार, अपर मुख्य सचिव अनूप चन्द्र पाण्डेय, प्रमुख सचिव (न्याय) रंगनाथ पांडेय सदस्य हैैं। समिति को 15 जून तक अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंपनी है।
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वर्ष 2014-15 में शुरू हुई थी योजना : वर्ष 2014-15 में गोमती नदी चैनलाइजेशन परियोजना के लिए 656 करोड़ रुपये की धनराशि आवंटित की थी जो बढ़कर 1,513 करोड़ हो गई थी। इस राशि का 95 प्रतिशत हिस्सा खर्च होने के बावजूद परियोजना का 60 प्रतिशत कार्य पूरा हुआ। मुख्यमंत्री बनने के बाद आदित्यनाथ ने गोमती रिवर फ्रंट का निरीक्षण किया और सेवानिवृत न्यायमूर्ति आलोक सिंह की अध्यक्षता में समिति गठित कर 45 दिन में रिपोर्ट मांगी थी। उन्होंने पिछले सप्ताह मुख्यमंत्री को रिपोर्ट सौंपी थी।
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 सीबीआइ ने ब्यौरा जुटाया, जांच पर निर्णय जल्द
-17 मई को स्टेट गेस्ट हाउस के करीब मिला था आइएएस अनुराग का शव
-योगी सरकार ने 23 मई को सीबीआइ जांच कराने संस्तुति की थी
लखनऊ : सीबीआइ अधिकारियों ने आइएएस अनुराग तिवारी की 17 मई को लखनऊ में मौत व उसकी पुलिस तफ्तीश का ब्यौरा जुटा लिया है। जिसे सीबीआइ मुख्यालय के जरिये केन्द्रीय कार्मिक मंत्रालय को भेज दिया गया है। सूत्रों का कहना है कि सीबीआइ इस वारदात की जांच करने को तैयार है। ऐसे में जांच के लिए जल्द नोटिफिकेशन जारी हो सकता है।
लाल बहादुर शास्त्री अकादमी मसूरी से मिड कारिअर प्रशिक्षण लेकर लखनऊ आये कर्नाटक कैडर के आइएएस अधिकारी अनुराग तिवारी यहां के वीआइपी गेस्ट हाउस में अपने बैचमेट आइएएस के साथ ठहरे थे। 17 मई की सुबह गेस्ट हाउस के चंद कदम पर उनका शव पाया गया था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण दम घुटना बताया गया था। अनुराग के भाई व परिवार के अन्य सदस्यों ने हत्या की आशंका जाहिर करते हुए हतरतगंज कोतवाली में एफआइआर दर्ज करायी थी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलकर मौत की सीबीआइ जांच की मांग की थी। अनुराग के परिवार के लोगों का कहना था कि वह कर्नाटक में खाद्य एवं रसद के घोटाले का पर्दाफाश करने वाले थे। उन्हें जान से मारने की धमकी मिल रही थी।
अनुराग के परिवार की मांग पर योगी सरकार ने 23 मई को इस प्रकरण की जांच सीबीआइ से कराने का निर्णय लिया और उसका प्रोफार्मा भेज दिया था। एक पखवारे के अधिक का समय बीतने के बाद भी जांच को लेकर निर्णय नहीं होने पर गृह विभाग के अधिकारियों ने शुक्रवार को केन्द्रीय कार्मिक मंत्रालय के अधिकारियों से संबंध में वार्ता की। सूत्रों का कहना है कि केन्द्र के अधिकारियों ने बताया है कि प्रक्रिया चल रही है। उधर, सीबीआइ सूत्रों का कहना है कि अनुराग की मौत की जांच से जुड़ा ब्यौरा दिल्ली स्थित सीबीआइ मुख्यालय भेज दिया गया है। अधिकारियों ने यह संकेत भी दिया है कि सीबीआइ इस मामले की जांच लेने को तैयार है।
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कैसे होती है सीबीआइ जांच
राज्य सरकार किसी प्रकरण प्रकरण की सीबीआइ से जांच के लिये निर्धारित प्रोफार्मा पर केस के सारांश व गंभीरता का उल्लेख कर उसे केन्द्रीय कार्मिक मंत्रालय को भेजती है। कार्मिक मंत्रालय उस पर सीबीआइ से राय मांगती है। अगर सीबीआइ केस की जांच को तैयार नहीं होती तो वह केस सामान्यत: उसे नहीं दिया जाता। मगर, हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट अगर किसी मामले की जांच का आदेश करता है तो सीबीआइ उसे मानने के लिए बाध्य होती है। अनुराग के मामले में केन्द्रीय कार्मिक मंत्रालय ने सीबीआइ से उसके राय मांग ली है।
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 गोमती रिवर फ्रंट का आज निरीक्षण करेगी समिति
-15 जून तक मुख्यमंत्री को सौंपनी है रिपोर्र्ट
 लखनऊ : गोमती रिवर फ्रंट परियोजना में भ्रष्टाचार व गड़बड़ी के लिए चिन्हित इंजीनियरों, अधिकारियों की सजा तय करने से पहले नगर विकास मंत्री सुरेश खन्ना की अध्यक्षता में गठित समिति बुधवार को मौका-मुआयना करेगी। इंजीनियरों से पूछताछ का क्रम जारी रहेगा। 15 जून तक समिति को अपनी सिफारिश मुख्यमंत्री को सौंपनी है।
 मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद योगी आदित्यनाथ ने गोमती चैनेलाइजेशन (गोमती रिवर फ्रंट) परियोजना का निरीक्षण किया था। उन्होंने योजना में धन का दुरुपयोग होने की बात कहते हुए सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति आलोक सिंह की अध्यक्षता में जांच समिति गठित की थी जिसने अपनी जांच में ढेरों गड़बडिय़ां पायी थीं। इसके बाद मुख्यमंत्री ने मंत्री सुरेश खन्ना को अध्यक्ष, राजस्व परिषद के अध्यक्ष प्रवीर कुमार, अपर मुख्य सचिव वित्त अनूप चन्द्र पांडेय और प्रमुख सचिव न्याय रंगनाथ पांडेय को सदस्य सचिव बनाते हुए 'कार्रवाई निर्धारण समितिÓ बनाई। तीन चरणों की बैठक के बाद समिति ने अब गोमती फ्रंट परियोजना का स्थलीय निरीक्षण करने का निर्णय लिया है। बुधवार को यह समिति मौका मुआयना करने पहुंचेगी। इस दौरान इंजीनियरों के बयान भी दर्ज किये जाएंगे।
वर्ष 2014-15 में गोमती नदी चैनलाइजेशन परियोजना के लिए 656 करोड़ रुपये की धनराशि आवंटित की गई थी जो बढ़कर 1,513 करोड़ रुपये हो गई थी। इस राशि का 95 प्रतिशत हिस्सा खर्च होने के बावजूद परियोजना का 60 प्रतिशत कार्य पूरा हुआ।
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14 june
 यूपीएसआइडीसी के चीफ इंजीनियर अरुण मिश्रा के विरुद्ध जांच पूरी

लखनऊः उत्तर प्रदेश पुलिस की स्पेशल इंवेस्टीगेशन टीम (एसआइटी) ने यूपीएसआइडीसी के बहुचर्चित मुख्य अभियंता अरुण मिश्रा के बेनामी बैैंक खातों की जांच लगभग पूरी कर ली है। इस मामले में उनके विरुद्ध अभियोजन की जल्द इजाजत मांगे जाने की संभावना है।
ट्रोनिका सिटी, फर्जी मार्कशीट के आरोपों से घिरे अरुण मिश्र के बेनामी बैैंक खातों की जांच एसआइटी को सौंपी गयी थी। सूत्रों का कहना है कि यह जांच पूरी हो गई। जांच एजेंसी जल्द ही उनके विरुद्ध एफआइआर की शासन से इजाजत मांगेगी। दूसरी ओर आइएएस अधिकारी अमित घोष के विरुद्ध विजिलेंस जांच के मुख्यमंत्री कार्यालय के आदेश के सतर्कता विभाग ने परीक्षण शुरू करा दिया है। सूत्रों का कहना है कि सतर्कता विभाग ने यूपीएसआइडीसी के अधिकारियों इल्जामों के संदर्भ में रिपोर्ट मांगी है।

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16 june
 गोमती रिवर फ्रंट की जांच रिपोर्ट सीएम को सौंपी गई
-परियोजना पूरी करने के लिए 350 करोड़ जारी करने पर सहमति
 लखनऊ : गोमती चैनेलाइजेशन (रिवर फ्रंट) परियोजना के दोषियों पर 'कार्रवाई निर्धारितÓ करने के लिए गठित समिति ने अपनी रिपोर्ट संस्तुतियों के साथ मुख्यमंत्री को सौंप दी है। रिपोर्ट के परीक्षण के बाद कार्रवाई का निर्णय लिया जाएगा। सूत्रों का कहना है कि इस परियोजना को पूरा करने के 350 करोड़ रुपये जारी करने तथा सिंचाई, जल निगम व पर्यावरण विभाग के अधिकारियों पर कार्रवाई की भी संस्तुति की गई है। सूत्रों के मुताबिक समिति ने न्यायिक जांच में दोषी पाये गए किसी भी अधिकारी को बरी नहीं किया है।
अखिलेश सरकार के 'ड्रीम प्रोजेक्टÓ रहे गोमती चैनलाइजेशन (गोमती रिवर फ्रन्ट) परियोजना की जांच के लिए न्यायमूर्ति आलोक सिंह की अध्यक्षता में गठित समिति की रिपोर्ट में दोषी पाये गए अफसरों पर कार्रवाई निर्धारित करने के लिए मंत्री सुरेश खन्ना की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई थी। समिति ने शुक्रवार को अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंप दी है। इससे पहले समिति ने रिवर फ्रंट का मौका मुआयना किया था। परियोजना को परवान चढ़ाने वाले इंजीनियरों, दो आइएएस अधिकारियों (इनमें से एक रिटायर हैैं) से उनका पक्ष पूछा था।
सूत्रों का कहना है कि कार्रवाई निर्धारण समिति ने जनहित में परियोजना को पूरा करने पर जोर दिया और गोमती में गिर रहे नालों के पानी का शोधन करने के लिए 350 करोड़ की राशि जारी करने की संस्तुति की है। कम धन में परियोजना पूरी करने के लिए तकनीक विशेषज्ञों की राय ली। सूत्रों का कहना है कि डायफ्राम वाल, इंटरसेप्टिंग ड्रैन, रबर डैम की टेंडर प्रक्रिया में गड़बड़ी व  डायफ्राम की दीवार सीधी बनाने में शामिल रहे सिंचाई व जल निगम के आधा दर्जन इंजीनियरों पर सीधी कार्रवाई और पयर्वेक्षण में लापरवाही करने वाले अधिकारियों के विरुद्ध सांकेतिक कार्रवाई की संस्तुति की गयी है। हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है।
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वर्ष 2014-15 में शुरू हुई थी योजना
वर्ष 2014-15 में गोमती नदी चैनलाइजेशन परियोजना के लिए 656 करोड़ रुपये की धनराशि आवंटित की थी जो बढ़कर 1,513 करोड़ हो गई थी। इस राशि का 95 प्रतिशत हिस्सा खर्च होने के बावजूद परियोजना का 60 प्रतिशत कार्य पूरा हुआ।
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16 june
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आइएएस अफसर अनुराग की मौत की सीबीआइ जांच शुरू
-सीबीआइ की स्पेशल क्राइम ब्रांच ने दिल्ली में दर्ज की एफआइआर
-17 मई को स्टेट गेस्ट हाउस के पास मिला था अनुराग का शव
-योगी सरकार ने 23 मई को सीबीआइ जांच के लिए की थी संस्तुति
 लखनऊ : आइएएस अधिकारी अनुराग तिवारी की 17 मई को लखनऊ में हुई मौत की जांच सीबीआइ ने अपने हाथ में ले ली है। स्पेशल क्राइम ब्रांच ने दिल्ली में इस वारदात का मुकदमा दर्ज किया है। एएसपी संतोष कुमार को विवेचनाधिकारी नियुक्त किया गया है।
सीबीआइ ने अनुराग तिवारी के भाई मयंक तिवारी की तहरीर पर अपने यहां मुकदमा दर्ज किया है जिसमें कहा गया है कि 2007 बैच व कर्नाटक कैडर के आइएएस अनुराग की दस साल की सेवा में सात बार तबादला हुआ। आयुक्त खाद्य एवं रसद के पद पर रहते हुये उन्होंने कई जांचें की थी, जिससे ढेरों लोग उनके दुश्मन थे। तहरीर में मंयक ने कहा कि है कि वह कर्नाटक के बड़े घोटाले का खुलासा करने वाले थे। इसी तहरीर पर सीबीआइ ने हत्या (302 आइपीसी) का मुकदमा दर्ज किया गया।
ध्यान रहे, 17 मई की सुबह गेस्ट हाउस के चंद कदम पर अनुराग तिवारी का शव पाया गया था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण दम घुटना बताया गया था। अनुराग के भाई व परिवार के अन्य सदस्यों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर भाई की हत्या की आशंका जाहिर करते हुए सीबीआइ जांच की मांग की थी। अनुराग के परिवार की मांग पर योगी सरकार ने 23 मई को इस प्रकरण की जांच सीबीआइ से कराने का निर्णय लिया। उसका प्रोफार्मा भेज दिया था। जिसके परीक्षण के बाद केन्द्रीय कार्मिक मंत्रालय ने एफआइआर दर्ज करने की अधिसूचना जारी की और सीबीआइ की स्पेशल ब्रांच ने मामला दर्ज कर विवेचना शुरू कर दी है। जांच अधिकारियों के टीम ने लखनऊ पुलिस से पोस्टमार्टम रिपोर्ट, एफआइआर की प्रति व अन्य साक्ष्य हासिल कर लिये हैैं।
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19 june
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रिवर फ्रन्ट में फंसेगी कई बड़ों की गर्दन
- सीबीआइ जांच की सिफारिश से मचा हड़कंप
- व्यय वित्त समिति के सदस्य, अनुश्रवण कमेटी, जल निगम, सिंचाई विभाग के इंजीनियर आएंगे चपेट में
 लखनऊ : सीबीआइ ने गोमती चैनलाइजेशन (रिवर फ्रन्ट) परियोजना की जांच अपने हाथ में ली तो राज्य सरकार के कई बड़े अफसरों की गर्दन फंसेगी। व्यय वित्त समिति के सदस्य, अनुश्रवण कमेटी, जल निगम, सिंचाई विभाग के इंजीनियरों का दल भी चपेट में आएगा।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सपा सरकार के ड्रीम प्रोजेक्टों में शुमार रिवर फ्रन्ट में भ्रष्टाचार की सीबीआइ जांच का फैसला लिया है। सीबीआइ जांच शुरू होने पर प्रोजेक्ट राशि को मंजूरी देने वाली वित्त व्यय समिति के तत्कालीन सदस्य (इसमें पांच सदस्य थे), बजट राशि पुनरीक्षित करने वाले अधिकारी, परियोजना को अनुमोदन देने वाली मंत्रिपरिषद के सदस्यों से पूछताछ किये जाने से इंकार नहीं किया जा सकता है। इससे प्रोजेक्ट से जुड़े अधिकारियों-इंजीनियरों में हड़कंप मचा है।
परियोजना की सीबीआइ जांच के आदेश से पहले योगी सरकार ने न्यायमूर्ति आलोक सिंह से जांच कराई। फिर मंत्री सुरेश खन्ना की समिति बनाकर उसे कार्रवाई निर्धारित करने का जिम्मा दिया। खन्ना समिति ने 16 जून को मुख्यमंत्री को सौंपी अपनी रिपोर्ट में तकनीकी जांच की विशेषज्ञता न होने का जिक्र करते हुए सीबीआइ से जांच कराने की संस्तुति की थी। उधर, सरकार ने सीबीआइ जांच के लिए केन्द्रीय कार्मिक मंत्रालय को अनुरोध पत्र भेजने की औपचारिकता पूरी कर ली है। सूत्रों का दावा है कि सीबीआइ जांच की आंच तत्कालीन मुख्यमंत्री के एक ओएसडी तक भी पहुंचेगी।
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सीबीआइ जांच की प्रक्रिया
राज्य सरकार किसी मामले की सीबीआइ जांच कराने के कारण स्पष्ट करते हुए केन्द्रीय कार्मिक मंत्रालय को एक प्रोफार्मा भेजती है। जिस पर कार्मिक मंत्रालय सीबीआइ निदेशक से टिप्पणी मांगता है। सीबीआइ ने अगर जांच लेने से इंकार कर दिया तो सामान्यत: कार्मिक मंत्रालय जांच के लिए बाध्य नहीं करता है। अगर सीबीआइ तैयार होती है, उसे जांच सौंप दी जाती है। गोमती रिवर फ्रन्ट प्रकरण राज्य सरकार प्रोफार्मा तैयार हो गया है।
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वर्ष 2014-15 में शुरू हुई योजना

वर्ष 2014-15 में गोमती नदी चैनलाइजेशन परियोजना के लिए 656 करोड़ रुपये की धनराशि आवंटित की थी जो बढ़कर 1,513 करोड़ हो गई थी। जिसका 95 प्रतिशत हिस्सा खर्च होने के बावजूद परियोजना का 60 प्रतिशत कार्य पूरा हुआ। इस परियोजना की जांच के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने न्यायमूर्ति आलोक सिंह की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी।
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आलोक समिति ने ये खामियां रेखांकित की
1-इंजीनियरों द्वारा सेन्टेज चार्जेज नहीं चार्जेज नहीं जमा कराये
2-डायफ्राम वाल, इंटरसेप्टिंग ड्रैन, रबर डैम की टेंडर प्रक्रिया में गड़बड़ी की गई। डायफ्राम की दीवार सीधी बनाई गई, जबकि इसे ढलान वाला होना चाहिए था।
3-इंटरसेप्टिंग ड्रैन, रबर ड्रैन, म्यूजिकल फाउंटेशन शो आदि के लिए कैबिनेट ने जुलाई 2016 में मंजूर की और कार्य 2015 में शुरू हो गया।
4-पर्यावरण नियमों का पालन नहीं किया
5-विभिन्न आइटम में निर्धारित में कई गुना अधिक व्यय किया गया
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कार्रवाई निर्धारण समिति
न्यायमूर्ति आलोक सिंह की जांच रिपोर्ट आने के बाद मुख्यमंत्री ने मंत्री सुरेश खन्ना की अध्यक्षता में कार्रवाई निर्धारण समिति बनायी थी। जिसमें 16 जून को मुख्यमंत्री को सौंपी रिपोर्ट में कहा था कि समिति के पास तकनीकी बिन्दुओं की जांच की विशेषज्ञता नहीं है, वह प्रशासनिक खामियों की जांच कर सकती है। ऐसे में विशेषज्ञ एजेंसी अथवा सीबीआइ से जांच कराई जाए। इसी रिपोर्ट के आधार पर सीबीआइ जांच का निर्णय लिया है।
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22 june
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सचल पालना घोटाले की सीबीआइ जांच शुरू

हाईलाइटर
सीबीआइ की भ्रष्टाचार निवारण शाखा लखनऊ ने उप्र राज्य समाज कल्याण बोर्ड, उप्र भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड और वर्कर्स वेलफेयर बोर्ड के अज्ञात अधिकारी, पदाधिकारी, अज्ञात स्वयंसेवी संस्था व प्राइवेट व्यक्ति के विरुद्ध एफआइआर दर्ज कर विवेचना शुरू की है।
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-मजदूरों के बच्चों को डे केयर देने लिए वर्ष 2013 में शुरू हुई थी परियोजना
-सीबीआइ ने श्रम विभाग, समाज कल्याण बोर्ड से तलब की पत्रावली
lucknow : माता-पिता भले मजदूरी करें, मगर उनके बच्चों की अच्छी परवरिश की मंशा से शुरू 'सचल पालना गृहÓ योजना का करोड़ों हड़पने वाले अधिकारियों, एनजीओ व बोर्डो के विरुद्ध सीबीआइ की भ्रष्टाचार निवारण शाखा ने एफआइआर दर्ज कर ली है। श्रम विभाग से इस परियोजना की पत्रावली तलब की गयी है। सूत्रों का कहना है कि  परियोजना से जुड़े आइएएस, पीसीएस अधिकारियों समेत दर्जनों लोगों का जांच के कटघरे में खड़ा होना तय है।
वर्ष 2016 में हाईकोर्ट में दाखिल जनहित याचिका पर 29 मई 2017 को न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और न्यायमूर्ति वीरेंद्र कुमार (द्वितीय) की पीठ ने सचल पालना गृह योजना की सीबीआइ का आदेश दिया था। तीन माह में जांच की स्टेट्स रिपोर्ट भी मांगी थी। हाईकोर्ट के आदेश पर सीबीआइ के डिप्टी एसपी आलोक शाही की ओर से मुकदमा दर्ज किया गया है। इसमें उत्तर प्रदेश श्रम विभाग के आधीन कार्यरत दो दो बोर्डों, राज्य समाज कल्याण बोर्ड के तत्कालीन पदाधिकारियों, एनजीओ व निजी क्षेत्र के अज्ञात व्यक्तियों को आरोपित किया गया है। सूत्रों का कहना है कि एफआइआर दर्ज करने के बाद सीबीआइ अधिकारियों ने श्रम विभाग, समाज कल्याण बोर्ड के अधिकारियों से परियोजना से जुड़े दस्तावेज तलब किये हैैं। ध्यान रहे, सीबीआइ जांच से पहले हाईकोर्ट ने महिला व बाल विकास विभाग की प्रमुख सचिव रेणुका कुमार से इस प्रकरण में रिपोर्ट मांगी थी। जबकि उनका इस परियोजना से सीधा ताल्लुक नहीं था। हाईकोर्ट ने उनसे पूछा था कि कितने शिशु गृहों की स्थापना की गई। जो सेवाएं बच्चों को प्रदान की जानी थी, क्या वह मिलीं? वे कौन लोग हैं जिन्होंने बिना कार्य किए पैसे प्राप्त कर लिए। कौन से अधिकारी हैं जो धोखाधड़ी भरेभुगतान के लिए जिम्मेदार हैं। कुमार ने हाईकोर्ट को सौंपे शपथ पत्र में परियोजना में भ्रष्टाचार होने का उल्लेख किया था। हालांकि उन्होंने इसके लिए सीधे किसी को दोषी नहीं ठहराया था। इस प्रकरण की सीबीआइ जांच कराने के लिए याचिका हरीश कुमार वर्मा ने दाखिल की थी।
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बंद है परियोजना
मजदूरों के बच्चों को सुविधा देने वाली यह परियोजना शुरूआती दौर में ही भ्रष्टाचार की भेंट चढऩे के चलते आगे नहीं बढ़ सकी। योजना के लिए आवंटित धन भी सरकारी खजाने में वापस हो गया। जिससे जिन पंजीकृत मजदूरों के बच्चों को अच्छी परवरिश मिल सकती थी, वह भी नहीं मिल पायी। सच्चाई यह है कि गंगनचुंबी इमारतें खड़ी करने वाले मजदूरों के बच्चे कार्य क्षेत्र में भी खुले मैदान में पलने-बढऩे को मजबूर हैैं।
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योजना से जुड़े तथ्य
-वर्ष 2013-14 में सचल पालना गृह योजना शुरू हुई, जिसमें पहले यूपी व केन्द्र की धनराशि का औसत 40: 60 था, जो बाद में 50: 50 हो गया।
-1100 करोड़ की परियोजना की पहली किश्त के रूप में 48.92 जारी हुए, जिसका उपभोग कागजों में कर लिया गया था
-पालना गृह योजना में पंजीकृत मजदूरों के नवजात शिशु से छह वर्ष तक के बच्चों को डे केयर (खाना, खिलौना से लेकर दिन भर रखना) दिया जाना था।
-72 जिलों में परियोजना चलनी थी, जिसके लिए तत्कालीन अधिकारियों ने 280 स्वयं सेवी संस्थाएं चयनित की थीं।
-लखनऊ का कार्य जिस संस्था को दिया गया, वह एक आइएएस अधिकारी की रिश्तेदार थीं, इन्ही संस्था को भुगतान को लेकर सबसे पहले बखेड़ा हुआ

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कोट:
मैने कार्य संभालने के बाद बोर्ड के भ्रष्टाचार की जांच के लिए प्रधानमंत्री व सीबीआइ को भी पत्र लिखा था। अब सीबीआइ जांच शुरू हो गयी है, सब कुछ साफ हो जाएगा- डॉ.रूपल अ्रग्रवाल, अध्यक्ष उत्तर प्रदेश समाज कल्याण बोर्ड
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24 june
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 ईडी के नाम पर घूस लेते कस्टम अधिकारी बंदी
-गिरफ्तारी से एक माह पहले ही ईडी से मूल कैडर कस्टम विभाग वापस हुए थे एनबी सिंह
-ईडी से कार्यमुक्त होने के बाद भी पत्रावलियों का निस्तारण करने कार्यालय जाते थे
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lucknow : सीबीआइ की भ्रष्टाचार निवारण शाखा ने एनआरएचएम (राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन) घोटाले के आरोपित से घूस लेने के आरोप में केंद्रीय उत्पाद, सीमा शुल्क एवं सेवा कर (कस्टम) विभाग के अधीक्षक एनबी सिंह व उनके बिचौलिए सुभाष कुमार गिरफ्तार कर लिया है। उनके पास सेचार लाख रुपये भी बरामद हुए हैं। सिंह, 18 मई तक प्रतिनियुक्ति पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की लखनऊ शाखा में सहायक निदेशक के पद पर तैनात थे। और ईडी की कार्रवाई की धौंस दिखाकर एनआरएचएम घोटाले के अभियुक्त से 50 लाख की घूस मांग रहे थे, जिसकी पहली किश्त के रूप में चार लाख रुपए लेते हुए पकड़े  गये हैैं। उनकी गिरफ्तारी इस बात की संकेत है कि जिन पर भ्रष्टाचारियों की नकेल कसने का जिम्मा है, उनमें से कुछ घूसखोरी में लिप्त हैं।
मेरठ के सोतीगंज निवासी सुरेंद्र चौधरी बहुचर्चित एनआरएचएम (अब एनएचएम) घोटाले के अभियुक्त हैं। सीबीआइ ने उनके विरुद्ध चार मुकदमे दर्ज कर रखे हैं जिनमें से मनी लांड्रिंग के एक मामले की जांच ईडी कर रही है। यह जांच केंद्रीय उत्पाद, सीमा शुल्क एवं सेवा कर (कस्टम) से प्रतिनियुक्ति पर ईडी में तैनात एनबी सिंह के पास था। सुरेन्द्र चौधरी ने सीबीआइ के एसपी प्रणव कुमार को भेजे शिकायती पत्र में कहा था कि ईडी में कार्यकाल पूरा होने के बाद भी एनबी सिंह उसे फोन कर केस में राहत देने के बदले 50 लाख रुपये की रिश्वत मांग रहे हैैं। एप्पल कंपनी के दो आइफोन-7 मांगे हैं, जिसका भुगतान करने के लिए श्रीबालाजी मोबाइल के मालिक का बैैंक खाता नम्बर-053011020002....(नम्बर का दुरुपयोग न हो इसलिए पूरा नंबर नहीं दिया जा रहा) देते हुए इसमें धन जमा कराने को कहा गया था। एनआरएचएम घोटाले के अभियुक्त से घूस मांगे की शिकायत पर सीबीआइ ने पहले फौरी जांच कराई। तथ्यों की तस्दीक होने पर केस दर्ज किया। फिर सुरेंद्र चौधरी से एनबी सिंह को फोन कराकर रिश्वत देने के लिए गोमतीनगर स्थित जेन नेक्स्ट होटल बुलाया। एनबी सिंह ने पैसा लेने के लिए सुभाष को वहां भेजा। सीबीआइ ने उसे रोक लिया। काफी देर तक जब सुभाष वापस नहीं लौटा तो सिंह ने उसे फोन किया। इस पर सीबीआइ के इशारे पर सुभाष ने कहा कि वह होटल में है। सुरेंद्र उन्हें बुला रहे हैैं। एनबी सिंह जैसे पहुंचे सीबीआइ ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। पूछताछ के बाद एमिटी विश्वविद्यालय के नजदीक के ठिकानों पर ले जाकर तलाशी ली गई।
सूत्रों का कहना है प्रतिनियुक्ति का कार्यकाल पूरा होने पर ईडी के उपनिदेशक (प्रशासन) ए एस बधवार ने 18 मई को उन्हें कार्यमुक्त करने का आदेश जारी कर दिया था, उन्हें पत्रावलियां संबंधित सहायक निदेशक को सौंपने का निर्देश दिया गया था। मगर लंबित पत्रावली निस्तारित करने को एनबी सिंह प्रवर्तन निदेशालय की लखनऊ शाखा जाते थे। इस संबंध में प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों से बात करने का प्रयास किया गया, मगर कोई उपलब्ध नहीं हुआ। बताया गया कि एनबी सिंह इसी महीने सेवा से रिटायर होने वाले हैं।
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कौन है बिचौलिया सुभाष
घूस लेने के आरोप में गिरफ्तार कस्टम अधिकारी का बिचौलिया सुभाषराजधानी के खुर्रमनगर इलाके में स्थित 'अतिथि पैराडाइज इनÓ नाम के गेस्ट हाउस के संचालक हैैं। सीबीआइ अधिकारियों के अनुसार वह कई वर्षों से एनबी सिंह के संपर्क में है। उनके कहने पर ही वह होटल 'जेन नेक्स्टÓ पहुंचा था जहां सीबीआइ टीम ने रिश्वत की रकम लेते हुए रंगे हाथ पकड़ लिया। सीबीआइ ने दोनों आरोपितों को विशेष न्यायाधीश के आवास पर पेश किया जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया। हालांकि सीबीआइ ने दोनों को दस दिनों की पुलिस अभिरक्षा में देने की मांग की है। इस पर 27 जून को सुनवाई होगी।
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क्या थी शिकायत
एनआरएचएम घोटाले के आरोपित सुरेंद्र चौधरी ने सीबीआइ से शिकायत की थी कि एनबी सिंह ने अपने सरकारी दफ्तर के नंबर-0522-2288782 से फोन कर बुलाया और पांच जून को सुभाष की मौजूदगी में रिश्वत मांगी। ऐसा न करने पर मुझे और मेरे भाई को केस में फंसाने और सारी संपत्तियां जब्त करने की धमकी दी। सुरेंद्र की शिकायत में कहा गया है कि एनबी सिंह से कहा कि सरकार को हुए नुकसान के दो करोड़ रुपये उन्होंने जमा कर दिए हैं। सीबीआइ के केस से उन्हें राहत की उम्मीद है। इस पर सिंह नाराज हो गए। पचास लाख रुपये की रिश्वत मांगी। कहा कि उन पर 21 करोड़ की देनदारी हो रही है। इसको निपटाने के लिए 50 लाख रूपये की मांग की गयी थी। बाद में सुभाष ने कहा कि कम से कम 25 लाख रुपये एनबी सिंह को देने होंगे। उनके बीच पांच लाख रुपये की पहली किश्त देने की बात हुई थी।
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19 july
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 सपा सरकार में हुई भर्तियों की होगी सीबीआइ जांच
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-विधान सभा सत्र में बोले योगी
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  हाईलाइटर
'अच्छा हुआ श्वेत पत्र लेकर सरकार नहीं आई। जिस दिन श्वेत पत्र जारी होगा, कहीं ऐसा न हो कि उत्तर प्रदेश सपा-बसपा मुक्त हो जाए। जिस निर्ममता से इन दोनों दलों ने लूट-खसोट की, जिस तरह प्रदेश को नोचा, मुझे लगता है कि यह सभ्य समाज कभी इन्हें स्वीकार नहीं करेगा।Ó
-योगी आदित्यनाथ
मुख्यमंत्री (विधानसभा में)
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- केवल शिक्षक भर्ती घोटाले में जेल में सड़ रहे हरियाणा के नेता
-बजट चर्चा में शामिल हुए पक्ष-विपक्ष के 73 सदस्य
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लखनऊ : मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सपा सरकार में हुई भर्तियों की सीबीआइ जांच कराने का एलान किया है। उन्होंने कहा है कि भर्तियों में धांधली की सारी जांचें होगी और कोई दोषी बचेगा नहीं। 'याद रखना केवल शिक्षक भर्ती घोटाले में हरियाणा के एक नेता (ओमप्रकाश चौटाला) दस वर्षों से जेल में सड़ रहे हैं। कागज जलाने से कोई बच नहीं सकता।Ó
विधानसभा में बुधवार को बजट चर्चा पर विपक्ष के सदस्यों का जवाब देते हुए योगी आक्रामक थे। पौने दो घंटे के अपने भाषण में वह सपा, बसपा और कांग्रेस की सरकारों की खामियां गिनाकर प्रदेश की बदहाली के लिए निरंतर विपक्ष को जिम्मेदार ठहरा रहे थे। योगी ने कहा कि 'पुलिस के डेढ़ लाख पद खाली हैं और दस वर्षों में कोई नियुक्ति ऐसी नहीं हुई जिस पर अंगुली न उठी हो। यह पद इसलिए नहीं भरे गए क्योंकि नीयत साफ नहीं थी।Ó उन्होंने बजट सत्र में भाग लेने वाले मंत्री और विधायकों समेत 73 सदस्यों के प्रति आभार जताया। योगी ने वित्त मंत्री और उनकी टीम की बजट के लिए सराहना की। इस चर्चा में सत्ता पक्ष की ओर से 46 लोग बोले जबकि बाकी विपक्ष के रहे। योगी ने बजट की सराहना करते हुए कहा कि यह अविस्मरणीय होगा क्योंकि पहली बार बजट के केंद्र में किसान है। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य है कि 25 वर्षों से राजनीति का केंद्र जाति और परिवार बनता रहा है। इससे सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न हुआ और जातिवादी राजनीति से प्रदेश पिछड़े पायदान पर है।
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अमन-चैन में खलल डालने वालों का हराम कर देंगे जीना
मुख्यमंत्री पूरे तेवर में थे। खराब कानून-व्यवस्था पर पिछली सरकार पर तंज कसते हुए बोले 'बहुत जल्द फिर सत्र बुलाएंगे। हम कानून बनाने जा रहे हैं। प्रदेश में हर नागरिक को जीने का अधिकार है। जो अमन-चैन में खलल डालेगा, उसका जीना हराम कर देंगे।Ó मुख्यमंत्री ने भूमि कब्जा करने के 1.53 लाख मामलों का जिक्र करते हुए कहा कि 'अभी तो कब्जे की जानकारी हासिल की जा रही है लेकिन, दो माह बाद जब भूमाफिया के खिलाफ अभियान चलेगा तो उनकी स्थिति क्या होगी, सोच लेना चाहिए। जिन लोगों ने राजनीतिक संरक्षण में जमीनें कब्जा की उनके खिलाफ अभियान चलेगा और अब जवाहर बाग कांड की पुनरावृत्ति नहीं होगी।Ó योगी ने खनन माफिया, अपराधियों और अवैध ढंग से काम कर रहे कारोबारियों को भी चेतावनी दी। कहा 'कुछ लोग बालू-मौरंग के दाम बढ़ाए हैं। उन पर भी डंडा चलेगा। सरकार इनसे सख्ती से पेश आएगी।Ó वह यहीं नहीं रुके। आतंकी मददगारों पर भी बरसे। कहा, आतंकवाद को फाइनेंस करने वालों की कमर तोड़ डालेंगे।
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तो सरकार स्ववित्त पोषित स्कूलों को अधिग्रहीत कर लेगी
योगी ने नेता प्रतिपक्ष की ओर इशारा कर कहा कि वित्त विहीन शिक्षक नियमित नहीं हुए तो इसके लिए आप लोग दोषी हैं। अगर शिक्षकों को सरकार वेतन देगी तो स्ववित्त पोषित विद्यालयों को अधिग्रहीत करेगी। योगी ने दावा किया कि तीन वर्ष में पुलिस में डेढ़ लाख भर्ती होगी। यह भर्ती धर्म, मजहब और जाति के आधार पर नहीं होगी। यह पूरी तरह पारदर्शी होगी।
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 बोलने लग जाएं तो बहुत लोग एक्सपोज होंगे
सीतापुर में निर्दोष व्यापारी के हत्यारे को संरक्षण देने का आरोप लगाकर योगी ने कहा कि 'आप लोग कानून-व्यवस्था की बात करते हैं लेकिन, बोलने लग जाएंगे तो बहुत लोग एक्सपोज हो जाएंगे। राजनीतिक शिष्टाचार रहने दीजिए।Ó आजमगढ़ में अवैध शराब से मरने वालों का जिक्र कर योगी ने सपा पर मुख्य अभियुक्त मुलायम यादव को संरक्षण देने का आरोप लगाया। कहा, पिछले वर्ष उसके चलते 60 लोग मरे थे लेकिन, उसे बचाने का काम किया गया। योगी ने कहा कि हमारी सरकार में मुलायम समेत उसके 14 लोग गिरफ्तार किए गए हैं। उन्होंने रायबरेली की घटना पर सवाल उठाया कि क्या वहां दोनों पक्षों के लोग सपा के नहीं हैं? क्या उन्हें संरक्षण नहीं है। एलान किया कि अपराधियों पर सख्त कार्रवाई होगी। योगी ने अपराधों में कमी का दावा करते हुए आंकड़े भी गिनाए।

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विवादों से घिरी रही सपा सरकार की हर भर्ती
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- 600 से अधिक भर्तियां आएंगी जांच के दायरे में
- दो लाख पदों की नियुक्ति में हुई मनमानी का उजागर होगा सच
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-पीसीएस समेत लोक सेवा आयोग की सभी भर्तियां पर विवाद
-उच्चतर और माध्यमिक शिक्षा में शिक्षकों की भर्ती पर उठे थे सवाल
-सिपाही और दारोगा भर्ती में पुलिस भर्ती बोर्ड पर लगे आरोप
-अधीनस्थ सेवा चयन आयोग में रहीं तमाम गड़बडिय़ां
-विद्युत सेवा आयोग की सहायक और अवर अभियंता भर्ती में मनमानी
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लखनऊ : भाजपा सरकार ने पिछले पांच साल तक भर्तियों में हुए भ्रष्टाचार की जांच का आदेश देकर उन प्रतियोगी छात्रों की मुरादें पूरी कर दी हैं, जिनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की तरह दब जा रही थी। प्रतियोगी छात्र अलग-अलग स्तर पर कई सालों से भर्तियों की जांच के लिए आंदोलन चला रहे हैं और उन्होंने अदालत में भी लंबी लड़ाई लड़ी। अब उन्हें उम्मीद है कि भर्तियों का सच सामने आएगा।
समाजवादी पार्टी की सरकार में लगभग हर भर्ती को लेकर विवाद खड़े हुए हैं। प्रशासनिक अधिकारियों का चयन करने वाले उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग तक की भर्तियां भी इससे अछूती नहीं रहीं। तत्कालीन सपा सरकार में अध्यक्ष और सदस्यों को मनमानी का पूरा संरक्षण हासिल था। यही वजह थी कि डॉ.अनिल यादव के कार्यकाल में मनमाने फैसले लिए गए और हजारों छात्रों को सड़क पर उतरना पड़ा। अंतत: हाईकोर्ट ने उनकी नियुक्ति को अवैध करार दिया। जिन भर्तियों को लेकर आरोप लगे हैं, उनमें अधिकांश अनिल यादव के कार्यकाल की ही हैं। पीसीएस 2011 से लेकर पीसीएस 2015 तक की भर्ती पूर्व अध्यक्ष डॉ.अनिल यादव के कार्यकाल में हुई तो इस दौरान लोअर सबआर्डिनेट की चार भर्ती परीक्षाएं संपन्न हुईं। इनमें प्रशासनिक पद की सूबे की सबसे बड़ी पीसीएस की पांच परीक्षाएं भी शामिल हैं। पीसीएस जे, समीक्षा अधिकारी-सहायक समीक्षा अधिकारी और सहायक अभियोजन अधिकारी की तीन-तीन भर्तियों के परिणाम इस दौरान घोषित किए गए। उनके कार्यकाल में 236 सीधी भर्तियां भी हुईं। अब सीबीआइ की जांच में इन भर्तियों का सच उजागर होगा। गौरतलब है कि अनिल यादव के कार्यकाल में ही एसडीएम पद पर एक ही जाति के अभ्यर्थियों का चयन किए जाने के आरोप लगे थे।
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जांच दायरे में होंगे पीसीएस-लोअर के साढ़े छह हजार पद
सपा शासनकाल में पीसीएस 2011 से लेकर 2015 तक लगभग ढाई हजार पदों पर नियुक्तियां हुई हैं। 2011 में एसडीएम और डिप्टी एसपी समेत विभिन्न श्रेणी के 389 पदों पर भर्ती की गई तो 2012 में 345, 2013 में 650, 2014 में 579 और पीसीएस 2015 में 521 पद भरे गए। इसी तरह बीते पांच साल में लोअर सबार्डिनेट के 4138 पदों पर भर्तियां हुई हैं। प्रतियोगी छात्र समिति की ओर से यह मुद्दा उठाने वाले अशोक पांडेय कहते हैं कि जांच में कई अध्यक्ष व सदस्यों पर शिकंजा कस सकता है।
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कृषि तकनीकी सहायक सबसे बड़ी भर्ती
सपा शासनकाल में आयोग द्वारा सबसे बड़ी भर्ती कृषि तकनीकी सहायकों की हुई है। इसमें 6628 पद भरे गए। इस भर्ती में ओबीसी के लिए आरक्षित पदों में बड़े पैमाने पर हेरफेर की शिकायत मिली थी। मामला अभी न्यायालय में है। राजस्व निरीक्षक के 617, खाद्य सुरक्षा के 430 पद भी सपा शासनकाल में भरे गए।
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साढ़े पांच सौ मुकदमे लंबित
लोक सेवा आयोग की भर्तियों को लेकर विवाद किस कदर है, इसका अंदाजा सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में दाखिल मुकदमों की संख्या से लगाया जा सकता है। हाईकोर्ट में लगभग 500 और सुप्रीम कोर्ट में 50 से अधिक मुकदमे लंबित हैं।
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पीसीएस का पेपर भी हुआ आउट
भर्तियों में गड़बडिय़ों का अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि आयोग में पहली बार पीसीएस का पेपर आउट हुआ। डॉ.अनिल यादव के कार्यकाल में हुई पीसीएस 2015 प्री परीक्षा का पेपर लखनऊ के एक सेंटर से आउट हुआ था।
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टीजीटी-पीजीटी में भी खेल
लोक सेवा आयोग की ही तरह माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड में प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक परीक्षा (टीजीटी) और प्रवक्ता परीक्षा (पीजीटी) के आठ हजार पदों पर हुई भर्तियां भी जांच के दायरे में आएंगी। यह परीक्षाएं 45 विषयों के लिए हुई थीं और 39 विषयों के परिणाम घोषित होकर नियुक्तियां की जा चुकी हैं। बोर्ड में भी अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्तियां विवादित रहीं।
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असिस्टेंट प्रोफेसर के 1652 पदों पर भर्ती
इसी कड़ी में उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग भी रहा, जहां अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्तियां को लेकर उठा विवाद हाईकोर्ट तक पहुंचा। 1652 पदों के लिे हुई पहली बार भर्ती परीक्षा विवादों में रही। कापियां सादी छोड़ देने के आरोप भी लगे। आयोग के सचिव को अभी भाजपा शासनकाल में बर्खास्त किया गया है।
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35 हजार सिपाही व चार हजार दारोगा भर्ती
सपा सरकार में पुलिस भर्ती बोर्ड की ओर से हुई ये भर्तियां शुरू से ही विवादों में रहीं। भर्ती शुरू होने के बाद नियमों में बदलाव किए गए। आरक्षण नियमों की अनदेखी ने नियुक्तियों को कोर्ट का विषय बना दिया। भाई-भतीजावाद के आरोपों से घिरी ये नियुक्तियां जांच का हिस्सा होंगी।
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फिर से हुई अवर अभियंता भर्ती
पावर कारपोरेशन में सहायक और अवर अभियंताओं की भर्ती में अभ्यर्थियों ने मनमानी का आरोप लगाया। अवर अभियंता भर्ती परीक्षा में तो पूरा एक पेपर ही रिपीट किया गया। इसकी वजह से एक विषय की परीक्षा दोबारा हुई। विद्युत सेवा आयोग की इस भर्ती में भी गड़बडिय़ों की जांच सीबीआइ करेगी।
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