Friday, 17 March 2017

UP ELECTION_SP

लखनऊ : उत्तर प्रदेश की जनता चाहती क्या थी? 11 मार्च को वोटों की गिनती के साथ इसका खुलासा हो गया। ऐतिहासिक जनादेश भाजपा के पक्ष में है। ऐसा कैसे हुआ? इसका विश्लेषण शुरू हो गया है। मगर मंथन का एक विषय समाजवादी पार्टी (सपा) की हार भी है। जिसमें यह परखने का प्रयास हो रहा है कि क्या सपा के अध्यक्ष पद से मुलायम सिंह को हटाकर अखिलेश यादव को उस पर आसीन कराना भी एक चुनावी मुद्दा (फैक्टर) था? 
55 लाख औरतों को पेंशन, रानी लक्ष्मी बाई पुरस्कार, लैपटॉप, कन्या विद्या धन जैसी लोक हितकारी योजना के बावजूद चुनाव में विधायकों की संख्या न्यूनतम (47) पर पहुंचने के पीछे 'तख्ता पलटÓ भी एक कारण था? यह समझने के लिए 13 सितंबर-2016 से बात शुरू करते हैैं। यह वही तारीख है जब समाजवादी कुनबे की कलह सड़क पर आई। शुरूआती संघर्ष अखिलेश बनाम शिवपाल दिख रहा था। मुलायम 'अम्पायरÓ की भूमिका में थे। प्रो. रामगोपाल, राजेन्द्र चौधरी अखिलेश यादव के सलाहकार का दायित्व निभाते दिख रहे थे। उस समय यह धारणा थी कि अखिलेश अब तीन-साढ़े तीन मुख्यमंत्री के इल्जामों से उबरने का प्रयास कर रहे हैैं। इससे उनकी छवि निखरती दिख रही है। माना जाने लगा था कि अखिलेश कठोर फैसले लेने के लिए खुद तैयार कर रहे हैैं। इससे जनभावना उनके पक्ष में दिख रही थी। मगर इस संघर्ष ने अचानक मुलायम सिंह यादव को भी अपनी चपेट में ले लिया। पत्र बम छोड़े जाने लगे। जिससे ओहदा, अधिकार और वर्चस्व के प्रयास जनशक्ति प्रदर्शन में तब्दील हो गए। निर्णयराष्ट्रीय प्रतिनिधि सम्मेलन बुलाने तक पहुंच गया।
मुलायम, कई वरिष्ठ समाजवादियों के ढेरों प्रयास नाकाम करते हुए प्रो.राम गोपाल यादव ने एक जनवरी-2017 को जनेश्वर मिश्र पार्क में विशेष राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाया। हजारों की भीड़ जुटी। चंद मिनट की औपचारिकता के बाद प्रो.राम गोपाल यादव ने ही फैसला सुनाते हुए कहा कि शिवपाल यादव को प्रदेश अध्यक्ष पद और अमर सिंह को सपा से निकालने का निर्णय लिया गया है। इस पर अखिलेश के पक्ष में खुब नारेबाजी हुई। मगर रामगोपाल मुंह से यह सुनते ही कि मुलायम सिंह यादव के स्थान पर अखिलेश यादव को सपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया है, भीड़ में सन्नाटा पसर गया। उसी समय खुसुर-पुसुर होने लगी। युवा ब्रिगेड के चंद लोगों ने नारेबाजी की मगर ज्यादातर लोग समारोह स्थल से उठ गये। राजनीति की नब्ज परखने वालों ने मुलायम को सपा अध्यक्ष पद से हटाने की दीर्घकालिक परिणाम सामने आने का अंदेशा जाहिर किया। कुछ देर बाद ही मुलायम जब फैसले को असंवैधानिक ठहराया उस समय आशंकाओं को बल मिला। बाद में यह लड़ाई चुनाव आयोग तक गई। कुनबे की लड़ाई अखिलेश यादव जीते। सब ठीक होने का संदेश देने का प्रयास हुआ। मुलायम ने कभी रहस्यमयी चुप्पी साधी, कभी कहा कि आशीवार्द है। कभी सब ठीक, कभी कुछ गड़बड़ होने की बात होती रही। इसी बीच चुनावी समर शुरू हो गया। मगर मुलायम प्रचार अभियान में नहीं निकले, मुलायम के इस तरह घर बैठने का यह पहला चुनाव था।
11 मार्च को परिणाम आया। सपा को सिर्फ 47 सीटें मिलीं, तब से यह बात जेरे-बहस है कि क्या मुलायम से अध्यक्ष पद छीना जाना जनता को नागवार गुजरा था? विधानसभा चुनाव में क्या यह भी 'गुप्तÓ मुद्दा था। समाज विज्ञानियों का कहना है कि उत्तर प्रदेश ऐसा राज्य है, जहां 'राजा रामचन्द्रÓ के स्थान पर 'वनवासी श्रीरामÓ की पूजा-अर्चना ज्यादा होती है। पिता की आज्ञा मान भगवान राम वन गये थे, ऐसे में यह फैसला निश्चित रूप से सपा प्रत्याशियों के खिलाफ गया होगा। 
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तब क्या कहा गया
'मैं नेताजी का जितना सम्मान पहले करता था, राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर उससे ज्यादा करूंगा। नेताजी का जो स्थान है, वह सबसे बड़ा है। मैं, नेताजी का बेटा हूं और रहूंगा। यह रिश्ता कोई खत्म नहीं कर सकता। परिवार के लोगों को बचाना पड़ेगा तो वह काम भी करूंगा।ÓÓ
- अखिलेश यादव (एक जनवरी-2017 राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त होने के बाद)
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'दो व्यक्तियों ने साजिश कर अखिलेश को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया। संसदीय बोर्ड की बैठक के बगैर टिकट बांट दिए, ये लोग नहीं चाहते कि अखिलेश फिर सीएम बनें।Ó
- प्रो. रामगोपाल यादव (एक जनवरी-2017 कोअधिवेशन में)

UP ELECTION MUSLIM @-2

मुस्लिम बहुलता वाली विधानसभा सीटें, जहां समाजवादी पार्टी के मुस्लिम प्रत्याशी दूसरे नंबर पर रहे। और उन्हें मिले मत।
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अलीगढ़-जफर आलम -९८३१२
इलाहाबाद (दक्षिण)-परवेज टंकी-६४४२४
बदायूं-आबिद रजा-७०८४७
बहराइच -रूबाब सईदा-८०७७७
बांगरमऊ-बदलू खां ५९३३०
बढ़ापुर
भोजीपुरा-सहजिल इस्लाम-७२६१७
भोजपुर-अरशद जमाल-५८७९६
बिसालपुर-अनीस बाबू (कांग्रेस) ६२५०२
बिसवां-अफजाल कौसर-७१६७२
दीदरगंज-आदिल शेख-५८४८०
भदोही-जाहिदबेग-७८४१४
फिरोजाबाद-अजीम भाई-६०९२७
हसनपुर-कमाल अख्तर-८३४९९
कांठ-अनीसुर्रहमान-७३९५९
किठौर-शाहिद मंजूर-७९८००
कोएल-अज्जू इशहाक-४२८५१
कुर्सी-फरीद महफूज किदवई-७९७२४
लखनऊ पश्चिम-मोहम्मद रेहान-७९९५०
मीरापुर-लियाकत अली
मुरादाबादनगर-यूसुफ अंसारी-१,२०२७४
नौगांव सादात-जावेद अब्बास-७६३८२
नूरपुर-नईमुल हसन-६६४३६
पथरदेवा-शाकिर अली-५६८१५
फाफामऊ-अंसार अहमद-५७२५४
फूलपुर-मंसूर आलम-६७२९९
रामपुर कारखाना-फसीहा मंजर
रुदौली-अब्बास अली-५९०५२
संडीला-अब्दुल मन्नान-६९९५९
शाहजहांपुर-तनवीर खान-८१५३१
श्रावस्ती-मो.रमजान-७८९९२
सिकंदरपुर-जिया उद्दीन रिजवी-४५९८८
सिवालखास-गुलाम मोहम्मद-६१४२१
श्रीनगर-मीराबानो-५८००२
टांडा-अजीमुल पहलवान-७३०४३
उतरौला-आरिफ अनवर हाशमी-५६०६६

UP ELECTIONS MUSLIM-1

 मुस्लिम बहुल सीटों पर जमकर बंटे वोट, खिला कमल
नोट : टैली अवश्य लगाएं। टैली को अपडेट किया गया है।
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- 28 सीटों पर सपा-बसपा में मतों के बंटवारे का लाभ भाजपा को
- कई क्षेत्रों में दोनों दलों का जोड़ भाजपा के जीते प्रत्याशी से 30 से 40 हजार तक ज्यादा
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लखनऊ : इधर जायें या उधर! मुसलमानों के इसी असमंजस ने मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भारतीय जनता पार्टी का 'कमलÓ खिला दिया। 'साइकिलÓ पंक्चर हुई। 'हाथीÓ ठहर गया। हां, रामपुर, मुरादाबाद, आजमगढ़ की जिन सीटों पर इस वर्ग ने स्पष्ट फैसला लिया, वहां सपा या बसपा के प्रत्याशी जीत का परचम फहराने में कामयाब रहे हैं। 28 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां बसपा, सपा-कांग्रेस गठबंधन के मतों का जोड़ भाजपा के जीतेप्रत्याशी से कई हजार अधिक होता है।
प्रदेश में राजनीतिक बयार की आहट के साथ 'सेकुलरÓ दलों के नुमाइंदे मुस्लिम वोटों की छीना-झपटी में लग जाते हैं। इसकी मुख्य वजह इनकी आबादी 19.5 फीसद से अधिक होना है। यूं तो 120 विधानसभा क्षेत्रों में इस वर्ग के लोग हार-जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, मगर 72 विधानसभा क्षेत्रों में इनकी आबादी 30 फीसद से अधिक है। बावजूद इसके कहीं क्षेत्रीय समीकरण, कहीं पंथ को  लेकर इस संप्रदाय में ऐसा मतभेद है कि  वह सियासी रहनुमा चुनने में भी एकजुट नहीं हो पाते। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव परिणाम के आंकड़ों से साफ है कि मुसलमानों के वोटों में जमकर बंटवारा हुआ। जिन 28 क्षेत्रों में उनकी आबादी 30 फीसद से भी ऊपर है, वहां भी भाजपा ने 'कमलÓ खिला दिया।
मुस्लिम बहुल अलीगढ़ में सपा व बसपा के मुस्लिम प्रत्याशियों को हासिल मतों का जोड़ भाजपा के विजयी प्रत्याशी को मिले मतों से भी दस हजार ज्यादा होता है। इलाहाबाद दक्षिण में यह जोड़ भाजपा के जीते प्रत्याशी से 16 हजार अधिक है। बहेड़ी में बसपा प्रत्याशी को 66009 और सपा को 63841 मत मिले। यानी भाजपा प्रत्याशी से 22 हजार अधिक। बांगरमऊ में सपा को 59330, बसपा को 44730 मत मिले जबकि भाजपा के विजयी प्रत्याशी को 87657 मत मिले। सपा-बसपा के मतों को जोड़ दिया जाए तो वह भाजपा प्रत्याशी के मतों से 17 हजार अधिक है।
बड़ापुर में कां्रग्रेस को 68920, बसपा को 50684 मत मिले। इनका योग भाजपा के विजयी प्रत्याशी को मिले मतों से 40 हजार से अधिक है। इसी तरह चायल, तुलसीपुर और नानपारा में मतों के विभाजन में भाजपा को जीत मिली। भोजीपुरा में सपा को 72617 व बसपा 49882 मिले जो भाजपा के विजयी प्रत्याशी से 22 हजार अधिक है। इसी तरह सपा-बसपा के मुस्लिम प्रत्याशियों का जोड़ चायल में चार हजार, देवबंद में 26 हजार, कांठ में 41 हजार और मेरठ दक्षिण में 34 हजार अधिक है। ये सभी क्षेत्र मुस्लिम बहुल माने जाते हैैं। मुस्लिम राजनीति का लंबे समय से अध्ययन कर रहे अभय कुमार कहते हैं कि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव व 2017 के विधानसभा चुनाव के परिणामों ने यह साबित कर दिया है कि मुसलमान मत एकजुट नहीं होता है। उसमें कतिपय कारणों से सीधा बंटवारा होता है। गैर भाजपा दलों को इन परिणामों की रोशनी में आगे की रणनीति तैयार करनी होगी।
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इन क्षेत्रों में बंटे मुस्लिम मत, जीती भाजपा
 क्षेत्र  सपा  बसपा  योग  भाजपा अंतर
अलीगढ़-  98312  25704  124016  113752 10264
बहेड़ी  66009  63841 129850 108846  21004
बांगरमऊ  59330  44730 104060 87657 16403
भोजीपुरा  72617  49882  122499 100381 22118
बुलंदशहर  24119  88454  112573 111538  1035
चांदपुर  36531  56696  93227  92345  822
देवबंद  55385  72844  128229 102244 25985
फिरोजाबाद  60927  51387  112314  102654  9660
कांठ  73959  43820  117779 93022  24757
लखनऊ (पश्चिम)- 79950  36247 116197  93022 23175
मीरापुर- 68842  39689  108531 69035 39496
मेरठ (दक्षिण)- 69117  77830  146947  113225 33722
मुरादाबाद नगर- 120274  24650 144924  123467 21457
नूरपुर- 67643  25430 93073  86312 6761  
फूलपुर- 67299 50421 117720 93912 23808
सरधना 76296 57239 133535 97921 35614
शाहाबाद : 15767 95364 111131 99624 11507
उतरौला- 56066  44799 100865 85240 15625
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निचले पायदान पर मुस्लिम नुमाइंदगी
उत्तर प्रदेश की राजनीतिक दशा-दिशा तय करने में मुस्लिम वोटरों की 'भूमिकाÓ सीमित होने को है? 2014 के लोकसभा में प्रदेश से मुस्लिमों की नुमाइंदगी 'शून्यÓ होने के बाद अब विधानसभा में प्रतिनिधित्व न्यूनतम संख्या पर पहुंच गया है।
प्रदेश की राजनीति में मुसलमानों की भूमिका अहम रही है। कभी कांग्रेस इस वर्ग के वोटों को अपनी थाती समझती थी। मंडल-कमंडल के दौर में सपा-बसपा ने नई सियासी गोलबंदी का सिलसिला शुरू किया और मुसलमानों को उसमें शामिल किया। जिससे विधानसभा में इस वर्ग की नुमाइंदगी बढऩी शुरू हुई। 1996 में 39 मुस्लिम विधायक बने। 2002 में यह संख्या-44 हुई। 2007 में यह संख्या-56 तक पहुंची। और 2012 केविधानसभा चुनाव में रिकार्ड 68 मुस्लिम विधायक निर्वाचित हुए। मगर, 2014 लोकसभा चुनाव में सियासी चौसर कुछ इस अंदाज में बिछी कि मुस्लिम वोट बिखर गया और  भाजपा ने टिकटों की हिस्सेदारी से मुसलमानों को दूर रखकर 81 बनाम 19 का जो दांव चला उससे संसद में उत्तर प्रदेश से मुस्लिमों की नुमाइंदगी शून्य हो गई। विधानसभा चुनाव में भाजपा ने तीन साल पुराना नुस्खा आजमाया और यह न सिर्फ कारगर रहा। क्योंकि मुस्लिम मतों में हमेशा की तरह फिर बंटवारा हुआ। आश्चर्यजनक बात यह रही है कि मुजफ्फरनगर समेत ढेरों दंगों के बावजूद मुसलमानों के बड़े वर्ग ने सपा के साथ रहना पसंद किया। जबकि बसपा ने सौ मुसलमानों को टिकट देकर उन पर भारी दांव लगाया था।
बात आंकड़ों की हो मुस्लिमों की आबादी 19.5 के करीब है। 26 जिलों की 120 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैैं जहां उनकी आबादी 20 से 35 फीसद तक है। मगर चुनाव परिणाम ने यह साबित किया है कि यह आबादी उलटफेर में उस अंदाज में कारगर नहीं है, जिसका शोर किया जाता रहा है। विधानसभा चुनाव के परिणामों से साफ है कि आने वाले चुनाव में मुस्लिम एक फैक्टर तो रहेगा मगर वह 'वोट बैैंकÓ के रूप में पढ़ा नहीं किया जा सकेगा। मुसलमानों की तरक्की के लिए लंबे समय से काम कर रहे अभय कुमार कहते हैं कि राजनीतिक दलों को यह समझना चाहिए कि मुसलमान सिर्फ मुसलमान नहीं है। इस संप्रदाय में भी अगड़े-पसमांदा (अगड़े-पिछड़े) के बीच खासा मतभेद है। वह बरेलवी, देवबंदी, हनफिया, सुन्नी, शिया, कादरिया समेत ढेरों फिरकों में बंटा हुआ है, इस बंटवारे का असर चुनावों दिखना स्वाभाविक ही है।
अब तक यूपी में मुस्लिम विधायक
1951-44
1957-37
1962-29  
1967-24
1969-34
1974-40
1977-48
1980-49
1985-50
1989-41
1991-23
1993-31
1996-39
2002-44
2007-56
2012-68
2017-25
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Thursday, 2 February 2017

2 jan 2017- अखिलेश ने बदले सुर, कहा-पहले मुलायम

मुलायम ने अधिवेशन टाल बंद रखी 'मुठ्ठीÓ
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-सपा का पांच जनवरी को प्रस्तावित राष्ट्रीय अधिवेशन स्थगित
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लखनऊ : रविवार को जिस मैदान पर अखिलेश यादव की राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर ताजपोशी की गयी, उसी स्थान पर 5 जनवरी को प्रस्तावित अधिवेशन को टाल कर सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने मुठ्ठी बंद ही रहने देने का काम किया। प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव ने सोमवार को प्रात: करीब पौने पौ बजे ट्वीट के जरिये अधिवेशन को स्थगित करने की जानकारी दी।
इस जवाबी सम्मेलन को घोषणा के मात्र 17 घंटे के भीतर ही टाल देने को मुलायम सिंह यादव का रणनीतिक फैसला माना जा रहा है। दरअसल अपनों से सियासी वजूद बचाने की जंग में उलझे सपा सुप्रीमो अभी नहीं चाहते कि सम्मेलनों में भीड़ के जुटान को लेकर रस्साकसी बढ़ाई जाए। लोगों को यह आकलन करने का अवसर भी न मिले कि भीड़ किसने अधिक जुटायी और कौन नेता किस पाले में है? मुख्यमंत्री अखिलेश के सम्मेलन में अधिकतर मंत्री व विधायकों के पहुंचने के बाद से शिवपाल खेमा हैरान है। मुलायम सिंह को हटाकर अखिलेश को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाते समय मंच पर अधिकतर मंत्री मौजूद थे। जिसमें कई ऐसे चेहरे भी थे जिनको शिवपाल के खेमे का माना जाता है। मंत्री व विधायकों को पाला बदलते देखकर शिवपाल खेमे को पांच जनवरी का अधिवेशन फ्लाप होने का डर भी सता रहा था। बता दे कि गत दिनों विधायकों की बैठक अलग अलग बुलाए जाने पर मुख्यमंत्री अखिलेश का पलड़ा भारी पड़ा था। तब मुख्यमंत्री आवास पर जहां दो सौ से अधिक विधायक एकत्र हुए थे, वहीं पार्टी कार्यालय में शिवपाल यादव के बुलावे पर दो दर्जन से ज्यादा विधायक जमा नहीं हो सके थे।
कानूनी कार्रवाई कमजोर पडऩे का डर : अधिवेशन स्थगित करने की वजह कानूनी कार्रवाई कमजोर पडऩे की आशंका को भी बताया जा रहा है। जानकारों का कहना है कि अखिलेश व रामगोपाल के अधिवेशन को जिन कारणों से असंवैधानिक करार देने की बात कही जा रही है। उसमें कई कारण पांच जनवरी को प्रस्तावित अधिवेशन पर भी लागू होते। मसलन अधिवेशन आहूत करनेे से पहले अनिवार्य 15 दिन का समय भी नहीं दिया गया था। अखिलेश समर्थक विधानपरिषद सदस्य उदयवीर सिंह ने इन कारणों को प्रचारित करना शुरू कर दिया था। ऐसे में अधिवेशन की वैधानिकता पर सवाल खड़े होते तो मुलायम सिंह यादव की राष्ट्रीय अध्यक्षता को चुनाव आयोग में  बचाए रखना भी मुश्किल होता।
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 अखिलेश ने बदले सुर, कहा-पहले मुलायम
- मुख्यमंत्री का रुख नरम, साइकिल फ्रीज होने का डर
- कुछ विधायकों, प्रत्याशियों से मिले अखिलेश यादव
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लखनऊ : रविवार को विशेष अधिवेशन में मुलायम सिंह यादव को बेदखल कर समाजवादी पार्टी का अध्यक्ष पद संभालने वाले मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सोमवार को अपना रुख एकदम से नरम कर लिया। कुछ विधायकों, एमएलसी से मुलाकात में कहा 'पहले मुलायम सिंह जिंदाबाद, फिर मेरी बात होनी चाहिए। क्षेत्र में जाइए। चुनाव की तैयारी तेज कीजिए। 2017 में फिर सरकार बनानी है।Ó
यूं मुख्यमंत्री ने किसी को बुलाया नहीं था, मगर कई विधायक, एमएलसी साढ़े नौ बजे सुबह ही उनके घर पहुंच गए। कुछ ने राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने पर मुबारकबाद दी। साथ खड़े रहने का वादा किया। क्षेत्र में कार्य कराने का प्रार्थना पत्र दिया। मुख्यमंत्री ने विधायकों से कहा कि नेताजी (मुलायम सिंह यादव) से मिलते रहिए। उनका सम्मान कम नहीं होना चाहिए। मुझसे पहले नेताजी जिंदाबाद का नारा लगाया जाए। मुख्यमंत्री आवास से निकले चरखारी के पूर्व विधायक कप्तान सिंह ने कहा कि क्षेत्र में रहने व जनता को सरकार के काम बताने का निर्देश मिला है। सूत्रों का कहना है कि मुलायम सिंह ने जिस अंदाज में चुनाव आयोग के साथ विशेष अधिवेशन व साइकिल चिन्ह को लेकर पत्राचार किया है, उससे 'साइकिलÓ फ्रीज होने की आशंका बढ़ी है। इससे होने वाले सियासी नुकसान से वाकिफ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपना रुख पहले से कहीं अधिक नरम किया है। विधायकों के जरिये यह संदेश दिया कि 'वह सपा के संस्थापक मुलायम सिंह का सम्मान कम नहीं होने देंगे।Ó आजमगढ़ से विधायक बृजलाल ने बताया कि मुख्यमंत्री ने कहा कि मुलायम नारा पहले लगाया जाए। विधायक नाहिद हसन ने मुख्यमंत्री ने मुलायम सिंह को सर्वोपरि मानकर नारा लगाने को कहा है। यह भी कही है कि बिना बुलाए लखनऊ न आएं। विधायकों के बाद अखिलेश ने नवमनोनीत प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम, करीबी एमएलसी उदयवीर, सुनील यादव साजन व बर्खास्त युवा ब्रिगेड के साथ सदस्यों की चर्चा की।
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फरियादियों से मिले, सरकारी काम निपटाया
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पांच कालिदास परिसर में बने जनसुनवाई सभागार में फरियादियों की समस्या सुनी। इनमें से कुछ लोग नौकरी की चाहत में आए थे। कुछ पुलिस उत्पीडऩ की शिकायत करने आए थे। जहानांबाद से आये राम निहोर, आकाश ने बताया कि पुलिस ने उनके खिलाफ फर्जी मुकदमा लिया दिया है। मुख्यमंत्री को प्रार्थना पत्र दिया। कार्रवाई का आश्वासन मिला है। सूत्रों का कहना है सरकारी कामकाज के अलावा मुख्यमंत्री ने दिल्ली में चुनाव आयोग में चल रही गतिविधियों पर भी नजर बनाए रखी।
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नेताजी निकालें अमर को और रामगोपाल को अखिलेश
-सपाइयों ने सुलह फार्मूले के साथ मुलायम-अखिलेश को लिखे पत्र
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लखनऊ : कहते हैं राजनीति में संभावनाएं कभी खत्म नहीं होती ! इसी भरोसे कुछ समाजवादियों ने मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव को आपस में सुलह कर लेने का सुझाव देना शुरू किया है। दोनों नेताओं को पत्र लिखे जा रहे हैं। कुछ ने सुलह का फार्मूला भी सुझाया है।
'साइकिलÓ चिन्ह जब्त होने की आशंका से युवा व बुजुर्ग दोनों ही पीढिय़ां भयभीत हैं। सपा में संग्र्राम शुरू होने के बाद जहां नेताओं के 'पत्र बमÓ आग में घी का काम कर रहे थे, वहीं इस बार के पत्र शांति बनाने का प्रयास हैं। युवा सोशल मीडिया पर विचार रख रहे हैं। ज्यादातर का मानना है कि पार्टी को मुलायम का आशीïर्वाद जरूरी है, वरना चुनाव में नुकसान होगा और पार्टी केपन्नों पर बदनुमा कहानी भी दर्ज होगी।
सपा के छठवें अधिवेशन के संयोजक रहे गोपाल अग्रवाल ने मुलायम व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव दोनों को पत्र लिखा है। मुलायम को भेजे पत्र में उन्होंने कहा है कि समाजवादी आंदोलन बिखरने से बचाने के लिए परिवार में एका जरूरी है। परिवार का सर्वेसर्वा होने के नाते मुलायम को खुद प्रयास करने में हिचक नहीं होनी चाहिए जबकि अखिलेश को लिखे पत्र में उन्होंने कहा है कि उन्हें पिता को मनाने का प्रयास करना चाहिए। बुंदेलखंड के एक प्रमुख सपा नेता इम्तियाज खां ने अपने पत्र में अखिलेश यादव को सपा का भविष्य बताते हुए नेताजी को हालात संभालने का सुझाव दिया गया है। कुछ कार्यकर्ताओं ने अमर सिंह के साथ राम गोपाल को भी बाहर का रास्ता दिखाकर हालात संभालने का सुझाव दिया है।
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सुलह का फार्मूला
-अखिलेश यादव राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर अपने मनोनयन को स्वत: खारिज कर, मुलायम को राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वीकारें
-अखिलेश यादव को प्रदेश अध्यक्ष व संसदीय बोर्ड का मुखिया बनाया जाए
-शिवपाल यादव को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर, राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त किया जाए
-प्रो.राम गोपाल, अमर सिंह को सपा से निकालकर उनकी प्राथमिकता सदस्यता रद की जाए
 -दोनों पक्ष चुनाव आयोग में दाखिल किए जा रहे दस्तावेज वापस लें
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हटो नहीं चाहिए, सुरक्षा
लखनऊ : सुरक्षा कर्मियों के प्रति रवैया नरम रखने वाले मुलायम सिंह यादव राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से बेदखल होने की सूचना मिलने पर सुरक्षाकर्मियों पर भड़क गये। विक्रमादित्य मार्ग स्थित आवास पर तैनात 'सीएम सिक्योरिटीÓ के जवानों को डपटते हुए कहा कि 'हटो, नहीं चाहिए तुम्हारी सुरक्षा।Ó बाहर जाओ। अपनी सुरक्षा कर सकता हूं। हालांकि सुरक्षा कर्मी कुछ दूर हटकर रुक गये। ध्यान रहे, मुख्यमंत्री शाम को विक्रमादित्य मार्ग स्थित आवास पर रहते हैं, इसके चलते वहां सीएम सिक्योरिटी के जवान भी सुरक्षा के लिए नियुक्त हैं। सुरक्षा कर्मियों को डांटने के बाद मुलायम अलग-अलग कमरों में मौजूद समर्थकों से जाकर मिलते रहे। सामान्यत: वह आगंतुकों को अपने कक्ष में बुलाकर मिलते हैं।

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चाचा के फैसले का विरोध करना पसंद आया अखिलेश को
- ददुआ के भाई की सपा में दाखिले के खिलाफ थे नरेश उत्तम
- ददुआ के बेटे को टिकट का भी किया था विरोध
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परवेज अहमद, लखनऊ : मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपनी ओर से नरेश उत्तम को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर राजनीति के अपराधीकरण का विरोध करने वालों को महत्व देने का संदेश दिया है। प्रदेश में जब ददुआ के आतंक का डंका बजता था और वह बुंदेलखंड की सियासी दिशा तय करने में प्रभावी था, उस समय नरेश उत्तम ने उसके भाई बाल कुमार को पार्टी में लेने का मुखर विरोध किया था, हालांकि इसकी सजा के तौर पर उनका टिकट काट दिया गया था।
 वर्ष 2000 में शिवपाल यादव की सिफारिश पर ददुआ के भाई बाल कुमार का सपा में प्रवेश कराया गया, जिसका नरेश उत्तम ने विरोध किया था। उन्होंने धरना प्रदर्शन तक किए। वह आंदोलन शिवपाल को इतना अखरा था कि 2002 के विधानसभा चुनाव में नरेश उत्तम का टिकट कट गया। उनकी परंपरागत जहानाबाद सीट पर मदन गोपाल वर्मा को प्रत्याशी बना दिया गया तो उन्होंने कोई विरोध नहीं किया। इसके बाद मुलायम सिंह ने नरेश उत्तम को तवज्जो देना शुरू कर दिया और अपने संसदीय चुनावों का प्रभारी बनाया। लगातार दो बार उन्हें एमएलसी बनाया गया। 17 अति पिछड़ी जातियों को एससी का दर्जा दिलाने के अभियान में गायत्री के साथ उन्हें भी लगाया गया था। इस दौरान भी नरेश राजनीति के अपराधीकरण के विरोध में खड़े रहे। वर्ष 2012 में अखिलेश प्रदेश अध्यक्ष बने तो उन्होंने नरेश उत्तम को अपनी कमेटी में प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया।
चाचा भतीजे के बीच शुरू हुई कलह के बाद शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी सौंपी गई तो नरेश उनकी कमेटी से बाहर हो गए। राजनीति में अपराधियों के प्रवेश के मुखर विरोधी नरेश उत्तम अखिलेश को इतना भाये कि उन्हें सीधे पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी ही सौंप दी। उनका कुर्मी होना भी उनके पक्ष में एक कारण बना। इस तरह अखिलेश ने भाजपा के पिछड़ा कार्ड का जवाब देने का प्रयास तो किया ही है, अपना दल के प्रभावशाली कुर्मी नेताओं का कद भी नापा है। सूत्रों का कहना है कि सोमवार को प्रदेश अध्यक्ष के साथ मीटिंग में अखिलेश यादव ने उन्हें कुर्मी वोटों को पाले में करने का जिम्मा दिया है। बाराबंकी की रामनगर सीट से बेनी वर्मा के बेटे को शिवपाल द्वारा प्रत्याशी घोषित करनेके दांव की घेरेबंदी करना भी इस नियुक्ति का मकसद हो सकता है।
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तीन घंटे कार्यालय में बैठे
नरेश उत्तम सोमवार को तकरीबन तीन घंटे तक सपा कार्यालय में रहे। हालांकि इस दौरान दफ्तर में पूरी तरह सन्नाटा रहा। आम दिनों में वहां मौजूद रहने वाले समर्थक, कर्मचारियों में से भी अधिकतर गायब थे। इसे बदले निजाम के प्रभाव के रूप में देखा जा रहा है। बताया गया है कि शीर्ष स्तर की ज्यादातर इकाइयां कुछ दिन बंद रखने की हिदायत दी गई थी जिसके चलते कर्मचारी भी नहीं पहुंचे।

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पिता-पुत्र की 'जंगÓ में खुद का नफा देख रही बसपा
- सपा में दंगल से मुस्लिम मतों में भ्रम का फायदा उठाने की कोशिश
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लखनऊ : समाजवादी पार्टी में वर्चस्व को लेकर पिता-पुत्र की 'जंगÓ में बहुजन समाज पार्टी खुद का नफा देख रही है। नेतृत्व को पूरा भरोसा है कि मुस्लिम मतों में फैलते भ्रम का सर्वाधिक फायदा उसे ही मिलेगा।
पांचवी बार सूबे की सत्ता में काबिज होने की कोशिश में लगी बसपा दलित-मुस्लिम गठजोड़ को पुख्ता करने में कोई कसर नहीं छोडऩा चाहती है। वर्ष 2012 में सपा के हाथों राज्य की सत्ता गंवाने वाली बसपा का मानना है कि यदि मुस्लिम उसके साथ आ जाएं तो दलित-मुस्लिम गठजोड़ से सरकार बनना तय है। लेकिन सपा सरकार द्वारा मुस्लिम समाज के लिए किए गए कार्यों और मुलायम सिंह के प्रति मुस्लिमों के लगाव के चलते मुस्लिम समाज को सपा से अलग करना बसपा के लिए बड़ी चुनौती माना जाता है। इस बात को बसपा भी समझ रही थी कि राज्य में कांग्रेस की स्थिति अच्छी नहीं है इसलिए विधानसभा चुनाव में मुस्लिम मतों के कांग्रेस के बजाय सपा में धुव्रीकरण से उसका ही नुकसान होगा।
हालांकि, चार माह पहले सितंबर से समाजवादी परिवार में शुरू हुई कलह विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अब जिस तरह से पिता-पुत्र के बीच जंग में तब्दील होती दिख रही है उसमें बसपा को खुद का फायदा दिखाई दे रहा है। 'जंगÓ पर बसपा के वरिष्ठ नेता खुल कर तो कुछ नहीं बोल रहे हैं लेकिन उनका कहना है कि भले ही यह पारिवारिक ड्रामा हो लेकिन इससे मुस्लिम समाज में सपा को लेकर भ्रम ही पैदा हो रहा है। भ्रम के चलते मुस्लिम मतों में बटवारे से भाजपा को होने वाले फायदे का डर दिखाकर बसपा प्रमुख मायावती भी मुस्लिम समाज को यही समझाने में लगी हैं कि वह अपना मत सपा को न देकर बसपा को ही दें।
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दलित मुस्लिम एका जीत की गारंटी : बसपा अपनी पूरी ताकत मुस्लिमों को यह समझाने में लगी है कि भाजपा को हराना है तो दलित मुस्लिमों को एकजुट रहना होगा। 19 फीसद मुस्लिम व 21 प्रतिशत दलितों की आबादी का गणित भी भाईचारा समितियों की बैठकों में समझाया जा रहा है। बसपा शासन में मुस्लिम हित में किए कार्यो की एक पुस्तिका प्रकाशित कराकर वितरित की जा रही है।  
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मुलायम बिन मुस्लिमों को नहीं लुभा पाएगी सपा
- राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से मुलायम सिंह को हटाने से मुस्लिमों की बेचैनी बढ़ी
- नाम न छापने की शर्त पर कई विधायकों ने खोली जुबान
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लखनऊ : समाजवादी पार्टी में आर-पार की लड़ाई ने मुस्लिमों को सबसे ज्यादा बेचैन किया है। वह मुलायम सिंह को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाने के फैसले को जोखिम भरा मान रहे हैं। मुख्यमंत्री से जुड़ा मामला होने के कारण वह जुबान नहीं खोल रहे हैं, मगर इशारे कहते हैं कि 'रहनुमाÓ (मुलायम) को हटाने का यह अंदाज उन्हें रास नहीं आया है।
रविवार को जनेश्वर मिश्र पार्क के विशेष राष्ट्रीय अधिवेशन में भाग लेने आए पूर्वी उप्र के एक मुस्लिम नेता का कहना है कि मुसलमान अब तक मुलायम सिंह को ही अपना हमदर्द मानता है, जबकि प्रो.राम गोपाल को लेकर उसकी 'अरुचिÓ है। ऐसे में मुलायम को जिस तरह राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाया गया, उससे उनके लाखों प्रशंसकों के दिल पर चोट लगी है। विधानसभा चुनाव से पहले हालात नहीं सुधारे गए तो मुश्किलें बढऩे से इन्कार नहीं किया जा सकता।
बुलंदशहर की सिकंदराबाद सीट से टिकट मांग रहे एक नेता का कहना है कि मुलायम को आगे किए बिना मुस्लिमों को लुभाना आसान नहीं होगा। पश्चिम उप्र में वैसे भी बसपा का दलित-मुस्लिम गणित समाजवादी पार्टी पर भारी पड़ता रहा है। सोमवार को मुख्यमंत्री आवास पर पहुंचने वालों में भी मुस्लिम नेताओं की संख्या कम रहीं जबकि दिल्ली पहुंचे मुलायम से सबसे अधिक मुस्लिम ही मिले। गत दिवस के घटनाक्रम से हैरत में एक महिला मुस्लिम विधायक का कहना है कि भाजपा को रोकना है तो समाजवादी झगड़ा तत्काल रोकना होगा। उनका कहना है, मुख्यमंत्री की लोकप्रियता बेशक सबसे ज्यादा है मगर मुसलमान अभी मुलायम को ही अपना रहनुमा मानते है।
बिन साइकिल होगी मुश्किल : सपा का चुनाव साइकिल आपसी कलह में गवांने का डर भी कार्यकर्ताओं को सता रहा है। मुख्यमंत्री को बधाई देकर लौटे पश्चिम उप्र के एक विधायक का कहना है कि साइकिल चिन्ह बचना सबसे अधिक जरूरी है। चुनाव नजदीक है। साइकिल के स्थान पर नए चुनाव निशान को जनता में लोकप्रिय बनाना आसान नहीं होगा। इस मुस्लिम विधायक को अब भी उम्मीद है कि साइकिल के लिए सही समाजवादी परिवार में जल्द एका हो जाएगा।
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अखिलेश ने बदले सुर, कहा-पहले मुलायम
- मुख्यमंत्री का रुख नरम, साइकिल फ्रीज होने का डर
- कुछ विधायकों, प्रत्याशियों से मिले अखिलेश यादव
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लखनऊ : रविवार को विशेष अधिवेशन में मुलायम सिंह यादव को बेदखल कर समाजवादी पार्टी का अध्यक्ष पद संभालने वाले मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सोमवार को अपना रुख एकदम से नरम कर लिया। कुछ विधायकों, एमएलसी से मुलाकात में कहा 'पहले मुलायम सिंह जिंदाबाद, फिर मेरी बात होनी चाहिए। क्षेत्र में जाइए। चुनाव की तैयारी तेज कीजिए। 2017 में फिर सरकार बनानी है।Ó
यूं मुख्यमंत्री ने किसी को बुलाया नहीं था, मगर कई विधायक, एमएलसी साढ़े नौ बजे सुबह ही उनके घर पहुंच गए। कुछ ने राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने पर मुबारकबाद दी। साथ खड़े रहने का वादा किया। क्षेत्र में कार्य कराने का प्रार्थना पत्र दिया। मुख्यमंत्री ने विधायकों से कहा कि नेताजी (मुलायम सिंह यादव) से मिलते रहिए। उनका सम्मान कम नहीं होना चाहिए। मुझसे पहले नेताजी जिंदाबाद का नारा लगाया जाए। मुख्यमंत्री आवास से निकले चरखारी के पूर्व विधायक कप्तान सिंह ने कहा कि क्षेत्र में रहने व जनता को सरकार के काम बताने का निर्देश मिला है। सूत्रों का कहना है कि मुलायम सिंह ने जिस अंदाज में चुनाव आयोग के साथ विशेष अधिवेशन व साइकिल चिन्ह को लेकर पत्राचार किया है, उससे 'साइकिलÓ फ्रीज होने की आशंका बढ़ी है। इससे होने वाले सियासी नुकसान से वाकिफ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपना रुख पहले से कहीं अधिक नरम किया है। विधायकों के जरिये यह संदेश दिया कि 'वह सपा के संस्थापक मुलायम सिंह का सम्मान कम नहीं होने देंगे।Ó आजमगढ़ से विधायक बृजलाल ने बताया कि मुख्यमंत्री ने कहा कि मुलायम नारा पहले लगाया जाए। विधायक नाहिद हसन ने मुख्यमंत्री ने मुलायम सिंह को सर्वोपरि मानकर नारा लगाने को कहा है। यह भी कही है कि बिना बुलाए लखनऊ न आएं। मुख्यमंत्री से मिलने वालों में एमएलसी एसआरएस यादव, साहब सिंह सैनी, कांग्र्रेस से सपा में आये मुकेश कुमार श्रीवास्तव, मौलाना बुखारी का दामाद व एमएलसी उमर अली और कई प्रत्याशी शामिल थे। विधायकों के बाद अखिलेश ने नवमनोनीत प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम के साथ चर्चा की। इसके अलावा मुख्यमंत्री ने पूर्व सांसद उदय प्रताप से भी मुलाकात की। उनसे मौजूदा परिस्थितियों पर चर्चा की।
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फरियादियों से मिले, सरकारी काम निपटाया
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पांच कालिदास परिसर में बने जनसुनवाई सभागार में फरियादियों की समस्या सुनी। इनमें से कुछ लोग नौकरी की चाहत में आए थे। कुछ पुलिस उत्पीडऩ की शिकायत करने आए थे। जहानांबाद से आये राम निहोर, आकाश ने बताया कि पुलिस ने उनके खिलाफ फर्जी मुकदमा लिया दिया है। मुख्यमंत्री को प्रार्थना पत्र दिया। कार्रवाई का आश्वासन मिला है। सूत्रों का कहना है सरकारी कामकाज के अलावा मुख्यमंत्री ने दिल्ली में चुनाव आयोग में चल रही गतिविधियों पर भी नजर बनाए रखी।
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फैसले के बाद राय कायम करूंगा: आजम
लखनऊ : समाजवादी परिवार का संग्राम शांत कराने का प्रयास विफल होने के बाद मंत्री आजम खां ने भी चुप्पी साध ली है, जबकि लोगों की निगाहें उनके कदम की ओर ही लगी रहीं। शाम को कुछ लोगों से बातचीत में आजम ने कहा कि पूरा मामला निर्वाचन आयोग में चला गया है, मुलायम सिंह दिल्ली में हैं। सुना है कि सुप्रीम कोर्ट भी मामला जा रहा है। कोई फैसला आने के बाद राय कायम करूंगा।
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मुलायम सिंह मुझे पार्टी से नहीं निकाल सकते हैं, मैं समाजवादी हूं समाजवादी रहूंगा। समाजवाद के लिए जेल भी जा चुका हैं। मेरे निष्कासन का जो लेटर जारी हुआ है, उस पर संभवत: मुलायम के फर्जी हस्ताक्षर हैं।
-किरनमय नंदा (सपा से निकाले जाने के बाद)
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देखिए मैं बीमार नहीं हूं: मुलायम
लखनऊ : समाजवादी पार्टी में तख्ता पलट के बाद मुलायम सिंह यादव ने कहा कि पार्टी मेरी है। प्रत्याशी घोषित हैं, वह चुनाव लड़ेंगे और जीतेंगे भी। चुनाव चिन्ह पर मेरे ही हस्ताक्षर होंगे। सोमवार को दिल्ली रवाना होने से पहले मुलायम ने मीडियाकर्मियों से कहा कि मैं बीमार नहीं हूं। आप देखिए, मैं ठीक हूं। मीडिया ने हमेशा मेरा साथ दिया है। मैंने कोई गलत काम नहीं किया। करप्शन नहीं किया है। इल्जाम लगा भी तो सुप्रीम कोर्ट ने बरी किया है। साइकिल तो मेरी ही है। इसी पर प्रत्याशी चुनाव लड़ेंगे और जीतेंगे भी।

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-बेनी प्रसाद वर्मा ने कहा, चुनाव आयोग करेगा निर्णय
-सपा में सब कुछ हो जाएगा ठीक : अंबिका चौधरी
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लखनऊ : सपा परिवार में मचा घमासान खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। रोज नया विवाद सामने आ रहा है। इस हाई वोल्टेज सियासी ड्रामे में सपाई दो खेमे में बंट गए हैं। वरिष्ठ नेताओं में भी कुछ मुलायम सिंह के साथ हैं तो कुछ अखिलेश यादव के। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कुंवर रेवतीरमण सिंह इलहाबाद से लखनऊ आकर डेरा डाले हुए हैं। वह बीच का रास्ता निकालने में जुटे हैं ताकि पिता-पुत्र में समझौता हो सके। उनका कहना है कि नेता जी (मुलायम सिंह यादव) चुनाव आयोग गए हैं। वहां से लौटने के बाद फिर दोनों के बीच बात कराई जाएगी। यह परिवार का झगड़ा है और इसे सुलझा लिया जाएगा। हमारी पूरी कोशिश होगी कि पार्टी में दो फाड़ न हो।
दूसरी ओर, बाराबंकी में पूर्व केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने कहा कि मुलायम ङ्क्षसह यादव चुनाव आयोग में गए हैं। आयोग के निर्णय की प्रतीक्षा की जानी चाहिए। पांच जनवरी को प्रस्तावित अधिवेशन टाल दिया गया है। यदि अधिवेशन होता तो वह उसमें जरूर शामिल होते। उन्होंने कहा कि जंग के वक्त रणनीति के बारे में बताया नहीं जाता। स्थिति को देखते हुए फैसले लिए जाते हैं। उन्होंने कहा कि राकेश को (बेनी के पुत्र) रामनगर विधानसभा सीट से ही चुनाव लड़ाएंगे। गौरतलब है कि जिन सीटों के प्रत्याशियों को लेकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जिद पर अड़े थे, उनमें बाराबंकी की रामनगर विधानसभा सीट भी शामिल है, जिस पर शिवपाल यादव की सूची में राकेश वर्मा को प्रत्याशी घोषित किया गया है। इसी सीट से ग्राम्य विकास मंत्री अरङ्क्षवद ङ्क्षसह गोप विधायक हैं।
वहीं, वरिष्ठ नेता व पूर्व मंत्री अंबिका चौधरी ने सोमवार देर रात टेलीफोन पर बताया कि मुलायम सिंह यादव हम सभी के सर्वमान्य नेता हैं और रहेंगे। उनकी बात कोई भी नहीं टालता। अखिलेश व मुलायम के बीच संबंधों की तल्खी पर अंबिका चौधरी ने माना कि कुछ दूरियां बढ़ीं हैं। मगर लगे हाथ यह भी कहा कि भरोसा रखिए, सब कुछ पहले जैसा ठीक हो जाएगा। सपा का यह शीर्ष कुनबा न टूटा है, न टूटेगा। मुलायम सिंह यादव द्वारा लखनऊ में पांच जनवरी को आहूत राष्ट्रीय अधिवेशन स्थगित करने के कारणों पर अंबिका चौधरी ने बताया कि राजनीति में यह सब चलता रहता है। इस अधिवेशन को राजनीतिक कारणों से ही रद किया गया है। भविष्य में नेताजी जब उचित समझेंगे, अधिवेशन की अगली तिथि तय कर देंगे। मुलायम सिंह यादव व मुझ समेत सपा के कुछ अन्य वरिष्ठ नेता चुनाव आयोग गए जरूर थे, मगर यह कार्यक्रम मुलाकात तक ही सीमित रहा। आयोग के साथ औपचारिक मुलाकात हुई, कुछ बातें हुईं और चाय पीकर हम सभी बाहर आ गए।
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मद्धिम ही निकला नए निजाम का पहला सूरज
- सपा का प्रदेश कार्यालय खुला पर नहीं दिखी पहले सी रौनक
लखनऊ : सोमवार को साल का पहला कार्यदिवस था तो समाजवादी पार्टी के नए निजाम का सूरज भी पहली बार निकला था। यह अद्भुत संयोग था कि आसमान में ढूंढने पर भी सूरज का नामोनिशान नहीं था तो इधर सपा के प्रदेश कार्यालय का भी नूर उड़ा हुआ था। खास तौर से प्रदेश में सरकार बनने के बाद बीते पांच साल से जिस माहौल को बिंदास और बेफिक्र जैसे अल्फाजों से पहचाना जाता था, वह सोमवार को पहले दिन ही पुलिस के पहरे में कड़ी पूछताछ के बीच सहमा सा कहीं दुबका हुआ था।
एक दिन पहले मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने की घोषणा के बाद मुख्यमंत्री समर्थकों ने प्रदेश कार्यालय पर कब्जा कर लिया था। पुलिस ने भी घेरेबंदी बढ़ा दी थी। रविवार को हुए इस ऐतिहासिक घटनाक्रम के बाद सोमवार को पहला कार्यदिवस होने के नाते सबकी निगाहें दिन भर होने वाले घटनाक्रम पर टिकी थीं। सुबह से ही मुख्यमंत्री के पांच, कालिदास मार्ग स्थित सरकारी आवास के बाहर जुटी फरियादियों की भीड़ बता रही थी कि परिवार का झगड़ा चाहे जो हो, लेकिन मुख्यमंत्री से लोगों की आस कम नहीं हुई है। जनता दरबार में इलाहाबाद से कई लोगों के साथ आए राकेश को उम्मीद थी कि मुख्यमंत्री तक उनकी शिकायत पहुंच जाएगी तो शायद उन्हें पुलिस उत्पीडऩ से भी छुटकारा मिल जाएगा।
उधर विक्रमादित्य मार्ग स्थित पार्टी के प्रदेश कार्यालय में नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम पहुंचे और दो घंटे काम किया। मुख्यमंत्री के ओएसडी जगजीवन प्रसाद ने भी कुछ देर काम निपटाया, लेकिन बाकी चहल पहल नदारत थी। न रोज की तरह वाहनों को कार्यालय में प्रवेश करने दिया जा रहा था और न ही सहज भाव से लोग भीतर आ पा रहे थे। गेट पर पूछताछ होने और भीतर जाने की स्पष्ट वजह होने पर ही लोगों को दाखिल होने दिया गया। इस बीच कार्यालय के गलियारे सन्नाटे में ही डूबे रहे। मुलायम के राजनीतिक सचिव रहे और वर्तमान में कार्यालय सचिव वीरेंद्र सिंह भी अपने दफ्तर नहीं पहुंचे। उधर मुलायम सिंह के आवास के बाहर भी सन्नाटा पसरा रहा।
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2017-jan 1 smajwadi partyःसपा में तख्तापलट


सपा में तख्तापलट
पिता को हटा कर अखिलेश बने राष्ट्रीय अध्यक्ष
- शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाया, अमर सिंह भी निष्कासित
- एमएलसी नरेश उत्तम को बनाया गया प्रदेश अध्यक्ष
- जवाबी कार्रवाई में मुलायम ने रामगोपाल, किरनमय नंदा, नरेश अग्रवाल को निकाला
''मैं नेताजी का जितना सम्मान पहले करता था, राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर उससे ज्यादा करूंगा। नेताजी का जो स्थान है, वह सबसे बड़ा है। मैं नेताजी का बेटा हूं और रहूंगा। यह रिश्ता कोई खत्म नहीं कर सकता। परिवार के लोगों को बचाना पड़ेगा तो वह काम भी करूंगा।ÓÓ
- अखिलेश यादव (राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किए जाने के बाद)
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''पार्टी के दो व्यक्तियों ने साजिश कर अखिलेश को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया। इसके बाद जो हुआ सबके सामने है। यहां मौजूद लोगों में बहुतों को निष्कासित कर दिया गया। संसदीय बोर्ड की बैठक के बगैर टिकट बांट दिए, ये लोग नहीं चाहते कि अखिलेश फिर सीएम बनें।ÓÓ
- प्रो. रामगोपाल यादव (अधिवेशन में)
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''यह अधिवेशन अवैध है। पार्टी संविधान के विरुद्ध है। अनुशासनहीनता करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है, संसदीय बोर्ड ने रामगोपाल के निष्कासन पर मंजूरी की मुहर लगाई है।ÓÓ -मुलायम सिंह यादव
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 लखनऊ : वर्चस्व की जंग में दो फाड़ हुई समाजवादी पार्टी (सपा) में नए साल की सुबह तख्तापलट हो गया। प्रतिनिधि अधिवेशन में मुलायम सिंह यादव को अध्यक्ष पद से हटाकर उनके पुत्र व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को सपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया। शिवपाल यादव को प्रदेश अध्यक्ष पद और अमर सिंह को पार्टी से बर्खास्त कर दिया गया। मुलायम को पार्टी के संरक्षक की भूमिका दी गई है। बौखलाए मुलायम ने जवाबी कार्रवाई करते हुए अधिवेशन को ही अवैध घोषित कर दिया, फिर अधिवेशन के सूत्रधार प्रो. रामगोपाल यादव, किरनमय नंदा और नरेश अग्रवाल को सपा से निष्कासित कर दिया। मुलायम ने पांच जनवरी को सपा का राष्ट्रीय सम्मेलन बुलाया है। दूसरी ओर अखिलेश ने विधान परिषद सदस्य नरेश उत्तम को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है।
ओहदा, अधिकार और वर्चस्व हासिल करने के प्रयासों में समाजवादी परिवार की कलह पहले संग्राम में बदली और फिर जनशक्ति प्रदर्शन के माध्यम से रविवार को राष्ट्रीय प्रतिनिधि सम्मेलन की शक्ल में सामने आई। राजधानी लखनऊ के जनेश्वर मिश्र पार्क में 25 बरस पहले समाजवादी पार्टी के गठन से लेकर अब तक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभाल रहे मुलायम सिंह को पद से बेदखल करने का अकल्पनीय फैसला किया गया। इसके साथ ही अखिलेश यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित किया गया। शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने के साथ परिवार में लड़ाई की जड़ ठहराए जाने वाले राज्यसभा सदस्य अमर सिंह को सपा से ही निष्कासित कर दिया गया। नवघोषित राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश को संसदीय बोर्ड, राष्ट्रीय कार्यकारिणी, आनुषांगिक संगठनों के पदाधिकारियों के चयन का अधिकार भी सौंप दिया गया।
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नेताजी के खिलाफ भी साजिश
राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर ताजपोशी के बाद चंद मिनट के भावुकता भरे भाषण में अखिलेश यादव ने कहा, मुझे प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने के लिए उस व्यक्ति ने (इशारा अमर सिंह की ओर) टाइपराइटर मंगवाया था। नेताजी ने मुझे मुख्यमंत्री बनाया था मगर इन लोगों ने मेरे खिलाफ साजिश कर न केवल पार्टी को नुकसान पहुंचाया बल्कि राष्ट्रीय अध्यक्ष (मुलायम सिंह) के सामने भी संकट पैदा किया। नेताजी के खिलाफ साजिश हो तो यह मेरी जिम्मेदारी है कि मैं ऐसे लोगों के खिलाफ बोलूं और कार्रवाई करूं। अब कार्रवाई कर रहा हूं।
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नए प्रदेश अध्यक्ष का दफ्तर पर कब्जा
शिवपाल की जगह प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए नरेश उत्तम ने अपने समर्थकों के साथ पहुंच कर पार्टी दफ्तर पर कब्जा कर लिया। शिवपाल के नाम की नेमप्लेट भी हटा दी गई।
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अधिवेशन में फैसले
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-अखिलेश राष्ट्रीय अध्यक्ष होंगे।
-मुलायम संरक्षक होंगे।
-शिवपाल प्रदेश अध्यक्ष पद से बर्खास्त।
-महासचिव अमर सिंह पार्टी से निष्कासित।
-अखिलेश पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी, संसदीय बोर्ड और सभी राज्य संगठनों को जरूरत के मुताबिक  गठित करने को अधिकृत।
-इन फैसलों की सूचना यथाशीघ्र निर्वाचन आयोग को उपलब्ध कराई जाए।

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मुलायम का पलटवार
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-पार्टी का रविवार को हुआ राष्ट्रीय अधिवेशन असंवैधानिक।
-अधिवेशन में लिए गए सभी फैसले अवैध।
-रामगोपाल यादव पार्टी से तिबारा छह साल के लिए बाहर।
-अधिवेशन में शामिल होने पर पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष किरनमय नंदा के साथ नरेश अग्रवाल भी निष्कासित।
-पार्टी द्वारा जारी की गई उम्मीदवारों की सूची अब नहीं बदलेगी।
-5 जनवरी को लखनऊ में पार्टी का आकस्मिक राष्ट्रीय अधिवेशन।
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इन सवालों के जवाब बाकी
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-अधिवेशन के लिए रामगोपाल और  अन्य को पार्टी से निष्कासित किया गया तो अखिलेश को क्यों नहीं?
-क्या मुलायम अब भी बेटे को अपने पाले में कर लेने की संभावना देखते हैं?
-बेटे के भारी पडऩे पर शनिवार को अखिलेश और रामगोपाल का निष्कासन समाप्त किया था, क्या फिर से मुलायम वैसा ही करने को मजबूर होंगे?
-क्या पार्टी औपचारिक तौर पर टूट जाएगी? पार्टी टूटने पर चुनाव चिह्न साइकिल पर कब्जा किसका?
-चुनाव आयोग अखिलेश, मुलायम में से किसका दावा मानेगा?
-क्या साइकिल चिह्न 'जब्तÓ हो जाएगा और दोनों गुट अलग-अलग निशान पर लड़ेंगे?
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 नेताजी से तो कोई कुछ भी फैसला करा ले
- अधिवेशन के मंच से अखिलेश ने जताई आशंका
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लखनऊ : समाजवादी कलह में जारी आरोप प्रत्यारोपों में मुलायम सिंह यादव की क्षमता पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने तो अधिवेशन के मंच से कहा कि नेताजी से कोई भी फैसले करा सकता है। ये तीन-चार महीने बहुत महत्वपूर्ण हैं। न जाने नेताजी से मिलकर कौन क्या फैसला करवा दे? न जाने कौन क्या टाइप करा दे?
बता दें कि राष्ट्रीय प्रतिनिधि अधिवेशन से पूर्व मुलायम सिंह यादव ने पत्र जारी कर अधिवेशन को असंवैधानिक और उसमें पारित हुए प्रस्तावों को अवैध करार दिया था। साथ ही अधिवेशन में शामिल होने वालों पर कार्रवाई की चेतावनी दी थी। दूसरे पत्र में उन्होंने कहा कि सीबीआइ से बचने और अपने कुकृत्य छिपाने के लिए अधिवेशन बुलाया गया है।
इसके अलावा रविवार को मुलायम सिंह के हस्ताक्षरों से अन्य पत्र भी जारी किये गए। इनमें से एक में रामगोपाल यादव को निष्कासित करने के साथ ही अधिवेशन की वैधानिकता पर प्रश्न भी उठाया गया। इसके बाद किरनमय नंदा व नरेश अग्रवाल को भी निष्कासित करने का पत्र जारी किया गया।
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लेटर पैड का इस्तेमाल क्यों नहीं : मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के करीबी विधानपरिषद सदस्य उदयवीर सिंह ने आरोप लगाया कि मुलायम के आदेश समाजवादी पार्टी के लेटर पैड से जारी क्यों नहीं हो रहे? पत्र पर मुलायम के दस्तखत तो हैं परंतु उनकेपद का हवाला नहीं दिया गया है। यदि मुलायम सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तो पत्र में उसका जिक्र क्यों नहीं? उन्होने आरोप लगाया कि नेताजी से पत्रों पर हस्ताक्षर जो भी लोग करा रहे हैं, वहीं उन्हें भ्रम में डालकर पार्टी में षड्यंत्र भी कर रहे हैं।
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संगीनों का घेरा तोड़ सपा दफ्तर में घुसे नरेश उत्तम
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- कार्यकर्ताओं ने तोड़ी शिवपाल की नेम प्लेट
- पुलिस के साथ हुई कई बार झड़प
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लखनऊ : सपा के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम अपने लाव-लश्कर के साथ रविवार को दोपहर बाद सपा मुख्यालय पहुंचे और सुरक्षा व्यवस्था को धता बताते हुए अंदर घुस गए। उन्होंने सपा प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठकर विधिवत कार्यभार ग्रहण किया। इस बीच प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव की नेम प्लेट कार्यकर्ताओं ने उखाड़ दी। भारी पुलिस बल देखकर यही लगा कि सत्ताधारी खेमे ने सपा मुख्यालय पर काबिज होने के लिए यह बंदोबस्त किया है।
 जनेश्वर मिश्र पार्क में सपा के विशेष राष्ट्रीय अधिवेशन में प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव को हटाने समेत कई महत्वपूर्ण फैसले होने के साथ ही पुलिस महकमा हरकत में आ गया। विक्रमादित्य मार्ग स्थित सपा प्रदेश मुख्यालय को रैपिड एक्शन फोर्स और पीएसी जवानों ने घेर लिया। शासन और पुलिस के उच्चाधिकारी एक-एक पल की खबर लेते रहे। उधर, मुख्यमंत्री के पांच कालिदास मार्ग पर भी भारी संख्या में पीएसी जवानों के साथ ही आरएएफ तैनात कर दी गई। कार्यकर्ताओं की भारी भीड़ दोनों स्थानों पर उमड़ पड़ी। सपा मुख्यालय पर भारी फोर्स ने संगीनों के साये में चौतरफा घेरेबंदी कर दी। मुख्य द्वार पर दोनों तरफ से बैरिकेडिंग करके रास्ता बनाया गया और जवान खड़े कर दिए गए। किसी को भी जाने पर रोक लगा दी गई थी। सपा मुख्यालय पुलिस की छावनी बन गया। सपा मुख्यालय पर एसपी पश्चिमी और मुख्यमंत्री आवास पर एसपी पूर्वी ने सुरक्षा की कमान संभाल ली। हर आने-जाने वालों पर कड़ी नजर रखी जा रही थी। सपा मुख्यालय में दोपहर बाद प्रदेश सरकार के मंत्री रविदास मेहरोत्रा समर्थकों के साथ पहुंचे तो उन्हें रोक दिया गया। इस बीच कई बार कार्यकर्ताओं और पुलिस के बीच झड़प हुई। 20 मिनट बाद अकेले मेहरोत्रा को सपा दफ्तर में जाने दिया गया। करीब साढ़े चार बजे नरेश उत्तम समर्थकों के बड़े हुजूम के साथ सपा मुख्यालय पहुंचे। उन्होंने सुरक्षा की दीवारों को तोड़ दिया। उनके साथ ही बड़ी संख्या में समर्थक भी पार्टी कार्यालय के अंदर चले गए। सपा प्रदेश अध्यक्ष के कक्ष में उत्तम सीधे पहुंचे और कार्यभार ग्रहण किया। उनके अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठते ही कार्यकर्ताओं ने शिवपाल सिंह यादव से जुड़ी हर चीज को मिटाना शुरू कर दिया।
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हटाई गई आशु मलिक की सुरक्षा
लखनऊ : समाजवादी कुनबे की रार में सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के सर्वाधिक करीबी बनकर उभरे एमएलसी आशु मलिक की सुरक्षा हटा ली गई है। मुख्यमंत्री खेमे से पंगा लेने का उन्हें खामियाजा भुगतना पड़ा है। आशु मलिक को वाई श्रेणी सुरक्षा मिली थी।
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मुलायम को नहीं निकालने का अधिकार : नरेश अग्रवाल
हरदोई : सपा नेता व राज्यसभा सदस्य नरेश अग्रवाल ने मुलायम सिंह द्वारा उन्हें पार्टी से निकालने की घोषणा के बाद कहा कि उन्हें पार्टी से निकालने वाले वह होते कौन हैं। वह सपाई हैं और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव हैं। मुलायम ङ्क्षसह के पास कोई अधिकार ही नहीं हैं। अग्रवाल ने नाराजगी जताते हुए कहा कि मुलायम ङ्क्षसह ने ऐसा बयान देकर अपने लिए ही समस्या खड़ी की है और पूरे प्रदेश के वैश्य नेताओं का अपमान किया है। वह समाजवादी पार्टी में थे और हमेशा बने रहेंगे।
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तो साइकिल निशान पर नहीं लड़ पाएंगे अखिलेश
- संविधान विशेषज्ञों की राय में वैधानिक नहीं है राष्ट्रीय सम्मेलन
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लखनऊ: जनेश्वर मिश्र पार्क में रविवार को आयोजित समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रतिनिधि अधिवेशन की वैधानिकता पर सवाल उठ रहे हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर अखिलेश यादव की नियुक्ति पर विवाद के साथ ही पार्टी का चुनाव चिह्न साइकिल जब्त होने की आशंका भी जतायी जा रही है।
संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि सपा के राष्ट्रीय प्रतिनिधि अधिवेशन को बुलाने का अधिकार केवल राष्ट्रीय अध्यक्ष को ही है। ऐसे में रविवार को जनेश्वर मिश्र पार्क में आयोजित अधिवेशन की वैधानिकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। जाहिर है अधिवेशन में लिए फैसलों को अभी कानूनी कसौटी पर कसा जाना है।

क्या कहता है सपा का संविधान
संविधान विशेषज्ञ और वरिष्ठ अधिवक्ता चंद्र भूषण पाण्डेय का कहना है कि समाजवादी पार्टी के संविधान के अनुसार राष्ट्रीय अधिवेशन या विशेष सम्मेलन बुलाने की अधिकार सिर्फ राष्ट्रीय अध्यक्ष को ही है। इसके अलावा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में प्रस्ताव पारित कर सम्मेलन का स्थान व तिथि नियत की जा सकती है। विशेष परिस्थितियों में प्रतिनिधि सभा के 40 प्रतिशत सदस्य अधिवेशन को बुलाने की मांग करते हैं तो इस आशय का एक पत्र राष्ट्रीय अध्यक्ष को देना अनिवार्य है। पत्र मिलने के बाद ही अध्यक्ष अधिवेशन बुलाएगा। सूत्रों का कहना है कि रविवार के अधिवेशन को लेकर इनमें से किसी नियम के पालन की पुख्ता जानकारी नहीं दी गई है। इसके विपरीत सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने अधिवेशन आरंभ होने से पहले ही एक पत्र लिखकर उसे असंवैधानिक घोषित कर दिया था।
संसदीय कानून के विशेषज्ञ सुभाष कश्यप का भी कहना है कि समाजवादी पार्टी के संविधान में अधिवेशन अथवा कार्यकारिणी बैठक बुलाने का अधिकार अध्यक्ष को ही है। जब अध्यक्ष मुलायम सिंह ने राष्ट्रीय अधिवेशन नहीं बुलाया तो उसमें लिए गए फैसलों की वैधानिकता पर सवाल लाजिमी है।

आयोग करेगा चुनाव निशान का फैसला :
 दो गुटों में बंटती दिख रही समाजवादी पार्टी का चुनाव निशान ÓसाइकिलÓ किसे मिल पाएगा? यह अब फैसला चुनाव आयोग ही करेगा। संविधान विशेषज्ञ चंद्र भूषण पाण्डेय का कहना है कि अभी 'साइकिलÓ चुनाव चिन्ह प्रयोग करने के वास्तविक हकदार मुलायम सिंह ही हैं। अखिलेश यादव को निर्वाचन आयोग के समक्ष राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर अपनी नियुक्ति की वैधानिकता सिद्ध करनी होगी। इसके लिए मुलायम सिंह यादव को नोटिस जारी कर उनका पक्ष जाना जाएगा। दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद ही आयोग असली राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रमाणित करेगा।

देर होने पर जब्त हो सकती है साइकिल :
 आयोग में विवाद देर तक लटक जाता है तो 'साइकिलÓ चुनाव निशान का प्रयोग करने पर अडंग़ा लग सकता है। पाण्डेय के मुताबिक समाजवादी पार्टी का साइकिल चुनाव चिह्न आयोग का फैसला आने तक होने तक सीज किया जा सकता है जिसकी संभावनाएं ज्यादा दिख रही हैं। अभी साइकिल निशान मुलायम सिंह यादव के कब्जे में ही है।

संसदीय बोर्ड में मुलायम का दबदबा :
समाजवादी पार्टी में अहम फैसले लेने के लिए संसदीय बोर्ड ही जिम्मेदार होता है। मौजूदा बोर्ड में मुलायम सिंह समर्थकों की संख्या अधिक है। संसदीय बोर्ड में मुलायम सिंह, अमर सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा, जॉय एंटोनी, किरनमय नंदा, रवि वर्मा, शिवपाल सिंह यादव, मोहम्मद आजम खां, सुरेंद्र मोहन अग्रवाल, अंबिका चौधरी व रामगोपाल यादव के अलावा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव विशेष आंमत्रित सदस्य हैं। इसमें से रामगोपाल यादव व किरनमय नंदा को रविवार को निष्कासित किया जा चुका है।
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 कुकृत्य छिपाने को मेरा अपमान : मुलायम

लखनऊ : समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने रविवार को दो घंटे के अंतराल में दो पत्र लिखे। पहले पत्र में उन्होंने प्रो.राम गोपाल यादव द्वारा बुलाये राष्ट्रीय प्रतिनिधि सम्मेलन को अवैध ठहराया। दूसरे पत्र में और तल्ख होते हुए कहा कि कुछ लोग अपने कुकृत्य छिपाने, सीबीआइ से बचने और भाजपा को लाभ पहुंचाने के लिए लगातार मेरा अपमान कर रहे हैं। उनका इशारा राम गोपाल की ओर था। पत्र में लिखा कि ऐसे लोगों ने आज का तथाकथित सम्मेलन बुलाने की साजिश की है।
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पहला पत्र - सुबह आठ बजे
प्रिय साथी,
30 सितंबर को राम गोपाल यादव द्वारा हस्ताक्षरित एक सूचना एक जनवरी 2017 को लखनऊ में आयोजित एक तथाकथित विशेष आपातकालीन राष्ट्रीय प्रतिनिधि सम्मेलन में आमंत्रित किये जाने के संबंध में जारी की गई है। यह आयोजन पूरी तरह से पार्टी संविधान के विरुद्ध है तथा पार्टी अनुशासन के विपरीत और पार्टी को क्षति पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया है। अत: आप ऐसे किसी तथाकथित सम्मेलन में भाग न लें। आपको अवगत कराना है कि ऐसे किसी सम्मेलन में भाग लेना या इससे संबंधित किसी प्रस्ताव या प्रपत्र पर हस्ताक्षर करना पार्टी हित के विरुद्ध व अनुशासनहीनता समझा जाएगा। ऐसा करने वालों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाएगी।
-मुलायम सिंह यादव
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दूसरा पत्र - दोपहर दो बजे
1-आज दिनांक एक जनवरी 2017 को जनेश्वर मिश्र पार्क में आयोजित पार्टी का तथाकथित आपातकालीन राष्ट्रीय प्रतिनिधि सम्मेलन असंवैधानिक है। यह सम्मेलन राष्ट्रीय अध्यक्ष की अनुमति के बगैर बुलाया गया है। इसमें पारित सभी प्रस्ताव व लिए गए निर्णय अवैध हैं। संसदीय बोर्ड इस आयोजन, इसमें पारित प्रस्तावों व सम्मेलन की संपूर्ण कार्यवाही को असंवैधानिक ठहराते हुए उसकी निंदा करता है तथा इसके कर्ताधर्ता प्रो.राम गोपाल यादव के पार्टी से छह वर्ष के लिए निष्कासन की पुष्टि करता है।
2-राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा 2017 के विधान सभा चुनाव के लिए पूर्व में घोषित प्रत्याशियों की सूची का अनुमोदन किया जाता है और राष्ट्रीय अध्यक्ष को अधिकृत किया जाता है कि शीघ्र शेष बची हुई सीटों पर प्रत्याशियों के नामों की घोषणा कर दें।
3-समाजवादी पार्टी को खड़ा करने एवं सांप्रदायिक शक्तियों से जान जोखिम में डालकर संघर्ष करने का मुलायम सिंह यादव का इतिहास रहा है। कुछ लोग अपने कुकृत्यों को छिपाने के लिए व सीबीआइ से बचने के लिए तथा भाजपा को लाभ पहुंचाने के लिए मुलायम सिंह का लगातार अपमान कर रहे हैं। उन्हीं लोगों ने आज का तथाकथित सम्मेलन बुलाने की साजिश की है।
4-संसदीय बोर्ड यह भी निर्णय करता है कि प्रदेश की जनता को जनमत का भ्रम न रहे। इसलिए पार्टी की आकस्मिक राष्ट्रीय अधिवेशन 05 जनवरी 2017 को पूर्वाह्न 11 बजे जनेश्वर मिश्र पार्क लखनऊ में आयोजित किया जाए।
-मुलायम सिंह यादव

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 अखिलेश के पैंतरे पर होंगी निगाहें
- पांच जनवरी को मुलायम चल सकते हैं चरखा दांव
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लखनऊ : विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर जैसे राजनीतिक सूरमाओं को चुनौती देकर मुलायम सिंह यादव ने चार अक्टूबर, 1992 को जब समाजवादी पार्टी की नींव रखी थी, तब शायद उन्हें यह भान नहीं होगा कि कभी उनके सगे ही उनकी बुनियाद हिला देंगे। इतिहास में ढेरों ऐसे उदाहरण हैं जब पिता को किनारे कर पुत्र ने वर्चस्व स्थापित किया। यह बात और है कि ऐसे कृत्यों की सामाजिक स्वीकारोक्ति मुश्किल होती है। पिता को किनारे कर खुद सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने अखिलेश के इस पैंतरे का जनता कैसे मूल्यांकन करेगी, यह तो वक्त बताएगा।
कुनबे की कलह के बीच संतुलन साधते हुए पिछले पांच नवंबर को सपा ने जनेश्वर मिश्र पार्क में स्थापना की रजत जयंती मनाई तो एक उम्मीद थी कि मतभेद के बावजूद संगठन को आंच नहीं आएगी। किसी ने घरेलू ड्रामा तो किसी ने वर्चस्व की जंग समझकर यही आकलन किया कि चुनाव तक सब ठीक हो जाएगा। पर, घर में दोनों तरफ कुछ ऐसी ताकतें थी जिन्होंने अपने-अपने हितों में पिता और पुत्र के बीच में बड़ी दीवार उठानी शुरू कर दी। करीब दो माह बाद उसी जनेश्वर मिश्र पार्क में रविवार को यह दीवार मुकम्मल होती नजर आयी। सपा की नींव रखने वाले मुलायम सिंह यादव दीवार के उस पार हो गए और इस पार उन्हीं के रोपित वृक्षों की शाखाओं के कंधों पर सवार पुत्र अखिलेश यादव पिता से मुकाबिल होते नजर आए। हालांकि उनकी आंखों में जरूर इस बात का अहसास था। पार्टी में अपने पिता का ओहदा संभालते हुए उनकी जुबान पर मर्यादा और संकोच भारी था। शायद यही वजह थी कि अधिवेशन में उनका संक्षिप्त उद्बोधन पिता मुलायम के प्रति उनके समर्पण पर केंद्रित था। अभी शुक्रवार को ही अखिलेश के निष्कासन का एलान करते हुए बेबस और भावुक मुलायम ने कहा कि 'मैं तो अखिलेश को बेटा मानता हूं पर वह मुझे पिता माने तब नÓ। इसी कड़ी में मुलायम ने यह भी कहा कि यदि अखिलेश माफी मांगेंगे तो वह विचार करेंगे। यह एक पुत्र की हिमाकत के बावजूद उसके प्रति एक पिता का उदात्त भाव था। यह जरूर है कि अगले दिन अख्रिलेश ने ताकत दिखाई और इसका अहसास होते ही मुलायम ने बिना माफी मांगे ही अखिलेश को माफ कर दिया। वहीं अखिलेश को शायद अपनी सियासी ताकत का गुमान हो या फिर इर्द-गिर्द मौजूद चाचा, भाई, भतीजा और सहयोगियों का दबाव हो जिसने उन्हें पार्टी में पिता को किनारे कर उनका ओहदा हासिल करने के लिए बेचैन किया हो। अखिलेश को 'युवा जोशÓ के नारे राजधानी से लेकर उत्तर प्रदेश की सड़कों के किनारे 'लोहा तप कुंदन भयाÓ जैसे स्लोगन वाले पोस्टर भले सुहा रहे हों लेकिन अब भी पिता के खिलाफ पुत्र के सियासी दांव जनता को बेचैन करते हैं।
जिन्हें यह लगता है कि मुलायम कमजोर पड़ गये हैं, उन्हें यह भी याद रखने की जरूरत है कि 1992 में पार्टी गठित करने के बाद एक वर्ष के भीतर ही उन्होंने कांशीराम की साझेदारी में उत्तर प्रदेश में सरकार बना ली थी। जिन्हें यह भ्रम है कि दलित वोटों की बदौलत नेताजी ने दोबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, उन्हें यह भी याद रखने की जरूरत है कि 2003 में जोड़-तोड़ में खुद को खरा साबित करते हुए मायावती की सत्ता छीन ली थी। वह चरखा दांव के लिए यूं ही याद नहीं किए जाते हैं। पांच जनवरी को उनके द्वारा बुलाए गये सम्मेलन को लेकर एक बड़ा तबका आस लगाए है कि वह अपने चरखा दांव से कोई करिश्मा दिखा सकते हैं।

बेनी हुए मुलायम, अखिलेश संग रेवतीरमण
- चढ़ते सूरज के प्रति ज्यादा आस्थावान दिखे सपाई
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लखनऊ : समाजवादी कुनबे में तख्तापलट के बाद सब की निगाहें पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के कदम पर टिक गयीं। स्थापना काल में सपा को दम देने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने मुलायम का हाथ थामा तो दूसरे पूर्व मंत्री और सांसद कुंवर रेवतीरमण सिंह ने अखिलेश यादव को प्राथमिकता दी। शनिवार को दोनों खेमों के बीच सुलह कराने में सक्रिय मोहम्मद आजम खां नाकाम होने के बाद रविवार को खुद को समेटे रहे। शनिवार को ही शक्ति प्रदर्शन में भारी पड़े अखिलेश के साथ वे लोग भी कदमताल करते दिखे जिन्हें मुलायम का बेहद करीबी माना जाता था। मंत्री अहमद हसन और बलराम यादव जैसे लोग भी मुलायम को छोड़ अखिलेश को मजबूत करने में लगे रहे। मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति, बर्खास्त मंत्री ओमप्रकाश सिंह, नारद राय, अंबिका चौधरी जैसे कुछ चुनिंदा लोगों की बात छोड़ दी जाए तो गिनाने के लिए मुलायम के साथ बड़े नाम बहुत ही कम थे। चढ़ते सूरज के प्रति यह समाजवादियों की आस्था थी जिसके चलते महारथी मुलायम को एक दायरे में सिमटना पड़ा।
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आदेश के बाद आशु मलिक से तत्काल वापस ली गई सुरक्षा

गाजियाबाद : मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के आदेश पर शासन द्वारा एमएलसी आशु मलिक की सुरक्षा वापस लेने के बाद पुलिस ने तत्काल प्रभाव से सुरक्षा वापस मंगा ली। आशु मलिक को पूर्व में वाई श्रेणी की सुरक्षा दी गई थी। इस सुरक्षा में उनके साथ 17 पुलिसकर्मी रहते थे। हाल ही में आशु मलिक सपा कुनबे में रार की शुरुआत के बाद कई बार सुर्खियों में आए थे। एमएलसी आशु मलिक सपा सुप्रीमो मुलायम ङ्क्षसह के करीबी माने जाते हैं। सपा कुनबे में शुरू हुई रार में आशु मलिक दिलचस्पी दिखाते हुए कूद पड़े थे और उन्होंने पूरी दखलंदाजी भी की थी। माना जा रहा है कि इसके चलते ही उनसे सुरक्षा वापस ली गई है।

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लखनऊ : राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त होने के बाद अखिलेश यादव ने नरेश उत्तम को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त करने का पहला निर्णय लिया। उत्तम को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त करने के पीछे पिछड़ी जाति के वोटों को साधने का दांव नजर आ रहा है।
फतेहपुर के लहुरी सरांय गांव के निवासी नरेश उत्तम कुर्मी जाति से ताल्लुक रखते हैं। इस जाति के मतदाताओं का सौ से अधिक सीटों पर सीधा प्रभाव है। उत्तम ने कानपुर में पढ़ाई के दौरान छात्र राजनीति शुरू की थी। 1989 में लोकदल के टिकट पर फतेहपुर की जहानाबाद सीट से विधायक चुने गए थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम ङ्क्षसह यादव ने उन्हें वन विभाग का उपमंत्री बनाया था। प्रदेश अध्यक्ष का ओहदा संभालने के बाद नरेश ने कहा कि वह गरीबों, पिछड़ों की लड़ाई लड़ेंगे। जल्द कार्यकारिणी गठित होगी। कुछ अरसे से मीडिया से दूरी बनाकर चल रहे मंत्री राजेंद्र चौधरी भी सामने आए और कहा कि राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश के नेतृत्व में फिर से सरकार बनाएंगे।
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शिवपाल गुनगुनाए- कसमें, वादे, प्यार, वफा ...
- पद से हटाए जाने के बाद भी उत्साह से की डिनर पार्टी की मेजबानी
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लखनऊ : हालात कोई भी हों, शिवपाल यादव के चेहरे पर मुस्कराहट हमेशा बनी रहती है। सपा के प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद रविवार शाम उन्होंने होटल ताज में डिनर पार्टी आयोजित की। इस पार्टी में उनके एक समर्थक ने बड़े मायूस होकर कहा -'तुम इतना जो मुस्करा रहे हो, क्या गम है जिसको छिपा रहे होÓ। शिवपाल बोले-गम काहे का। फिर तो गीत-संगीत का जो सिलसिला बढ़ा वह देर तक चलता रहा। आखिर आर्केस्ट्रा संचालक ने माइक थमाया तो शिवपाल गुनगुनाए -'कसमें, वादे, प्यार, वफा, सब बातें हैं, बातों का क्या, कोई किसी का नहीं है जग में, नाते हैं नातों का क्या।Ó ऐसा प्रतीत हुआ कि इन लाइनों के जरिये अतीत में परिवार को बांधे रखने के लिए जो कुर्बानी दी थी, वह गीत के रूप में सामने आयी। इस गीत के बाद एक समर्थक ने दूसरे गीत की लाइन कागज में लिखकर उन्हें थमाई, उसे गुनगुनाने का इसरार किया। शिवपाल ने चश्मा निकाला, देखा फिर हंसते हुए उन लाइनों को गुनगुनाने से इन्कार कर दिया।
शिवपाल सिंह यादव प्रतिवर्ष नव वर्ष के पहले दिन पार्टी देते हैं। इस पार्टी में मीडियाकर्मियों और उनके करीबी लोग आमंत्रित किए जाते हैं। इस बार भी कई दिन पहले से ही लोगों को आमंत्रित किया जा रहा था। रविवार को जब सपा में तख्तापलट का खेल शुरू हुआ तो भी शिवपाल ने यह पार्टी निरस्त नहीं की। उन्होंने तख्तापलट के बाद भी अपने कई शुभचिंतकों को फोन करके बुलाया। उनके साथ गीत-संगीत की महफिल में भी शरीक हुए।
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मैं मरते दम तक मुलायम के साथ : शिवपाल
इसी पार्टी में बातचीत करते हुए शिवपाल सिंह यादव ने कहा है कि मैं मरते दम तक मुलायम सिंह यादव के साथ हूं। साइकिल मुलायम सिंह की और हमारी थी, हमारी है और हमारी रहेगी। जिसको जहां जाना हो जाए। हमने रविवार को हुए घटनाक्रम की तथ्यों के साथ सारी जानकारी चुनाव आयोग को भेज दी है। यादव ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा कि मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी खड़ी की है, संघर्ष किया है। ढेरों लोगों को संघर्ष करना सिखाया है। पांच जनवरी को राष्ट्रीय अधिवेशन में सब कुछ साफ हो जाएगा। जनता और कार्यकर्ताओं का सारा असमंजस खत्म हो जाएगा।
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...अरे समाजवादी पार्टी मेरी : मुलायम
- राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाए जाने की सूचना से हैरान रह गए सपा प्रमुख
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लखनऊ : करीब 25 वर्ष तक खून पसीने से सींची गई समाजवादी पार्टी को मुकाम देने वाले मुलायम सिंह यादव रविवार को उस वक्त हैरान हो गए जब उनको राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाने की जानकारी मिली। यह सुनते ही उनके मुंह से बेसाख्ता निकला-'समाजवादी पार्टी मेरी है, इसे मैने बनाया है। अखिलेश और रामपाल (रामगोपाल) यह भी कर सकते हैं।Ó
 विक्रमादित्य मार्ग स्थित आवास से ही अधिवेशन पर मुलायम नजर रखे हुए थे और जनेश्वर मिश्र पार्क के घटनाक्रम की पल-पल की खबर भी ले रहे थे। सूत्रों का कहना है कि मुलायम को भरोसा नहीं हुआ कि उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाया गया है। उन्हें उम्मीद थी कि अखिलेश कार्यकारी अध्यक्ष बनेंगे और उनका सम्मान बरकरार रखेंगे। मुलायम के आवास पर कई कैबिनेट मंत्री डटे रहे, जिसमें गायत्री प्रसाद प्रजापति प्रमुख थे। शिवपाल सिंह यादव अपने बेटे आदित्य के साथ मुलायम सिंह के आवास पर आते- जाते रहे।


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 घटनाक्रम की टाइम लाइन
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- 8.00 बजे सुबह- शिवपाल मुलायम के घर पहुंचे।
-10 बजे मुलायम ने पार्लियामेंट्री बोर्ड की बैठक बुलाई।
-11 बजे भारी संख्या में पदाधिकारी जनेश्वर मिश्र पार्क में आयोजित अधिवेशन में हिस्सा लेने पहुंचे।
-11.10 बजे अखिलेश यादव जनेश्वर मिश्र पार्क पहुंचे।
- 11.20 बजे रामगोपाल यादव ने अखिलेश यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त करने का प्रस्ताव रखा।
- 11.22 बजे अखिलेश यादव राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए।
- 11.40 बजे रामगोपाल माइक पर आए और अधिवेशन में पारित प्रस्ताव पढ़ा।
- 12.00 बजे मुलायम सिंह ने रामगोपाल यादव को तीसरी बाद पार्टी से बाहर कर दिया।
- 1.30 बजे मुलायम ने सपा के उपाध्यक्ष किरनमंय नंदा व नरेश अग्र्रवाल को पार्टी से निकाला।
- 4 बजे नए अध्यक्ष अखिलेश यादव ने नरेश उत्तम को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया।
- 4.50 बजे समर्थकों के साथ नरेश उत्तम पार्टी आफिस कार्यालय पहुंचे, जहां समर्थकों ने शिवपाल यादव की नेम प्लेट तोड़ डाली। उत्साह में जमकर हंगामा किया।
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: आज दिल्ली जाएंगे मुलायम, शिवपाल
लखनऊ : समाजवादी पार्टी में कार्रवाई, दांव-पेंच के दौर में मुलायम सिंह यादव और शिवपाल सिंह यादव सोमवार को दिल्ली जाएंगे। सूत्रों का कहना है कि दिल्ली में वह पार्टी के घटनाक्रम के पहलुओं पर विधि विशेषज्ञों से चर्चा करने के साथ दूसरे दलों के कुछ नेताओं से मुलाकात भी करेंगे। दूसरी ओर राष्ट्रीय अधिवेशन में अखिलेश यादव को अध्यक्ष नामित किए जाने के बाद इससे जुड़े सारे दस्तावेज लेकर प्रो.राम गोपाल यादव रविवार को ही दिल्ली रवाना हो गए।
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मुलायम का स्वास्थ्य बिगड़ा
रविवार की देर शाम मुलायम सिंह यादव का स्वास्थ्य बिगड़ गया। जिसकी जानकारी मिलने पर ताज होटल में पार्टी कर रहे शिवपाल यादव सीधे मुलायम के घर पहुंचे। डॉक्टरों को बुलाया गया। बाद में बताया गया कि मुलायम के दांत में तेज दर्द था। डॉक्टरों ने दवा देने के साथ उन्हें आराम करने की सलाह दी।
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सपा में अब न कोई विवाद, न गुट : आजम
इलाहाबाद : प्रदेश के कैबिनेट मंत्री आजम खां ने रविवार को यहां दो टूक कहा, समाजवादी पार्टी में न कोई गुट है न अब कोई विवाद। पूर्व महाधिवक्ता स्व. एसएमए काजमी के बेटे के दावत-ए-वलीमा में शिरकत करने आए आजम खां ने मीडिया से अनौपचारिक वार्ता में यह बातें कहीं।
केपी कम्युनिटी हाल में मीडिया से संक्षिप्त वार्ता में आजम खां ने इतना ही कहा कि पार्टी के लिए जो उचित है, वह वरिष्ठ नेता कर रहे हैं। परिवार में कुछ मनमुटाव है वह जल्द ही सुलझ जाएगा। लखनऊ में रविवार के घटनाक्रम पर उन्होंने कहा अब किसी तरह का कोई विवाद नहीं है। आजम खां के इलाहाबाद आने पर सपाइयों ने उनका स्वागत किया। सर्किट हाउस में बड़ी संख्या में पार्टीजन मौजूद रहे।
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'जिन्हें आप प्यार करते हैं, कभी उन्हें बचाने के लिए सही फैसला करना पड़ता है। मैंने आज कड़ा निर्णय लिया लेकिन यह मुझे लेना ही था।Ó
- देर रात अखिलेश यादव का ट्वीट
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बैठक बुलाना अध्यक्ष का अधिकार
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लखनऊ : समाजवादी पार्टी के संविधान में राष्ट्रीय सम्मेलन या विशेष सम्मेलन बुलाने की अधिकार केवल राष्ट्रीय अध्यक्ष के पास होता है। धारा 16 ख में उल्लेखित है, राष्ट्रीय सम्मेलन की बैठक बुलाने का अधिकार केवल अध्यक्ष को होगा लेकिन 40 प्रतिशत सदस्यों द्वारा मांग करने पर राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुलाने को वह बाध्य होगा। धारा 23 में विशेष अधिवेशन को बुलाने का उल्लेख है। इसमें भी अध्यक्ष को ही विशेष अधिवेशन आहूत करने का अधिकार है। इसके अलावा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में प्रस्ताव पारित करने पर सम्मेलन का स्थान व तिथि नियत की जा सकती है। हालांकि इसको लेकर अलग अलग व्याख्या की जा रही है।

Tuesday, 31 January 2017

Samajwadi party-2016_अखिलेश ने दिखा दी ताकत


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-229 में 204 विधायक साथ, तीन कांग्र्रेसियों का भी समर्थन
-बीस घंटे के अंदर अखिलेश, रामगोपाल का निष्कासन वापस
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आप सब जानते हैं विवाद क्या है? मेरे पास ऐसे ढेरों सुबूत हैं, जिनसे साजिश करने वाले बेनकाब हो जाएंगे। जब से दलाल आए हैं, समस्याएं खड़ी हो गई हैं। अब जो भी कहना है कल कहूंगा।
-अखिलेश यादव
(शनिवार को समर्थकों के बीच)
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : समाजवादी पार्टी में एक बार फिर वही हुआ, जिसकी संभावना थी। 229 में से 204 विधायकों को अपने पीछे खड़ा कर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने खुद को 'बॉसÓ साबित किया तो सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने सिर्फ 20 घंटे के अंदर उनका निष्कासन वापस ले लिया। उनके साथ रामगोपाल यादव भी बहाल हो गए मगर झगड़ा अभी खत्म नहीं माना जा सकता। रविवार को जनेश्वर मिश्र पार्क में होने वाले विशेष राष्ट्रीय अधिवेशन में अहम फैसले की संभावना है। अमर सिंह को सपा से और शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने का फैसला संभावित है। अखिलेश सपा के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष और विधानसभा चुनाव में पार्टी का चेहरा घोषित किये जा सकते हैं।
शुक्रवार को राम गोपाल ने सम्मेलन बुलाने का एलान किया तो नाराज मुलायम सिंह ने अखिलेश को सपा से निष्कासित कर दिया। दो माह के अंदर दूसरी बार राम गोपाल भी निकाले गए। जिसकी प्रतिक्रिया में अखिलेश ने शक्ति प्रदर्शन का निर्णय किया। विधायकों को शनिवार की सुबह साढ़े नौ बजे अपने सरकारी आवास पर बुलाया। चंद घंटे की नोटिस के अंदर पार्टी के 229 में 204 विधायक और कांग्र्रेस के तीन विधायक पहुंचे, जिन्होंने अखिलेश के नेतृत्व में लिखित आस्था व्यक्त की। जब यह प्रक्रिया चल रही थी, उस समय मंत्री आजम खां सुलह अभियान में लगे थे। वह पहले सुबह नौ बजे मुलायम सिंह से मिले और कुछ देर बाद अखिलेश के घर पहुंचे। फिर अखिलेश को लेकर दोबारा मुलायम के घर गए। जहां आक्रोश व भावनाओं का गुबार निकला। सूत्रों का कहना है कि अखिलेश ने मुलायम के पैर छुए, उन्होंने भी आशीर्वाद दिया। शिवपाल वहीं बुलाये गए। तीनों की मौजूदगी में अखिलेश ने कहा कि मुख्यमंत्री पद की चाहत नहीं है। 2017 में यूपी जीतकर नेताजी को तोहफा देंगे, मगर स्वाभिमान व साजिश बर्दाश्त नहीं होगी। अखिलेश ने अमर सिंह को बाहर निकालने पर जोर दिया।  मंत्रियों का टिकट काटे जाने व प्रत्याशी चयन पर नाराजगी जताई। आजम ने दखल दिया, कहा कि नेताजी राष्ट्रीय अध्यक्ष से पहले आपके पिता हैं? तय हुआ कि घोषित सूचियों के स्थान पर नई सूची जारी होगी।... और मुलायम ने 20 घंटे पहले निकाले गए अखिलेश व राम गोपाल का निष्कासन का फैसला वापस ले लिया। यह जानकारी शिवपाल ने ट्वीट के जरिये दी। उन्होंने लिखा-'नेताजी के आदेशानुसार अखिलेश यादव और राम गोपाल यादव का पार्टी से निष्कासन तत्काल प्रभाव से समाप्त किया जाता है और अब सब मिलकर सांप्रदायिक ताकतों से लड़ेंगे और पुन: उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाएंगे।Ó इसके बाद अखिलेश, मुलायम के आवास से निकल विधायकों के बीच पहुंचे और बोले,-'अभी नेताजी से मिलकर आ रहा हूं, कल अधिवेशन में बोलूंगा।Ó विधायकों की ओर से दबाव पडऩे पर अपने साढ़े चार मिनट के भाषण में अखिलेश ने कहा कि नेताजी (मुलायम सिंह) के विरुद्ध कुछ न बोला जाए। उनका जुमले का यह आशय तो निकाला जा सकता है कि राष्ट्रीय अधिवेशन में मुलायम के विरुद्ध कोई प्रस्ताव नहीं होगा। इससे पूर्व मुख्यमंत्री आवास पर मौजूद विधायकों, मंत्रियों ने अपनी-अपनी बात रखी। प्रो.राम गोपाल यादव ने अमर सिंह व शिवपाल पर खुलकर निशाना साधा और कहा कि वह उनकी कार्रवाई का कोई फर्क नहीं पड़ता। कार्यक्रम का संचालन मंत्री अरविंद सिंह गोप ने किया। दूसरी ओर मुलायम के घर से निकले शिवपाल यादव पार्टी कार्यालय पहुंचे जहां मौजूद तकरीबन डेढ़ दर्जन विधायकों, प्रत्याशियों मुलाकात की और चुनाव में लगने को कहा। मगर मुलायम खुद पार्टी कार्यालय नहीं आए जबकि उन्होंने खुद पार्टी की ओर से घोषित प्रत्याशियों व विधायकों को बुलाया था। एक सच्चाई यह भी था कि पांच कालिदास की तुलना में पार्टी कार्यालय पहुंचने वालों की संख्या नगण्य थी। ऐसे में मुलायम वहां जाकर अपनी स्थिति खराब नहीं करना चाहते थे। इस  पूरे घटनाक्रम के दौरान दोनों पक्षों की ओर से बुलाई गई मीटिंग सिर्फ सांकेतिक रहीं। मुख्यमंत्री के यहां तो कुछ लोगों ने अपनी-अपनी बात रखी भी लेकिन सपा कार्यालय में औपचारिक मीटिंग हुई ही नहीं।
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सीएम आवास पर विधायकों का जमावड़ा
पांच कालिदास मार्ग पर विधायकों, प्रत्याशियों की बैठक में सपा के 204 विधायक, 37 एमएलसी व तकरीबन 70 प्रत्याशी पहुंचे थे। कांग्रेस के विधायक माविया अली, मुकेश श्रीवास्तव और कौशलेन्द्र भी शामिल हुए। इनमें दो प्रत्याशी भी हैं। प्रदेश में सपा विधायकों की संख्या-229 है। ॉ
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यह अधिवेशन ही है
मुलायम-अखिलेश मीटिंग के बाद अचानक इस चर्चा ने जोर पकड़ा कि राष्ट्रीय अधिवेशन कार्यकर्ता सम्मेलन में तब्दील जाएगा। इसको साफ करने के लिए लाउडस्पीकर के जरिये बताया गया कि यह विशेष राष्ट्रीय अधिवेशन ही है। भ्रामक बाते कही जा रही हैं, उससे गुमराह न हों।
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कौन क्या बोला
-मेरे आराध्य और राजनीति में मुकाम देने वाले नेताजी (मुलायम सिंह) हैं। मुख्यमंत्री अखिलेश जी ने विकास के ऐतिहासिक कार्य किये हैं। उनके सिवा दूसरा चेहरा नहीं है। उनके नेतृत्व में सरकार बनाने को ताकत झोंक दूंगा।
-मनोज पांडेय, मंत्री
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-चंद्रशेखर के साथ राजनीति की, मुलायम ने कहा साथ आओ विधायक बनाऊंगा। आया तो विधायक, मंत्री बनाया मगर अब अखिलेश मेरे मुख्यमंत्री व नेता हैं। हर फैसले में अखिलेश के साथ रहूंगा।
-राम गोविंद चौधरी , मंत्री
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मुलायम ने मुस्लिमों के लिए संघर्ष किया। उन्होंने अपमान भी सहा मगर डिगे नहीं। उम्मीद है आप भी (अखिलेश) इस लाइन पर मजबूती से बढ़ेंगे, हम साथ हैं, रहेंगे।
-इकबाल महमूद, मंत्री
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अब तक नेताजी के साथ थे, अब आपके साथ हैं। आप जो भी फैसला लेंगे, उसमें मैं भी साथ हूं।
-कमाल अख्तर, मंत्री
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शानदार मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पीछे प्रदेश की जनता, पार्टी का कार्यकर्ता, विधायक एक जुटे हैं। हम उनके साथ ही खड़े रहेंगे: अरविंद सिंह गोप, मंत्री
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सपा का अधिवेशन होगा, जिसमें प्रतिनिधि अपना फैसला लेंगे। अभी पूरा समझौता नहीं हुआ है।-उदयवीर, एमएलसी (सपा से बर्खास्त)
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ये मंत्री नहीं पहुंचे
परिवहन मंत्री गायत्री प्रजापति, उच्च शिक्षा राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) शारदा प्रताप शुक्ला और मत्स्य मंत्री हाजी रियाज अहमद ।
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विधायक नहीं पहुंचे
रामलाल अकेला, पारसनाथ, शादाब फातिमा, नारद राय, अंबिका चौधरी, गायत्री प्रजापति, सुरेन्द्र विक्रम, राज किशोर सिंह, ओम प्रकाश सिंह, शिवपाल यादव, हाजी रियाज अहमद, माता प्रसाद पांडेय।
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मंत्री पारसनाथ की हूटिंग
ग्र्रामीण अभियंत्रण मंत्री पारसनाथ यादव के मुख्यमंत्री आवास पहुंचने पर कुछ लोगों ने उनकी हूटिंग की, जिससे वह चंद मिनट के अंदर ही वापस चले गए। ऐसे ही विधायक गजाला लारी को पहले आवास से लौटा दिया गया फिर फोन कर बुलाया गया।
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 जय, जय, जय अखिलेश
सियासत की कठोर दुनिया में खुद को बॉस साबित करने वाले अखिलेश यादव के समर्थन में उनके ही सरकार आवास पर कई विधायकों ने जय..जय...जय अखिलेश के नारे लगाकर उनका समर्थन किया। कुछ लोगों ने अखिलेश के साथ मुलायम के भी नारे लगाये।
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बेटा नाराज होता है तो बाप मनाता है: आजम
लखनऊ : समाजवादी परिवार में सुलह कराने की पहल करने वाले मंत्री मोहम्मद आजम खां ने कहा कि जब बेटा नाराज होता है तो बाप ही उसे मनाता है। अच्छे माहौल में बात हुई है। निष्कासन से लोग नाराज थे। कार्रवाई वापस हो गई। अब सब ठीक है। इस प्रकरण को लेकर सबसे अधिक चिंता मुसलमानों में है। क्योंकि वह जानता है कि अगर सपा कमजोर हुई तो फिर भाजपा को फायदा होगा। आजम ने यह भी कहा कि अब रविवार को होने जा रहे अधिवेशन की वह शक्ल नहीं होगी, जो होने वाली थी। इशारा यह था कि कम से कम इसमें मुलायम के विरुद्ध कुछ नहीं होने जा रहा है। आजम ने कहा कि मुख्यमंत्री का शुक्रिया कि वह राष्ट्रीय अध्यक्ष से मिले, कहीं कोई शिकवा नहीं था। उस समय लगा कि एक बाप, बेटे से मिल रहा है। कहा, समस्याएं सुलझ जाएंगी।
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लालू ने किया फोन
राब्यू, लखनऊ : मुलायम सिंह यादव के रिश्तेदार व राजद मुखिया लालू प्रसाद यादव ने भी शनिवार को पहले मुख्यमंत्री अखिलेश यादव फिर मुलायम को फोन कर बात की और विवाद खत्म करने का आग्रह किया। बाद में लालू ने ट्वीट किया कि-आलतू-फालतू लोगों को किनारे कर विवाद खत्म किया जाना चाहिए। मैंने मुलायम, अखिलेश से अनुरोध किया है।
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 संगठन भी आएगा अखिलेश के हाथ
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- जनेश्वर मिश्र पार्क में राष्ट्रीय अधिवेशन आज
- सपा के संविधान में संशोधन समेत कई फैसले होंगे
- अमर सिंह का निष्कासन संभव, शिवपाल भी हटाए जा सकते हैं प्रदेश अध्यक्ष पद से
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लखनऊ : अखिलेश यादव पर कार्रवाई का फैसला वापस लेकर मुलायम सिंह ने भले कदम पीछे खींचे हैं, मगर समाजवादी परिवार का तूफान थमा नहीं है। रविवार को होने वाले राष्ट्रीय अधिवेशन में अमर सिंह, शिवपाल की बर्खास्तगी व अखिलेश को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर संगठन की कमान भी उन्हें सौंपने का प्रस्ताव पास हो सकता है। बताया जा रहा है कि राष्ट्रीय अधिवेशन में मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव के आने की संभावना बिलकुल नहीं है।
शनिवार को मंत्री आजम खां ने मुख्यमंत्री अखिलेश को मुलायम के घर ले जाकर सुलह का प्रयास किया। यहां अखिलेश ने कहा भी कि ' उन्हे मुख्यमंत्री पद की चाहत नहीं। वह वर्ष 2017 में यूपी जीतकर नेताजी को तोहफा देंगे। मगर नेताजी (मुलायम) के विरुद्ध कोई साजिश करेगा तो बर्दाश्त नहीं होगा।Ó अखिलेश के इस रुख के बाद शांति का प्रयास परवान चढऩे का संदेश निकला। मगर पांच कालिदास मार्ग पहुंचकर प्रो.रामगोपाल व अन्य लोगों से चर्चा के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने चुप्पी साध ली। विधायकों से कहा कि 'जो बोलना है, वह कल अधिवेशन में बोलूंगा। आज से कल तक कई घटनाक्रम होंगे।Ó जिसने साफ किया कि तूफान सिर्फ धीमा हुआ है। बाद में प्रो.राम गोपाल ने कहा कि राष्ट्रीय अधिवेशन होकर रहेगा। तैयारी पूरी है। जनेश्वर मिश्र पार्क में कार्यकर्ता मीटिंग नहीं 'आपातकालीन अधिवेशनÓ है। इसके बाद नई चर्चाएं शुरू हुई कि आजम केसुलह प्रयासों का यह असर तो रहा कि अखिलेश, राम गोपाल यादव का निष्कासन वापस हो गया, मगर अन्य समझौते के अन्य बिन्दुओं पर अमल नहीं हुआ। सूत्रों का कहना है कि समझौते के चलते अधिवेशन की आक्रामकता थोड़ी कम होगी, मगर कई अहम फैसले होंगे, जिसमें पार्टी के संविधान में संशोधन का फैसला भी होगा।
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कई दिनों से चल रही है तैयारी
आपातकालीन राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाने का फैसला अचानक नहीं है, यह सोंच समझकर लिया गया निर्णय है। अधिवेशन की पहल से पहले उसके कानूनी पहलुओं को भी परखा गया है। प्रत्येक जिले के न्यूनतम 25 प्रतिनिधियों व 100 से अधिक सामान्य कार्यकर्ताओं से अधिवेशन बुलाने के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कराये गये हैं। इसको चुनौती न मिले इसके लिए कुछ स्थानों पर वीडियोग्र्राफी भी करायी गई है। दरअसल, राष्ट्रीय अध्यक्ष की अनुमति के बगैर आपातकालीन अधिवेशन बुलाने के लिए 40 फीसद सदस्यों की अनुमति जरूरी होती है। लिहाजा इस कार्य को दुरुस्त कर लिया गया है। सूत्रों का कहना है कि इसके लिए युवा ब्रिगेड को प्रस्तावों के साथ जिलों में भेजा गया था, जो वापस लौट आएं हैं। इन्ही प्रस्तावों के आधार पर रविवार को कई फैसले लिये जाएंगे।
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समझौते के समय चर्चा के बिंदु
-अखिलेश, रामगोपाल का निष्कासन रद किया जाए, जिस पर फौरन अमल हुआ।
-प्रत्याशियों की घोषित सूची रद कर मुलायम-अखिलेश  सहमति से नई सूची तैयार करेंगे, इस बिन्दु पर मंथन जारी।
-अमर सिंह से इस्तीफा लिया जाए या फिर उन्हे निकाला जाए, अभी अमल नहीं हुआ।
-बर्खास्त एमएलसी व पदाधिकारियों का निष्कासन रद हो, अभी अमल नहीं हुआ।  
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अब संभावनाएं
-महासचिव व राज्यसभा सदस्य अमर सिंह को बर्खास्त किया जा सकता है।
-अखिलेश को कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर मिशन-2017 का चेहरा घोषित किया जा सकता है।
-कार्यकारी अध्यक्ष की नियुक्ति का प्रस्ताव हुआ तो राष्ट्रीय कार्यकारिणी भंग होगी।
-शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष पद से बर्खास्त कर जिला इकाइयां भंग करने का प्रस्ताव पास हो सकता है।
-बदायूं के सांसद धर्मेन्द्र यादव को नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त करने पर विचार संभव।
-संविधान में संशोधन कर कार्यकारी अध्यक्ष को अधिकार संपन्न बनाने का प्रस्ताव संभव।
-बर्खास्त चल रहे एमएलसी व युवा ब्रिगेड की बर्खास्तगी रद करने का फैसला संभव।
-समाजवादी परिवार को तोडऩे की साजिशों का मुख्यमंत्री कर सकते हैं रहस्योद्घाटन।
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 अखिलेश की मजबूती से कांग्रेस को सुकून
- गठबंधन की उम्मीद बढ़ी, आज के अधिवेशन पर निगाहें
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लखनऊ : समाजवादी कलह में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की मजबूती से कांग्रेस को सुकून है। गठबंधन की उम्मीद परवान चढऩे की इंतजार देख रहे कांग्रेसियों की निगाह रविवार को प्रस्तावित सपा के राष्ट्रीय प्रतिनिधि सम्मेलन पर लगी है।
शनिवार को कांग्रेस मुख्यालय में सपा से संभावित गठजोड़ की चर्चा का ही जोर रहा। हालांकि पार्टी के वरिष्ठ नेता सीधे तौर पर टिप्पणी करने से बचते रहे परंतु केंद्रीय नेताओं से मिल करे संकेतों से गठबंधन होना लगभग तय माना जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस की ओर 127 सीटों पर दावेदार जतायी जा रही है परंतु सौ के आसपास दोनों के बीच सहमति बनने की उम्मीद है। अखिलेश द्वारा जारी उम्मीदवारों की पहली सूची में भी कांग्रेस से गठबंधन की गुंजाइश रखी गयी है।
मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने रहने के लिए अखिलेश यादव बिहार की तरह महागठबंधन चाहते है ताकि भाजपा व बसपा के साथ त्रिकोणात्मक मुकाबले में सपा का पलड़ा भारी रह सकें। इस के लिए उत्तर प्रदेश में भले ही बिहार जैसे हालात नहीं बन पाए परंतु कांग्रेस और रालोद का साथ मिलने से स्थिति काफी हद तक मजबूत होगी।
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अधिवेशन में गठबंधन चर्चा संभव : गत पांच नवंबर को समाजवादी पार्टी के रजत जयंती समारोह में भी लोहिया और चरण सिंह वादियों को एकमंच पर लाने की सहमति बनी थी। रविवार को आहूत राष्ट्रीय प्रतिनिधि सम्मेलन में भी गठबंधन की संभावनाओं पर चर्चा होने की उम्मीद जतायी जा रही है। कांग्रेस से गठबंधन होने पर 300 सीट जीतने का दावा कर रहे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपनी मंशा पर मुहर भी लगवा सकते है।
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रालोद बनेगा स्वाभाविक सहयोगी : पश्चिमी उप्र में खुद को अपेक्षाकृत कमजोर मान रही समाजवादी पार्टी के लिए राष्ट्रीय लोकदल का साथ मिल जाना मुफीद मानने वाले नेताओं का कहना है कि कांग्रेस और रालोद को साथ में लेकर ही वहां बसपा व भाजपा के सीधे दिख रहे मुकाबले में तीसरा कोण बनाया जा सकता है। भाजपा के खिलाफ लगातार तीखे तेवर अख्तियार किए रालोद नेतृत्व के लिए भी वजूद बचाने के लिए सपा का साथ मिलना जरूरी माना जा रहा है।
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आजमाइश से पहले खत्म हुआ जोर
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- अखिलेश खेमे में विधायकों की भारी जुटान ने पहले ही तय की जीत
- फीका रहा सपा प्रदेश कार्यालय का माहौल
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लखनऊ : दो फाड़ हुई समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव की ओर से शनिवार को पार्टी के प्रदेश कार्यालय में बुलायी गई महत्वपूर्ण बैठक से पहले ही साफ हो गया था कि ऊंट किस करवट बैठेगा। अखिलेश खेमे से आजमाइश के लिए बुलायी गई इस बैठक में सपा न जोर दिखा पायी और न लगा पायी। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के सरकारी आवास पर सपा विधायकों की भारी जुटान ने साबित कर दिया कि तुरुप का इक्का किसके हाथ में है। लिहाजा अपनी ओर से बुलायी गई बैठक में शिरकत करना खुद मुलायम ने मुनासिब न समझा।
सपा आलाकमान और उसके इशारे पर पार्टी से निकाले गए अखिलेश यादव के धड़ों के बीच जोर आजमाइश को लेकर शनिवार को बुलायी गईं अलग-अलग बैठकों में कालिदास मार्ग (मुख्यमंत्री का सरकारी आवास) का पलड़ा विक्रमादित्य मार्ग (समाजवादी पार्टी का दफ्तर) पर भारी रहा। इसमें कुछ भूमिका विक्रमादित्य मार्ग के दोनों छोर और बीच में कई स्थानों पर लगीं बैरिकेडिंग ने भी निभायी। सपा प्रदेश कार्यालय में शिवपाल के करीबी और अखिलेश मंत्रिमंडल से बर्खास्त किये गए मंत्रियों समेत चंद विधायक, सांसद व पार्टी प्रत्याशी ही पहुंचे। इनमें सपा प्रदेश महासचिव ओम प्रकाश सिंह, नारद राय, शादाब फातिमा, राजकिशोर सिंह के अलावा राज्यसभा सदस्य बेनी प्रसाद वर्मा और कानपुर कैंट से सपा प्रत्याशी घोषित किये गए अतीक अहमद प्रमुख थे। दोपहर 12.20 बजे विक्रमादित्य मार्ग पर हलचल तेज हुई, सुरक्षाकर्मियों ने बैरिकेडिंग हटाई और बाप-बेटे में सुलह के सूत्रधार बने मो.आजम खां को साथ लेकर मुख्यमंत्री का काफिला धड़धड़ाता हुआ मुलायम के बंगले में दाखिल हुआ। आधे घंटे बाद विक्रमादित्य मार्ग का सन्नाटा तब फिर टूटा जब बेटे आदित्य को लेकर शिवपाल भी मुलायम से मिलने उनके आवास पहुंचे। तेजी से बदलते घटनाक्रम का फोकस मुलायम के आवास पर केंद्रित हो जाने के बाद उनके बंगले के बाहर सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई।
मुलायम के बंगले पर घंटे भर से ज्यादा चली बैठक के बाद दोपहर डेढ़ बजे अखिलेश मुलायम के बंगले से निकल कर वापस अपने सरकारी आवास चले गए। उनके बाद शिवपाल भी निकले लेकिन गाड़ी के शीशे के पीछे भी उनके चेहरे पर तनाव की लकीरें साफ देखी जा सकती थीं। दोपहर 1.50 बजे शिवपाल फिर सपा प्रदेश कार्यालय पहुंचे। हालांकि दोपहर दो बजे तक अखिलेश और रामगोपाल का निष्कासन रद होने की खबर फिजां में तारी हो चुकी थी। सपा प्रदेश कार्यालय के बाहर अब तक असमंजस में दिख रहे सपा कार्यकर्ताओं के चेहरे खिल उठे और वे कार्यालय के गेट के सामने तख्तियां और पोस्टर लेकर थिरकने लगे। इसी दौरान सपा कार्यालय से अतीक अहमद बाहर आए लेकिन मीडिया के चुटीले सवालों से बचकर निकल गए। इसके बाद गाड़ी के भीतर मूर्तिमान बने बैठे बेनी प्रसाद वर्मा भी रुखसत होते दिखे।
दोपहर 2.20 बजे सपा कार्यालय के बंद गेट खोले दिये गए और एलान हुआ कि शिवपाल पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करेंगे। कई बार के एलान के बाद भी मुट्ठी भर कार्यकर्ता ही जुटे क्योंकि सस्पेंस खत्म हो चुका था। बेटे आदित्य, सपा के प्रदेश महासचिव ओम प्रकाश सिंह और राज्यसभा सदस्य सुखराम सिंह यादव के साथ पार्टी दफ्तर के लॉन में मौजूद  शिवपाल चिंतामग्न दिखे लेकिन मौके की नजाकत को भांपते हुए माइक संभालते ही उन्होंने जोशीला अंदाज ओढ़कर संबोधन शुरू किया। कार्यकर्ताओं को पूरे मामले में पार्टी के यूटर्न की जानकारी देने में बेहद असहज महसूस कर रहे शिवपाल को यह औपचारिकता निभाने के लिए समाजवादी नेता राजनारायण के नाम का सहारा लेना पड़ा। राजनारायण की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि देने और उनके सियासी कारनामों का जिक्र करने के बाद ही वह असल मुद्दे पर आये। अखिलेश और रामगोपाल का निष्कासन रद किये जाने की सूचना दी। लेकिन अपने संबोधन में उन्होंने जब यह कहा कि जिन प्रत्याशी को नेताजी ने साइकिल का निशान दिया है, आप लगकर उसे जिताएंगे, तो पार्टी दफ्तर से रुखसत होते कार्यकर्ता इसके निहितार्थ तलाश रहे थे।
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 हावी रहा मुस्लिम वोट बैंक फिसलने का डर
- मुख्यमंत्री के सामने विधायकों की बैठक में उठा मुद्दा
- आजम खां ने सपा प्रमुख मुलायम सिंह को भी चेताया
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लखनऊ : समाजवादी कलह में मुस्लिम वोट बैंक फिसलने की आशंका पार्टी नेताओं को सताने लगी है। शनिवार को विधायकों व पदाधिकारियों की बैठक में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के सामने यह चिंता हावी रही।
खासकर मंत्रियों और विधायकों का कहना था कि पार्टी की आंतरिक उठापटक का मुस्लिमों में संदेश ठीक नहीं जा रहा है। पार्टी नेतृत्व तक यह चिंता पहुंचाने का काम आजम खां ने भी किया। सुलह की कमान संभालते हुए आजम ने सुबह से ही कोशिशें तेज कर दी थी। अपने आवास पर मुस्लिम नेताओं की बैठक में समस्या पर विचार किया। उन्होंने सपा प्रमुख मुलायम सिंह और शिवपाल यादव से बैठक कर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से भी मुलाकात की। जिसका नतीजा रहा कि अखिलेश और रामगोपाल यादव का निष्कासन 24 घंटे के भीतर ही वापस हो गया। मगर जिस तरह अभी भी चालें चली रही हैं, उससे मुस्लिम मतदाताओं में घबराहट भी है।
मुख्यमंत्री आवास पर जुटे लोगों ने आपसी बातचीत में कहा भी मुसलमान अब भी मुलायम सिंह यादव को ही अपना नेता मानता है, दल में दूसरा कोई इतना प्रभावशाली नहीं है। ऐसे में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को इस दिशा में पहल करनी होगी। सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री के पहुंचने से पहले आपसी चर्चा में एक मंत्री ने कहा भी अगर मुसलमान खिसका तो सौ का आंकड़ा पार करने में खासी दुश्वारी होगी।
 दलित मुस्लिम समीकरण में मजबूती का खतरा : सपा के आंतरिक विवादों पर मुख्य प्रतिद्वंद्वी पार्टी बसपा की नजर भी लगी है। दलित-मुस्लिम समीकरण पर भी चर्चा हुई। पश्चिमी उप्र के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि मुस्लिमों की आशंका है समाजवादियों में एकता जनता को नजर नहीं आएगी तो हालात गत लोकसभा चुनाव से ज्यादा खराब हो सकते है। एक कैबिनेट मंत्री ने सपा प्रमुख मुलायम सिंह द्वारा मुसलमानों के लिए संघर्ष की याद दिलाते हुए कहा कि इसके लिए उन्होंने अपमान भी सहे, मगर डिगे नहीं।
सूत्रों का कहना है कि मुलायम सिंह के साथ आजम खां की दो बैठकों में भी सपा की कलह से मुसलमानों में बढ़ती चिंता से अवगत कराया गया। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पार्टी से निष्कासित करने के खतरे भी गिनाए। मुस्लिमों के खिसकने से सत्ता में नहीं बने रह पाने की आशंका जताते हुए विवाद पर विराम लगाने का आग्रह किया।
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 ...तो तय थी विवाद की स्क्रिप्ट!
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-स्टीव जार्डिंग के कथित ईमेल से उठे सवाल
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लखनऊ : समाजवादी पार्टी की पारिवारिक कलह क्या वाकई किसी स्ट्रेटजी का हिस्सा थी? एक पत्रकार के ट्वीट में इस मेल का जिक्र है जो कि अखिलेश यादव के अमेरिकी सलाहकार स्टीव जार्डिंग की ओर से है। हालांकि यह स्पष्ट होना बाकी है कि ईमेल कितना सही और कितना गलत है?
पिछले दिनों ऐसी खबर प्रकाश में आई थी कि यूपी के चुनाव में अखिलेश की छवि चमकाने के लिए सपा एक अमेरिकी पीआर एजेंसी की मदद ले रही है। इसके बाद हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर स्टीव जार्डिंग का नाम बतौर सलाहकार सामने आया था। इन्हीं जार्डिंग के एक ई-मेल में सपा को सलाह दी गई थी कि पार्टी में अंदरूनी लड़ाई दिखावे के लिए जरूरी है। इससे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की इमेज बेहतर उभर कर आएगी। उनका व्यक्तित्व और मजबूत नजर आएगा। स्टीव जार्डिंग की ओर से आगे लिखा गया है कि मेरी सीनियर यादव को एक गुप्त योजना केतहत सलाह है कि परिवार को पूरे परिदृश्य से हटाने के लिए, चाचा को कसूरवार ठहराकर जूनियर यादव की क्लीन इमेज बनाई जाए और उन्हें भविष्य का पार्टी का मुखिया प्रोजेक्ट किया जाए।
गौरतलब है कि स्टीव जार्डिंग हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में 1980 से पब्लिक पॉलिसी पढ़ा रहे हैं। उन्होंने अमेरिका में राष्ट्रपति पद की डेमोक्रेटिक उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन का भी चुनाव प्रचार देखा था। इसके अलावा भी कई देशों के प्रभावशाली नेता उनके क्लाइंट रहे हैं। वायरल हो रहे इस तरह की ईमेल की सत्यता की पुष्टि होना भले ही बाकी है, लेकिन लोग यह मानकर चल रहे हैं कि सपा का विवाद किसी गुप्त योजना का ही हिस्सा था। लोग नोटबंदी शुरू होने के बाद सपा का विवाद खत्म होने और दिसंबर खत्म होने के समय फिर शुरू होने को भी इससे जोड़ रहे हैं।
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 जिसका जलवा कायम है, उसका बाप मुलायम है...
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-मुलायम के घर से पहुंची अखिलेश समर्थकों को राहत
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लखनऊ : 'फाइव केडीÓ यानी पांच कालिदास मार्ग। शनिवार दोपहर एक बजे यहां जमा बड़ी भीड़ के बीच कहीं ऊंट मौजूद नहीं था, फिर भी सब जानने को उतावले थे कि वह किस करवट बैठेगा। हर पल सबकी व्याकुलता इसलिए भी बढ़ती जा रही थी कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पिता मुलायम सिंह के घर गए देर हो चुकी थी। हाईवोल्टेज ड्रामा चरम क्लाईमेक्स पर पहुंच रहा था। ...अब क्या होगा का सवाल जितना उन समर्थक विधायकों को परेशान कर रहा था, जिन्हें अखिलेश अपने आवास में बिठा कर गए थे तो बाहर सड़क पर मौजूद युवा, बुजुर्ग और महिला समर्थकों में भी कम बेचैनी नहीं थी।
इसी बीच किसी नतीजे के इंतजार में तेज कदमों से गोल्फ क्लब चौराहे की ओर बढ़े जा रहे दो जोशीले युवाओं में से एक ने दूसरे को समझाते हुए तेज आवाज में सवाल उछाला- 'बुजुर्गों के साथ कोई भविष्य हो सकता है क्या..?Ó दूसरे ने मौन सहमति देते हुए इन्कार में सिर हिला दिया। तख्तियां लेकर नारे लगाते युवाओं के साथ फोटो क्लिक करा चुकीं एक युवा महिला नेता लपक कर डिजाइनर खादी में मौजूद अपने साथी के पास पहुंचीं और पूछ लिया- 'फेसबुक पर अपलोड कर दी कि नहीं मेरी फोटो...?Ó युवक ने हां कहा तो वह वापस कार में जाकर बैठ गईं। यहीं खाकी वर्दी में मौजूद लंबे-चौड़े सरदार जी एक कार से टेक लगाए किसी को फोन से बता रहे थे- '...अमर सिंह पर एक्शन हो सकता है।Ó
मुख्यमंत्री आवास के गेट से कुछ दूर घेरा बना खड़े पत्रकारों में से एक ने मैसेज टोन सुन फोन निकाला, कुछ पढ़ा और बोले- 'लो... हो गया।Ó सबने आंखें बड़ी कर उन्हीं पर टिका दीं कि क्या हो गया। चुटकी लेते हुए  बोले- 'आजम ने अखिलेश से मुलायम के पैर छुआए... गले लगवाया..., फिर अखिलेश ने कहा- काए नाराज हो... हमीं तो तुमें पीएम बनैैैंहे...।Ó
अखिलेश और शिवपाल के घर के बीच एक एसयूवी के अंदर-बाहर मौजूद युवाओं में से एक ने बदलते माहौल में चिंता जताई- 'रात में पार्टी हो पाएगी कि नहीं नए साल की..?Ó दूसरे ने टोका- 'पहिले इहे पार्टी का हाल तौ देखि लो।Ó मुस्लिम युवाओं का एक गुुट अंग्रेजी में नारे लगा रहा था- 'नो कन्फ्यूजन-नो मिस्टेक, सिर्फ अखिलेश-सिर्फ अखिलेशÓ। अब तक घड़ी सवा एक बजा चुकी थी। मुलायम के घर से अखिलेश के घर तक 'सब कुछ फिर से ठीक हो जानेÓ का संदेश पहुंचने लगा था। 'हम सब समाजवादी हैैं...एक हैैंÓ की भावना की आपूर्ति भी शुरू हो गई थी कि इसी बीच ठीक डेढ़ बजे मुख्यमंत्री का काफिला वापस फाइव केडी आ गया। अब तक 'अखिलेश तुम संघर्ष करो...Ó के नारे लगा रहे युवा अचानक बधाई के नारे लगाने लगे। कुछ ने नारों में थोड़ा बदलाव किया- 'जिसका जलवा विशेष है, उसका नाम अखिलेश हैÓ। लेकिन, लोगों को असल मजा तब आया, जब पूरे माहौल को बयां करने वाला एक नया नारा गढ़ लिया गया कि 'जिसका जलवा कायम है, उसका बाप मुलायम है..!Ó
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फूंके गए शिवपाल-अमर के पुतले
-अखिलेश के निष्कासन से नाराज समर्थकों का हंगामा, नोरबाजी
-आपा खोया: शिवपाल और अमर के सिर पर एक करोड़ का इनाम
-मुलायम के लिए बुद्धि-शुद्धि यज्ञ, शिवपाल के घर के बाहर पथराव
 लखनऊ: दोपहर बाद निष्कासन रद होने पर भले ही ज्यादातर सपाइयों के चेहरों पर रौनक लौट आई हो लेकिन इससे पहले अखिलेश समर्थकों ने जमकर भड़ास निकाली। सूबे में राजनीतिक माहौल दिनभर गरम रहा। कहीं पुतले फूंके जाते रहे तो कहीं आत्मदाह का प्रयास हुआ। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और प्रो. रामगोपाल को पार्टी से निकालने से भन्नाए मथुरा के गोवर्धन विधान सभा सपा अध्यक्ष मुकेश सिकरवार ने तो शिवपाल और अमर ङ्क्षसह की गर्दन काटने वाले को एक करोड़ रुपये का इनाम देने का एलान तक कर दिया।  की भी होड़ लगी रही। हंगामा, पुतला दहन और आग में घी डालने वाले बयानों का सिलसिला अखिलेश का निष्कासन रद होने के बाद ही थमा और मिठाई बंाटी गई।
सीएम को पार्टी से निकाले जाने से नाराज समर्थकों ने राजधानी व आसपास के कई जिलों में प्रदर्शन किया। अमर सिंह के निष्कासन की मांग के साथ शिवपाल का पुतला भी फूंका। लखनऊ में कालिदास मार्ग पर अखिलेश समर्थकों के निशाने पर मुलायम, शिवपाल और अमर सिंह थे। अमर दल्ला के पोस्टर लहराते रहे। कार्यकर्ताओं ने मुलायम सिंह के लिए बुद्धि-शुद्धि यज्ञ किया। शिवपाल यादव के घर के बाहर पथराव में उन्नाव के हसनगंज के सीओ चोटिल हुए।
बाराबंकी व अंबेडकरनगर में  प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव के और रायबरेली व बलरामपुर में राष्ट्रीय महासचिव अमर ङ्क्षसह पुतले फूंके।
लखीमपुर में युवजन सभा के पूर्व जिलाध्यक्ष मुन्ना यादव की अगुवाई में बारह समर्थक अर्धनग्न होकर कचहरी के पास पानी की टंकी पर चढ़ गए। इससे पहले जलूस भी निकाला।
पूर्वांचल में सुबह माहौल काफी गर्म था। शिवपाल व अमर सिंह के विरोध में पुतले दहन हुए तो कई जिलों में इस्तीफे का भी दौर चला। ज्यादातर अखिलेश के साथ खड़े दिखे। मऊ व गाजीपुर में छात्रों ने चचा और अंकल के पुतले फूंके। आजमगढ़ में भी  दोनों के पुतले जलाये गए। मध्य यूपी व बुंदेलखंड में भी इन्हीं के पुतले जलाए गए। बांदा में कार्यकर्ताओं ने पानी की टंकी पर चढ़ मुलायम के खिलाफ नारेबाजी की।
 हमीरपुर के सुमेरपुर कस्बे में भी शिवपाल व अमर ङ्क्षसह के खिलाफ नारेबाजी की गई तो औरैया बेला क्षेत्र के गांव भूलाहार में जाम लगाया गया। कन्नौज के ठठिया में मुलायम व शिवपाल का पुतला फूंका। उन्नाव, फतेहपुर, बांदा, हमीरपुर, उरई, महोबा, चित्रकूट, फर्रुखाबाद, इटावा तथा हरदोई में भी अधिकांश सपाई अखिलेश के समर्थन में दिखे।
गोरखपुर में शास्त्री चौक और अंबेडकर चौक पर शिवपाल सिंह यादव का पुतला जलाकर नारेबाजी की। बस्ती में शिवपाल-अमर के पुतले आग के हवाले किए गए। महराजगंज में छात्रसभा ने अमर सिंह का पुतला जलाया। सिद्धार्थनगर, कुशीनगर और संतकबीर नगर जिला मुख्यालय पर शिवपाल के खिलाफ जबरदस्त प्रदर्शन हुआ और देवरिया में शिवपाल अमर सिंह के पुतले जलये।
मैनपुरी, कासगंज में भी शिवपाल व अमर के पुतले फूंके तो एटा में अखिलेश और रामगोपाल के समर्थक सड़कों पर उतर आए। जीटी रोड पर एक सपा नेता ने केरोसिन उड़ेल कर आत्मदाह की कोशिश की।
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 घड़ी की सूइयों पर सियासी चक्र
09.00 बजे- मंत्री आजम खां सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के घर पहुंचे और 15 मिनट बाद वापस अपने घर लौटे।
09.30 बजे- मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के सरकारी आवास पर विधायकों के पहुंचने का सिलसिला शुरू।
10.00 बजे- अखिलेश यादव निजी आवास से सरकारी आवास पर पहुंचे।
10.15 बजे- प्रो. राम गोपाल यादव मुख्यमंत्री के सरकारी आवास पहुंचे।
11.15 बजे- शिवपाल सिंह यादव अपने बेटे आदित्य के साथ पार्टी आफिस पहुंचे।
11.20 बजे- आजम खां दोबारा मुलायम सिंह के आवास पर पहुंचे।
11.30 बजे- राज्यसभा सदस्य बेनी वर्मा समाजवादी पार्टी आफिस पहुंचे।
11.40 बजे- अतीक अहमद मुलायम से मिलने उनके घर पहुंचे, चंद मिनट में ही निकल गए।
11.55 बजे- मुलायम से मिलकर आजम खां सीधे अखिलेश से मिलने उनके सरकारी आवास पहुंचे।
12.15 बजे- आजम खां, अखिलेश यादव को लेकर मुलायम के घर पहुंचे।
12.15 बजे:  अखिलेश यादव ने मुलायम के पांव छुये, दोनों की आंखे डबडबाई।
12.45 बजे- शिवपाल सिंह मुलायम सिंह के घर बुलाए गए।
01.05 बजे- अखिलेश यादव और रामगोपाल का निष्कासन वापस लेने का फैसला।
01.25 बजे- अखिलेश यादव मुलायम सिंह के घर से निकले।
02.20 बजे- शिवपाल सिंह ने कार्यकर्ताओं को संबोधित किया।
03.00 बजे- आजम खां के घर शिवपाल समेत कई विधायक पहुंचे।
04 बजे- राम गोपाल ने युवा ब्रिगेड के साथ राष्ट्रीय अधिवेशन की तैयारियों की समीक्षा की।
06 बजे- आजम खां और शिवपाल सिंह फिर मुलायम के घर पहुंचे।
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 'इतनी जल्दी तो मेरी मम्मी भी नहीं बुलातींÓ
- सोशल साइट्स पर उड़ा सपाई दंगल का मजाक
- ट्विटर, फेसबुक पर आम राय-'यह पॉलिटिकल ड्रामा थाÓ
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लखनऊ: ऐन चुनाव के पहले समाजवादी पार्टी के दंगल का सच चाहे कुछ भी हो, सोशल साइट्स को अखिलेश और राम गोपाल का निलंबन रद होने के बाद नया मसाला मिल गया। ट्विटर, फेसबुक और अन्य नेटवर्किंग पर इसका जमकर मजाक उड़ा। लोगों का मानना है कि यह पार्टी का पॉलिटिकल ड्रामा था। एक ने टिप्पणी भी की-'यह पब्लिक है, सब जानती है।Ó
कहानी के मुख्य पात्र अखिलेश, शिवपाल और मुलायम जरूर थे लेकिन आजम और अमर भी पीछे न रहे। आजम-अमर ट्विटर पर टॉप ट्रेंड में भी नजर आए। क्रिकेटर रवींद्र जडेजा के नाम से ट्वीट किया गया-'ऐसा प्रतीत होता है वे आजम की भैंसों से सलाह लेते हैं। फेसबुक पर कमाल उसरी ने व्यंग किया-फिर क्या कृष्णा पटेल और बेटी अनुप्रिया पटेल के विवाद पर भी घराने का कानून लागू होता है।Ó उन्होंने बात आगे बढ़ाई-'यह न रामायण है, न ही महाभारत। दरअसल यह अच्छी स्क्रिप्ट के साथ पुन: सत्ता कायम रखने के लिए शानदार अभिनय हो रहा है ट्विटर पर तो प्रतिक्रियाओं की झड़ी लग गई। महिमा भारती का ट्वीट था-'इतनी जल्दी तो मेरी मम्मी भी मुझे घर नहीं बुलातीं।Ó इस कड़ी को आगे बढ़ाया मनीष सिंह ने-'इतनी जल्दी तो साइकिल भी रिपेयर नहीं होती, जितनी जल्दी निष्कासन वापस ले लिया।Ó नवीन खेतान ने लिखा-'मीडिया के लोग यह फुटनोट पढऩा भूल गए कि यह सस्पेंशन लेटर सिर्फ 24 घंटे के लिए वैलिड है।Ó इससे पहले उन्होंने ट्वीट किया था- 'शायद आप जानते हों कि अखिलेश ने अपनी इमेज बिल्डिंग के लिए यूएस की पीआर एजेंसी को इंगेज किया था। नाटक अपनी पटकथा के अनुसार ही खेला गया।Ó
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ट्विटर पर सपा का दंगल
 -अखिलेश यादव इस उम्र में अगर ड्रामा सीखना है तो मुलायम सिंह से सीखें-तवरेज आलम
-मुलायम सिंह यादव, उनके बेटे अखिलेश और भाई शोले के बीरू से ज्यादा नौटंकीबाज हैं-बाबू भैया
-अगर ड्रामा करने से वोट मिलते तो अरविंद केजरीवाल अमेरिका के राष्ट्रपति होते। यह बात अखिलेश यादव को समझ लेनी चाहिए-श्याम 808
-अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी में लौट आए हैं। ये सब कम उम्र के जोड़ों की होने वाली लड़ाई और सुलह से भी तेज हुआ है-पकचिकपक राजा बाबू

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 शिवपाल वाली सूची के उम्मीदवारों की सांसें अटकीं
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-अब नए सिरे से जारी होगी प्रत्याशियों की सूची
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लखनऊ : समाजवादी पार्टी में तेजी से बदलते आंतरिक हालात से उम्मीदवारों की सांसें भी अटकी हुई हैं। शनिवार को सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव द्वारा रामगोपाल यादव और अखिलेश यादव का निष्कासन वापस लिए जाने के साथ ही उम्मीदवारों की लिस्ट नए सिरे से तैयार करने का फैसला हुआ है। सबकी निगाहें रविवार को आहूत पार्टी के राष्ट्रीय प्रतिनिधि सम्मेलन पर लगी हैं। घोषित प्रत्याशी शनिवार को अपने समर्थकों के साथ राजधानी में डटे रहे।
सबसे अधिक दुविधा उन उम्मीदवारों की है जिनको प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव द्वारा घोषित किया गया, लेकिन जिन्हें अखिलेश की पहली सूची मेें जगह नहीं मिल सकी थी। 29 दिसंबर को सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह ने 325 प्रत्याशियों की पहली लिस्ट जारी की थी जिसके जवाब में करीब चार घंटे बाद मुख्यमंत्री की ओर से एक सूची जारी की गयी, जिसमें 235 उम्मीवारों के नाम शामिल थे। उम्मीदवारों के नाम की सूचियां जारी करने का सिलसिला यहीं पर नहीं थमा। प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव की ओर से जारी दूसरी लिस्ट में 68 नए नामों को शामिल किया था। शिवपाल द्वारा 393 उम्मीदवारों की घोषणा कर दी गयी तो वहीं अखिलेश की दूसरी संक्षिप्त सूची में दो नाम और शामिल किए गए और उनके उम्मीदवारों की संख्या 237 हो गयी।
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साझा उम्मीदवारों को सुकून
उम्मीदवारों की नई सूची बनाए जाने के फैसले से उन 195 नेताओं को सुकून है जिनके नाम दोनों सूचियों में दर्ज है। ऐसे नेताओं का मानना है कि भविष्य में आने वाली सूची में उनका नाम तो होगा ही। चूंकि अब माना जा रहा है कि प्रत्याशियों के चयन में अखिलेश की ही ज्यादा चलेगी इसलिए अखिलेश की सूची में शामिल कुल 237 प्रत्याशियों में से भी ज्यादातर के नाम नई सूची में होंगे। उन उम्मीदवारों की ही नींद उड़ी है जिनका नाम सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव की ओर से जारी सूची में दर्ज है। इनमें से अधिकतर के नाम नई सूची में नहीं दिखाई दे सकते हैं। शिवपाल की सूची में शामिल रहे दागी उम्मीदवारों का भी पत्ता साफ हो सकता है। पूर्व में पार्टी द्वारा मुलायम परिवार की बहू अपर्णा यादव को लखनऊ कैंट से प्रत्याशी घोषित किए जाने के बाद से वह चुनावी तैयारी में जुटी जरूर है, लेकिन मुख्यमंत्री की पहली सूची में उनका नाम भी शामिल नहीं था, हालांकि उस सूची में कैंट से किसी और का भी फिलहाल नाम दर्ज नहीं है।
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Samajwadi party-2016 30 dec_ सपा से निकाले गए मुख्यमंत्री

पुन: अपडेट : सपा पैकेज - ब्यूरो: बेबस, हताश, भावुक मुलायम !
ध्यानार्थ: खबर में कुछ तथ्य जोड़े गये हैं, इसी का प्रयोग अपेक्षित।
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- बेटे को सपा से निष्कासित करने का फैसला सुनाते हुए नम हुईं आखें
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : सियासत में रिश्तों का रंग भी घुला हो तो आंखें डबडबाती हैं और फैसले कठोर हो जाते हैं। शुक्रवार को जब बेटे पर कार्रवाई का फैसला सुनाने मुलायम सिंह यादव मीडिया के सामने आए तो उनके चेहरे पर बेबसी, हताशा तो नजर आ ही रही थी, लेकिन बेटे को सपा से निष्कासित करने का फैसला सुनाते हुए आंखें नम भी हुईं।
शुक्रवार सुबह बड़े नेताओं में बेनी वर्मा सबसे पहले मुलायम सिंह से मिलने उनके घर पहुंचे। कुछ देर बाद आशु मलिक विक्रमादित्य मार्ग पहुंचे। मुलायम के घर से निकले बेनी सीधे शिवपाल के यहां पहुंच गए। दोनों के बीच चर्चा हुई। फिर बेनी के साथ शिवपाल और अंबिका भी मुलायम के घर पहुंचे।
शाम साढ़े छह बजे मुलायम सामने आये। उस समय उनके चेहरे पर बेबसी, हताशा झलक रही थी। वह कुछ देर चुप रहे। फिर पूछा कि क्या ये लाइव है? हां में जवाब मिलते ही कहा- चलो अच्छा हुआ। ये लाइव जा रहा है। फिर जब रामगोपाल पर कार्रवाई की घोषणा कर मुलायम शिवपाल की ओर घूमे तो उन्होंने कान में कुछ कहा। ऐसा प्रतीत हुआ कि शिवपाल ने मुलायम से कहा-'अखिलेश वाला कर दीजिएÓ। मुलायम ने फिर पूछा, क्या? इस पर शिवपाल ने कहा-टाइप हो रहा है। मुलायम फिर बोले- बोल दें? शिवपाल ने कहा- हां, इस पर मुलायम ने अखिलेश को भी 6 साल के लिए बाहर कर दिया। हालांकि, अखिलेश को निकालने का एलान किया, उस समय उनकी जुबान लडख़ड़ाई। आंखें नम हुई...और जब यह पूछा गया कि अखिलेश के माफी मांगने पर माफ कर देंगे? तब मुलायम का चेहरा थोड़ा सामान्य हुआ। संभले और कहा वह कहां ऐसा करेगा, पता नहीं पिता मानता भी है कि नहीं? फिर बोले, माफी मांगेगा तो विचार कर लेंगे। यही वह पंक्तियां है, जिन्हें बोलते ही कठोर इरादों वाले मुलायम का चेहरा पुत्र के प्रति कार्रवाई की पीड़ा में डूबता नजर आया। लंबे राजनीतिक जीवन में पत्रकार वार्ता खत्म करने के बाद बहुत-बहुत धन्यवाद कहने वाले मुलायम ने इस बार यह भी नहीं कहा।
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प्रवक्ता जूही सिंह व नावेद सिद्दीकी समेत दर्जनों ने पद छोड़े
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राब्यू, लखनऊ: करीब छह माह से समाजवादी पार्टी में जारी कलह अब टूट में बदलती जा रही है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव व रामगोपाल यादव को सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव द्वारा छह वर्ष के लिए निष्कासित करने के बाद से इस्तीफों का दौर आरंभ हो गया है। प्रवक्ता जूही सिंह और नावेद सिद्दीकी के अलावा बड़ी संख्या में त्यागपत्र देने की घोषणा करके माहौल को और गर्मा दिया है। इसके अलावा जिलों में भी धरना प्रदर्शन व त्यागपत्र देने का क्रम जारी है।
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अपडेट-सपा पैकेज :  ब्यूरो : जो किया मुलायम ने, दोहरा रहे अखिलेश
नोट- कुछ नए तथ्य जोड़े गए हैं।
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- उछल रहा जैसी करनी-वैसी भरनी का जुमला
- लोहिया, चरण सिंह, वीपी और चंद्रशेखर को दिया था झटका
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ : सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के बारे में यह कहावत है कि सियासत में उनसे अधिक कोई रिश्तों का निर्वाह नहीं कर सकता, लेकिन, विरोधी यह कहने से भी नहीं चूकते कि मुलायम ने सत्ता हासिल करने के लिए लगातार अपने आकाओं को झटका दिया है। सपा प्रमुख अपने राजनीतिक जीवन में सबसे बडे संकट से गुजर रहें है, जब खुद उनके पुत्र अखिलेश यादव ने ही बगावती रुख अख्तियार किया है। यहां यह भी कहा जा रहा है कि मुलायम ने जो किया वह सूद समेत वापस मिल रहा है।
बोफोर्स कांड के बाद जब 1989 में वीपी सिंह की अगुआई में देश और उत्तर प्रदेश में गैर कांग्रेसी सरकार बनी, तब वीपी सिंह चौधरी अजित सिंह को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे लेकिन मुलायम ने ऐसा चरखा दांव चला कि वीपी सिंह भी उनके हिमायती हो गए। मुलायम को उप्र की सत्ता मिली पर वीपी सिंह की सत्ता डगमगाने के बाद मुलायम ने जनता दल छोड़कर चंद्रशेखर से मजबूत संबंध बनाए लेकिन कुछ महीनों तक ही उन्हें निभा सके। उन्होंने चंद्रशेखर की समाजवादी जनता पार्टी से अलग होकर समाजवादी पार्टी बना ली। मुलायम की राजनीति में यह कोई नई बात नहीं थी। वह शुरुआती दौर में भी लोहिया को छोड़कर चौधरी चरण सिंह के साथ हुए थे। चंद्रशेखर से अलग होने के बाद बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन से ही मुलायम ने 1993 में दोबारा सत्ता हासिल की लेकिन जून 1995 तक यह रिश्ता भी चल नहीं पाया। जिस बसपा के बूते मुलायम ने सत्ता हासिल की, उसी बसपा की प्रमुख नेता मायावती के साथ गेस्ट हाऊस कांड आज भी लोग नहीं भूले हैं।
डॉ. लोहिया के अनुयायी होने के बावजूद मुलायम सिंह यादव ने समाजवाद के नाम पर जिस तरह परिवार को आगे किया, वही परिवार अब उनके लिए मुसीबत का सबब बन गया है। मुलायम के कुनबे में खांचों में बंटे भाई-बंधु अखिलेश के कंधे पर बंदूक रखकर मुलायम पर निशाना साध रहे हैं। कभी लड़खड़ाते हुए मुलायम को एक आज्ञाकारी आदर्श पुत्र की तरह संभालने वाले अखिलेश अब आक्रामक हो गये हैं। नेताजी के फैसलों के खिलाफ वह एक्शन ले रहे हैं और अपनों को लामबंद कर रहे हैं। जाहिर है, वक्त अपने को दोहरा रहा है और कहने वाले यही कह रहे हैं, जैसी करनी-वैसी भरनी।
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मुलायम सिंह यादव : जीवन वृत्त
 जन्म : 22 नवंबर, 1939
 जन्म स्थान : सैफई, इटावा
राजनीतिक करियर : 1967 में पहली बार विधायक। तीन बार उप्र के मुख्यमंत्री। 1996 में केन्द्र में रक्षा मंत्री। समाजवादी पार्टी के संस्थापक। संप्रति आजमगढ़ से सांसद। सात बार विधायक और छह बार सांसद बने।
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कांग्रेस की मदद से बचेगी अखिलेश की कुर्सी
 कांग्रेस के 29 विधायकों की जगह 28 विधायक किया गया है।
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-शक्ति प्रदर्शन में रालोद का भी मिल सकता है साथ
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लखनऊ : समाजवादी पार्टी से निष्कासित होने के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की कुर्सी कांग्रेस की मदद से ही बचना संभव है। शक्ति प्रदर्शन की स्थिति में अखिलेश को रालोद का साथ भी मिल सकता है।
 मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा गुरुवार को जारी 235 प्रत्याशियों की सूची में 171 सपा विधायक भी शामिल थे। माना जा रहा है कि  इसमें से अधिकतर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को बचाने के लिए आगे आ जाएंगे। मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाए रखने के लिए  202 विधायकों के समर्थन का आंकड़ा पूरा करना जरूरी है। ऐसी स्थिति आने पर अखिलेश को कांग्रेस और रालोद से मदद की दरकार होगी। बता दे कि कांग्रेस के 28 विधायकों में से दल बदल व इस्तीफे के बाद 19 विधायक ही पार्टी में बने हैं। दलबदल करने वालों में दो समाजवादी पार्टी में पहले ही शामिल हो चुके हैं। कांग्रेस से मदद की उम्मीद अखिलेश के बयानों से भी नजर आती है। अखिलेश लगातार कांग्रेस से गठबंधन होने पर तीन सौ सीट आने का दावा करते रहे हैं। वहीं कांग्रेस भी प्रदेश सरकार को लेकर नरम रुख अपनाए हुए है और केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले है। कांग्रेस के चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर की दो माह से सपा से गठजोड़ की कोशिश को भी इससे जोड़ कर देखा जा रहा है। इस मुद्दे पर कांग्रेस विधानमंडल दलनेता प्रदीप माथुर किसी भी टिप्पणी से इन्कार करते है। उनका कहना है कि राष्ट्रीय नेतृत्व ही इस पर कोई फैसला लेगा।
वहीं, रालोद के कुल आठ विधायकों में से पूरन प्रकाश भाजपा में शामिल हो चुके हैं। ऐसे में अन्य सात विधायकों का साथ भी अखिलेश को मिल सकता है। रालोद का रवैया भी अखिलेश यादव को लेकर कांग्रेस जैसा ही है। रालोद के महासचिव जयंत चौधरी और मुख्यमंत्री अखिलेश की नजदीकियां भी किससे छिपी नहीं हैं। गत राज्यसभा व विधानपरिषद चुनाव में रालोद का समर्थन सपा को मिल भी चुका है।

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...तो विस भंग करने की सिफारिश कर सकते हैं अखिलेश
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- मुलायम से पहले ही विधायकों को लामबंद करेंगे मुख्यमंत्री
- दोनों खेमों ने आज बुलाई विधायकों की बैठक
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लखनऊ : समाजवादी कुनबे के बवाल के बाद अब निगाहें मुलायम और अखिलेश के अगले कदम पर टिक गयी हैं। सपा से मुख्यमंत्री को निकाले जाने के बाद विधायकों को लामबंद करने की कवायद शुरू हो गयी है। अखिलेश विधायकों के साथ ही समर्थकों को भी सहेज रहे हैं। अखिलेश अगर संख्या बल में कमजोर पड़े तो विधानसभा भंग करने की सिफारिश भी कर सकते हैं।
अखिलेश ने शनिवार सुबह साढ़े नौ बजे विधायकों को पांच कालिदास स्थित अपने सरकारी आवास पर बुलाया है। उधर, मुलायम सिंह ने पार्टी मुख्यालय में विधायकों को 11 बजे तलब किया है। उन्हें अपने-अपने पाले में करने की होड़ शुरू हो गयी है। दोनों खेमों के क्षत्रप विधायकों को सहेजने में लग गये हैं और हालात वही हो गए हैं जो 1990 और 2003 में मुलायम द्वारा सरकार बचाने और बनाने के लिए बने थे। अखिलेश ने गुरुवार को 225 उम्मीदवारों की जो सूची जारी की थी उसमें 171 विधायक हैं। इनमें करीब सवा सौ विधायक ऐसे हैं जिनका नाम मुलायम की सूची में भी है। दोनों खेमे इन विधायकों पर अपना हक जता रहे हैं लेकिन ये विधायक किसके पाले में हैं, यह शनिवार को साफ होगा। ऐसे में अखिलेश और मुलायम को अपनी-अपनी ताकत का अंदाजा हो जाएगा। अगर अखिलेश के पास 171 विधायकों का संख्या बल उपलब्ध होता है तो वह कांग्रेस और अन्य छोटे दलों के सहयोग से अपनी सत्ता बचा सकते हैं। संकेत मिल रहे हैं कि अगर विधायकों की पर्याप्त संख्या उनके पाले में नहीं आयी तो वह राजभवन जाकर विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर सकते हैं।
दूसरी तरफ मुलायम की बैठक में पार्टी के कुल 229 विधायकों में से ज्यादातर के पहुंचने पर अखिलेश को विधायक दल के नेता पद से हटाने का प्रस्ताव पारित कर विधायक दल का नया नेता चुना जा सकता है। बैठक में नया नेता चुने जाने के संकेत मुलायम ने शुक्रवार को प्रेस कांफ्रेंस में भी दिए। पार्टी के विधायक मौजूदा परिस्थिति में मुलायम पर ही कमान संभालने का दबाव बना सकते हैं। ऐसे में मुलायम, राजभवन जाकर अखिलेश के पास बहुमत न होने की बात कह सकते हैं। ऐसी स्थिति में राज्यपाल राम नाईक, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से सदन में बहुमत साबित करने के लिए कह सकते हैं।
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रामगोपाल को बना सकते राष्ट्रीय अध्यक्ष
प्रोफेसर राम गोपाल यादव ने रविवार को राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुलाई है। समाजवादी खेमे में इस बात की भी सुगबुगाहट है कि इस बैठक में प्रोफेसर रामगोपाल यादव को सपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जा सकता है। अखिलेश यादव इस बार पूरी तैयारी से जवाब देना चाहते हैं। उधर, संभावना यह भी जताई जा रही है कि अगर चुनाव चिन्ह को लेकर बात फंसी तो कभी समाजवादियों का निशान रहे बरगद चुनाव चिन्ह को लेने की पहल होगी। बताया जा रहा है कि इस बारे में दिल्ली में प्रोफेसर रामगोपाल एक प्रमुख राजनीतिक शख्सियत से मुलाकत कर चुके हैं।
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फर्रुखाबाद से लगी लखनऊ में आग
-रामगोपाल के लखनऊ पहुंचते ही शुरू हुआ हंगामा
लखनऊ : पिछली बार जो काम प्रो.रामगोपाल के अल सुबह जारी पत्र ने कर दिया था, ठीक वैसा ही हंगामा अबकी रामगोपाल के बयान ने कर दिखाया। दिन शुरू होने के कुछ घंटों के भीतर ही रामगोपाल ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा जारी 235 प्रत्याशियों की सूची को सही और सपा की असल लिस्ट ठहरा दिया तो इस बयान के पीछे छिपी चुनौती ने कुछ देर में लखनऊ की राजनीतिक हवा में गर्मी घोल दी। फर्रुखाबाद में यह बयान देकर रामगोपाल दोपहर बाद जब तक लखनऊ पहुंचते, यहां सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह आगबबूला हो चुके थे।
रामगोपाल दोपहर करीब साढ़े तीन बजे लखनऊ पहुंचकर जब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मुलाकात के लिए उनके नगराम से लौटने का इंतजार कर रहे थे, तब भी शायद उन्हें पूरी तरह अंदाजा नहीं था कि पार्टी अध्यक्ष ने उनके साथ मुख्यमंत्री पर कार्रवाई की क्या तैयारी कर रखी है। चार बजे वह मुख्यमंत्री से मिले और दो घंटे के भीतर ही मुलायम ने वह बम फोड़ कर तूफान खड़ा कर दिया, जिसका अंदेशा सुबह से मुख्यमंत्री के आवास के बाहर खड़े समर्थकों को भी नहीं था। शाम करीब छह बजे जैसे ही मुख्यमंत्री को पार्टी से निकाले जाने की खबर कालीदास मार्ग की सर्द हवा में फैली तो बाहर जमा कार्यकर्ताओं और नेताओं में चेन रिएक्शन शुरू हो गया।
कुछ लोग शिवपाल के सरकारी आवास की ओर दौड़ पड़े और गेट के बगल में लगी उनकी नेमप्लेट तोड़ दी। जिनके हाथ में शिवपाल के पोस्टर आए, उन्होंने पोस्टर को चिंदी-चिंदी कर जैसे बदला ले लिया। कुछ इतने क्षुब्ध थे कि अपने ही शरीर में आग लगाने पर आमादा हो गए। जो सबसे पहले इसके लिए भागा, उसे तो पुलिस और मीडिया छायाकारों ने किसी तरह रोक लिया, लेकिन कुछ ही पल बाद गोमतीनगर निवासी राहुल ने खुद को आग लगा ली। वह झुलस गया। इस आग ने माहौल में तनाव और गर्मी को और बढ़ा दिया। इस बीच यासिर शाह सहित अखिलेश के कई समर्थक नेता मुख्यमंत्री से मिलने पहुंचे। बाहर जमा युवा समर्थक जानने को उत्सुक थे कि भीतर क्या हुआ, लेकिन भीतर से निकल रहे नेताओं के उतरे चेहरे बिना बोले ही उनकी दशा बयान कर रहे थे। रात गहराने के साथ ही जैसे लोगों को अंदाजा हुआ कि मुख्यमंत्री अपने सरकारी आवास से बाहर आ रहे हैैं तो उनके समर्थक गेट के और नजदीक आ गए। हालत यह हुई कि जैसे समर्थकों ने मुख्यमंत्री को उनके आवास पर ही बंधक बना लिया हो। खैर कुछ देर में मुख्यमंत्री को जाने देने की अपील माइक से की गई और कमांडो ने भी घेरेबंदी कस दी। इसके बाद मुख्यमंत्री अपने विक्रमादित्य मार्ग स्थित आवास पहुंचे तो समर्थक पीछे-पीछे वहां भी पहुंच गए। देर रात तक कोहरे के बीच युवा समर्थक डटे थे, जबकि मुलायम और शिवपाल के आवासों के बाहर का सन्नाटा अगले दिन की पटकथा तैयार कर रहा था।
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सपा में जंग को मुफीद मान रही बसपा-भाजपा
लखनऊ : बिखराव के मुहाने पर पहुंची समाजवादी पार्टी में आंतरिक जंग को भाजपा व बसपा खुद के लिए मुफीद मान रही हैं और पूरे घटनाक्रम पर निगाह लगाए हैं।
बसपा प्रमुख मायावती शुक्रवार को लखनऊ में ही थी और सपा में मचे घमासान की पल-पल जानकारी लेती रहीं। सूत्रों का कहना है कि घरेलू कलह से समाजवादी पार्टी का कमजोर हो जाना बसपा अपने हित में मानती है। नेतृत्व का मानना है कि सपा दो फाड़ होती है तो मुस्लिम भाजपा को हारने के लिए बसपा के पक्ष में लामंबद हो सकते हैं। इसी फार्मूले पर बसपा लगातार दलित-मुस्लिम गठजोड़ पर जोर देने पर लगी है। बहुमत की सरकार नहीं चलाने की तोहमत सपा पर मढ़ते हुए बसपा का प्रचार अभियान चलेगा और इसका चुनावी लाभ मिलने की संभावना बढ़ेगी।
उधर, भाजपा नेतृत्व को भरोसा है कि समाजवादी पार्टी की बढ़ी अंतरकलह से मुस्लिम वोट भ्रमित होगा और इसका पूरा चुनावी फायदा भाजपा के खाते में जाएगा। इसके अलावा प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगने की उत्पन्न होती है तो प्रशासन को मनमुताबिक लगाने का मौका मिलेगा।
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 अब क्या होगा
1. अखिलेश कुर्सी बचाने का हरसंभव करेंगे प्रयास। विधायकों की बैठक में अपेक्षित संख्या बल न आया तो विधानसभा भंग करने की कर सकते हैं सिफारिश। विधायकों से पार्टी का विशेष समर्थन बैठक बुलाने का भी ले सकते हैं प्रस्ताव।
2 . मुलायम दल नेता बदलने का प्रस्ताव पास कराकर भेज सकते हैं राजभवन।
3. रविवार को राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में सपा पर कब्जे की अखिलेश बनाएंगे रणनीति।
4. सपा पर काबिज न होने की स्थिति में बरगद चुनाव चिन्ह हासिल करने के प्रयास के साथ रामगोपाल नई पार्टी का कर सकते हैं एलान।
5. ... यह सब कुछ नहीं होगा अगर मुलायम के कहे अनुसार अखिलेश ने मांग ली माफी।

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सपा पैकेज : ब्यूरो : विधायकों की दलीय स्थिति
समाजवादी पार्टी - 229
बहुजन समाज पार्टी - 80
भारतीय जनता पार्टी - 41
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस -28
राष्ट्रीय लोकदल - 08
पीस पार्टी - 04
कौमी एकता दल - 02
अपना दल - 01
नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी - 01
इत्तेहाद मिल्लत कौंसिल - 01
निर्दलीय - 06
रिक्त - 02 (पडऱौना, लखनऊ कैंट)
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अखिलेश ने दो प्रत्याशी बदले, दो नए घोषित
- प्रत्याशियों की संख्या 237 हुई
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लखनऊ: मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने शुक्रवार को 235 प्रत्याशियों की पहली सूची जारी करने के 24 घंटे के भीतर दो प्रत्याशी बदल दिए और दो नए प्रत्याशी घोषित कर दिया। अब उनके प्रत्याशियों की संख्या 237 हो गई है। कासगंज विधानसभा क्षेत्र से पहले मानपाल सिंह वर्मा को प्रत्याशी बनाया गया था, अब उनके स्थान पर इशरत उल्ला शेरवानी को टिकट दिया गया है। मैनपुरी के करहल विधानसभा से घोषित प्रत्याशी सोवरन सिंह यादव के स्थान मुख्यमंत्री ने अपने परिवार के सदस्य अभिषेक उर्फ अंशुल यादव को प्रत्याशी बनाया है। एटा से जोगेंद्र सिंह यादव और कासगंज से किरन यादव को प्रत्याशी बनाया गया है।
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सुरक्षा को लेकर बढ़ी चुनौती, अलर्ट
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-प्रमुख सचिव गृह और डीजीपी ने लिया जायजा
-एडीजी एलओ ने एसपी-एसएसपी को दी हिदायत
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लखनऊ : समाजवादी कुनबे के बवाल ने सुरक्षा को लेकर शासन की चुनौती बढ़ा दी है। शुक्रवार को प्रमुख सचिव गृह देबाशीष पंडा और डीजीपी जावीद अहमद ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पांच कालिदास मार्ग और सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के पांच विक्रमादित्य स्थित सरकारी आवास पर जाकर सुरक्षा का जायजा लिया। इधर, अपर पुलिस महानिदेशक कानून-व्यवस्था दलजीत सिंह चौधरी ने जिलों के एसपी-एसएसपी को अलर्ट कर दिया है।
समाजवादी कुनबे के बवाल के बाद दोनों गुटों के समर्थकों के उग्र तेवर को देखते हुए शासन ने सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त किए हैं। पंडा और जावीद अहमद ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आइजी जोन लखनऊ ए. सतीश गणेश, आइजी एटीएस असीम अरुण और आइजी एसटीएफ रामकुमार को आवश्यक निर्देश दिए हैं। एटीएस कमांडो से लेकर एसटीएफ के जवान भी पांच कालिदास मार्ग से लेकर पांच विक्रमादित्य तक मुस्तैद रहेंगे। असलहा लेकर घूमने वालों पर पुलिस की नजर रहेगी। भारी फोर्स के इंतजाम किए गये हैं। पीएसी, आरएएफ समेत तेज तर्रार पुलिस अफसरों को भी मुस्तैद किए जा रहे हैं। शुक्रवार की शाम को ही बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात कर दिया गया है। एडीजी एलओ ने डीएम और एसपी से अपेक्षा की है कि जिलों में शांति-व्यवस्था बनाये रखने के लिए वह बेहतर इंतजाम करें। अगर कहीं भी कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती उत्पन्न हो तो उसे तत्काल नियंत्रित करने की पहल करें।
अफवाहबाजों पर होगी सख्त कार्रवाई
इस बीच सोशल मीडिया पर फैल रही अफवाहों पर भी कंट्रोल के लिए कार्ययोजना बनी है। एसटीएफ के सर्विलांस और विशेष सेल को सक्रिय कर दिया गया है। अगर कहीं किसी ने अफवाह फैलाने की कोशिश की तो उसे चिन्हित कर कड़ी कार्रवाई होगी। इसके लिए सर्विलांस विशेषज्ञ दो अपर पुलिस अधीक्षकों को विशेष जिम्मेदारी दी गयी है।

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-अखिलेश मांगे माफी तो कर सकता हूं विचार : मुलायम
-अखिलेश बोले, समाजवादी पार्टी मेरी
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रामगोपाल द्वारा राष्ट्रीय प्रतिनिधि सम्मेलन बुलाया गया है। यह पार्टी संविधान के खिलाफ है। ऐसे तथाकथित सम्मेलन में कार्यकर्ता हिस्सा न लें
-शिवपाल यादव, प्रदेश अध्यक्ष सपा (ट्विटर पर)
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-रविवार 11 बजे पार्टी का विशेष अधिवेशन बुलाया गया है।
-रामगोपाल यादव
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लखनऊ : सब कुछ अभूतपूर्व और अप्रत्याशित। माफी न मांगी गई तो समझौते की गुंजायश बिल्कुल खत्म। शुक्रवार का दिन उत्तर प्रदेश की सियासत में इतिहास लिख गया जबकि, मुलायम सिंह यादव ने आंखों में आंसू और भरे गले से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को छह साल के लिए समाजवादी पार्टी से निकाल दिया। उनके साथ ही पिछले चार महीने से विवाद के केंद्र में रहे प्रो.राम गोपाल को भी छह साल के लिए निकाल दिया गया। शनिवार का दिन दोनों खेमों के लिए बेहद अहम होगा क्योंकि मुलायम और अखिलेश दोनों ने ही विधायकों और अपने-अपने प्रत्याशियों की बैठक बुलाई है। बैठक में मुलायम सिंह नए मुख्यमंत्री का नाम घोषित कर सकते हैं जबकि अखिलेश अपनी सरकार बचाने का हर जतन करेंगे। दूसरी ओर रामगोपाल ने एक जनवरी को विशेष अधिवेशन बुलाया है, जिसमें मुलायम के प्रति अविश्वास प्रस्ताव पास कराकर उन्हें हटाने का प्रयास होगा। रात को मिलने पहुंचे कुछ लोगों से अखिलेश ने कहा-समाजवादी पार्टी मेरी है।
इधर, निष्कासन की कार्रवाई होते ही आत्महत्या का प्रयास हुआ और धरना-प्रदर्शन भी शुरू हो गए।
 सपाई परिवार का झगड़ा अब ऐसे मोड़ पर है जहां से वापसी के रास्ते लगभग बंद हैं। शुक्रवार सुबह मुलायम सिंह और शिवपाल में कई बार चर्चा हुई और दोपहर होते-होते मुलायम सिंह यादव ने सपा अध्यक्ष की हैसियत से मुख्यमंत्री अखिलेश, प्रो.राम गोपाल को कारण बताओ नोटिस जारी किया, जिसमें उन पर क्रमश: पार्टी से इतर प्रत्याशियों घोषित करने व अनुशासनहीनता जैसे कई गंभीर इल्जाम थे। यह नोटिस जब जारी हुआ, उस समय अखिलेश व रामगोपाल पांच कालिदास मार्ग पर अपनी रणनीति बना रहे थे। कुछ देर बाद मुख्यमंत्री के घर से निकले रामगोपाल यादव ने कहा कि ऐसे नोटिस जारी होते रहते हैं। वह मीडिया के सवालों पर भी भड़क गए। कुछ देर बाद ही उनकी ओर से एक जनवरी 2017 को डॉ.राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट में समाजवादी पार्टी का विशेष अधिवेशन बुलाने का पत्र जारी किया गया। इसमें कहा गया था कि चुनावी समय में पार्टी की गतिविधियों को देखते हुए हजारों कार्यकर्ता ने उन्हें पत्र लिखकर विशेष अधिवेशन बुलाने की मांग की।
विशेष अधिवेशन का पत्र जारी होने की त्वरित प्रतिक्रिया हुई। मुलायम सिंह नाराज हो गए और शाम साढ़े छह बजे पत्रकारों को बुलाकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और रामगोपाल को निष्कासित करने का निर्णय सुनाया। कहा कि राम गोपाल पार्टी के साथ अखिलेश का भविष्य बर्बाद कर रहे हैं। यह बात अखिलेश को समझ में नहीं आ रही है। कहा कि पार्टी को बचाने के लिए वह कोई भी फैसला लेने से नहीं हिचकेंगे। कहा कि  शनिवार को विधायकों व पार्टी के घोषित प्रत्याशियों की बैठक बुलाई है, जिसमें आगे का फैसला लिया जाएगा।
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मुलायम बोले
-राष्ट्रीय प्रतिनिधि सम्मेलन बुलाने का अधिकार राष्ट्रीय अध्यक्ष या 40 फीसद प्रतिनिधियों को है
-कुछ लोगों से पत्र पर दस्तखत करा लिए होंगे मगर यह असंवैधानिक
-विधायकों, प्रतिनिधियों से अपील कि इस सम्मेलन में हिस्सा नहीं लें
-मैं खुद सम्मेलन बुला देता, मुझसे पूछ तो लिया होता, स्वत: फैसला मनमानी है, अनुशासनहीनता है
-देश में किसी पिता ने अपने बेटे को मुख्यमंत्री नहीं बनाया होगा, मैने तब बनाया जब सब विरोध कर रहे थे
-बात हद से निकल गई थी, कड़ी कार्रवाई जरूरी हो गई  थी, पार्टी बचाना ही है
-रामगोपाल ने पहले भी अनुशासनहीनता के ढेरों काम किये, पार्टी से निकाला तो दिल्ली आकर माफी मांगी
-अखिलेश का भविष्य बर्बाद कर रहे हैं रामगोपाल, मुझसे ज्यादा सगे नहीं हो सकते हैं उसके
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पांच, छह लोगों व 25-30 सीटों के प्रत्याशियों पर ही मतभेद है। सब ठीक होगा। पार्टी क्यों छोडूंगा या तोडूंगा मैं तो काम कर रहा हूं। जो काम नहीं कर रहे हैं, वे बाहर जाएं। जो गड़बड़ कर रहे हैं कि उन्हें बाहर निकाला जाएगा
-अखिलेश यादव, मुख्यमंत्री (पार्टी से निकाले जाने से पहले शुक्रवार को करीब तीन बजे नगराम रोड स्थित एक पत्रकार के फार्म हाउस पर)
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कोई पार्टी हमेशा उन लोगों को टिकट देती है, जो जीतने के योग्य होता है। मैं मुलायम सिंह यादव के साथ हूं
-बेनी प्रसाद वर्मा, राज्यसभा सदस्य
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16 साल के सफर में तीन बार सांसद
- अखिलेश यादव पर पहली बार चली अनुशासन की तलवार
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लखनऊ : महज 26 साल की उम्र में सांसद बनने वाले अखिलेश यादव पर पहली बार पार्टी में अनुशासन की तलवार चली है। वह पहली बार वर्ष 2000 में कन्नौज लोकसभा सीट से सपा उम्मीदवार के रूप में ही उपचुनाव जीते थे। इस दौरान खाद्य, नागरिक आपूर्ति और सार्वजनिक वितरण से संबंधित समिति के सदस्य भी रहे।
2004 में हुए आम चुनाव में वह दूसरी बार लोकसभा के लिए चुने गए। इस दौरान वह शहरी विकास समिति, विभिन्न विभागों के लिए कंप्यूटर के प्रावधान पर एक कमेटी, विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर समिति और पर्यावरण एवं वन संबंधी समिति के सदस्य रहे। सांसद के रूप में हैट्रिक लगाते हुए 2009 में हुए आम चुनाव में उन्होंने एक बार फिर जीत दर्ज की। इस बार वह पर्यावरण एवं वन संबंधी समिति, विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर एक समिति और 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर बनी जेपीसी के भी सदस्य रहे। उनके सियासी जीवन में मोड़ तब आया जब 2012 में उन्हें उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का नेता चुना गया। इसी साल प्रदेश विधानसभा चुनाव में पार्टी को जबरदस्त सफलता मिली और इसका श्रेय अखिलेश को गया। 15 मार्च, 2012 को अखिलेश ने सिर्फ 38 साल की उम्र में राज्य के 20वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। तीन मई, 2012 को उन्होंने कन्नौज लोकसभा सीट से इस्तीफा दे दिया। पांच मई, 2012 को वह उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य बने।
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परदे के पीछे के खिलाड़ी भी दे रहे हवा
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-अखिलेश समर्थकों के निशाने पर अमर सिंह और साधना गुप्ता
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लखनऊ : समाजवादी कुनबे में लगी आग को हवा देने के लिए कई प्रमुख लोग जिम्मेदार ठहराए गये हैं। जहां मुलायम और शिवपाल के लोग प्रोफेसर रामगोपाल पर ठीकरा फोड़ रहे हैं वहीं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के समर्थक अमर सिंह को लेकर खफा हैं। इन सबके बीच मुलायम सिंह की पत्नी साधना गुप्ता पर भी अंगुलियां उठ रही हैं। आग को हवा देने में उनकी भूमिका भी मानी जा रही है।
 परिवार में छिड़े सत्ता संग्राम में एक सामान्य घटनाक्रम पर गौर करना जरूरी है। मुलायम की लिस्ट के बाद बगावती हुए अखिलेश ने 235 उम्मीदवारों की जो सूची जारी की, उसमें लखनऊ कैंट से अपर्णा यादव का नाम नदारद था। अखिलेश के सौतेले भाई प्रतीक यादव की पत्नी और साधना की पुत्रवधू अपर्णा हाल के दो वर्षों में राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों में बहुत तेजी से उभरी हैं। उन्हें बहुत पहले ही उम्मीदवार घोषित किया गया था और वह सक्रिय भी खूब रहीं। अखिलेश की सूची में अपर्णा का नाम न होना निसंदेह साधना गुप्ता के लिए पीड़ादायक था। यद्यपि अखिलेश ने कैंट में किसी को उम्मीदवार घोषित नहीं किया, लेकिन पहली सूची में बहू का नाम न देखकर उनकी नाराजगी बढऩी स्वाभाविक था। इन दिनों सोशल मीडिया पर अखिलेश समर्थक उनकी मां के साथ की तस्वीरें लगातार वायरल कर भावुक अपील कर रहे हैं। पहले भी एमएलसी उदयवीर सिंह ने एक चि_ी जारी कर साधना गुप्ता पर आरोप लगाए थे और इस बार भी अखिलेश समर्थक मुलायम के एक्शन के पीछे उनका दिमाग मान रहे हैं। अखिलेश समर्थकों का एक बड़ा तबका साधना के साथ ही सपा महासचिव अमर सिंह को भी जिम्मेदार ठहरा रहा है। मंत्री अरविन्द सिंह गोप, पवन पांडेय समेत कई प्रमुख लोग अमर सिंह पर निशाना साधने लगे हैं। अमर सिंह भी अखिलेश से नाराज हैं और उन्हें जब भी मौका मिला तंज कसने से नहीं चूके। अमर और साधना के अलावा इस लड़ाई में मुलायम परिवार के और भी कई रिश्तेदार और संबंधी हैं जो संदेह पैदा करने और भड़काऊ भूमिका में सक्रिय हुए हैं।
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सपा की कलह से बर्बादी के मुहाने पर प्रदेश : आजम
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 - बोले-रिश्ते कलंकित होने पर एक दूसरे से उठ रहा है भरोसा
रामपुर : समाजवादी पार्टी में टिकट बंटवारे को लेकर चल रहे घमासान से कैबिनेट मंत्री आजम खां खफा हैं। उन्होंने कहा है कि सपा की कलह से प्रदेश बर्बादी के मुहाने पर पहुंच गया है। रिश्तों के बिगाड़ ने प्रदेश का मुकद्दर बिगाड़ दिया। मीडिया से बातचीत में कहा कि अब रिश्तों पर अंगुली उठ रही है। बेटा-बाप पर, चाचा-भतीजे पर और मामा-भांजे पर भरोसा नहीं करेंगे। अब जो हो रहा है, वह इतिहास में बुरे लफ्जों में लिखा जाएगा।
नगर विकास मंत्री आजम खां शुक्रवार को सपा कार्यालय पहुंचे तो तमाम कार्यकर्ता जमा हो गए। कई नेताओं ने लोगों को सपा में शामिल कराया। यहां भी सपा में मचे घमासान की चर्चा होने लगी। इस दौरान मंत्री ने कहा कि कार्यकर्ता मायूस न हों, संयम बरतें। उम्मीद है कि विवाद का हल निकलेगा। विवाद से पार्टी के बड़े नेता नहीं, आम कार्यकर्ता परेशान हैं। हम से ज्यादा बड़े नेताओं की जिम्मेदारी है कि विवाद का हल निकालें। सूबे के सबसे बड़े राज्य में राजनीति करने वाले इतने हल्के साबित होंगे, यह हम सबके लिए बड़े शर्म की बात है। कहा कि कुछ लोग पार्टी को बर्बाद करना चाहते हैं। कहा कि एक मछली ने पूरे तालाब को गंदा कर दिया। उनका निशाना अमर ङ्क्षसह की ओर था। बोले कि सपा की कलह से फासिस्ट ताकतों को मजबूती मिल रही है। समाजवादी लोग मायूस हैं और भाजपा जश्न मना रही है।
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दो दिन-आज और कल
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-आज मुलायम, कल अखिलेश ने बुलाए प्रतिनिधि सम्मेलन
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लखनऊ : रामगोपाल यादव और अखिलेश यादव को समाजवादी पार्टी से निकाले जाने के बाद अब अगले दो दिन शक्ति प्रदर्शन के होंगे। वैसे कहा जा रहा है कि विधानसभा चुनाव-2017 में  मुलायम सिंह यादव ही फिर समाजवादी पार्टी की चेहरा होंगे और दोबारा अपनी ताकत दिखायेंगे मगर इससे पहले 31 दिसंबर को मुलायम सिंह की बैठक और एक जनवरी को अखिलेश के प्रतिनिधि सम्मेलन की जनशक्ति से ही साफ हो जाएगा कि सपा समर्थकों का वाहक कौन होगा?
कभी अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने के लिए स्वयं कुर्सी से दूर रहने का फैसला लेने वाले मुलायम इतने कठोर होंगे कि बेटे को सपा से निकालने की निर्णय करेंगे, यह राजनीतिक विश्लेषकों तक को उम्मीद नहीं थी। परिवार के संग्र्राम में संधि और रामगोपाल की सपा में वापसी के बाद लग रहा था कि मुलायम स्थितियों को संभाल लेंगे, मगर हुआ उलटा। मुलायम के करीबी सूत्र कहते हैं कि अब वह इस चुनाव में भी खुद पार्टी का चेहरा बनने का फैसला कर सकते हैं। इसके पीछे का तर्क है कि मुलायम सिंह के मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित होने के बाद न सिर्फ पुराने समाजवादी सक्रिय होंगे, बल्कि तमाम ऐसे लोग भी मुलायम-शिवपाल खेमे में बने रहेंगे, जो शिवपाल या किसी अन्य को मुख्यमंत्री बनाए जाने की स्थिति में अखिलेश के साथ जा सकते थे।
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दो दिनों में फैसला
समाजवादी पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए नया साल तमाम नए संदेश लेकर सामने आएगा। 2016 के आखिरी दिन यानी, 31 दिसंबर को मुलायम सिंह यादव ने सभी प्रत्याशियों की बैठक बुलाई है, इसमें देखा जाएगा कि घोषित प्रत्याशियों में से कितने मुलायम सिंह के साथ हैं। इसके बाद एक जनवरी को अखिलेश समर्थकों ने राष्ट्रीय प्रतिनिधि सम्मेलन बुलाया है। दोनों दिनों में समर्थकों की भीड़ से तय होगा कि कितने लोग अखिलेश व कितने मुलायम के साथ हैं। यहीं से नए साल में अलग-अलग राहों पर चल कर दोनों खेमे विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटेंगे।
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लड़ाई अब पिता पुत्र में
अखिलेश बनाम शिवपाल से शुरू हुई यह लड़ाई अब बाप-बेटे के बीच संघर्ष में बदल गयी है। यही कारण है कि शिवपाल समर्थक भी मुलायम को ही मुख्यमंत्री बनाने की बात कहकर चुनाव मैदान में जाने को तैयार हैं। जनता के बीच अखिलेश की सकारात्मक छवि व अन्य दलों के साथ जोड़-तोड़ की संभावनाओं के चलते अखिलेश विरोधी खेमे को भी लगता है कि मुलायम ही उनकेखेमे के सर्वश्रेष्ठ दावेदार हो सकते हैं। ऐसे में चुनाव मैदान में अखिलेश बनाम मुलायम होने से पूरी लड़ाई बाप-बेटे के बीच सिमट जाएगी। दूसरे, मुलायम के साथ मुस्लिम भी एकजुट होकर सपा से जुड़ सकते हैं, यह तर्क भी रखा जा रहा है।
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बवाल की धुरी बने रामगोपाल
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-पहले चरण की रार में ही लगा था विलेन का ठप्पा
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लखनऊ : बढ़ते बवाल के बाद अंतत : समाजवादी परिवार में शुक्रवार को दीवार खड़ी हो गयी। प्रोफेसर रामगोपाल यादव इस बवाल की धुरी बनकर उभरे। पहले चरण की लड़ाई में सपा प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव ने उन पर विलेन होने का ठप्पा लगाया और इस बार मुलायम सिंह ने न केवल उन पर सपा को बर्बाद करने बल्कि अखिलेश का भविष्य चौपट करने का भी आरोप मढ़ दिया।
दूसरे चरण की लड़ाई छिडऩे के बाद भी प्रोफेसर राम गोपाल ने आग में घी डालने का काम किया। उन्होंने संतुलन बनाने की बजाय फर्रुखाबाद में समझौते की गुंजायश खत्म होने का बयान देकर माहौल गर्मा दिया। उन्होंने अखिलेश के प्रत्याशियों का समर्थन करने की बात कही। लखनऊ आते ही वह वीवीआइपी गेस्ट हाउस आए और फिर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से उनके आवास पर मिले। इस बीच सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने उनके खिलाफ अनुशासनहीनता की नोटिस जारी कर दी। जब रामगोपाल को इसकी जानकारी दी गयी तो वह बड़े तेवर में बोले कि ऐसी नोटिस मिलती रहती है। फिर वह सक्रिय हो गये और एक जनवरी को राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट में पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन बुला लिया। मुलायम सिंह को यह बात खल गयी। उनकी टिप्पणी थी कि राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाने का अधिकार अध्यक्ष का है, लेकिन उन्होंने बार-बार अनुशासनहीनता की है। मुलायम की नाराजगी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रामगोपाल के साथ ही उन्होंने अखिलेश को भी छह वर्ष के लिए पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया।
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पहले भी रामगोपाल ने भड़कायी आग
पिछली बार जब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को अध्यक्ष पद से हटाकर शिवपाल को यह जिम्मेदारी सौंपी गयी तब यह चि_ी प्रोफेसर रामगोपाल ने ही जारी की थी, लेकिन जब वह लखनऊ आए तो मुलायम के इस फैसले पर आपत्ति कर दी। उन्होंने मुलायम के खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की थी। रामगोपाल शुरू में ही विवाद हल करने की पहल करते तो नतीजा कुछ और हो सकता था। रामगोपाल ने बार-बार यही दोहराया कि अखिलेश यादव के बिना समाजवादी पार्टी की परिकल्पना नहीं की जा सकती है।
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सीबीआइ जांच की तलवार
घोटालों के आरोपी यादव सिंह के संबंधों को लेकर रामगोपाल आरोपों के घेरे में आए और शिवपाल सिंह यादव ने ही उन्हें कठघरे में खड़ा किया। शिवपाल ने रामगोपाल पर भाजपा से मिलने का आरोप तक लगा दिया और कहा कि उनका परिवार यादव सिंह घोटाले में शामिल है।
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  शिवपाल और अखिलेश में बढ़ाई दूरी
मुलायम जब अखिलेश को राजनीति में स्थापित करने में लगे थे तब उन्होंने अमर सिंह को यह जिम्मेदारी सौंपी थी। उन दिनों शिवपाल और रामगोपाल एक हुआ करते थे। वर्ष 2012 में जब अखिलेश ने सत्ता की कमान संभाली तो रामगोपाल ने शिवपाल से दूरी बनाकर अखिलेश को पकड़ लिया। सरकार में उनका दबदबा कायम हुआ और वह सब पर भारी दिखने लगे। कहते हैं कि शिवपाल और अखिलेश के बीच दूरी बढ़ाने में भी उन्होंने ही अहम भूमिका निभाई।
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पहले भी छह वर्ष के लिए बर्खास्त
पहले चरण की रार में सपा मुखिया मुलायम सिंह ने प्रोफेसर रामगोपाल को छह वर्ष के लिए निष्कासित किये गये थे, लेकिन रामगोपाल के गलती मान लेने के बाद उनकी वापसी हुई थी।
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प्रो. राम गोपाल :
राम गोपाल यादव
जन्म तिथि - 29 जून 1946
जन्म स्थान - सैफई, इटावा। 1969 से 1974 तक शिक्षक।
राजनीतिक सफर : 1988 में ब्लाक प्रमुख, 1989-92 अध्यक्ष, जिला परिषद इटावा। 1992 में राज्यसभा सदस्य। 1998 में दोबारा राज्यसभा सदस्य। 2004 में संभल से लोकसभा सदस्य। लोकसभा कार्यकाल समाप्त होने के बाद फिर लगातार राज्यसभा में।
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 राष्ट्रीय सम्मेलन असंवैधानिक : मुलायम
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-विधायकों व पार्र्टी नेताओं से सम्मेलन में शामिल न होने की अपील
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लखनऊ : समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने एक जनवरी को आहूत राष्ट्रीय प्रतिनिधि सम्मेलन को असंवैधानिक करार देते हुए विधायकों और पदाधिकारियों से सम्मेलन में शामिल नहीं होने की अपील की है।
पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को छह वर्ष के लिए पार्टी से निष्कासित करने का एलान करने के बाद मुलायम ने बताया कि रामगोपाल द्वारा बुलाया गया प्रतिनिधि सम्मेलन पार्टी संविधान की धारा-14 एवं धारा-32 के विपरीत है। सपा मुखिया ने पार्टी को बचाने की दुहाई देते हुए विधायकों व प्रतिनिधियों से सम्मेलन मेें न आने की अपील भी की। उनका कहना था कि पार्टी को बचाना और अनुशासन बनाए रखना प्राथमिकता है। कोई भी समाजवादी पार्टी को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेगा तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी।
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क्या कहती है धारा-14
राष्ट्रीय सम्मेलन
1-निम्नलिखित प्रतिनिधि होंगे-
क-राष्ट्रीय सम्मेलन में प्रत्येक राज्य से चयनित प्रतिनिधि।
ख-सभी संसद सदस्य, विधायक, पूर्व सांसद व जिला पंचायत अध्यक्ष।
ग-सभी प्रदेश अध्यक्ष, संबद्ध संगठनों के राज्य व राष्ट्रीय अध्यक्ष।
घ-राष्ट्रीय कार्यकारिणी के पदाधिकारी व सदस्य।
ड-सपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, यदि वह सक्रिय सदस्य हो।
च-इस धारा की उप धारा 1(क) से (ड) के प्रतिनिधियों की कुल संख्या के दस प्रतिशत प्रतिनिधि राष्ट्रीय सम्मेलन के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा मनोनीत किए जाएंगे।
2- राष्ट्रीय कार्यकारिणी के प्रस्ताव पर अथवा राष्ट्रीय सम्मेलन के 40 प्रतिशत सदस्यों की मांग पर राष्ट्रीय सम्मेलन का विशेष अधिवेशन राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा कभी भी बुलाया जा सकता है।
3-तीन वर्ष के भीतर कम से कम एक बार राष्ट्रीय कार्यकारिणी द्वारा निर्धारित तिथि एवं स्थान पर सम्मेलन की बैठक अवश्य होगी।
4-राष्ट्रीय सम्मेलन के प्रतिनिधियों के चयन को लेकर यदि कोई आपत्ति है तो वह राष्ट्रीय अध्यक्ष के समक्ष लिखित रूप में की जा सकती है। राष्ट्रीय अध्यक्ष का निर्णय अंतिम व बाध्यकारी होगा। राष्ट्रीय अध्यक्ष के निर्णय को किसी भी न्यायालय में चुनौती नही दी जा सकती है।
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धारा-32
राष्ट्रीय अध्यक्ष यदि इस बात से संतुष्ट हो तो कोई संबद्ध संगठन समाजवादी पार्टी के हितों के अनुकूल कार्य नहीं कर रहा है तो ऐसे संबद्ध संगठन को राष्ट्रीय अध्यक्ष कभी भी भंग करता है या उसके किसी भी पदाधिकारी को पद से हटा सकता है।
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सपा से मनोरंजन कर लिया जाना चाहिए
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-सोशल साइट्स पर छाया सपा का 'दंगल पार्ट-टूÓ
-ट्विटर पर मजे लिए जा रहे तो गंभीर टिप्पणियां भी
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लखनऊ : सपा की अंदरूनी कलह एक बार फिर सोशल साइट्स पर सुर्खियों में है। ट्विटर हैंडिल पर देखते ही देखते यह टॉप टेन में ट्रेंड करती नजर आई तो फेसबुक पर भी कमेंट की भरमार लग गई। इंस्टाग्र्राम और वाट्सएप आदि सोशल नेटवर्किंग पर भी सैकड़ों कमेंट भरे पड़े हैं। सबसे अधिक वायरल दंगल का गाना 'बाबू सेहत के लिए तू तो हानिकारक हैÓ हुआ है। इसके साथ ही दंगल के पोस्टर में मुलायम के साथ ही अखिलेश को दर्शाया गया है।
सपा की पहली कलह पर भी सोशल मीडिया में तरह-तरह की चुटकियों की भरमार थी और इस बार भी कम मजे नहीं लिए जा रहे। किसी ने सवाल उठाया है-'क्या समाजवादी पार्टी से मनोरंजन कर लिया जाना चाहिए।Ó वाट्सएप पर यह सवाल सबसे अधिक चला और अधिकांश का कहना था कि जरूर लिया जाना चाहिए। प्रमोद शुक्ल ने लिखा-'संभलने के बजाए लडख़ड़ाती जा रही साइकिल...करमगति टारे नहीं टरी। एसके यादव ने फेसबुक पर बेबाकी से लिखा-'दागियों पर मुलायम की या दागियों पर कठोर की...देखिए इस जंग में किसकी जीत होती है। नौकरशाह सूर्य प्रताप सिंह ने कहा कि चंबल की घाटी में रिश्तों का भले कोई मोल हो, लेकिन लखनऊ के दंगल में इसका कोई मोल नहीं। पूरे घटनाक्रम पर समाजसेवी अरुण अग्र्रवाल ने चुटकी ली-'सपा का नया एलान....एक विधानसभा क्षेत्र से दो उम्मीदवार उतारे जाएंगे।Ó
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कुछ नजीरें
-मुलायम को यूनेस्को से बेस्ट फादर अवार्ड मिलना चाहिए : गीतिका
-क्या मुलायम पूरी फेमिली को पालिटिक्स में लाने की कीमत चुका रहे हैं। क्या यह चाचा-भतीजा का लास्ट राउंड है : पीयूष गौतम
-मुलायम ने अखिलेश को रबर स्टांप सीएम बना दिया है : अमित मालवीय
-अखिलेश का लंबा कॅरियर है, मुलायम इतिहास हैं। अखिलेश को इलेक्शन अपने दम पर लडऩा चाहिए...चाहे जीतें या हारें : पराग भंडारी
-अखिलेश सही थे, अमर सिंह ने सपा को बर्बाद कर दिया : इनविन्सबिल
-मुलायम सिंह के लिए अपने बड़े परिवार में संतुलन बनाना मुश्किल हो रहा है। इसका एक हल है कि प्रदेश को चार हिस्सों में विभाजित कर दिया जाए : स्मिता मिश्र
-उत्तर प्रदेश में असली समाजवाद तो अब आया है। सबके पास टिकट है। किसी के पास मुलायम का, किसी के पास अखिलेश का और किसी के पास शिवपाल का : अरुण अग्र्रवाल
-हे शिवपाल तुम क्यों व्यर्थ शोक करते हो...तुम क्या लाए थे जो तुम्हें मिला नहीं। जो आज अखिलेश का है वो कल मुलायम का था और कल अर्जुन का होगा : शरद शिवहरे
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अखिलेश की सूची ही सही : रामगोपाल
-बोले-बात बहुत आगे बढ़ गई है, कान भरने वालों की हैसियत 10 वोट की नहीं
फर्रुखाबाद : विधानसभा चुनाव में प्रत्याशियों की सूची को लेकर सपा में चल रही रार के बीच पार्टी महासचिव प्रो. रामगोपाल यादव ने शुक्रवार को सुबह यहां पत्रकारों से बातचीत में कहा कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा घोषित प्रत्याशियों की सूची ही सही है। वही मेरे प्रत्याशी हैं। उन्हीं के समर्थन में चुनाव प्रचार करूंगा।
सदर विधायक विजय ङ्क्षसह के पिता की तेरहवीं संस्कार में रामगोपाल ने कहा कि तीन-चार दिन पहले उनकी मुलायम ङ्क्षसह यादव से भेंट हुई थी। नेताजी ने उन्हें एक जनवरी को आने के लिए कहा था, लेकिन इससे पहले ही उन्होंने प्रत्याशियों की सूची जारी कर दी। एक व्यक्ति के कहने पर नेताजी ने अखिलेश यादव को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया था। वह उस व्यक्ति का नाम नहीं लेना चाहते, उसे सब जानते हैं। उस व्यक्ति की हैसियत किसी विधानसभा क्षेत्र में 10 वोट पार्टी के पक्ष में डलवाने की नहीं है। जनता ने अखिलेश यादव को फिर मुख्यमंत्री बनाने का मन बना लिया है। अखिलेश विरोधी विधानसभा का मुंह नहीं देख पाएंगे।
अखिलेश के प्रत्याशी सपा के निशान पर लड़ेंगे या मुलायम के घोषित प्रत्याशी पर उन्होंने कहा कि यह फैसला निर्वाचन आयोग को करना है। उन्होंने दोहराया कि वह पहले ही मुंबई से पत्र लिखकर कह चुके हैं कि पार्टी में रहें अथवा न रहें, अखिलेश का समर्थन करेंगे। उन्होंने कहा कि विधानसभा चुनाव के बाद सपा नए स्वरूप में नजर आएगी और स्थितियां बदलेंगी और एक बार फिर से सब कुछ ठीक होगा।
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मुख्तार व रघुराज के लिए सपा ने छोड़ी सीट!
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-प्रमोद तिवारी की बेटी की सीट पर भी नहीं उतारा है प्रत्याशी
-मुलायम ने 'दोस्तों का दोस्तÓ होने की रवायत रखी बरकरार
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लखनऊ : समाजवादी परिवार के संग्राम, उससे निपटने केप्रयासों के बीच मुलायम सिंह यादव ने प्रत्याशियों की जो सूची जारी की है, उसमें रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया, मुख्तार अंसारी और कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी की बेटी आराधना की सीट पर प्रत्याशी न उतारकर 'दोस्तों का दोस्तÓ रहने की अपनी रवायत बरकरार रखी है।
समाजवादी पार्टी की ओर से चार टुकड़ों में जारी प्रत्याशियों की सूची में 395 उतारने की बात कही गई है। वास्तव में उनमें प्रत्याशियों की संख्या 392 है। दो प्रत्याशियों का नाम दो स्थानों पर है, यह त्रुटि हो सकती है। खास यह है कि मुलायम सिंह ने कौएद के सपा में विलय के समय हुए समझौते को निभाते हुए मुख्तार अंसारी के लिए मऊ सीट पर प्रत्याशी नहीं उतारा। अंसारी यहीं से विधायक हैं। रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया की परंपरागत सीट कुंडा से भी प्रत्याशी नहीं उतारा गया है। यूं रघुराज निर्दल लड़ते हैं, मगर मायावती सरकार में उन पर पोटा लगने पर मुलायम खुलकर रघुराज के साथ खड़े हो गये थे। तब से रघुराज भी मुलायम के साथ हैं। वर्ष 2012 में सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के एक्शन की आंच रघुराज की ओर बढ़ी, मुलायम ने उस पर पानी डालने का काम किया। रघुराज के करीबी व बाबागंज सुरक्षित से विधायक विनोद सरोज की सीट को भी छोड़ दिया गया है।सपा की सूची में कांग्र्रेस सांसद प्रमोद तिवारी की बेटी व रामपुर खास की विधायक आराधना मिश्र उर्फ मोना के विरुद्ध भी किसी को टिकट नहीं दिया गया है। तिवारी का सपा करीबी रिश्ता जगजाहिर है, प्रमोद को राज्यसभा भेजने में मुलायम ने ही अहम भूमिका निभाई थी। मंत्री विनोद सिंह उर्फ पंडित सिंह को उनकी सीट गोंडा के स्थान पर तरबगंज से प्रत्याशी बनाया गया है, मगर उनका उत्तराधिकारी तय नहीं किया गया। मथुरा की गोवर्धन व बल्देव सुरक्षित पर प्रत्याशी घोषित नहीं हैं। माना जा रहा है कि गोवर्धन से ठाकुर किशोर सिंह का टिकट तय है मगर बल्देव सुरक्षित से सपा के पास अभी जिताऊ प्रत्याशी नहीं है, वर्ष 2012 में यह सीट रालोद के हिस्से में गई और यहां से जीते पूरन प्रकाश भाजपा के करीब हो गए हैं।
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इन सीटों पर प्रत्याशी घोषित नहीं
1-गोवर्धन, बल्देव (सु) (मथुरा), आर्यनगर (कानपुर), रामपुर खास, बाबागंज (सु) और कुंडा (प्रतापगढ़), गोंडा, नौतनवा (महाराजगंज), सलेमपुर (सु), मऊ और बेलथरा रोड (सु)।