Friday, 17 March 2017

UP ELECTIONS MUSLIM-1

 मुस्लिम बहुल सीटों पर जमकर बंटे वोट, खिला कमल
नोट : टैली अवश्य लगाएं। टैली को अपडेट किया गया है।
-------
- 28 सीटों पर सपा-बसपा में मतों के बंटवारे का लाभ भाजपा को
- कई क्षेत्रों में दोनों दलों का जोड़ भाजपा के जीते प्रत्याशी से 30 से 40 हजार तक ज्यादा
-------
लखनऊ : इधर जायें या उधर! मुसलमानों के इसी असमंजस ने मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भारतीय जनता पार्टी का 'कमलÓ खिला दिया। 'साइकिलÓ पंक्चर हुई। 'हाथीÓ ठहर गया। हां, रामपुर, मुरादाबाद, आजमगढ़ की जिन सीटों पर इस वर्ग ने स्पष्ट फैसला लिया, वहां सपा या बसपा के प्रत्याशी जीत का परचम फहराने में कामयाब रहे हैं। 28 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां बसपा, सपा-कांग्रेस गठबंधन के मतों का जोड़ भाजपा के जीतेप्रत्याशी से कई हजार अधिक होता है।
प्रदेश में राजनीतिक बयार की आहट के साथ 'सेकुलरÓ दलों के नुमाइंदे मुस्लिम वोटों की छीना-झपटी में लग जाते हैं। इसकी मुख्य वजह इनकी आबादी 19.5 फीसद से अधिक होना है। यूं तो 120 विधानसभा क्षेत्रों में इस वर्ग के लोग हार-जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, मगर 72 विधानसभा क्षेत्रों में इनकी आबादी 30 फीसद से अधिक है। बावजूद इसके कहीं क्षेत्रीय समीकरण, कहीं पंथ को  लेकर इस संप्रदाय में ऐसा मतभेद है कि  वह सियासी रहनुमा चुनने में भी एकजुट नहीं हो पाते। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव परिणाम के आंकड़ों से साफ है कि मुसलमानों के वोटों में जमकर बंटवारा हुआ। जिन 28 क्षेत्रों में उनकी आबादी 30 फीसद से भी ऊपर है, वहां भी भाजपा ने 'कमलÓ खिला दिया।
मुस्लिम बहुल अलीगढ़ में सपा व बसपा के मुस्लिम प्रत्याशियों को हासिल मतों का जोड़ भाजपा के विजयी प्रत्याशी को मिले मतों से भी दस हजार ज्यादा होता है। इलाहाबाद दक्षिण में यह जोड़ भाजपा के जीते प्रत्याशी से 16 हजार अधिक है। बहेड़ी में बसपा प्रत्याशी को 66009 और सपा को 63841 मत मिले। यानी भाजपा प्रत्याशी से 22 हजार अधिक। बांगरमऊ में सपा को 59330, बसपा को 44730 मत मिले जबकि भाजपा के विजयी प्रत्याशी को 87657 मत मिले। सपा-बसपा के मतों को जोड़ दिया जाए तो वह भाजपा प्रत्याशी के मतों से 17 हजार अधिक है।
बड़ापुर में कां्रग्रेस को 68920, बसपा को 50684 मत मिले। इनका योग भाजपा के विजयी प्रत्याशी को मिले मतों से 40 हजार से अधिक है। इसी तरह चायल, तुलसीपुर और नानपारा में मतों के विभाजन में भाजपा को जीत मिली। भोजीपुरा में सपा को 72617 व बसपा 49882 मिले जो भाजपा के विजयी प्रत्याशी से 22 हजार अधिक है। इसी तरह सपा-बसपा के मुस्लिम प्रत्याशियों का जोड़ चायल में चार हजार, देवबंद में 26 हजार, कांठ में 41 हजार और मेरठ दक्षिण में 34 हजार अधिक है। ये सभी क्षेत्र मुस्लिम बहुल माने जाते हैैं। मुस्लिम राजनीति का लंबे समय से अध्ययन कर रहे अभय कुमार कहते हैं कि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव व 2017 के विधानसभा चुनाव के परिणामों ने यह साबित कर दिया है कि मुसलमान मत एकजुट नहीं होता है। उसमें कतिपय कारणों से सीधा बंटवारा होता है। गैर भाजपा दलों को इन परिणामों की रोशनी में आगे की रणनीति तैयार करनी होगी।
--------
इन क्षेत्रों में बंटे मुस्लिम मत, जीती भाजपा
 क्षेत्र  सपा  बसपा  योग  भाजपा अंतर
अलीगढ़-  98312  25704  124016  113752 10264
बहेड़ी  66009  63841 129850 108846  21004
बांगरमऊ  59330  44730 104060 87657 16403
भोजीपुरा  72617  49882  122499 100381 22118
बुलंदशहर  24119  88454  112573 111538  1035
चांदपुर  36531  56696  93227  92345  822
देवबंद  55385  72844  128229 102244 25985
फिरोजाबाद  60927  51387  112314  102654  9660
कांठ  73959  43820  117779 93022  24757
लखनऊ (पश्चिम)- 79950  36247 116197  93022 23175
मीरापुर- 68842  39689  108531 69035 39496
मेरठ (दक्षिण)- 69117  77830  146947  113225 33722
मुरादाबाद नगर- 120274  24650 144924  123467 21457
नूरपुर- 67643  25430 93073  86312 6761  
फूलपुर- 67299 50421 117720 93912 23808
सरधना 76296 57239 133535 97921 35614
शाहाबाद : 15767 95364 111131 99624 11507
उतरौला- 56066  44799 100865 85240 15625
----------------------------------------------------------

निचले पायदान पर मुस्लिम नुमाइंदगी
उत्तर प्रदेश की राजनीतिक दशा-दिशा तय करने में मुस्लिम वोटरों की 'भूमिकाÓ सीमित होने को है? 2014 के लोकसभा में प्रदेश से मुस्लिमों की नुमाइंदगी 'शून्यÓ होने के बाद अब विधानसभा में प्रतिनिधित्व न्यूनतम संख्या पर पहुंच गया है।
प्रदेश की राजनीति में मुसलमानों की भूमिका अहम रही है। कभी कांग्रेस इस वर्ग के वोटों को अपनी थाती समझती थी। मंडल-कमंडल के दौर में सपा-बसपा ने नई सियासी गोलबंदी का सिलसिला शुरू किया और मुसलमानों को उसमें शामिल किया। जिससे विधानसभा में इस वर्ग की नुमाइंदगी बढऩी शुरू हुई। 1996 में 39 मुस्लिम विधायक बने। 2002 में यह संख्या-44 हुई। 2007 में यह संख्या-56 तक पहुंची। और 2012 केविधानसभा चुनाव में रिकार्ड 68 मुस्लिम विधायक निर्वाचित हुए। मगर, 2014 लोकसभा चुनाव में सियासी चौसर कुछ इस अंदाज में बिछी कि मुस्लिम वोट बिखर गया और  भाजपा ने टिकटों की हिस्सेदारी से मुसलमानों को दूर रखकर 81 बनाम 19 का जो दांव चला उससे संसद में उत्तर प्रदेश से मुस्लिमों की नुमाइंदगी शून्य हो गई। विधानसभा चुनाव में भाजपा ने तीन साल पुराना नुस्खा आजमाया और यह न सिर्फ कारगर रहा। क्योंकि मुस्लिम मतों में हमेशा की तरह फिर बंटवारा हुआ। आश्चर्यजनक बात यह रही है कि मुजफ्फरनगर समेत ढेरों दंगों के बावजूद मुसलमानों के बड़े वर्ग ने सपा के साथ रहना पसंद किया। जबकि बसपा ने सौ मुसलमानों को टिकट देकर उन पर भारी दांव लगाया था।
बात आंकड़ों की हो मुस्लिमों की आबादी 19.5 के करीब है। 26 जिलों की 120 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैैं जहां उनकी आबादी 20 से 35 फीसद तक है। मगर चुनाव परिणाम ने यह साबित किया है कि यह आबादी उलटफेर में उस अंदाज में कारगर नहीं है, जिसका शोर किया जाता रहा है। विधानसभा चुनाव के परिणामों से साफ है कि आने वाले चुनाव में मुस्लिम एक फैक्टर तो रहेगा मगर वह 'वोट बैैंकÓ के रूप में पढ़ा नहीं किया जा सकेगा। मुसलमानों की तरक्की के लिए लंबे समय से काम कर रहे अभय कुमार कहते हैं कि राजनीतिक दलों को यह समझना चाहिए कि मुसलमान सिर्फ मुसलमान नहीं है। इस संप्रदाय में भी अगड़े-पसमांदा (अगड़े-पिछड़े) के बीच खासा मतभेद है। वह बरेलवी, देवबंदी, हनफिया, सुन्नी, शिया, कादरिया समेत ढेरों फिरकों में बंटा हुआ है, इस बंटवारे का असर चुनावों दिखना स्वाभाविक ही है।
अब तक यूपी में मुस्लिम विधायक
1951-44
1957-37
1962-29  
1967-24
1969-34
1974-40
1977-48
1980-49
1985-50
1989-41
1991-23
1993-31
1996-39
2002-44
2007-56
2012-68
2017-25
----------------------



No comments:

Post a Comment