Friday, 2 November 2018

खूबसूरत महिला पात्र पैंडोरा


भारत की राजनीति यूनान की मिथकीय कहानी की खूबसूरत महिला पात्र पैंडोरा की तरह है जिसके हाथ में शिल्प कौशल के देवता एक बॉक्स देकर हिदायत देते हैं, इसे कभी खोलना नहीं. लेकिन जिज्ञासु पैंडोरा उस बॉक्स को खोल देती है और बॉक्स में बंद सारी बुराइयां दुनिया को प्रदूषित करने के लिए आजाद हो जाती हैं. भारत में जब भी चुनाव आता है, पैंडोरा की तरह ‘राजनीति-देवी’ घोटालों-भ्रष्टाचारों का बक्सा खोल देती हैं और लोकतंत्र का पर्व हर बार बदबू से भर जाता है. इस बुराई-बक्से का इस्तेमाल सभी करते हैं, विपक्षी दल से लेकर सत्ताधारी दल तक. लेकिन चुनाव खत्म होते ही बुराई-बक्सा अगले चुनाव के लिए ताक पर रख दिया जाता है. अभी कांग्रेस बुराई-बक्से से सत्ताधारी भाजपा का राफेल-सौदा निकाल कर चमका रही है तो भाजपा लंबे समय तक सत्ता सुख भोगती रही कांग्रेस के घोटालों की लंबी फेहरिस्त निकाल कर दिखाने में लगी है.
इसी बुराई-बक्से से उत्तर प्रदेश का पत्थर घोटाला भी सामने निकल आया है. वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा के भ्रष्टाचार का बुराई-बक्सा खोल कर समाजवादी पार्टी सत्ता में आई थी. लेकिन सत्ता में आते ही समाजवादी पार्टी ने बसपा का भ्रष्टाचार दबा दिया. बाद में उसी भ्रष्टाचार की प्रणेता पार्टी बसपा से समाजवादी पार्टी ने गठबंधन रिश्ता भी बना लिया. अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्मारक (पत्थर) घोटाले की जांच (स्टेटस) रिपोर्ट मांग कर भाजपा को बुराई-बक्सा खोलने का चुनावी-मौका दे दिया है. अब तक भाजपा सरकार भी इस घोटाले को लेकर मौन साधे थी, लेकिन चुनाव आया तो डराने, धमकाने और औकात दिखाने में पत्थर घोटाला अब उनके काम आने वाला है. जब देश-प्रदेश में लोकसभा चुनाव का माहौल गरमाया, तभी ऐन मौके पर मायावती-काल के स्मारक घोटाले की सीबीआई जांच के लिए किसी शशिकांत उर्फ भावेश पांडेय की तरफ से इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल हो जाती है. इस याचिका पर त्वरित सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीबी भोसले और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा उत्तर प्रदेश सरकार से इस मामले में विजिलेंस जांच की प्रगति रिपोर्ट मांग लेते हैं. याचिका पर हाईकोर्ट के रुख से सनसनी फैल गई. बसपा भी सनसना गई और उससे गठबंधन करने पर उतारू सपा भी सनसनाहट से भर गई.
सपा की सनसनाहट थोड़ी अधिक इसलिए भी है क्योंकि मायावती-काल के घोटालों की फाइल अखिलेश सरकार ने ही दबा रखी थी. कार्रवाई करने की लोकायुक्त की सिफारिश को ताक पर रख कर तत्कालीन मुख्यमंत्री बसपाई भ्रष्टाचार की गैर-वाजिब अनदेखी कर रहे थे. स्मारक घोटाले पर तत्कालीन अखिलेश सरकार की चुप्पी इस बार बड़ा कानूनी जवाब मांगेगी. हाईकोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए बड़े ही सख्त लहजे में कहा है कि स्मारक घोटाले का कोई आरोपी बचना नहीं चाहिए. घोटाले की जांच उत्तर प्रदेश सरकार की आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा (ईओडब्लू) और सतर्कता अधिष्ठान (विजिलेंस) कर रहा था. इस प्रकरण में एक जनवरी 2014 को ही लखनऊ के गोमतीनगर थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई थी. तब यूपी में अखिलेश यादव की सरकार थी.
मायावती के मुख्यमंत्रित्व-काल में राजधानी लखनऊ और गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) में अम्बेडकर स्मारकों और पार्कों के निर्माण में 14 अरब रुपए से भी अधिक का घोटाला हुआ था. तत्कालीन लोकायुक्त न्यायमूर्ति एनके मेहरोत्रा की रिपोर्ट और कार्रवाई की सिफारिश पर अखिलेश यादव सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की थी. लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा ने मई 2013 में ही अखिलेश सरकार को अपनी जांच रिपोर्ट सौंप दी थी. स्मारक घोटाले में तत्कालीन मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबू सिंह कुशवाहा समेत 199 व्यक्ति और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के मालिकान जिम्मेदार ठहराए गए थे. आरोपियों में दो मंत्रियों, एक दर्जन विधायकों, दो वकीलों, खनन विभाग के पांच अधिकारियों, राजकीय निर्माण निगम के प्रबंध निदेशक सीपी सिंह समेत 59 अधिकारियों और पांच महाप्रबंधकों, लखनऊ विकास प्राधिकरण के पांच अधिकारियों, 20 कंसॉर्टियम प्रमुखों, 60 व्यावसायिक प्रतिष्ठानों (फर्म्स) के मालिक और राजकीय निर्माण निगम के 35 लेखाधिकारियों के नाम शामिल हैं. आरोपियों की लिस्ट में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती या मुख्यमंत्री सचिवालय के उनके खास नौकरशाहों के नाम शामिल नहीं हैं. लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा ने अपनी रिपोर्ट में तत्कालीन मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बाबू सिंह कुशवाहा, राजकीय निर्माण निगम के तत्कालीन प्रबंधन निदेशक (एमडी) सीपी सिंह, खनन विभाग के तत्कालीन संयुक्त निदेशक सुहैल अहमद फारूकी और 15 इंजीनियरों के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज कराकर मामले की सीबीआई से जांच कराने और घोटाले की रकम वसूलने की सिफारिश की थी. लोकायुक्त ने यह भी सिफारिश की थी कि आरोपियों की आय से अधिक पाई जाने वाली चल-अचल सम्पत्ति जब्त कर ली जाए और स्मारकों के लिए पत्थर की आपूर्ति करने वाली 60 फर्मों और 20 कंसॉर्टियम से भी वसूली की कार्रवाई की जाए. लोकायुक्त की रिपोर्ट मिलने पर तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कार्रवाई की बात तो कही, लेकिन सीबीआई से जांच कराने की सिफारिश करने के बजाय सतर्कता अधिष्ठान को जांच सौंपी दी. मामले को घालमेल करने के इरादे से तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कार्रवाई के लिए लोकायुक्त की रिपोर्ट के कुछ हिस्से अलग कर उसे गृह विभाग को सौंप दिए. उसी रिपोर्ट के कुछ हिस्से लोक निर्माण विभाग को सौंप दिए गए और कुछ हिस्से भूतत्व और खनन विभाग के सुपुर्द कर दिए गए. यानि, गृह विभाग छोड़ कर, पत्थर घोटाले में जो विभाग शामिल थे, उन्हें ही कार्रवाई करने की अखिलेश सरकार ने जिम्मेदारी दे दी.
विडंबना है कि अखिलेश यादव सरकार ने लोकायुक्त की रिपोर्ट को क्षतविक्षत करने की गैर-कानूनी हरकत की. जबकि लोकायुक्त ने पत्थरों की खरीद में घोटाला कर सरकार को 14.10 अरब रुपए नुकसान पहुंचाने के आपराधिक-कृत्य के खिलाफ ‘क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट ऑर्डिनेंस-1944’ की धारा 3 के तहत सभी आरोपियों की सम्पत्ति कुर्क करके घोटाले की राशि वसूलने की सिफारिश की थी. लोकायुक्त ने अपनी सिफारिश में सरकार को यह भी सुझाया था कि तत्कालीन मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबू सिंह कुशवाहा से कुल धनराशि का प्रत्येक से 30 प्रतिशत, राजकीय निर्माण निगम के प्रबंध निदेशक सीपी सिंह से 15 प्रतिशत, खनन विभाग के तत्कालीन संयुक्त निदेशक सुहैल अहमद फारूकी से पांच प्रतिशत और निर्माण निगम के 15 इंजीनियरों से 15 प्रतिशत धनराशि वसूली जाए. लोकायुक्त ने यह भी सिफारिश की थी कि निर्माण निगम के लेखाधिकारियों की आय से अधिक सम्पत्ति पाए जाने पर उनसे सरकारी खजाने को पहुंचे नुकसान की शेष राशि यानि पांच प्रतिशत की वसूली की जाए. लेकिन अखिलेश सरकार इस फाइल पर ही आसन टिका कर बैठ गई.
तत्कालीन लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा द्वारा आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा (ईओडब्लू) से कराई गई जांच में आधिकारिक तौर पर पुष्टि हुई कि पत्थर (स्मारक) घोटाले के जरिए 14.10 अरब रुपए, यानि, सवा चौदह हजार करोड़ रुपए हड़प लिए गए. स्मारकों और पार्कों के निर्माण के लिए मायावती सरकार ने कुल 42 अरब 76 करोड़ 83 लाख 43 हजार रुपए जारी किए थे. इसमें से 41 अरब 48 करोड़ 54 लाख 80 हजार रुपए खर्च किए गए. शेष एक अरब 28 करोड़ 28 लाख 59 हजार रुपए सरकारी खजाने में वापस कर दिए गए. स्मारकों के निर्माण पर खर्च की गई कुल धनराशि का लगभग 34  प्रतिशत अधिक खर्च करके सरकार को 14 अरब 10 करोड़ 50 लाख 63 हजार 200 रुपए का सीधा नुकसान पहुंचाया गया. उल्लेखनीय है कि वर्ष 2007 से लेकर 2012 के बीच तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के आदेश पर लखनऊ और नोएडा में अम्बेडकर और कांशीराम के नाम पर कई पार्क और स्मारक बनवाए गए थे. स्मारकों और पार्कों के निर्माण कार्य में प्रमुख रूप से राजकीय निर्माण निगम, आवास एवं शहरी नियोजन विभाग, लोक निर्माण विभाग, नोएडा अथॉरिटी, लखनऊ विकास प्राधिकरण और संस्कृति एवं सिंचाई विभाग को लगाया गया था.
स्मारकों और पार्कों के निर्माण में लगाए गए गुलाबी पत्थर मिर्जापुर की खदानों के थे. उन पत्थरों को राजस्थान (भरतपुर) भेज कर वहां कटाई (कटिंग एंड कार्विंग) कराई जाती थी. फिर जयपुर भेज कर उन पत्थरों पर नक्काशियां होती थीं. इसके बाद उन पत्थरों को ट्रकों से वापस लखनऊ और नोएडा भेजा जाता था. कागजों पर जितने ट्रक मिर्जापुर से राजस्थान गए और वहां से वापस नोएडा और लखनऊ आए, वे असलियत में उतने नहीं थे. पत्थर ढुलाई में भी सरकार का अनाप-शनाप धन हड़पा गया. भुगतान भी तय रकम से दस गुना ज्यादा मनमाने तरीके से किया जाता रहा. आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा की जांच रिपोर्ट कहती है कि वर्ष 2007 से लेकर 2011 के बीच कुल 15 हजार 749 ट्रक पत्थर कटाई और कशीदाकारी के लिए राजस्थान भेजे गए. इनमें से मात्र 7,141 ट्रक पत्थर लखनऊ आए और 322 ट्रक नोएडा पहुंचे. बाकी के 7,286 ट्रक और उन पर लदे पत्थर कहां लापता हो गए? जबकि इनके भुगतान ऊंची कीमतों पर हो गए. घोटाले की जांच रिपोर्ट में इस तरह की अजीबोगरीब बानगियां भरी पड़ी हैं.
जांच में यह भी पाया गया था कि आठ जुलाई 2008 को बैठक कर कंसॉर्टियम बनाया गया और कंसॉर्टियम से पत्थरों की सप्लाई का अनुबंध किया गया. इस बैठक ने उत्तर प्रदेश उप खनिज (परिहार) नियमावली 1963 का सीधा-सीधा उल्लंघन किया. पत्थरों की खरीद के लिए बनी संयुक्त क्रय समिति की बैठक में सारे नियम-प्रावधान दरकिनार कर बिना टेंडर के बाजार से ऊंचे रेट पर मिर्जापुर सैंड स्टोन के ब्लॉक खरीदने और सप्लाई कराने का फैसला ले लिया गया. फैसलाकारों ने मनमानी दरें तय कर करोड़ों का घपला किया. दाम ज्यादा दिखाने के लिए पत्थरों की खरीद कहीं से हुई, कटान कहीं और हुई, पत्थरों पर नक्काशी कहीं और से कराई गई और सप्लाई कहीं और से दिखाई गई. स्मारकों और पार्कों के निर्माण में लगे योजनाकारों ने पहले यह तय किया था कि पत्थर की कटिंग और कार्विंग मिर्जापुर में ही हो और इसके लिए मिर्जापुर में ही मशीनें लगाई जाएं. लेकिन बाद में अचानक यह फैसला बदल गया. पत्थर को ट्रकों पर लाद कर राजस्थान भेजने और कटिंग-कार्विंग के बाद उसे फिर ट्रकों पर लाद कर लखनऊ और नोएडा वापस मंगाने का फैसला बड़े पैमाने पर घोटाला करने के इरादे से ही किया गया था. हजारों ट्रक माल मिर्जापुर से राजस्थान भेजे गए, लेकिन वे वापस लौटे ही नहीं. उसका भुगतान भी हो गया. यह भ्रष्टाचार की सोची-समझी रणनीति का ही परिणाम था. ईओडब्लू की जांच में ये सारी करतूतें प्रामाणिक तौर पर साबित हो चुकी हैं. आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा (ईओडब्लू) ने उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर और सोनभद्र के पत्थर कटाई वाले क्षेत्र के साथ-साथ राजस्थान के बयाना (भरतपुर) और जयपुर को भी अपनी जांच के दायरे में रखा था. ईओडब्लू ने लखनऊ और नोएडा के उन स्थानों का भी भौतिक सत्यापन किया जहां पत्थर लगाए गए थे. रेखांकित करने वाला तथ्य यह भी है कि पत्थरों की खरीद के लिए कीमत तय करने वाली सरकार की उच्चस्तरीय संयुक्त क्रय समिति ने बाजार भाव का पता लगाए बगैर कमरे में बैठे-बैठे ही 150 रुपए प्रति घन फुट कीमत तय कर दी थी और उस पर 20 रुपए प्रति घन फुट की दर पर लदान की कीमत भी निर्धारित कर दी.
पहले खदान के पट्टाधारकों से सीधे पत्थर खरीदा जाना तय हुआ था, लेकिन अचानक यह फैसला भी बदल दिया गया. अधिकारियों ने उत्तर प्रदेश उप खनिज (परिहार) नियमावली 1963 के नियम 19 के प्रावधानों को ताक पर रख कर खनन पट्टाधारकों का एक ‘गिरोह’ बना दिया और उसे कंसॉर्टियम नाम दे दिया. पट्टाधारकों को सीधे भुगतान न देकर कंसॉर्टियम के जरिए भुगतान किया जाता था. जांच में यह तथ्य खुल कर सामने आ गया कि कंसॉर्टियम के जरिए पट्टाधारकों को 75 रुपए प्रति घन फुट की दर से पेमेंट होता था, जबकि निर्माण निगम डेढ़ सौ रुपए प्रति घन फुट की दर से सरकार से पेमेंट लेता था. स्मारक निर्माण की पूरी प्रक्रिया घनघोर अराजकता में फंसी थी. बैठकें होती थीं, निर्णय लिए जाते थे, भुगतान होता था, लेकिन ईओडब्लू ने जब जांच पड़ताल की तो बैठकों का कहीं कोई आधिकारिक ब्यौरा ही नहीं मिला. बैठकों का कोई रिकार्ड किसी सरकारी दस्तावेज में दर्ज नहीं पाया गया. भूतत्व एवं खनिकर्म महकमे के निदेशक सुहैल अहमद फारूकी के रिटायर होने के बाद भी मायावती सरकार ने उन्हें ‘पत्थर-धंधे’ में लगाए रखा. तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने फारूकी को सलाहकार नियुक्त कर दिया और मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी और सलाहकार सुहैल अहमद फारूकी मुख्यमंत्री की तरह ही फैसले लेते रहे. जांच में यह बात सामने आई कि निर्माणाधीन स्मारक स्थलों और पार्कों का मायावती ने कभी 'ऑन-रिकॉर्ड' निरीक्षण नहीं किया. निर्माण कार्य देखने के लिए मायावती कभी मौके पर आईं भी तो वह सरकारी दस्तावेजों पर दर्ज नहीं है. मायावती की तरफ से नसीमुद्दीन सिद्दीकी ही मॉनीटरिंग करते थे और यह तथ्य सरकारी दस्तावेज पर दर्ज भी है. लोकायुक्त की रिपोर्ट पर एक जनवरी 2014 को लखनऊ के गोमतीनगर थाने में सतर्कता अधिष्ठान ने भारतीय दंड विधान की धारा 409, 120-बी, 13 (1) डी और 13 (2) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज कराया था. लेकिन चार्जशीट आज तक दाखिल नहीं हो सकी.

निर्माण निगम के अफसरों ने यूं ही झाड़ लिए 10 करोड़
ईओडब्लू की जांच में यह तथ्य सामने आया कि निर्माण निगम ने कुल 19,17,870.609 घन फुट मिर्जापुर सैंड स्टोन 150 रुपए प्रति घन फुट की दर से खरीदा था, जिस पर 28 करोड़ 76 लाख 80 हजार 591 रुपए का भुगतान हुआ. विचित्र किन्तु सत्य यह है कि जो पत्थर 150 रुपए प्रति घन फुट की दर पर खरीदा दिखाया गया, वह महज 50 से 75 रुपए प्रति घन फुट की दर पर खरीदा गया था. लिहाजा,  19,17,870.609 घन फुट सैंड स्टोन पर अगर 50 रुपए प्रति घन फुट भी अधिक लिया गया तो चुराई गई राशि 9 करोड़ 58 लाख 93 हजार 530 रुपए होती है. इस तरह निर्माण निगम के अफसरों ने सरकार के 10 करोड़ रुपए यूं ही झाड़ लिए.

अपवित्र तौर-तरीकों से होता रहा मायावती का ‘पवित्र-कार्य’... वे मौन देखती रहीं
स्मारक घोटाला कहें या पत्थर घोटाला, इसमें हुई कानूनी औपचारिकताओं में कहीं भी तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती का जिक्र नहीं है. जैसा आपको ऊपर बताया कि इस घोटाला प्रकरण में लोकायुक्त की रिपोर्ट पर सतर्कता अधिष्ठान ने जो एफआईआर दर्ज कराई उसमें भी मायावती सरकार के दो मंत्री और एक दर्जन विधायक समेत करीब दो सौ लोग अभियुक्त बनाए गए, लेकिन मायावती को अभियुक्त नहीं बनाया गया. लोकायुक्त ने पत्थर घोटाले की विस्तृत जांच आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा (ईओडब्लू) से कराई थी. ईओडब्लू की पूरी जांच रिपोर्ट ‘चौथी दुनिया’ के पास है. ईओडब्लू की जांच रिपोर्ट अम्बेडकर और कांशीराम के नाम पर बने स्मारकों और पार्कों को मायावती द्वारा ‘पवित्र-कार्य’ बताए जाने पर गंभीर कटाक्ष करती है. जांच रिपोर्ट कहती है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने ‘पवित्र-कार्य’ के लिए 42 अरब 76 करोड़ 83 लाख 43 हजार रुपए का बजट दिया लेकिन उन्हीं की सरकार के दो मंत्रियों और उनके मातहती विभागों व निगमों के अधिकारियों ने ‘पवित्र-कार्य’ के लिए खर्च हुई धनराशि का 34 प्रतिशत हिस्सा गड़प कर जाने का अपवित्र काम किया. कुल धनराशि का 34 प्रतिशत हिस्सा भ्रष्टाचार करके खा जाने के काम में मायावती सरकार के दो मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबू सिंह कुशवाहा सीधे तौर पर लिप्त बताए गए, जिनके संरक्षण और निर्देशन में निर्माण निगम और खनन विभाग के अधिकारियों ने जमकर भ्रष्टाचार किया और सरकारी धन हड़पा.

सवा चौदह हजार करोड़ के घोटाले पर खड़ा महापुरुषों का स्मारक
भ्रष्टाचारियों ने महापुरुषों के नाम पर बन रहे स्मारकों और पार्कों को भी नहीं बख्शा. हालांकि ईओडब्लू के एक आला अधिकारी कहते हैं कि भ्रष्टाचार करने के लिए ही महापुरुषों के नाम का इस्तेमाल किया गया था. स्मारक और पार्क श्रद्धा के लिए नहीं, बल्कि सरकारी धन लूटने के लिए बनवाए गए थे. स्मारकों और पार्कों के निर्माण कार्य के लिए मायावती सरकार ने 42 अरब 76 करोड़ 83 लाख 43 हजार रुपए दिए थे. इस धनराशि में से 41 अरब 48 करोड़ 54 लाख 80 हजार रुपए खर्च किए गए. सरकारी खजाने में केवल एक अरब 28 करोड़ 28 लाख 59 हजार रुपए ही वापस जमा किए गए. यानि, कुल खर्च की गई राशि में से 14 अरब 10 करोड़ 50 लाख 63 हजार 200 रुपए हड़प लिए गए. स्मारकों के निर्माण कार्य में राजकीय निर्माण निगम के अलावा आवास एवं शहरी नियोजन विभाग, लोक निर्माण विभाग (पीडब्लूडी), संस्कृति विभाग, सिंचाई विभाग, लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) और नोएडा प्राधिकरण वगैरह शामिल थे. तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के तत्कालीन करीबी नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबू सिंह कुशवाहा ही इन विभागों के मंत्री थे. बाबू सिंह कुशवाहा खनन विभाग के मंत्री हुआ करते थे, जबकि नसीमुद्दीन सिद्दीकी स्मारकों और पार्कों के निर्माण के ‘पवित्र-कार्य’ से सम्बद्ध अन्य सभी विभागों के मंत्री हुआ करते थे. ‘अज्ञात’ वजहों से तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती की नजरों से गिरे कुशवाहा एनआरएचएम घोटाले में जेल चले गए, लेकिन मायावती जब तक सत्ता में रहीं, नसीमुद्दीन उनकी आंखों का तारा बने रहे और आखेट करते रहे. सत्ता जाने के बाद मायावती और नसीमुद्दीन में धन के लेन-देन को लेकर ही विवाद हुआ, खूब तू-तू-मैं-मैं हुई, आरोप-प्रत्यारोप हुए और बसपा से नसीमुद्दीन का निष्कासन हुआ. मायावती अब अखिलेश के साथ हैं और नसीमुद्दीन अब अखिलेश के दोस्त राहुल के साथ हैं. प्रत्यक्ष या परोक्ष, अब भी सब साथ हैं... उन पर ‘राजनीति-देवी’ की कृपा बनी रहे.

महागठबंधन पर असर डालेगा पत्थर घोटाला
मायावती के मुख्यमंत्रित्व काल में हुए पत्थर घोटाले पर मिट्टी डालने की अखिलेश यादव सरकार की कारगुजारी सपा और बसपा दोनों पर भारी पड़ने वाली है. हाईकोर्ट के तेवर को सियासी नजरिए से देखें तो यह महागठबंधन की कोशिशों पर पानी फेरेगा. मायावती दबाव में हैं, इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता. छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को दुत्कार कर अजित जोगी की जनता कांग्रेस से हाथ मिलाने के मायावती के फैसले ने यह जताया कि मायावती दबाव में हैं. उन्होंने न तो मध्य प्रदेश में कांग्रेस से हाथ मिलाया और न ही राजस्थान में. राजनीतिक प्रेक्षकों का आकलन है कि उत्तर प्रदेश में भी लोकसभा चुनाव के पहले ऐसा ही होने वाला है. अखिलेश यादव के लिए भी स्मारक घोटाला परेशानी का सबब बनने वाला है. वर्ष 2012 में सत्ता पर बैठने से पहले समाजवादी पार्टी बसपाई घोटाले का पाई-पाई वसूलने का चुनावी जुमला उछाल रही थी, वही पार्टी सत्ता पाते ही स्मारक घोटाले को पचा गई. लोकायुक्त की रिपोर्ट और विजिलेंस की तरफ से दर्ज एफआईआर भी किसी कानूनी अंजाम तक नहीं पहुंच पाई. सरकारी दबाव में विजिलेंस अधिष्ठान चार्जशीट तक दाखिल नहीं कर सका.

बसपा के स्मारक घोटाले के बाद खुलेगी सपा के कुंभमेला घोटाले की फाइल!
सत्ता गलियारे के उच्च पदस्थ अधिकारी बसपाकाल के स्मारक घोटाले के बाद सपाकाल के कुंभमेला घोटाले की फाइल के खुलने की भी संभावना जताते हैं. सपा सरकार के कार्यकाल में हुए कुंभ मेला घोटाले की भी सीबीआई से जांच कराने की मांग होती रही है. महालेखाकार (कैग) की रिपोर्ट में भी कुंभ मेला घोटाले की आधिकारिक पुष्टि हो चुकी है. कुंभ मेले के कर्ताधर्ता तत्कालीन मंत्री आजम खान थे. सपा सरकार के कार्यकाल में 14 जनवरी 2013 से 10 मार्च 2013 तक इलाहाबाद के प्रयाग में महाकुंभ हुआ था. कुंभ मेले के लिए अखिलेश सरकार ने 1,152.20 करोड़ दिए थे. कुंभ मेले पर 1,017.37 करोड़ रुपए खर्च हुए. यानि, 1,34.83 करोड़ रुपए बच गए. अखिलेश सरकार ने इसमें से करीब हजार करोड़ (969.17 करोड़) रुपए का कोई हिसाब (उपयोग प्रमाण पत्र) ही नहीं दिया. अखिलेश सरकार ने कुंभ मेले के लिए मिली धनराशि में केंद्रांश और राज्यांश का घपला करके भी करोड़ों रुपए इधर-उधर कर दिए.
मायावती काल के स्मारक घोटाले के बारे में भी कैग ने इसी तरह के सवाल उठाए थे. बसपा के स्मारक निर्माण की मूल योजना 943.73 करोड़ रुपए की थी, जबकि 4558.01 करोड़ रुपए में योजना पूरी हुई. योजना में 3614.28 करोड़ रुपए की भीषण बढ़त हुई. तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती द्वारा बार-बार डिजाइन में बदलाव कराने और पक्के निर्माण को बार-बार तोड़े जाने के कारण भी खर्च काफी बढ़ा. कैग ने इस पर भी सवाल उठाया था कि स्मारक स्थल पर लगाए गए पेड़ सामान्य से काफी अधिक दर पर खरीदे गए थे. इसके अलावा पर्यावरण नियमों के विपरीत 44.23 प्रतिशत भू-भाग पर पत्थर का काम किया गया था. दलितों और कमजोर वर्ग के प्रति कागजी समर्पण दिखाने वाली मायावती ने इन स्मारकों के शिलान्यास पर ही 4.25 करोड़ रुपए फूंक डाले थे. स्मारक घोटाले में अहम भूमिका निभाने वाली सरकारी निर्माण एजेंसी उत्तर प्रदेश निर्माण निगम पर मायावती सरकार की इतनी कृपादृष्टि थी कि 4558.01 करोड़ रुपए की वित्तीय स्वीकृति की औपचारिकता के पहले ही निर्माण निगम को 98.61 प्रतिशत धन आवंटित कर दिया गया था. (साभारः प्रभात रंजन दीन)

वाह कुरैशी,आह कुरैशी

काला धन सफेद (मनी लॉन्ड्रिंग) करने के धंधे का सरगना मोईन कुरैशी को मदद पहुंचाने के मामले में सीबीआई अपने एक और पूर्व निदेशक रंजीत सिन्हा के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने जा रही है. अरबों रुपए का काला धन सफेद करने के मामले में फंसे मीट व्यापारी मोईन कुरैशी और सीबीआई के पूर्व निदेशक रंजीत सिन्हा के गहरे सम्बन्ध रहे हैं. इसी मामले में सीबीआई के एक और पूर्व निदेशक एपी सिंह के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हो चुकी है. जांच के दायरे में सीबीआई के तत्कालीन संयुक्त निदेशक व यूपी कैडर के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी जावीद अहमद, समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान, प्रसिद्ध फिल्मकार मुजफ्फर अली और इन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट (ईडी) के ही एक आला अधिकारी राजेश्वर सिंह भी हैं, जिनके मोईन कुरैशी से जुड़े होने की पृष्ठभूमि सामने आई है. मोईन से जुड़े कांग्रेसी नेताओं की तो लंबी फेहरिस्त है. इन सबकी जांच हो रही है. पिछले दिनों ईडी के लखनऊ दफ्तर में हुई छापामारी और सहायक निदेशक एनबी सिंह की गिरफ्तारी तो बस एक शुरुआत मानी जा रही है. इस छापेमारी के जरिए सीबीआई को प्रवर्तन निदेशालय के दफ्तर में घुसने और जरूरी दस्तावेज खंगालने का मौका मिल गया. सीबीआई के सूत्र बताते हैं कि मीट व्यापारी मोईन कुरैशी की गतिविधियों के बारे में रामपुर के एसएसपी से मिली कई आधिकारिक सूचनाओं को इन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट ने दबाए रखा और उसकी जांच नहीं होने दी. ईडी के पास मनी लॉन्ड्रिंग से सम्बन्धित कई शिकायतें लंबित हैं, जिनकी जांच नहीं कराई गई. मनी लॉन्ड्रिंग मामले में एक प्रमुख फोन कंपनी की संलिप्तता भी सामने आई है, जिसे ईडी के आला अधिकारी ने काफी अर्से तक दबाए रखा.
मोईन कुरैशी का मामला ऐसा है कि इसकी जितनी परतें खोलते जाएं, उतनी कहानियां सामने आती जाएंगी. सीबीआई के अधिकारी ही कहते हैं कि कुरैशी के मनी लॉन्ड्रिंग और हवाला के गोरखधंधे के तार इतने फैले हैं कि दिल्ली, मुंबई, उत्तर प्रदेश, कोलकाता, कर्नाटक, सीबीआई, ईडी से लेकर इंटरपोल तक जाकर जुड़ते हैं. कुरैशी के पाकिस्तान और अन्तरराष्ट्रीय कनेक्शन तो हैं ही. यूपी के एनआरएचएम घोटाले से लेकर कर्नाटक के आईएएस अनुराग तिवारी की पिछले दिनों लखनऊ में हुई हत्या के सूत्र सब आपस में मिल रहे हैं. इस मामले की दो अलग-अलग स्तरों पर जांच चल रही है. सीबीआई अपने स्तर पर जांच कर रही है और ईडी अपने स्तर पर. हालांकि दोनों एजेंसियों में टकराव की स्थिति भी पैदा होती रहती है, लेकिन दोनों जांच एजेंसियों का आपसी टकराव फिलहाल हमारी खबर का हिस्सा नहीं है. इस पर हम कभी बाद में बात करेंगे. मीट कारोबारी और मुद्रा-धुलाई (मनी लॉन्ड्रिंग) धंधे के सरगना मोईन कुरैशी से गहरे ताल्लुकात पाए जाने के कारण सीबीआई के पूर्व निदेशक अमर प्रताप (एपी) सिंह के खिलाफ एफआईआर और चार्जशीट दाखिल हो चुकी है. अब दूसरे पूर्व निदेशक रंजीत सिन्हा के खिलाफ चार्जशीट दाखिल किए जाने की तैयारी है. उनके खिलाफ एफआईआर पहले ही दर्ज की जा चुकी है. उस दरम्यान सीबीआई के संयुक्त निदेशक (पॉलिसी) रहे जावीद अहमद भी जांच के दायरे में हैं, क्योंकि उनके समय में ही मोईन कुरैशी के धंधे की जांच का मसला सीबीआई के सामने आया था और पहले झटके में टाल दिया गया था. आप याद करते चलें कि सीबीआई में उनके एक्सटेंशन की केंद्र सरकार से मंजूरी मिल चुकी थी और केंद्रीय सतर्कता आयोग (सेंट्रल विजिलेंस कमीशन) जावीद अहमद के नाम को सीबीआई के अतिरिक्त निदेशक के पद के लिए हरी झंडी दिखाने ही जा रहा था कि अचानक गृह मंत्रालय ने इस पर ‘ऑब्जेक्शन’ लगा दिया और उनका नाम वापस लेकर उन्हें यूपी कैडर में वापस भेज दिया. केंद्र ने जावीद का नाम वापस लिए जाने की वजहों का खुलासा नहीं किया था.
सीबीआई ने पिछले दिनों इन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट के लखनऊ ऑफिस पर छापा मार कर सहायक निदेशक एनबी सिंह को गिरफ्तार किया. यह छापामारी अखबारों की सुर्खियां बनीं. खबर यही बनी कि एनआरएचएम घोटाले में एक आरोपी सुरेंद्र चौधरी से 50 लाख रुपए घूस मांगने और उसके एडवांस के बतौर चार लाख रुपए लेने के आरोप में एनबी सिंह और उनके गुर्गे सुभाष को गिरफ्तार किया गया. लेकिन इस गिरफ्तारी की जो ‘अंतरकथा’ है, वह खबर नहीं बनी और न अखबारों ने इसकी समीक्षा ही की. एनबी सिंह उसी महीने यानि जून में ही रिटायर होने वाले थे. चार लाख रुपए घूस लेने के लिए वे खुद एक स्थानीय होटल में जा रहे थे, जहां से उन्हें पकड़ा गया. रिटायरमेंट नजदीक होते हुए भी एनबी सिंह का केंद्रीय उत्पाद शुल्क विभाग में ट्रांसफर कर दिया गया था और मार्च में ही उनसे एनआरएचएम घोटाले की सारी फाइलें ले ली गई थीं, फिर भी वे ईडी के ऑफिस से बाकायदा ईडी का काम कैसे देख रहे थे? एनआरएचएम का आरोपी सुरेंद्र चौधरी जब सरकारी गवाह बन चुका है, तब उसे ईडी के अधिकारी को घूस देने की जरूरत क्या थी? फिर इस प्रायोजित घूस-प्रहसन का सूत्रधार कौन है? दरअसल पूरे मामले की पटकथा कुछ और थी और दिखाई कुछ और गई. इन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट के लखनऊ दफ्तर में कुछ ही अर्सा पहले सहायक निदेशक एनबी सिंह और संयुक्त निदेशक राजेश्वर सिंह के बीच हुई कहासुनी और गाली-गलौज ईडी में सार्वजनिक चर्चा का विषय रही है. दो अधिकारियों के बीच तनातनी और कलह का कारण क्या था? जांच का विषय यह है. मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच में ईडी की कोताही, नोटबंदी के दरम्यान मनी लॉन्ड्रिंग की शिकायतों पर ईडी की ओर से किसी कार्रवाई का न होना, मनी लॉन्ड्रिंग धंधे में मुब्तिला एक बहुराष्ट्रीय फोन कंपनी का मामला रफा-दफा कर दिया जाना, एक बड़ी मिठाई कंपनी की मुद्रा-धुलाई के धंधे में संलिप्तता हजम कर जाना, मनी लॉन्ड्रिंग धंधे के सरगना मोईन कुरैशी के खिलाफ रामपुर के एसएसपी से मिली आधिकारिक सूचनाओं को दबा दिया जाना जैसे कई मसले हैं जो एक साथ आपस में गुंथे हुए हैं. सीबीआई अधिकारी मानते हैं कि अब ईडी में घुसने का उन्हें मौका मिल गया है, अब सारे मामले की जांच होगी. सीबीआई यह भी जांच कर रही है कि ईडी की फाइलें लखनऊ के एक पॉश क्लब में क्यों ले जाई जाती थीं और कुछ खास आला नौकरशाहों के सामने फाइलें क्यों खोली जाती थीं. इस क्लब के पदाधिकारी जेल में बंद एक कुख्यात माफिया सरगना के इशारे पर चुने और हटाए जाते हैं. उस माफिया सरगना के भी मोईन कुरैशी से अच्छे सम्बन्ध बताए गए हैं.
सीबीआई के पूर्व निदेशक रंजीत सिन्हा और मोईन कुरैशी के सम्बन्ध इतने गहरे रहे हैं कि 15 महीने में दोनों की 90 मुलाकातें आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज हैं. यह तथ्य कोई छुपा हुआ मामला नहीं है. एपी सिंह से भी कुरैशी की ऐसी ही अंतरंग मुलाकातें सीबीआई और ईडी की छानबीन में रिकॉर्डेड हैं. एपी सिंह और कुरैशी की अंतरंगता इतनी थी कि सिंह के घर के बेसमेंट से कुरैशी का एक दफ्तर चलता था. एपी सिंह और कुरैशी के बीच ब्लैक-बेरी-मैसेज के आदान-प्रदान की कथा सार्वजनिक हो चुकी है. यह सीबीआई का दस्तावेजी तथ्य है. दूसरे निदेशक रंजीत सिन्हा के प्रसंग में सीबीआई के दस्तावेज बताते हैं कि मोईन कुरैशी अपनी कार (डीएल-12-सीसी-1138) से कई बार सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा से मिलने उनके घर गया. कुरैशी की पत्नी नसरीन कुरैशी भी अपनी कार (डीएल-7-सीजी-3436) से कम से कम पांच बार सिन्हा से मिलने गई. कुरैशी दम्पति की दोनों कारें उनकी कंपनी एएमक्यू फ्रोजेन फूड प्राइवेट लिमिटेड के नाम और सी-134, ग्राउंड फ्लोर, डीफेंस कॉलोनी, नई दिल्ली के पते से रजिस्टर्ड हैं. यह दोनों कारें कई बार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के आवास पर भी जाती रही हैं, जिनमें मोईन और उसकी पत्नी सवार रही हैं. मोईन कुरैशी की बेटी परनिया कुरैशी की शादी कांग्रेस नेता जितिन प्रसाद के रिश्तेदार अर्जुन प्रसाद से हुई है.
बहरहाल, सीबीआई का निदेशक रहते हुए रंजीत सिन्हा ने सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज़ (सीबीडीटी) पर दबाव डाल कर मोईन कुरैशी के खिलाफ हो रही छानबीन का ब्यौरा जानने और छानबीन की प्रक्रिया को बाधित करने की कोशिश की थी. सीबीडीटी के पास रंजीत सिन्हा का वह पत्र भी है जिसके जरिए उन्होंने छानबीन का ब्यौरा उपलब्ध कराने का औपचारिक दबाव डाला था. बाद में वित्त मंत्री बने अरुण जेटली ने सीबीडीटी को निर्देश देकर ऐसा करने से मना किया था. एपी सिंह हों या रंजीत सिन्हा, इस सिस्टम में मोईन कुरैशी के हाथ इतने अंदर तक धंसे हैं कि मनी लॉन्ड्रिंग का पूरा मसला बिना किसी नतीजे के अधर में ही टंगा रह जाएगा, इसी बात का अंदेशा है. अमेरिका के पेंसिलवानिया में अरबों रुपए की जालसाजी करने वाला जाफर नईम सादिक जब कोलकाता के रवींद्र सरणी इलाके में पकड़ा जाता है तब यह रहस्य खुलता है कि वह भी मोईन कुरैशी का ही आदमी है. इंटरपोल की नोटिस पर जाफर पकड़ा जाता है. बाद में यह रहस्य खुलता है कि जाफर नईम, दुबई के विनोद करनन और सिराज अब्दुल रज्जाक का नाम इंटरपोल की वांटेड-लिस्ट और उनकी तलाशी के लिए जारी रेड-कॉर्नर नोटिस से हटाने के लिए इंटरपोल के तत्कालीन प्रमुख रोनाल्ड के नोबल से कुरैशी ने सिफारिश की थी. नोबल ने यह आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया है कि उसके मोईन कुरैशी परिवार और सीबीआई के तत्कालीन निदेशक एपी सिंह से नजदीकी सम्बन्ध रहे हैं. लेकिन नोबल ने इंटरपोल की लिस्ट से नाम हटाने के मसले को सिरे से खारिज कर दिया था. कुरैशी की सिफारिश को नकारने वाले इंटरपोल प्रमुख रोनाल्ड के नोबल के भाई जेम्स एल. नोबल जूनियर और भारत से फरार स्वनामधन्य ललित मोदी बिजनेस-पार्टनर हैं. अमेरिका में दोनों का विशाल साझा धंधा है. यह सीबीआई के रिकॉर्ड में है. रोनाल्ड नोबल वर्ष 2000 से 2014 तक की लंबी अवधि तक इंटरपोल के महासचिव रहे हैं.
केंद्रीय खुफिया एजेंसी काले धन की आमद-रफ्त का पूरा नेटवर्क जानने की कोशिश में लगी है. इसी क्रम में मुद्रा-धुलाई और हवाला सिंडिकेट के सरगना मोईन कुरैशी से जुड़े उन तमाम लोगों के लिंक खंगाले जा रहे हैं, जिनके कभी न कभी मोईन कुरैशी से सम्बन्ध रहे हैं या मोईन कुरैशी का धन उनके धंधे में लगा है. इनमें नेता, अफसर, व्यापारी और फिल्मकारों से लेकर माफिया सरगना तक शामिल हैं. जैसा ऊपर बताया, मोईन कुरैशी के काफी नजदीकी सम्बन्ध समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान से रहे हैं. यह सम्बन्ध इतने गहरे रहे हैं कि आजम खान की बनाई मोहम्मद अली जौहर युनिवर्सिटी के उद्घाटन के मौके पर मोईन कुरैशी चार्टर हेलीकॉप्टर से रामपुर आया था. सीबीआई गलियारे में भुनभुनाहट थी कि आजम खान की युनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक विश्वविद्यालय की मान्यता दिलाने में मोईन कुरैशी ने यूपी के अल्पकालिक कार्यकारी राज्यपाल अजीज कुरैशी से सिफारिश की थी. स्वाभाविक है कि इसकी आधिकारिक पुष्टि छानबीन से ही होगी, क्योंकि इंटरपोल के महासचिव की तरह कोई यह स्वीकार तो करेगा नहीं कि मोईन कुरैशी से उनके दोस्ताना सम्बन्ध रहे हैं. यह भारतवर्ष के लोगों की खासियत है. इसी प्रसंग में याद करते चलें कि उत्तर प्रदेश के दो निवर्तमान राज्यपालों क्रमशः टीवी राजेस्वर और बीएल जोशी ने मौलाना जौहर अली युनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक विश्वविद्यालय का दर्जा देने के विधेयक पर हस्ताक्षर करने से इन्कार कर दिया था. जोशी के जाने के बाद और राम नाईक के राज्यपाल बन कर आने के बीच में महज एक महीने के लिए यूपी के कार्यकारी राज्यपाल बनाए गए अजीज कुरैशी ने आनन-फानन मौलाना अली जौहर युनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक विश्वविद्यालय की मान्यता के विधेयक पर हस्ताक्षर कर दिए. कुरैशी 17 जून 2014 को यूपी आए, 17 जुलाई 2014 को जौहर विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक विश्वविद्यालय की मान्यता दी और 21 जुलाई 2014 को वापस देहरादून चले गए.
मनी लॉन्ड्रिंग सरगना मोईन कुरैशी के साथ सम्बन्धों की बात तो प्रसिद्ध फिल्मकार मुजफ्फर अली भी स्वीकार नहीं करेंगे. जबकि असलियत यही है कि मुजफ्फर अली की फिल्म ‘जानिसार’ में मोईन कुरैशी का पैसा लगा और मोईन की बेटी परनिया कुरैशी इस फिल्म में हिरोइन बनी. ‘जानिसार’ फिल्म के प्रोड्यूसर में मीरा अली का नाम दिखाया गया, लेकिन सब जानते हैं कि फिल्म में मोईन कुरैशी ने पैसा लगाया था. बाप मोईन कुरैशी की तरह बेटी परनिया कुरैशी को भी कानून से खेलने में मजा आता है. अमेजन इंडिया फैशन वीक-2016 के दरम्यान मीडिया के लिए निजी तौर पर कॉकटेल पार्टी (बेशकीमती शराब पीने-पिलाने की पार्टी) देकर परनिया कुरैशी चर्चा में रही. मीडिया वालों ने पहले तो खूब दारू छकी और बाद में नुक्ताचीनी की कि परनिया कुरैशी फैशन डिज़ाइन काउंसिल ऑफ इंडिया की सदस्य नहीं हैं तो फिर कॉकटेल पार्टी कैसे दी. मजा यह है कि इस कॉकटेल पार्टी का नाम परनिया ने ‘रामपुर का कोला’ रखा था. हम आप सोचेंगे वही आजम खान का रामपुर... लेकिन वो कहेंगे, नहीं, मोईन कुरैशी का रामपुर. इसके पहले भी परनिया कुरैशी इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर स्मगलिंग के आरोप में पकड़ी और करीब 40 लाख रुपए का जुर्माना लेकर छोड़ी जा चुकी हैं. मोईन के अंतरंगों और उपकृतों की लिस्ट में ऐसे और कई नाम हैं. कांग्रेसियों के नाम तो भरे पड़े हैं. सोनिया गांधी का नाम इनमें शीर्ष पर है. पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद तो मोईन कुरैशी के रिश्तेदार ही हैं. वरिष्ठ कांग्रेस नेता अहमद पटेल, कमलनाथ, आरपीएन सिंह, मोहम्मद अजहरुद्दीन जैसे कई नेता इस सूची में शुमार हैं. ये उन नेताओं के नाम हैं जो मोईन कुरैशी के घर पर नियमित उठने-बैठने वाले हैं. सोनिया के घर पर मोईन परिवार नियमित तौर पर उठता-बैठता रहा है.

साढ़े पांच सौ घंटे की रिकॉर्डिंग उजागर हो तो तूफान आ जाएगा
इन्कम टैक्स विभाग की खुफिया शाखा ने मोईन कुरैशी की विभिन्न हस्तियों से होने वाली टेलीफोनिक बातचीत टेप की. उसके बारे में आईटी इंटेलिजेंस के सूत्र थोड़ी झलक दिखाते हैं तो लगता है कि कुरैशी का मनी लॉन्ड्रिंग का साम्राज्य पूरे सरकारी सिस्टम को समानान्तर चुनौती दे रहा है. तकरीबन साढ़े पांच सौ घंटे की रिकॉर्डिंग है. आईटी के अधिकारी ही कहते हैं कि इसे देश सुन ले तो भारतीय लोकतांत्रिक सिस्टम की असलियत प्रामाणिक रूप से समझ में आ जाए.
मनी लॉन्ड्रिंग मामले में इन्कम टैक्स की इंटेलिजेंस शाखा पहले से खुफिया जांच कर रही थी. आईटी इंटेलिजेंस ने मोईन कुरैशी की विभिन्न लोगों से टेलीफोन पर होने वाली बातचीत को तकरीबन साढ़े पांच सौ घंटे सुना था और उसे रिकॉर्ड किया था. इसमें केंद्र सरकार के कई मंत्री, यूपी समेत कई राज्य सरकारों के मंत्री, विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता, सीबीआई के अधिकारी, बड़े कॉरपोरेट घरानों के अलमबरदार, कई फिल्मी हस्तियां समेत ढेर सारे महत्वपूर्ण लोग शामिल हैं. आप हैरत न करें, इनमें भाजपा के भी कई नेताओं के नाम हैं. एक वरिष्ठ भाजपा नेता की बेटी का नाम भी है और उस भाजपा नेता का भी नाम है जो मोईन कुरैशी के भाई को रामपुर से टिकट दिलाने की कोशिश कर रहा था. यह अपने आप में बहुत बड़ा रहस्योद्घाटन होगा, अगर उसे सार्वजनिक कर दिया जाए.
मनी लॉन्ड्रिंग मामले में मोईन कुरैशी के जाल में फंसने और सीबीआई के दो-दो निदेशकों के उसके साथ सम्बन्ध उजागर होने के बाद देशभर में चर्चा हुई, निंदा प्रस्ताव जारी हुए और अपने-अपने तरीके से नेताओं ने इसे खूब भुनाया. लेकिन किसी भी नेता ने सार्वजनिक तौर पर यह चर्चा नहीं की कि ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी ने केंद्र सरकार को पहले ही क्या सूचना दे दी थी. ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी ने भारतीय खुफिया एजेंसी को आगाह करते हुए यह बता दिया था कि दुबई के एक बैंक अकाउंट से 30 करोड़ रुपए ट्रांसफर हुए हैं. अकाउंटधारी भारतीय है और यह पैसा सीबीआई के निदेशक को घूस देने के लिए भेजा गया है. केंद्र सरकार न तो उस अकाउंट को जब्त कर पाई और न अकाउंटधारी को ही पकड़ा जा सका.
सीबीआई के निदेशक के पद पर रहते हुए एपी सिंह और रंजीत सिन्हा, दोनों मोईन कुरैशी की फर्म ‘एसएम प्रोडक्शन्स’ को सीबीआई के विभागीय कार्यक्रमों के आयोजन का भी ठेका देते रहे हैं. इसे मोईन कुरैशी की दूसरी बिटिया सिल्विया कुरैशी संचालित करती थी. सीबीआई के निदेशकों के साथ मोईन कुरैशी के इंटरपोल के प्रमुख रोनाल्ड के नोबल के करीबी सम्बन्धों के बारे में आपने ऊपर जाना. साथ-साथ यह भी जानते चलें कि सीबीआई और ईडी दोनों एजेंसियों के अधिकारी फ्रांस के आर्किटेक्ट जीन लुईस डेनॉयट को मोईन कुरैशी के हवाला धंधे के सिंडिकेट से सक्रिय तौर पर जुड़ा हुआ सदस्य बताते हैं. ...केवल बताते हैं, उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाते हैं.

लखनऊ में बड़े आराम से खप जाता है काला धन
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ मनी लॉन्ड्रिंग और हवाला के धंधे के साथ-साथ नौकरशाहों के काले धन के ‘एडजस्टमेंट’ का भी सुविधाजनक स्थान रही है. स्मारक घोटाला, एनआरएचएम घोटाला, बिजली घोटाला जैसे तमाम घोटालों के धन मनी लॉन्ड्रिंग का धंधा करने वाले गिरोह के जरिए यहां से बेरोकटोक विदेश जाते रहे हैं. लखनऊ से नेपाल के रास्ते काला धन बड़े आराम और बिना किसी शोरगुल के दक्षिण एशियाई देशों तक पहुंच जाता है. केंद्र सरकार का ध्यान स्विट्जरलैंड और अन्य पश्चिमी देशों पर लगा रहता है और इधर दक्षिण एशिया के छोटे-मोटे देशों में देश का पैसा धड़ल्ले से जाता रहता है. चीन के अधीन हॉन्गकॉन्ग काले धन के निवेश का बड़ा केंद्र बन गया है. यूपी के कई नेताओं का काला धन हॉन्गकॉन्ग के अलावा थाईलैंड और मलेशिया में भी खपा हुआ है. इसकी छानबीन में खुफिया एजेंसियां कोई रुचि नहीं ले रही हैं. नेताओं की आय से अधिक सम्पत्ति की जांच इन देशों में हुए निवेश की छानबीन के बगैर पूरी नहीं हो सकती.
बहरहाल, भ्रष्ट नौकरशाह भी लखनऊ का इस्तेमाल काला धन खपाने में करते रहते हैं. कुछ अर्सा पहले अंगदिया कुरियर कंपनी के जरिए 50 लाख रुपए का बड़ा कन्साइनमेंट लखनऊ निवासी ध्रुव कुमार सिंह के नाम से आया था. इसकी भनक सीबीआई को पहले ही लग चुकी थी. यह पैसा क्रिकेट फिक्सिंग और सट्टे से जुड़े धंधेबाजों का था, जिसे रिश्वत के रूप में इन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट के अधिकारियों को ‘ऑब्लाइज’ करने के लिए भेजा गया था. इसमें ईडी के संयुक्त निदेशक जेपी सिंह व अन्य अफसरों और उनसे जुड़े सट्टेबाज विमल अग्रवाल, सोनू जालान और कुछ अन्य का नाम आया था.

सीबीआई अफसरों को ‘पटाने’ वालों को पकड़ती क्यों नहीं सरकार!
देश का अजीब हाल है कि केंद्र सरकार सीबीआई जैसी खुफिया एजेंसियों के अधिकारियों को पूंजी-सिंडिकेटों और सरगनाओं की ओर से उपकृत किए जाने पर गुस्सा भी दिखाती है और उसे रोकती भी नहीं है. सीबीआई के अधिकारियों को ‘पटाने’ का दो तरीका इस्तेमाल में लाया जा रहा है. या तो उन्हें मोटी रकम घूस में दी जाती है, या उन्हें सेमिनार और गोष्ठियों में बुला कर आकर्षक सम्मानिकी देकर उपकृत किया जाता है. कई पूंजी संस्थानों में तो खास तौर पर सीबीआई अधिकारियों को आलीशान वेतन पर नौकरी दी जाती है. यह ऐसा प्रलोभन है कि सीबीआई अफसर अपने रिटायरमेंट के बाद के जुगाड़ में उस पूंजी संस्थान को अनैतिक मदद पहुंचाते रहते हैं. सीबीआई के अधिकारियों को आकर्षक नौकरी का प्रलोभन देने में जिंदल प्रतिष्ठान अव्वल है. जिंदल प्रतिष्ठान कोयला घोटाले में लिप्त रहा है, लिहाजा वह सीबीआई अफसरों को अधिक उदारता से अपने यहां नौकरियां देता रहा है. सीबीआई जांचों के फेल होने की वजहों का भयानक सच भी यही है.
अब हम इसे आपको तफसील से बताते हैं. इसके लिए थोड़ा फ्लैश-बैक में चलना होगा. सीबीआई के निदेशक रहे अश्वनी कुमार सीबीआई से रिटायर होने के बाद और नगालैंड का राज्यपाल बनाए जाने के पहले नवीन जिंदल के प्रतिष्ठान में नौकरी कर रहे थे. सीबीआई के कई पूर्व निदेशक और वरिष्ठ नौकरशाह जिंदल संगठन में अभी भी नौकरी कर रहे हैं. सीबीआई के निदेशकों को रिटायर होते ही जिंदल के यहां नौकरी कैसे मिल जाती है? सत्ता के गलियारे में पैठ रखने वाले वरिष्ठ नौकरशाहों को जिंदल से जुड़े प्रतिष्ठानों में प्रभावशाली ओहदों पर क्यों बिठाया जाता है? जिंदल के संस्थानों से ताकतवर नौकरशाह महिमामंडित और उपकृत क्यों होते रहते हैं? उन पर केंद्र सरकार ध्यान क्यों नहीं दे रही? यह सवाल सामने है. कोयला घोटाले में जिंदल समूह की संलिप्तता और घोटाले की सीबीआई जांच से जुड़ी फाइलों की रहस्यमय गुमशुदगी के वायके को देखते हुए इन सवालों को सामने रखना और भी जरूरी हो जाता है. उद्योगपति और ताकतवर कांग्रेसी नेता नवीन जिंदल की कोयला घोटाले में भूमिका जगजाहिर है. यूपीए कालीन सत्ता से उनकी नजदीकियां और उन नजदीकियों के कारण कोयला घोटाले की लीपापोती की करतूतें आपको याद ही होंगी. घोटाले में लिप्त हस्तियों की साजिशी पहुंच कितनी गहरी होती है, यह कोयला घोटाले से जुड़ी फाइलों के गायब होने के बाद पूरे देश को पता चला था.
खैर, अब आप इस खबर के जरिए देखिए कि पर्दे के पीछे पटकथाएं कैसे लिखी जाती हैं और इसे कौन लोग लिखते हैं! कोयला घोटाले में लिप्त जिंदल समूह के जरिए केंद्र सरकार के वरिष्ठ नौकरशाहों को उपकृत कराने का सिलसिला लंबे अरसे से चल रहा है. आप तथ्यों को खंगालें तो आप पाएंगे कि सत्ता के अंतरंग जिन नौकरशाहों को केंद्र सरकार उपकृत नहीं कर पाई, उन्हें जिंदल के यहां शीर्ष पदों पर नौकरी मिल गई. ऐसा भी हुआ कि नौकरी करते हुए भी कई नौकरशाहों को जिंदल के मंच से महिमामंडित किया जाता रहा. कांग्रेस के बेहद करीबी रहे अश्वनी कुमार तब सीबीआई के निदेशक थे, जब कोयला घोटाला पूरे परवान पर था. दो साल की निर्धारित सेवा अवधि में चार महीने का विस्तार अश्वनी कुमार के सत्ता साधने के हुनर का ही प्रमाण था. अश्वनी कुमार दो अगस्त 2008 को सीबीआई के निदेशक बनाए गए थे और उन्हें दो अगस्त 2010 को रिटायर हो जाना चाहिए था, लेकिन उन्हें एक्सटेंशन दिया गया. सत्ता का ‘लक्ष्य’ पूरी होने के बाद अश्वनी कुमार नवम्बर 2010 को सीबीआई के निदेशक पद से रिटायर हुए. जैसे ही रिटायर हुए, उन्हें जिंदल समूह ने लपक लिया. जिंदल समूह ने उन्हें ओपी जिंदल ग्लोबल बिजनेस स्कूल का प्रोफेसर नियुक्त कर दिया. बाद में तत्कालीन केंद्र सरकार ने अश्वनी कुमार को नगालैंड का राज्यपाल बना दिया. कोयला घोटाला, घोटाले की लीपापोती, उसमें जिंदल की भूमिका और जिंदल समूह में सीबीआई निदेशकों की नियुक्ति के सूत्र आपस में मिलते हैं कि नहीं, इसकी पड़ताल का काम तो जांच एजेंसियों का है. हमारा दायित्व तो इसे रौशनी में लाने भर का है.
अश्वनी कुमार को सीबीआई का निदेशक बनाए जाने के पीछे की अंतरकथा कम रोचक नहीं है. 17 साल से अधिक समय से सीबीआई को अपनी सेवा देते रहे खांटी ईमानदार राजस्थान कैडर के आईपीएस अधिकारी एमएल शर्मा का निदेशक बनना तय हो गया था. चयनित निदेशक को प्रधानमंत्री के साथ चाय पर आमंत्रित करने की परम्परा के तहत शर्मा को पीएमओ में बुला लिया गया था. उधर, सीबीआई कार्यालय तक इसकी सूचना पहुंच गई थी और वहां लड्डू भी बंट गए. लेकिन अचानक केंद्र सरकार ने एमएल शर्मा का नाम हटा कर हिमाचल प्रदेश के डीजीपी अश्वनी कुमार को सीबीआई का निदेशक बना दिया. जबकि शर्मा उनसे सीनियर थे. वे पीएमओ से अपमानित होकर लौट आए. शर्मा ने प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड और उपहार सिनेमा हादसा जैसे कई महत्वपूर्ण मामले निपटाए थे. लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें आखिरी वक्त पर सीबीआई का निदेशक बनने लायक नहीं समझा, क्योंकि शर्मा वह नहीं कर सकते थे जो केंद्र सरकार सीबीआई से कराना चाहती थी. अचानक एमएल शर्मा को हटा कर अश्वनी कुमार को सीबीआई का निदेशक कैसे और क्यों बनाया गया, यह देश के सामने आए बाद के घटनाक्रम ने स्पष्ट कर दिया. आरुषि हत्याकांड की लीपापोती करने और सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले में अमित शाह को घेरे में लाने में अश्वनी कुमार की ही भूमिका थी. लिहाजा, कोयला घोटाले में उनका रोल क्या रहा होगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है. अश्वनी कुमार ऐसे पहले सीबीआई निदेशक हैं जो राज्यपाल बने.
सीबीआई के पूर्व निदेशक डीआर कार्तिकेयन जिंदल समूह के ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी की एकेडेमिक काउंसिल के वरिष्ठ सदस्य हैं. कार्तिकेयन 1998 में सीबीआई के निदेशक रह चुके हैं. इसी तरह चार जनवरी 1999 से लेकर 30 अप्रैल 2001 तक सीबीआई के निदेशक रहे आरके राघवन भी जिंदल समूह की सेवा में हैं. राघवन ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट के वरिष्ठ सदस्य हैं. सीबीआई के जिन निदेशकों को जिंदल अपने समूह में नियुक्त नहीं कर पाया उन्हें अपने शैक्षणिक प्रतिष्ठान से महिमामंडित कराता रहा. सीबीआई के निदेशक रहे अमर प्रताप (एपी) सिंह को रिटायर होने के महज महीने डेढ़ महीने के अंदर केंद्र सरकार ने लोक सेवा आयोग का सदस्य मनोनीत कर दिया था. उधर, जिंदल समूह इनके भी महिमामंडन में पीछे नहीं था. ओपी जिंदल ग्लोबल विश्वविद्यालय के कई शिक्षण-प्रशिक्षण कार्यक्रमों में एपी सिंह शरीक रहे. यहां तक कि राष्ट्रीय पुलिस अकादमी तक में अपनी घुसपैठ बना चुका जिंदल वहां भी सैकड़ों वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों के विशेषज्ञीय प्रशिक्षण का आयोजन कराता रहता है और उसी माध्यम से शीर्ष नौकरशाही को उपकृत करता रहता है. सीबीआई के पूर्व निदेशक पीसी शर्मा के साथ भी ऐसा ही हुआ. उन्हें भी रिटायरमेंट के महीने भर के अंदर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का सदस्य बना दिया गया. जिंदल ने पीसी शर्मा को भी अपने समूह से जोड़े रखा और शैक्षणिक प्रतिष्ठानों; ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी और जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल के जरिए उनका महिमामंडन करता रहा.
सत्ता से जुड़े रहे वरिष्ठ नौकरशाहों की जिंदल से नजदीकियां वाकई रेखांकित करने लायक हैं. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पूर्व सदस्य, भारत सरकार की नीति बनाने और उसे कार्यान्वित कराने की समिति के पूर्व निदेशक, प्रधानमंत्री, कैबिनेट सचिवालय और राष्ट्रपति तक के मीडिया एवं संचार मामलों के निदेशक रह चुके वाईएसआर मूर्ति को जिंदल ने ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी का रजिस्ट्रार बना दिया. मूर्ति न केवल विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार हैं बल्कि वे मैनेजमेंट बोर्ड और एकेडेमिक काउंसिल के भी सदस्य हैं. देश के ऊर्जा सचिव रहे राम विनय शाही और भारतीय स्टेट बैंक के चेयरमैन रहे अरुण कुमार पुरवार जिंदल स्टील्स प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर हैं. ऐसे तमाम उदाहरण हैं. जिंदल देश का अकेला ऐसा पूंजी प्रतिष्ठान है जिसने सत्ता से जुड़े शीर्ष नौकरशाहों को अपने समूह में सेवा में रखा. खास तौर पर सीबीआई के पूर्व निदेशकों को अपनी सेवा में रखने में जिंदल का कोई सानी नहीं है. जिंदल जैसे समूहों से उपकृत होने वाले सीबीआई के पूर्व निदेशकों या वरिष्ठ अधिकारियों पर किसी की निगाह नहीं जाती. यह भी तो घूस है! इस पर केंद्र सरकार कोई अंकुश क्यों नहीं लगाती? भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी-बड़ी बोलियां बोलने वाले सत्ताधारी नेता इन सवालों पर चुप रहते हैं.

जिनसे आतंकी लेते हैं फंड, उन्हीं से नेता लेते हैं धन
देखिए, दृश्य एकदम साफ है. मोईन कुरैशी का मनी लॉन्ड्रिंग और हवाला का धंधा बहुत बड़ा घोटाला है, लेकिन यह कोई नया थोड़े ही है! इसके पहले भी हवाला का धंधा होता रहा है. इसके पहले भी काला धन सफेद होता रहा है. उन घोटालों का क्या हुआ? कुछ नहीं हुआ. सारे मामले लीप-पोत कर बराबर कर दिए गए. कम राजनीतिक औकात वाले कुछ नेता और दलाल जेल गए. फिर सब कुछ सामान्य हो गया. नेता और नौकरशाह जिन मामलों में इन्वॉल्व रहेंगे, उसका कोई नतीजा नहीं निकलेगा. आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि आतंकी संगठन जिन स्रोतों से पैसे प्राप्त करते हैं, उन्हीं स्रोतों से विभिन्न राजनीतिक दल भी धन लेते हैं. लेकिन इससे नेताओं पर कोई फर्क नहीं पड़ता. 
अब आप ही बताइये कि नब्बे के दशक के उस हवाला घोटाले का क्या हुआ, जो बड़े धमाके से उजागर हुआ था? देश से बाहर विदेशों में अरबों रुपए का काला धन भेजने की हवाला-कला से देश के आम लोगों का परिचय ही जैन हवाला डायरी केस से हुआ था. सीबीआई ने वर्ष 1991 में कई हवाला सरगनाओं के ठिकानों पर छापे मारे थे. इसी छापेमारी के क्रम में एसके जैन की डायरी बरामद हुई थी और वर्ष 1996 में यह देश-दुनिया के सामने उजागर हो गया था. थोड़ा झांकते चलते हैं जैन हवाला मामले की फाइलों में...
25 मार्च 1991 को दिल्ली पुलिस ने जमायत-ए-इस्लामी के दिल्ली मुख्यालय से कश्मीरी युवक अशफाक हुसैन लोन को गिरफ्तार किया था. अशफाक से मिले सुराग पर जामा मस्जिद इलाके से जेएनयू के छात्र शहाबुद्दीन गोरी को पकड़ा गया. अशफाक और शहाबुद्दीन दोनों हवाला के जरिए पैसा हासिल कर उसे आतंकवादी संगठन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट तक पहुंचाते थे. यह पैसा लंदन से डॉ. अय्यूब ठाकुर और दुबई से तारिक भाई भेजा करता था. यह संवेदनशील सूचना मिलने पर मामले को सीबीआई को सौंप दिया गया. सीबीआई ने जांच अपने हाथ में लेने के बाद 3 मई 1991 को विभिन्न हवाला कारोबारियों के 20 ठिकानों पर छापेमारी की. इसमें भिलाई इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन के प्रबंध निदेशक सुरेंद्र कुमार जैन के महरौली स्थित फार्म हाउस और उसके भाई जेके जैन के दफ्तर पर भी छापा पड़ा. छापे में 58 लाख रुपए से ज्यादा नकद, 10.5 लाख के इंदिरा विकास पत्र और चार किलो सोना बरामद किया गया. इसके अलावा 593 अमेरिकी डॉलर, 300 पाउंड, 27 हजार डेनमार्क की मुद्रा, 50 हजार हॉन्गकॉन्ग की मुद्रा, 300 फ्रैंक सहित 50 अलग-अलग देशों की काफी मुद्राएं बरामद की गईं. सबसे महत्वपूर्ण बरामदगी थी दो संदेहास्पद डायरियां.
एसके जैन की डायरी में तत्कालीन केंद्र सरकार के तीन कैबिनेट मंत्री सहित केंद्र के कुल सात मंत्रियों, कांग्रेस के कई बड़े नेताओं, दो राज्यपालों और भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी का नाम भी शामिल था. इस लिस्ट में 55 नेता, 15 बड़े नौकरशाह और एसके जैन के 22 सहयोगियों को मिलाकर कुल 92 नामों की पहचान हुई थी. अन्य 23 लोगों की पहचान नहीं हो पाई थी. डायरी में लिखे नामों के आगे राशि-संख्या लिखी थी. इसमें लालकृष्ण आडवाणी पर 60 लाख रुपए, बलराम जाखड़ पर 83 लाख, विद्याचरण शुक्ल पर 80 लाख, कमलनाथ पर 22 लाख, माधवराव सिंधिया पर 1 करोड़, राजीव गांधी पर 2 करोड़, शरद यादव पर 5 लाख, प्रणब मुखर्जी पर 10 लाख, एआर अंतुले पर 10 लाख, चिमन भाई पटेल पर 2 करोड़, एनडी तिवारी पर 25 लाख, राजेश पायलट पर 10 लाख और मदन लाल खुराना पर 3 लाख रुपए लिखे थे. सीबीआई ने चार साल बाद मार्च 1995 में एसके जैन को गिरफ्तार किया. जैन ने अपने लिखित बयान में कहा कि उसने वर्ष 1991 में मार्च से मई महीने के बीच राजीव गांधी को चार करोड़ रुपए पहुंचाए. इसमें से दो करोड़ रुपए राजीव गांधी के निजी सचिव जॉर्ज के लिए थे. इसके अलावा दो करोड़ रुपए सीताराम केसरी को भी दिए गए, जो उस समय कांग्रेस के कोषाध्यक्ष थे. इसी तरह उसने नरसिम्हा राव और चंद्रास्वामी को भी साढ़े तीन करोड़ रुपए देने की बात कबूली थी. एसके जैन ने यह भी स्वीकार किया था कि इटली के हथियार डीलर क्वात्रोची के जरिए वह हवाला कारोबारी आमिर भाई के सम्पर्क में आया था. आप आश्चर्य करेंगे कि गिरफ्तारी के 20 दिन बाद ही एसके जैन को जमानत पर रिहा कर दिया गया था.
गिरोहबाजों के तार कितने लंबे रहे हैं इसका अहसास आपको इस बात से ही लग जाएगा कि जिस अशफाक और शहाबुद्दीन की निशानदेही पर इतना बड़ा मामला खुला, उन दोनों का नाम चार्जशीट से गायब कर दिया गया. एसके जैन की भी गिरफ्तारी मामला उजागर होने के चार साल बाद की गई थी. सीबीआई ने 16 जनवरी 1996 को आधी-अधूरी चार्जशीट दाखिल की. 8 अप्रैल 1997 को दिल्ली हाईकोर्ट के जज मोहम्मद शमीम ने लालकृष्ण आडवाणी और वीसी शुक्ला को बाइज्जत बरी कर दिया, धीरे-धीरे सारे नेता बेदाग निकल गए. कोर्ट ने भी जैन की डायरी को ‘बुक ऑफ़ अकाउंट’ में लेने से इन्कार कर दिया. कोर्ट ने इसे सबूत नहीं माना. सीबीआई ने भी सब कुछ ढीला छोड़ दिया. विडंबना यह है कि जैन हवाला डायरी मामले से यह खुलासा हुआ था कि विदेश से जिस फंड के द्वारा राजनीतिक दलों को पैसा भेजा गया था उसी चैनल के जरिए आंतकी संगठनों को भी फंड भेजा गया था. इस घोटाले में 115 राजनेता और कारोबारी के साथ-साथ कई नौकरशाह शामिल थे. लेकिन सब सबूत के अभाव में बचकर निकल गए.
लिहाजा, हमें यह समझ लेना जरूरी है कि उस बार की तरह इस बार भी कुछ नहीं होने वाला. हवाला या मनी लॉन्ड्रिंग के बूते ही राजनीतिक दलों का धंधा चलता है. चाहे कांग्रेस हो या भाजपा, आम आदमी पार्टी हो या समाजवादी पार्टी या बहुजन समाज पार्टी या कोई अन्य. राजनीतिक दलों पर हवाला के पैसे के लेन-देन के आरोप लगते रहे हैं और वे अपने सफेद वस्त्र से धूल झाड़ते रहे हैं. मनी लॉन्ड्रिंग मामले में करीब-करीब सारे राजनीतिक दल कमोबेश इन्वॉल्व हैं, लेकिन बताइये कौन नेता पकड़ा जाता है? आपके सामने बस एक उदाहरण है झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा का. आरोप है कि मधु कोड़ा ने हजारों करोड़ रुपए बटोरे और उसे हवाला के जरिए विदेश भेजा. लेकिन आप यह भी जानते चलें कि मधु कोड़ा बड़े नेताओं का एक कारगर मोहरा थे, जिसे सामने रख कर काला धन बाहर भेजा गया और मोहरा जेल चला गया। (प्रभात रंजन दीन की वाल से साभार)

Thursday, 1 March 2018

मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला

मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला
1984 बैच के IPS कृष्ण  स्वरूप द्विवेदी, जिन्हें  Bihar का DGP(राज्य पुलिस प्रमुख) नियुक्त करने पर  खूब 'हाय-तौबा' है ! कहा जा रहा है-1998 में भागलपुर में सांप्रदायिक  उपद्रव के समय वह भागलपुर के SP थे। इस दंगे में बड़ी संख्या मुसलमान मारे गए। वहां की तत्कालीन सरकार ने जस्टिस प्रसाद कमीशन गठित किया। जिसकी रिपोर्ट में एसपी की ओर इशारा कर कहा- "His communal bias was fully demonstrated, not (only) by the manner of arresting the Muslimsbut also by not extending adequatehelp to protect them."(यह भी दावा है कि बाद के कमीशनों की रिपोर्ट इससे इतर थी)। अब द्विवेदी की बिहार के DGP पद पर ताजपोशी के बाद यह रिपोर्ट फिर सामने है। कहा जा रहा है कि 'इस नियुक्ति से मुसलमान भयभीत है।' विरोध पर सवाल उठाने की मंशा नहीं है। अलबत्ता हम उनके समर्थक हैं। मगर सवाल यह है कि भाजपा, उसके समर्थन से चलने वाली सरकार जब एेसे अधिकारी पोस्ट करती है, तब ही हंगामा क्यों ?? कथित सेकुलर सरकार में कमोवेश एेसे इल्जामों से घिरे अधिकारियों की अहम पदों पर पोस्टिंग होती है, तब खामोशी क्यों रहती है ??  क्या इस शोर के पीछे मानवीय संवेदना, बेगुनाहों के खून की हौलनाक मंजर की सिहरन नहीं, पसंदीदा विचारों वाले दल को सत्ता दिलाने की मंशा पर्दे के पीछे छिपी है। अब आप पूछना चाहेंगे कि सेकुलर सरकारों में कब-कहां  एेसी पोस्टिंग हुई ?? जवाब ढूंढने के लिए सुदूर पूर्वोत्तर की ओर निगाह दौड़ाने की जरूरत नहीं। नजीरें, उत्तर प्रदेश में ही है। 22 मई 1987 को हाशिमपुरा नरसंहार हुआ। तब मेरठ के एसएसपी रहे IPS (नाम इसलिए नहीं लिखना चाहता क्योंकि अधिकतर सेवा में नहीं हैं।

को कौन सा महत्वपूर्ण पद नहीं मिला ?? उस समय के प्रमुख, आईजीपी (ZONE),डीआइजी बाद में महत्वपूर्ण पदों पर रहे। मलियाना कांड के दौरान के डीएम, एसएसपी को क्या "सेकुलर सरकारों" ने महत्वपूर्ण ओहदे नहीं दिये ? अच्छा छोड़िए!! ये हादसा तीन दशक पुराना हो चला। मगर वर्ष-2013 में "कथित रूप से मुसलमानों" की हमदर्द सरकार थी। उस दौर में इंसानी दिल-दिमाग दहलाने वाला मुजफ्फरनगर दंगा हुआ। मरने वालों में हिन्दू-मुसलमान दोनों थे। एक दर्जन मुस्लिम युवक गायब हैं। उस समय मुजफ्फरनगर में तैनात रहे अधिकारियों में से अधिकतर (डीएम, एसएसपी भी) क्या एेसी तैनाती नहीं दी गई, जो समाज को प्रभावित करती है। तर्क हो सकता है कि "ये लोग तो कहीं दोषी नहीं थे।" मगर जहां 60 से ज्यादा बेगुनाह मार दिये जाएं, वह किसी अधिकारी को जिम्मेदारी से कैसे मुक्त किया जा सकता है। और अगर उस समय भाजपा की सरकार होती तो....??? और हां, जिस एक अधिकारी की शिथिलता से 60 से अधिक लोगों के मुजफ्फरनगर में असमय मारे जाने की बुनियाद पढ़ी। वह 2013 से अब तक शानदार कही जाने वाली तैनातियों पर हैं। कई अधिकारी तो इतने महत्वपूर्ण पद पर तैनात हुए/ हैं जिसका सपना IPS/IAS/PCS/PPS देखता है।
कहना यह है कि समाज व समरता की फिक्र करने वालों ने सेकुलर सरकारों में हुए इन अधिकारियों की तैनाती पर सवाल क्यों नहीं उठाया-मेरा सवाल सिर्फ इतना सा है। इसके पीछे क्या निहितार्थ नहीं छिपे होते ??

इन दिनों वायरल इतिहासकार राम पुनियानी के वीडियो व उनके तर्कों से इतिहास को देखें तो छत्रपति शिवाजी के मुख्य सेनापति हकीम खां थे। और अकबर के सेनापति-राजा मान सिंह। हल्दीघाटी की लड़ाई में इन्हीं दोनों सेनापतियों ने अपने राजाओं की कमान संभाली। परिणाम पर जाने की जरूरत नहीं है, मगर यह तय है कि "लड़ाई सत्ता" की थी। यह हिन्दू और इस्लाम धर्म की लड़ाई नहीं थी। एेसे ही अधिकारियों की तैनातियों के पीछे भी सत्ता हासिल करने का ही लक्ष्य होता है। बौद्धिक समाज सभी पक्षों की खामियों का सवाल उठाने के साथ समाधान सुझाए तब ही हालात बदलेंगे। याद करिए-एक बार पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई पर "राइटि्स्ट" होने का इल्जाम लगा तो उन्होने कहा- 'आइ विलीब इन डूइंग थिंग्स राइट।' (I believe in doing things right)  यह जिक्र इस आशय से कि खुद को 'राइटिस्ट' (जिसे वह राष्ट्रवादी कहते हैं)  कहने वाले इस शब्द को  मुरारजी भाई की परिभाषा में अपनाएं तो शायद बदलाव आए।

...और एजेंडा-2019
हां, यह जरूर हो सकता है कि भाजपा के समर्थन से बिहार में सरकार चल रहे नीतीश कुमार ने के.एस द्विवेदी (कृष्ण  स्वरूप द्विवेदी) को डीजीपी बनाकर 2019 में यूपी साधने की मंशा बना रखी हो। दरअसल, द्विवेदी यूपी के जालौन जिले के निवासी हैं। उनका यहां से सीधा जुड़ाव है। कानपुर में ढेरों में रिश्तेदारियां हैं। जाहिर है कि  बुंदेलखंड की राजनीति में इसका सीधा प्रभाव है। भाजपा को इसका अप्रत्यक्ष, प्रत्यक्ष रूप से लाभ मिल सकता है ??? यूपी में नीतीश का न संगठन है और न जनाधार। एेसे में उनके समर्थक यूपी के कुर्मी मतदाता भी भाजपा के पक्ष में गोलबंद सकते हैं। एेसे हो यह जरूरी भी नहीं है, लेकिन राजनीति तो संकेतों से होती है। यही नहीं याद कीजिए, जिस न्यायिक अधिकारी ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले में सजा सुनाई, वह भी जालौन के ही रहने वाले हैं। और न्यायिक अधिकारी की ओर से यूपी कुछ अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठाया गया तो योगी सरकार ने आनन-फानन में जांच करा दी थी।
....
...विपक्ष का इल्जाम
राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनोज झा कहते हैं -"केएस द्विवेदी का डीजीपी नियुक्त होना अपने आप में इस बात की दोबारा पुष्टि करता है कि सरकार के नीतिगत और प्रशासनिक निर्णयों में नीतीश कुमार या जदयू की भूमिका नहीं रही।" "उन्हें वह करना पड़ रहा है जो संघ मुख्यालय की इच्छा होती है। तत्कालीन एसपी के रूप में 1989 के बर्बर भागलपुर दंगों के दौरान द्विवेदी की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। उस समय की मीडिया रिपोर्ट्स देखें तो स्पष्ट होता है तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी को उन्हें वहां से हटाने का निर्णय लेना पड़ा था।" दक्षिणपंथी विचारधारा से उनकी निकटता जाहिर है। इससे हाशिए के लोगों और अल्पसंख्यक समाज में डर और ख़ौफ़ की भावना जन्म लेगी ।"
अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आयेगा कोई जायेगा 
तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया, उसे भूलने की दुआ करो 


Tuesday, 27 February 2018

जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां रूई की तरह उड़ जायेंगें

...जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां  रूई की तरह उड़ जायेंगें

कहते हैं-'सरकार के हाथ बहुत लम्बे, कान बहुत बड़े होते हैं।' यह सच है ? तब ये बात उस तक कैसे नहीं पहुंच रही कि जो तबका 2014 फिर 2017 में सुबह से शाम तक गांव-गलियारे। खेत-खलिहान। पंचायत घर। चाय-पान की दुकान। यहां तक कि अपने घरों के अंदर सरकार वाले दल (BJP) का पैरोकार था। वही कुछ महीनों के अंदर बेचैन है। बेचैनी भी सामान्य नहीं, समर्थक दल के प्रति उमड़ी भावनाओं को कुचल डालने की हद तक है !! यह स्थिति चंद नौकरशाहों के चलते बन रही है।


बात औरैया की घटना से। गांव में प्रदर्शन हो रहा था, एक पत्रकार मौके पर पहुंचा। गांव के ही रहने वाले थे, ग्रामीणों की मनुहार पर पुलिस को फोन कर दिया। चेताया दिया कि " न्याय करो वरनो दिक्कत होगी।" पत्रकारों की यह सामान्य भाषा है। मगर पुलिस ने उन्हीं को मुजरिमा बना दिया। मानिंद लोगों में शुमार प्रेस क्लब अध्यक्ष सुरेश मिश्र ने नाराजगी जाहिर की तो एक शेरेपुश्त से उनके विरुद्ध डकैती का मुकदमा लिखा दिया। हंगामा होना था, हुआ। ढेरों लोग IG कानपुर की ड्योढ़ी पहुंचे, जो गए थे उनके "दिल में सरकार बसती" थी। IG ने दूसरे जिले के ईमानदार अधिकारी को जांच सौंपी। आईओ मौके पर गया-हर पक्ष खंगाला। लिखा-"एफआईआर झूठी है।" अब जिले में डाल-डाल, पांत-पांत का खेल चल रहा है। 

बात छिबरामऊ कीः
...बात छिसोमवार को यहां के व्यक्ति ने एक भूखंड की खुदाई शुरू की, इसमें मंदिर के गुंबद जैसा अवशेष नजर आया। भीड़ जुटी। विरोध हंगामे में तब्दील होने लगा। पत्रकार कोतवाली पहुंचे...माहौल संभालने के उपाय पूछे तो पुलिस अपने पर उतर आई। पुलिस जब अपने पर उतरती है तो "लत्ते (सड़ा हुआ कपड़ा) को सांप" बना देती है। उसने वही किया भी। हुक्म जारी हो गया कि ये पत्रकार कोतवाली फटक न पाएं। ये पत्रकार सरकार से भाव विह्वल रहे हैं।
...अब लखीमपुर। 
जहां दुघर्टना के बाद पुलिस की कारगुजारी बताने पर कुछ एेसा हुआ-जिसे लिखना उचित नहीं। सहारनपुर, सीतापुर, बांदा, बाराबंकी, उन्नाव समेत कई जिलों के ढेरों किस्से हैं। 
....कहने का आशय यह है कि गांव-गलियारे के पत्रकारों को सिर्फ "सूचना प्रेषक" न समझें। जब माननीय सांसद, विधायक, मंत्री, कलेक्टर, एसपी तक पीड़ित नहीं पहुंच पाता तब वह उसी ग्रामीण पत्रकार के पास जाता है। वो यथासामर्थ फोन करता है। उनकी बात लिखता है। जाहिर, धीरे-धीरे उसका अपना जनाधार बनता है, जो जाति, धर्म, संप्रदाय से ऊपर होता है।... और हां, इतिहास गवाह है कि देश-दुनिया में हाहाकार मचाने वाली खबरों में से 90 फीसद ग्रामीण पत्रकारों ने ही ब्रेक की हैं। एेसे जनाधार वाले पत्रकारों के दिल में 2014 से उमड़ी भावनाएं कुचल डालने की मंशा परवान चढ़ गई तो "साइनिंग यूपी", "वाइब्रेंट यूपी", "उत्तम यूपी" " विकास की ओर अग्रसर यूपी" के नारे सिर्फ लखनऊ की सुर्खियां बनकर रह जाएंगे... !!!! 
सरकार आपके हाथ लंबे हैं, कान बड़े हैं तो गांव-गलियारों की आबोहवा का आकलन कर लें। हां, मेरी बात पर भरोसा न हो तो यूपी में एक "घुमन्तू बाबा" हैं। उनको बुलाकर सच्चाई जान लें। यह बता दूं ये घुमन्तू बाबा 56-58 की उम्र में भी रोडवेज की खटारा बसों से घूम-घूमकर जनता की भावनाएं/ नब्ज परख रहे हैं। कभी-कभार लिख भी देते हैं। ये बाबा सूबे और केन्द्र वाली सरकार के दल को 25 सालों से जान समझ रहे हैं। सुझाव न मानिए तो अपनी इंटेलीजेंस की लंबी-चौड़ी फौज से सच पता कराइए। सच कहता हूं "घुमन्तू बाबा" राजनीतिक झूठ नहीं बोलते हैं।.....


Saturday, 24 February 2018

यूपी से दसवां सदस्य कौन !!!

यूपी से दसवां सदस्य कौन !!! 
UP से दसवां राज्यसभा सदस्य कौन होगा ? खांटी राजनीतिज्ञ या पूंजीपति ! ये जिज्ञासा विधानसभा के सदस्यों की संख्या के चलते हैं। 403 (निर्वाचित) सदस्यों वाले सदन में भाजपा के सदस्यों की संख्या 311 है। 13 घोषित समर्थक और  तीन से 5 दूसरे विधायक भी भाजपा के साथ हैं। एक व्यक्ति को राज्यसभा का सदस्य बनाने को तकरीबन 37 वोटों की जरूरत होगी। इस लिहाज से भाजपा जिन आठ लोगों को टिकट देगी, उनकी जीत तय है। सपा के पास 47 सदस्य हैं यानी वह जिस एक व्यक्ति को टिकट देगी, उसकी जीत तय है। यानी दस में से नौ सीट का परिणाम तय है। अब बची एक सीट जिसके लिए किसी एक विपक्षी दल के पास पर्याप्त वोट नहीं है। एक सदस्य को निर्वाचित कराने के बाद सपा के पास 10 वोट बचेंगे। कांग्रेस के पास 07 वोट हैं। बसपा के पास 19 सदस्य हैं। यानी ये दल अपने बूते दसवें सदस्य को जिता नहीं सकते। सपा, बसपा और कांग्रेस का गठबंधन दसवें सदस्य को राज्यसभा भेज सकता है। तीनों दल एक जुट होंगे ?? यह यक्ष प्रश्न है, जिसका उत्तर 12 मार्च को ही मिलेगा। अगर तीनों का गठजोड़ बना तो प्रभाव "2019" के चुनाव पर नजर आएगा। अगर गठबंधन नहीं बना। दलों ने अपने विधायकों को "आत्मा की आवाज" पर वोट डालने का संकेत दे दिया। तब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भाजपा 9वां प्रत्याशी मैदान में उतारती है।अथवा किसी पूंजीपति-खांटी राजनीतिज्ञ को भाग्या आजमाने देने के लिए मैदान खुला छोड़ देती है।....राजनीति में हमेशा कयास, गोटें बिछाने का दांव चला जाता और संभावना, आशंका के आधार पर लेखन होता है। बावजूद इसके राज्यसभा के इस चुनाव में  दसवां सदस्य कौतूहल का विषय होगा।
संभावित फार्मूला
-भाजपा सीधे नौ सदस्यों

का नामांकन कराए और विपक्षी फूट का लाभ उठाकर सभी को जिता ले। क्योंकि अगर द्वितीय वरीयता के मतों की गिनती की नौबत आई तो भाजपा के दसवें सदस्यो को 325 से अधिक वोट सीधे मिलेंगे।
-विपक्षी दल आपसी सहमित से दसवें सदस्य को मैदान में उतार दे और भाजपा नैतिकता के आधार यह मानकर की सदस्यों की संख्या के आधार पर दो सीटें विपक्ष को जाती हैं, मतदान की नौबत ही न आने दे।
-विपक्षी दल खासकर बसपा (जिसके सदस्यों की संख्या 19 है) कोई हैवीवेट प्रत्याशी उतारे और बाकी के दल भविष्य की संभावनाओं के मद्देनजर उसे समर्थन कर दे।
-सपा अपना दूसरा प्रत्याशी उतारे और बसपा अपने विधायकों को अंर्तात्मा की आवाज पर वोट डालने के लिए आजाद कर दे।
-कांग्रेस अपना एक प्रत्याशी मैदान में उतारे और यूपी के "लड़कों की दोस्ती वाला" फार्मूला फिर अमल में आता दिखे और बसपा मौन रह जाए।
-या फिर तीनों दल किसी बड़े औद्योगिक घराने को प्रत्याशी उतारने दे और भविष्य की संभावनाएं उसमें टटोलने का फैसला करे। (जैसा हरियाणा में भाजपा कर चुकी है।)
राज्यसभा चुनाव का कार्यक्रम
-नाम निर्देशन की अधिसूचना की तिथि : 05 मार्च 
-नाम दाखिल करने की अंतिम तिथि : 12 मार्च 
-नामांकन की जांच : 13 मार्च 2018
-नाम वापसी : 15 मार्च 
-मतदानः 23 मार्च (सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे)
-मतगणनाः 23 मार्च (शाम पांच बजे से परिणाम तक)
रिक्त सीटेंः दस
एक सीट के लिए आवश्यक वोटों की संख्या-37.5
मौजूदा समय में दलीय संख्या
0-भाजपा-311सपा- 47 बसपा- 19 अपना दल (सोनेलाल)-09 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस-07 सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी-04 राष्ट्रीय लोकदल-एक निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल-एकनिर्दलः तीन (अमन मणि त्रिपाठी, रघुराज प्रताप सिंह, विनोद सरोज)नामितः एक (डॉ.डेनजिल जे गोडिन) एक सीट रिक्त है।
भाजपा गठबंधन के सदस्य
- भाजपा (311) + अपना दल-09 + सुलेहदेव भारतीय समाज पार्टी-04 = 324
-राष्ट्रपति चुनाव के इतिहास पर नजर डालें- निर्दल (03) + सपा के 03 सदस्यों ने भाजपा प्रत्याशी को वोट दिया।
- इनमें से एक सपा सदस्य ने निजी संबंधों की दुहाई देकर, दो ने क्रास वोटिंग की।
-यदि राज्यसभा चुनाव में पुनरावृत्ति हुई तो भाजपा गठबंधन के सदस्यों की संख्या-330 हो जाएगी।
-कुछ अरसे से निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल के सदस्य की भाजपा से नजदीकी दिख रही है। 
-UP कोटे की राज्यसभा में सीटों की संख्या-31 (मायावती के इस्तीफे के बाद से एक रिक्त)
राज्यसभा में UP की स्थिति  
SP:18 (किरनमय नंदा, नरेश अग्रवाल, जावेद खां, तजीन फातिमा, आलोक तिवारी, सुरेन्द्र नागर, विशम्भर निषाद, जया बच्चन, चन्द्रपाल सिंह, दर्शन सिंह, रामगोपाल यादव, मुनव्वर सलीम, सुखराम चौधरी, बेनी वर्मा, रवि प्रकाश वर्मा, नीरज शेखर, संजय सेठ, रेवती रमण सिंह)-अमर सिंह सपा के टिकट पर राज्यसभा गए ,  सपा ने उन्हें  निकाल दिया। जिस पर उन्हें राज्यसभा में  निर्दल  की मान्यता है।
-BJP:03(विनय कटियार, हरदीप सिंह और शिवप्रताप)
-congress:03 (पीएल पुनिया, कपिल सिब्बल, प्रमोद तिवारी)
-BSP:05(वीर सिंह, सतीश मिश्र, राजाराज, मुनकाद अली, अशोक सिद्धार्थ)   
इनका कार्यकाल हो रहा पूरा
-नरेश अग्रवाल , दर्शन सिंह यादव, नरेश चन्द्र अग्रवाल, जया बच्चन, चौधरी मुनव्वर सलीम और आलोक तिवारी: (SP), -विनय कटियार ; (BJP)-प्रमोद तिवारी: (CONGRESS)



Friday, 23 February 2018

यही वह शहर जो अब मेरी जुबान देखता है।"






रेल मंत्री पीयूष गोयल लखनऊ में थे। कहते हैं- यूपी के विकास के लिए उन्होंने धन का पिटारा खोल दिया !!! शुक्रिया। उनका भी शुक्रिया जिन्होंने पिटारा खुलता महसूस कराया। कहना यह है कि ' पिटारा' खोले बिना UP में विकास की रेल सरपट दौड़ सकती है। भगवान श्रीराम के प्रति आस्था और परवान चढ़ सकती है। महर्षि बाल्मीकि का दर्शन मानने वाले भी भाजपा सरकार के मुरीद हो सकते हैं।

 पूछिए कौन सी छड़ी है?? जवाब- "मानिकपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन।" है। इस स्टेशन परिसर में 5 हजार कर्मचारियों के आवास खाली हैं। डीजल लोको शेड का शानदार स्ट्रैक्चर वीरान है। शंटिंग का सिस्टम है। आइआरएस (इंडियन रेलवे सर्विस) अधिकारियों के भव्य बंगले खाली हैं। रेलवे अस्पताल भी है। रेल मंत्री का शैलून यार्ड भी है। रेलवे के पार्क हैं। सैकड़ों एकड़ जमीन है। यहां से इलाहाबाद की दूरी सिर्फ 80 किमी है। सतना 65 किमी। हर 20 मिनट पर इस स्टेशन से एक ट्रेन गुजरती है, जो दोनों शहरों को जोड़ती है। कर्वी (जिला मुख्यालय) 20 किमी है। श्रीराम ने जिन स्थलों पर 14 साल तपस्या, संघर्ष में गुजारे वह पूरा क्षेत्र यहां से 15 से 25 किमी में सिमट जाता है। महान तुलसीदास ने जिस स्थान पर रामायण लिखी, वह 38 किमी है। महर्षि बाल्मीकि आश्रम 28 किमी पर है। सड़कें हैं।....बस खाली स्ट्रक्चरों को आबाद कराना था। आस्था-विकास की रेल सरपट दौड़ने लगेगी। बीमारू बुंदेलखंड का ठोस इलाज शुरू हो जाएगा। 

भाजपा का राजनैतिक एजेंडा भी उड़ान भरने लगेगा। हां, पिटारा खोलने की जरूरत नहीं।...भगवान श्रीराम के भक्तों (आशय प्रभु के विचारों के प्रति आस्था रखने वालों से है।) से अाग्रह है- राम राज्य का ख्वाब दिखाने वाली भाजपा सरकार का इस ओर ध्यान खींचिए प्लीज !!!!!! सियासी मुश्किल भी नहीं है, बुंदलेखंड की 19 में से 19 विधानसभा सीटों से भाजपा के विधायक हैं। झांसी-ललितपुर, जालौन, हमीरपुर, बांदा, सतना, रीवां, इलाहाबाद, फतेहपुर संसदीय सीट पर भाजपा के सांसद हैं। आखिर में थोड़ा तल्ख शब्द-फतेहपुर को छोड़ दें तो इन सभी सीटों पर अल्पसंख्यकों की आबादी भी दाल में नमक जैसी है। अब विकास नहीं तो फिर कब ???
और यह सब इसलिए कि...............
"यही वह शहर जो मेरे लबों से बोलता था.
यही वह शहर जो अब मेरी जुबान देखता है।"

Monday, 19 February 2018

आंकड़ों के बोल, इतिहास की चाल पर फूलपुर, गोरखपुर पर नजर

फूलपुर। गोरखपुर। संसदीय उपचुनाव-11 मार्च को वोट पड़ेंगे। योद्धा मैदान में हैं। कुछ लोगों के जेहन में परिणाम को लेकर जिज्ञासा होगी ?? मगर इस मुद्दे पर जिज्ञासा का स्थान "न..न..न" के बराबर है। हां, यह उत्सुकता जरूर हो  सकती है कि अनुसूचित जाति (दलित) के वोटरों का रुख क्या होगा ?? दोनों क्षेत्र में इस वर्ग के वोटरों की तादाद 25 फीसद के ऊपर है। जिनका कथित दावेदार अखाड़े में नहीं है।...अन्य पिछड़ा, पिछड़ा, सवर्ण कब किसके साथ रहा-यह साफ है। रही बात माइनटरी की तो 2014-लोकसभा के बाद का चुनाव इतिहास गवाह है कि UP में इस वर्ग की राजनीतिक हैसियत बची नहीं है !!! इसीलिए भविष्य के चुनावों में "बाहें तो फैलाईं होती", "मुस्लिम मतदाताओं पर नजर"। "मुस्लिम वोटर एकजुट"। " मुसलमानों का रुख तय करेगा हार-जीत "। " मुसलमानों की चुप्पी से राजनीतिक दलों में बेचैनी " जैसी हेडिंग वाली खबरें अब शायद ही सुर्खियां बने। कहीं-कभी बनीं तो उसके खास सियासी निहितार्थ होंगे। एेसे में उपचुनावों के परिणाम पर मगजमारी की ज्यादा गुंजाइश तो नहीं दिखती। समीकरण भी एेसे नहीं जिससे अजूबा हो जाए।  हां, कई राजनीतिक टीकाकारों की आंखें नम्बर-2 पर जरूर रहेंगी।
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जातीय समीकरण देखिए-फूलपुर

पटेल 18%, एससी 21%, मुस्लिम 15%, ब्राह्मण 9%, कायस्थ 6%, वैश्य 7%, यादव 6%, ठाकुर 4%, अन्य पिछड़ा 11% और अन्य 4% हैं।

विधानसभा सीटें और 2014 के परिणाम                            2017 विधानसभा का परिणाम
सीट                नम्बर-1                   नम्बर-2                   नम्बर-1                नम्बर-2
1-फाफामऊः  BJP: 92918 ///  BSP-42421              BJP-83239///     57254-SP
2-सोरांवः        BJP: 98311///  SP-45934                 BJP- 77814///   60079-BSP
3-फूलपुर:       BJP: 103681///  SP-54026               BJP- 93912///    67299 SP
4-इलाहाबाद पश्चिम-BJP: 99710///  SP-36979          BJP-85518///    60182 SP
5-इलाहाबाद उत्तर: BJP: 108391/// INC-20531        BJP-89191///   54166  INC
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लोकसभा में हार-जीत का अतरः 308308 (केशव मौर्य जीते, धर्मराज पटेल-2 रहे) 2017 विधानसभा में सभी सीटें भाजपा जीती।
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साफ है कि कुर्मी मतदाताओं का अधिकतर वोट भाजपा के साथ गया था। वरना फूलपुर संसदीय क्षेत्र की फूलपुर विधानसभा जहां कुर्मी (पटेल) मतदाता सबसे अधिक वहां सपा का पटेल प्रत्याशी भाजपा के मौर्य प्रत्याशी से 54026 मतों से पीछे नहीं होता। इसी तरह इलाहाबाद उत्तर जहां कायस्थ मतदाताओं की संख्या खासी अधिक है वहां भाजपा प्रत्याशी को 108391 वोट मिले थे जबकि इस विधानसभा क्षेत्र में दूसरे नम्बर रहे कांग्रेस के मोहम्मद कैफ को सिर्फ 20531 वोट मिले थे। सपा व बसपा के प्रत्याशी तीसरे चौथे नम्बर पर रहा।

नोटः इस बार तो भाजपा का प्रत्याशी भी पटेल जाति का ही है।
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 जातीय समीकरण देखिएः गोरखपुर

निषाद-15%, ब्राह्मण-9%,मुस्लिम-10 %,यादव- 9%, कायस्थ-4%, एससी/एसटी/ओबीसी-19% हैं। (यह आंकड़ा राजनीतिक दलों से चर्चा के आधर पर है)

गोरखपुर संसदीय सीट-2014 का परिणाम व सीटें           2017 विधानसभा का परिणाम
     सीट             नम्बर-1               नम्बर-2               नम्बर-1                       नम्बर-2 
1-कैम्पियरगंजः  BJP- 94508 ///  SP-52462        BJP-91636///           58782- BSP
2-पिपराइचः  BJP-125316 ///  SP-47837          BJP-82739///            69930- BSP
3-गोरखपुर शहरः BJP-133892 /// SP-31055     BJP-122221///          61491-INC
4-गोरखपुर ग्रामीणः BJP-97482 /// SP-53810     BJP-83686///           79276-SP
5-शहजनवांः  BJP-87406 /// BSP-43450           BJP-72213///            56836 SP

हारजीत का अंतर-312783 (योगी आदित्यनाथ जीते, राजमित निषाद नम्बर-2 रहीं)

सपा ने इस चुनाव में भी निषाद पर दांव लगाया है मगर उसके प्रत्याशी को लेकर पार्टी के ही एक निषाद नेता का विरोध झेलना पड़ रहा है जबकि राजमति निषाद के पति पूर्वांचल में अति पिछड़ों के प्रभावशाली नेता थे। ऊपर से इस बार कांग्रेस ने मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारा है। इसी गोरखपुर के करीबी क्षेत्र के प्रभावशाली नेता आरपीएन सिंह को सीडब्ल्यूसी का सदस्य बना दिया है। सीडब्ल्यूसी कांग्रेस की सर्वोच्च बाडी होती है।  ऊपर से इस बार योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री के ओहदे पर हैं। केन्द्र व राज्य दोनों स्थानों पर भाजपा की सरकार है और लोकसभा के आम चुनाव में एक साल से थोड़ा अधिक का ही समय है।

नोटः इस बार भाजपा ने ब्राह्रण प्रत्याशी पर दांव लगाया है। दशकों बाद भाजपा ने गोरक्षपीठ से बाहर का और ब्राह्मण प्रत्याशी मैदान दिया है। इससे बने समीकरण का खुद अंदाजा लगाइए।