Saturday, 13 April 2019

राजनीति में नौकरशाहों का दखल

लखनऊ। सफल नौकरशाह रहे पी.एल. पुनिया ने राजनीति  में दस्तक देकर जो सफलता का मुकाम  हासिल किया है, उसको पे्रेरणा मानकर कुछ नौकरशाह 17वीं लोकसभा चुनाव में मैदान में है। इस चुनाव में रिटायर्ड या वीआरएस ले चुके अफसर की चुनाव में सक्रियता देखते बन रही है। नेताओं की ही तरह प्रशासनिक सेवा के अधिकारी भी चुनाव में अपना भाग्य आजमा रहे है। हालांकि चुनाव लडऩे की गरज से  कई आईएएस ने काफ ी पहले विभिन्न दलों की सदस्यता ली थी, लेकिन उनमें से बहुतों को टिकट नहीं मिला तो कुछ केवल संगठन में ही सक्रिय है। हाल ही में प्रमुख सचिव रही विनीता कुमार ने भाजपा ने सदस्यता गृहण की है। लेकिन उन्हे अभी तक कहीं से उम्मीदवार नहीं बनाया गया है। अखिलेश सरकार में प्रमुख सचिव डा. सूर्य प्रताप सिंह ने सेवा में रहते हुए अखिलेश सरकार की कार्यशैली पर उठाते हुए सरकार को कटघरे में खड़ा किया। व्यवस्था परिवर्तन के लिए उन्होंने मंच भी तैयार किया लेकिन किसी राजनीतिक दल को नहीं ज्वाइन किया। जबकि कृषि उत्पादन आयुक्क् रह चुके अनीस अंसारी और प्रमुख सचिव रहे इन्दु प्रकाश ऐरन ने रिटायर होने के बाद कांग्रेस की सदस्यता गृहण की। जबकि इससे पूर्व  आईएएस सच्चिदानंद पाठक, मारकडेय सिंह आरपी शुक्ला रालोद में शामिल हुए थे। इस बार के लोकसभा चुनाव में जहां अयोध्या से प्रदेश के अपर कैबिनेट सचिव  रहे विजय शंकर पांडेय चुनाव मैदान में है तो 1987 बैच की आईआरएस सेवा से प्रीता हरित ने कांग्रेस का दामन थामा और कांग्रेस ने आगरा से उम्मीदवार बनाया है। वे हरित बहुजन सम्यक संगठन की अध्यक्ष भी है। हालांकि 2017 के विधानसभा चुनाव में रिटायर्ड आईएएस और इलाहाबाद के मंडलायुक्त रह चुके बादल चटर्जी इलाहाबाद के दक्षिणी विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ थे लेकिन उन्हे सफलता नहीं मिली। याद रहे चटर्जी ने तत्कालीन सपा  सरकार में उप्र लोकसेवा आयोग द्वारा भर्तियों की गई धांधली के खिलाफ  मोर्चा खोला था। लखनऊ विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष रहे और सचिव ग्राम्य विकास पद से सेवानिवृत हुए राम बहादुर बसपा के टिकट पर लखनऊ की मोहनलालगंज से सीट से भाग्य आजमाया था। चुनाव हारने के बाद उन्होंने बसपा से किनारा कर लिया। राष्टï्रीय एकता पार्टी के बैनर तले काम कर रहे हैं। बिजनौर के जिलाधिकारी रह चुके एस.के. वर्मा बिजनौर की चांदपुर सीट से रालोद उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में थे। भाजपा में टिकट नहीं मिला तो आरएलडी ज्वाइन की और कूद पड़े मैदान में। प्रमुख सचिव पद से सेवानिवृत हुए विन्ध्येश्वरी प्रसाद सिंह बाराबंकी की कुर्सी विधानसभा सीट से बसपा उम्मीदवार के रूप में मैदान में थे। इन्हें उम्मीदवार बनाए जाने का क्षेत्र में खासा विरोध था लेकिन मायावती ने उसकी परवाह न करते हुए उनका टिकट बरकरार रखा था। आईटीएस देवमणि दुबे सुल्तानपुर की लंभुआ सीट  से भाजपा के उम्मीदवार थे। इसके अलावा कई रिटायर्ड आईएएस और आईपीएस ने दलों में शामिल न होकर लोकगठबंधन पार्टी गठन किया था। लोग में सीनियर आईएएस और लोकसेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष एसआर लाखा, के अलावा केन्द्र में सचिव रहे एस.ए.टी. रिजवी और भूरेलाल के अलावा पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह, आई.सी. द्विवेदी, के अलावा आईपीएस एस.एन. सिंह भी जुड़े हुए है। प्रशासनिक सेवा से निवृत्त होने के बाद  लखनऊ से दिल्ली तक कई आईएएस अफसरों के सांसद विधायक और मंत्री बनने के बाद अब रिटायर हो रहे आईएएस मे खादी का चोला ओढऩे की प्रवृत्ति बढ़ रही है। मुलायम और मायावती सरकारों में प्रमुख सचिव रहे पी.एल. पुनिया के सांसद  फि र कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिलने के बाद खासतौर से अफसरों में माननीय बनने का क्रेज तेजी से बढ़ा है। पुनिया 2007 में बाराबंकी की फतेहपुर सीट से चुनाव लड़े और पराजित हुए लेकिन ठीक दो साल बाद 2009 के बाराबंकी सीट से निर्वाचित होकर वे संसद पहुंचे। राज्य सरकार में प्रमुख सचिव रहे डा. चन्द्रपाल ने किसी राजनीतिक दल में शामिल होने के बजाय आदर्श समाज पार्टी का गठन किया है। प्रशासनिक सेवा से निवृत्त होने के बाद उन्होंने  अपनी राजनीति पारी शुरू की लेकिन इसमे उन्हे कोई सफ लता नहीं मिली। चन्द्रपाल से पहले उनकी पत्नी विमला पाल जनता दल और सपा से विधानसभा का चुनाव लड़ चुकी हैं। प्रशासनिक सेवा से निवृत्त होने के बाद राजनीति में सक्रिय हुए डा. पाल पहले शख्स नहीं है इससे पूर्व कई रिटायर लोगों ने राजनीतिक दलों का दामन थामा तो कुछ ने अपनी ही पार्टी बनाकर राजनीतिक शुरू की। राजनीतिक में ठीक ठाक एडजस्टमेंट होने के बाद रिटायर्ड आईएएस में देश की दशा-दिशा बदलने का जज्बा देखते बन रहा है। भाजपा के शासनकाल में रिटायर्ड आईएएस तथा प्रमुख सचिव रहे एसडी बागला भी सक्रिय रहे। भाजपा ने उन्हें चुनाव तो नहीं लड़ाया लेकिन उन्हें एक आयोग का अध्यक्ष बनाकर उपकृत जरूर किया। प्रमुख सचिव रहे राय सिंह भी सेवानिवृत्त होने के बाद कांग्रेस में शामिल हो गए। उनकी पन्नी राजराय सिंह पहले भाजपा में फि र कांग्रेस में शामिल हो गई। कल्याण सरकार में वे राज्यमंत्री भी रही। पूर्व आईएएस तथा लखनऊ के कमिश्नर रहे रामकृष्ण इन दिनों कांग्रेस में ही सक्रिय है। एक अन्य रिटायर्ड आईएएस आर.ए. प्रसाद इन दिनों कांग्रेस में कांगेस में सक्रिय। प्रमुख सचिव रहे हरीश चंद्र भी राष्ट्रीय जनवादी पार्टी बना चुके हैं। वे 2009 के लोकसभा चुनाव में मऊ से चुनाव भी लड़े लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी। जबकि आईआरएस रहे डा. उदित राज भी इंडियन जस्टिस पार्टी बनाकर काफ ी दिनों से तक सक्रिय रहे। जब अपनी इंडियन जस्टिस पार्टी में सफ लता नहीं मिली तो भाजपा में शामिल हो गए और इस समय दिल्ली से संासद है। हालांकि इससे पूर्व अपने दल से जब राबर्टसगंज से लोकसभा के चुनाव लड़े 11वे स्थान पर थे। इसके अलावा पूर्व आईएएस अधिकारी देवीदयाल भी बुलंदशहर की खुर्जा सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुके है लेकिन जीत नहीं सके। आईएएस रहते हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लडऩे वाले धर्मसिंह रावत (दिवंगत) ने बर्खास्त होनेे के बाद भारत की लोक जिम्मेदार पार्टी बनाई। लेकिन उन्हें भी कामयाबी नहीं मिली। सेवानिवृत्त होने के बाद कई जिन आईएएस और आईपीएस अधिकारियों ने दल नहीं बनाया उन्होंने व्यवस्था से लडऩे और चुनाव के मद्देनजर सियासी दलों का झंडा उठा लिया है। 1992 बैच के आईएएस प्रभुदयाल श्रीवास चुनाव भले न लड़े हो लेकिन कांग्रेस जनसमस्या निस्तारण प्रकोष्ठ के  नौकरशाहों में चढ़ा...
अध्यक्ष बने। लखनऊ के जिलाधिकारी रहे आईएएस ओम पाठक लखनऊ पार्लियामेंट्री सीट से भाजपा उम्मीदवार अटल बिहारी बाजपेयी के खिलाफ  और मुख्य सचिव रह चुके महमूद बट 1980 में कांग्रेस उम्मीदवार शीला कौल के खिलाफ चुनाव लड़ चुके है। दोनों ही अधिकारियों को हार का सामना करना पड़ा। इसके अलावा रिटायर्ड आईएएस देवदत्त, देवीदयाल, आर.के.सिंह, बाबा हरदेव सिंह, आर.बी. भास्कर ने भी राजनीति में हाथ आजमाया, लेकिन सफलता नहीं मिली।

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