बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का
जो चीरा तो इक कतरा-ए-खूँ न निकला,
यूपी में मुस्लिम वोटरों की भूमिका सीमित हो रही है ? 2014 का लोकसभा। 2017 का चुनावी रिजल्ट, इस सवाल पर उपजे संदेह को मिटा देगा। सिर्फ साढ़े चार साल पहले सिलसिला शुरू हुआ। पहले लोकसभा में इस राज्य से मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व 'शून्य' हुआ। फिर विधानसभा में संख्या न्यूनतम स्तर पर गयी। कैराना उपचुनाव में खाता खुला, मगर वह अपवाद है। 19 फीसद मुस्लिम आबादी वाले प्रदेश में राजनीति की इस करवट ने कथित सेक्युलर दलों को रणनीति में बदलाव को प्रेरित किया... अब जो दिख रहा, वह अल्पसंख्यकों को विकल्पहीनता की ओर ले जाने वाला है। अजीब सवाल प्रतीत हो सकता है, मगर ये सचाई है कि भाजपा ने मुस्लिमों को चुनावी टिकटों से वंचित कर उसे लोकतांत्रिक व्यवस्था से अछूत कर रखा है। यह उनका राजनीतिक अंदाज है। इस पर ऐतराज नहीं होना चाहिए। लेकिन जिन दलों ने दशकों तक मुस्लिम मतों (वोटों) की बदौलत हुकूमत की। अपनी पीढ़ियों का मुस्तकबिल संवारा। जिनके दांव-पेंच के चलते ही मुस्लिम वोटों की बड़ी संख्या, एकजुटता का खौफ फैला। वही सेक्युलर दल राजनीतिक बदलाव के इस दौर में मुस्लिमों केउत्पीड़न, उनके रोजगार की छीना-झपटी, नाइंसाफी के सवाल पर संघर्ष करना तो दूर, उनकी समस्या पर बात करने से भी गुरेज कर रहे हैं। आखिर क्यों ? जवाब तल्ख है। कथित सेक्युलर दलों को भी सत्ता ही चाहिए वह भी अल्पसंख्यक वोटों की बदौलत, मगर उनके लिए इंसाफ का संघर्ष शायद, नहीं । यही कारण है कि भाजपा के जनाधार से मुकाबला करने के लिए लोकसभा चुनाव से पहले महागठबंधन का प्रयास तेजी से परवान चढ़ रहा है। यह राजनीति का अचरच नहीं है। फिर भी क्या यह सचाई नहीं है कि गठबंधन होने के साथ ही मुस्लिमों के सामने मताधिकार के विकल्प सीमित हो जाएंगे? भाजपा के मुकाबले महागठबंधन का जो भी प्रत्याशी होगा, मुसलमान मतदाताओं को उसके साथ ही जाना होगा, वरना वह कहां जाएगा ? अब सवाल ये है कि क्या सेक्युलर राजनीतिक दल मुसलमानों के सामने विकल्पहीनता पैदा करने के लिए गठबंधन का दांव खेलने के प्रयास में हैं? और यह स्थिति पैदा कर देना चाहते हैं कि उनके वोट मांगने की भी जरूरत न पड़े। जब वोट नहीं मांगें तो फिर हित की बात कैसी? जैसा भाजपा व्यवहार में करती है। यह भी तल्ख सच है कि जाति के खांचे में बंटे गैरअल्पसंख्यक मतदाताओं के पास राजनीतिक, आर्थिक समीकरण साधने के तब भी विकल्प मौजूद रहेंगे। मगर, गठबंधन की स्थिति में 19 फीसद वोटरों को हक-हकूक दिलाने का वादा करने की आवश्यकता महसूस नहीं होगी। सवाल हो सकता है क्यों? तो जवाब में साढेÞ चार साल की केन्द्र और डेढ़ साल की उत्तर प्रदेश सरकार के कार्य, फैसलों से आंकिये। जब भी न्याय और अन्याय के बीच की रेखा बारीक हुई, सेक्युलर दलों ने चुप्पी साध ली। कभी कांग्रेस इस वर्ग के वोटों को अपनी थाती समझती थी। मंडल-कमंडल के दौर में सपा-बसपा ने इन्हीं वोटों के बल पर नई सियासी गोलबंदी का सिलसिला शुरू किया। की तब भाजपा गोलबंदी को परखने व उसकी काट तलाशने के मोÞड में थी। ऐसे में विधानसभा में इस वर्ग की नुमाइंदगी बढऩी शुरू हुई। 1996 में 39 मुस्लिम विधायक बने। 2002 में यह संख्या-44 हुई। 2007 में यह संख्या-56 पहुंची। 2012 में रिकार्ड 68 मुस्लिम विधायक निर्वाचित हुए। मगर, 2014 लोकसभा चुनाव में सियासी चौसर कुछ इस अंदाज में बिछी कि मुस्लिम वोट बिखर गया। भाजपा ने मुसलमानों को दूर रखकर 81 बनाम 19 का जो दांव चला उससे संसद में उत्तर प्रदेश से मुस्लिमों की नुमाइंदगी शून्य हो गई। विधानसभा चुनाव में भाजपा ने तीन साल पुराना नुस्खा आजमाया और यह न सिर्फ कारगर रहा। क्योंकि मुस्लिम मतों में हमेशा की तरह फिर बंटवारा हुआ। आश्चर्यजनक बात यह कि मुजफ्फरनगर समेत ढेरों दंगों के बावजूद मुसलमानों के बड़े वर्ग ने सपा के साथ रहना पसंद किया, जबकि बिखरी हुई थी। बावजूद इसके जब दौर बदला तो सपा मुसलमानों के मुद्दे पर चुप्पी साध गयी है। यह तब हुआ था, जब बसपा ने सौ मुसलमानों को टिकट देकर भारी दांव लगाया था। बात आंकड़ों की हो तो मुस्लिमों की आबादी 19.5 के करीब है। 26 जिलों की 120 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैैं जहां उनकी आबादी 20 से 35 फीसद तक है। सात संसदीय क्षेत्र सीधे उसकी जद में हैं। मगर चुनाव परिणाम ने यह साबित किया है कि यह आबादी उलट-फेर में उस अंदाज में कारगर नहीं है, जिसका शोर किया जाता रहा है। आने वाले चुनाव में भी मुस्लिम एक फैक्टर तो रहेगा मगर वह 'वोट बैैंक के रूप में पढ़ा नहीं किया जा सकेगा, गठबंधन की स्थिति में वह विकल्पहीन होगा। मुसलमानों की समस्याओं पर लंबे समय से काम कर रहे व सपा के पूर्व राष्ट्रीय सचिव राजेश दीक्षित कहते हैं कि राजनीतिक दलों को यह समझना चाहिए कि मुसलमान सिर्फ मुसलमान नहीं है। वह इस देश का नागरिक है। उसके उतने ही अधिकार हैं, जितने दूसरों के हैं। ये और बात है कि अब मुसलमान भी अगड़े-पसमांदा (अगड़े-पिछड़े) के बीच बंटा है। उसके यहां भी बरेलवी, देवबंदी, हनफिया, सुन्नी, शिया, कादरिया समेत ढेरों फिरके हैं। ऐसे में खास तरह का धुव्रीकरण कर रहे दल इसका लाभ तो उठायेंगे ही। इस बात से इतर अगर समझे तो कहा जा सकता है कि
दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लम्बी है गम की शाम मगर शाम ही तो है।
जो चीरा तो इक कतरा-ए-खूँ न निकला,
यूपी में मुस्लिम वोटरों की भूमिका सीमित हो रही है ? 2014 का लोकसभा। 2017 का चुनावी रिजल्ट, इस सवाल पर उपजे संदेह को मिटा देगा। सिर्फ साढ़े चार साल पहले सिलसिला शुरू हुआ। पहले लोकसभा में इस राज्य से मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व 'शून्य' हुआ। फिर विधानसभा में संख्या न्यूनतम स्तर पर गयी। कैराना उपचुनाव में खाता खुला, मगर वह अपवाद है। 19 फीसद मुस्लिम आबादी वाले प्रदेश में राजनीति की इस करवट ने कथित सेक्युलर दलों को रणनीति में बदलाव को प्रेरित किया... अब जो दिख रहा, वह अल्पसंख्यकों को विकल्पहीनता की ओर ले जाने वाला है। अजीब सवाल प्रतीत हो सकता है, मगर ये सचाई है कि भाजपा ने मुस्लिमों को चुनावी टिकटों से वंचित कर उसे लोकतांत्रिक व्यवस्था से अछूत कर रखा है। यह उनका राजनीतिक अंदाज है। इस पर ऐतराज नहीं होना चाहिए। लेकिन जिन दलों ने दशकों तक मुस्लिम मतों (वोटों) की बदौलत हुकूमत की। अपनी पीढ़ियों का मुस्तकबिल संवारा। जिनके दांव-पेंच के चलते ही मुस्लिम वोटों की बड़ी संख्या, एकजुटता का खौफ फैला। वही सेक्युलर दल राजनीतिक बदलाव के इस दौर में मुस्लिमों केउत्पीड़न, उनके रोजगार की छीना-झपटी, नाइंसाफी के सवाल पर संघर्ष करना तो दूर, उनकी समस्या पर बात करने से भी गुरेज कर रहे हैं। आखिर क्यों ? जवाब तल्ख है। कथित सेक्युलर दलों को भी सत्ता ही चाहिए वह भी अल्पसंख्यक वोटों की बदौलत, मगर उनके लिए इंसाफ का संघर्ष शायद, नहीं । यही कारण है कि भाजपा के जनाधार से मुकाबला करने के लिए लोकसभा चुनाव से पहले महागठबंधन का प्रयास तेजी से परवान चढ़ रहा है। यह राजनीति का अचरच नहीं है। फिर भी क्या यह सचाई नहीं है कि गठबंधन होने के साथ ही मुस्लिमों के सामने मताधिकार के विकल्प सीमित हो जाएंगे? भाजपा के मुकाबले महागठबंधन का जो भी प्रत्याशी होगा, मुसलमान मतदाताओं को उसके साथ ही जाना होगा, वरना वह कहां जाएगा ? अब सवाल ये है कि क्या सेक्युलर राजनीतिक दल मुसलमानों के सामने विकल्पहीनता पैदा करने के लिए गठबंधन का दांव खेलने के प्रयास में हैं? और यह स्थिति पैदा कर देना चाहते हैं कि उनके वोट मांगने की भी जरूरत न पड़े। जब वोट नहीं मांगें तो फिर हित की बात कैसी? जैसा भाजपा व्यवहार में करती है। यह भी तल्ख सच है कि जाति के खांचे में बंटे गैरअल्पसंख्यक मतदाताओं के पास राजनीतिक, आर्थिक समीकरण साधने के तब भी विकल्प मौजूद रहेंगे। मगर, गठबंधन की स्थिति में 19 फीसद वोटरों को हक-हकूक दिलाने का वादा करने की आवश्यकता महसूस नहीं होगी। सवाल हो सकता है क्यों? तो जवाब में साढेÞ चार साल की केन्द्र और डेढ़ साल की उत्तर प्रदेश सरकार के कार्य, फैसलों से आंकिये। जब भी न्याय और अन्याय के बीच की रेखा बारीक हुई, सेक्युलर दलों ने चुप्पी साध ली। कभी कांग्रेस इस वर्ग के वोटों को अपनी थाती समझती थी। मंडल-कमंडल के दौर में सपा-बसपा ने इन्हीं वोटों के बल पर नई सियासी गोलबंदी का सिलसिला शुरू किया। की तब भाजपा गोलबंदी को परखने व उसकी काट तलाशने के मोÞड में थी। ऐसे में विधानसभा में इस वर्ग की नुमाइंदगी बढऩी शुरू हुई। 1996 में 39 मुस्लिम विधायक बने। 2002 में यह संख्या-44 हुई। 2007 में यह संख्या-56 पहुंची। 2012 में रिकार्ड 68 मुस्लिम विधायक निर्वाचित हुए। मगर, 2014 लोकसभा चुनाव में सियासी चौसर कुछ इस अंदाज में बिछी कि मुस्लिम वोट बिखर गया। भाजपा ने मुसलमानों को दूर रखकर 81 बनाम 19 का जो दांव चला उससे संसद में उत्तर प्रदेश से मुस्लिमों की नुमाइंदगी शून्य हो गई। विधानसभा चुनाव में भाजपा ने तीन साल पुराना नुस्खा आजमाया और यह न सिर्फ कारगर रहा। क्योंकि मुस्लिम मतों में हमेशा की तरह फिर बंटवारा हुआ। आश्चर्यजनक बात यह कि मुजफ्फरनगर समेत ढेरों दंगों के बावजूद मुसलमानों के बड़े वर्ग ने सपा के साथ रहना पसंद किया, जबकि बिखरी हुई थी। बावजूद इसके जब दौर बदला तो सपा मुसलमानों के मुद्दे पर चुप्पी साध गयी है। यह तब हुआ था, जब बसपा ने सौ मुसलमानों को टिकट देकर भारी दांव लगाया था। बात आंकड़ों की हो तो मुस्लिमों की आबादी 19.5 के करीब है। 26 जिलों की 120 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैैं जहां उनकी आबादी 20 से 35 फीसद तक है। सात संसदीय क्षेत्र सीधे उसकी जद में हैं। मगर चुनाव परिणाम ने यह साबित किया है कि यह आबादी उलट-फेर में उस अंदाज में कारगर नहीं है, जिसका शोर किया जाता रहा है। आने वाले चुनाव में भी मुस्लिम एक फैक्टर तो रहेगा मगर वह 'वोट बैैंक के रूप में पढ़ा नहीं किया जा सकेगा, गठबंधन की स्थिति में वह विकल्पहीन होगा। मुसलमानों की समस्याओं पर लंबे समय से काम कर रहे व सपा के पूर्व राष्ट्रीय सचिव राजेश दीक्षित कहते हैं कि राजनीतिक दलों को यह समझना चाहिए कि मुसलमान सिर्फ मुसलमान नहीं है। वह इस देश का नागरिक है। उसके उतने ही अधिकार हैं, जितने दूसरों के हैं। ये और बात है कि अब मुसलमान भी अगड़े-पसमांदा (अगड़े-पिछड़े) के बीच बंटा है। उसके यहां भी बरेलवी, देवबंदी, हनफिया, सुन्नी, शिया, कादरिया समेत ढेरों फिरके हैं। ऐसे में खास तरह का धुव्रीकरण कर रहे दल इसका लाभ तो उठायेंगे ही। इस बात से इतर अगर समझे तो कहा जा सकता है कि
दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लम्बी है गम की शाम मगर शाम ही तो है।
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